आप क्या चाहते है ? – पूज्य आशाराम बापूजी

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आप क्या चाहते है ? – पूज्य बापूजी 
आवश्यकताएँ कम करो | कम आवश्यकता में आप बादशाह बन जाओगे | जो बचा हुआ समय है, वह ईश्वर में लगा दो तो महान बन जाओगे | ॐ …. ॐ…. ॐ…
हर आदमी एक शक्तिपुंज है | हर आदमी से उसके विचारों के आंदोलन फैलाते हैं | भूमि में तमाम प्रकार के रस छुपे हैं | इन बाह्य आँखों से वह नहीं दीखता | एक ही जमीन लेकिन जैसा बीज होता है वैसा सर्जन होता है, जैसे – गन्ना, बाजरा, गेंहूँ इत्यादि | ऐसे ही हममें भी अनंत-अनंत रस भरा है, अनंत-अनंत क्षमताएँ भरी हैं | हमको जैसा बाहर से वातावरण मिलता है, उसी प्रकार की अंदर सिंचाई होती है |
आपके पास बाह्य जगत का कितना ज्ञान या धन है, यह मूल्यवान नहीं है | परमात्मा यह पूछता है कि आप क्या चाहते है ? आपको किस चीज की प्यास है ? किसको चाहते हो, श्वाश्व्त सुख चाहते हो या नश्वर ? नश्वर से जन्म-मरण, नरक-स्वर्ग की प्राप्ति एवं शाश्वत सुख से परमात्मा की प्राप्ति होगी | अहं को विकसित करना चाहते हो या विसर्जित करना चाहते हो ? जन्म-मरण का सामान बढ़ाना चाहते हो ? आपके पास क्या है इसका मूल्य नहीं है लेकिन आप क्या है इसका मूल्य है | आप जिज्ञासु है, भक्त हैं, साधक हैं कि फिर संसार के मजदूर हैं ? सब इकट्ठा किया, बनाया, कुटुम्बियों-मित्रों को खुश रखा लेकिन मौत का झटका आया, सब चला गया – ये हैं संसार के मजदूर !
आप संसार के मजदुर हो या संसार को साधन बनाकर उपयोग करते हुए अपनी यात्रा तय करनेवाले पथिक हो ? आपमें भगवान को पाने की तडप हैं या हाड-मांस के मरनेवाले शरीर की प्रतिष्ठा चाहते हो ? संसार के मजदुर से जिज्ञासु बहुत ऊँचा होता है | रावण ने सोने की लंका पायी परंतु एक टोला भी सोना अपने साथ ले नहीं गया | संत कबीरजी कहते हैं :
क्या करिये क्या जोडीये थोड़े जीवन काज |
छोड़ी-छोड़ी सब जात हैं देह गेह धन राज ||
शरीर को, धन को, राज्य को सब छोड़-छोडकर जा रहें है | सब चला-चली का मेल है | छूटनेवाले, मरनेवाले शरीर से अमर आत्मा की यात्रा कर लो | शरीर ख़ाक में मिले उसके पहले अपनी वासना, अनात्म अज्ञान को खाक में मिला दो | यह अपने हाथ की बात है | कुटुम्बी अर्थी पर बाँधकर श्मशान में जला दें उसके पहले ही अपनी समझ से अपने-आपको भगवान के चरणों में सौंप दो | जिन्होंने शरीर, मन, बुद्धि का सदुपयोग किया वे सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रम्ह स्वरुप में रहे और जो असत, जड़, दुःख में ही भटकते रहेंगे | इसलिए आँखों की रौशनी कम होने लगे उसके पहले भीतर की आँख खोल दो | बेडा पार हो जायेगा ! बहुएँ मुँह मोड़ लें उसके पहले अभी से संसार से मुँह लो तो बुढ़ापे में पश्चाताप नहीं होगा |
चाहे हरिभजन कर चाहे विषय कमाय |
चाहो तो परमात्मा का भजन कर मुक्त हो जाओ, अपनी २१ पीढ़ियों का उद्धार करो और चाहो तो हाय-हाय करके जगत की चीजे सँभालो, बटोरो और अंत में मृत्यु का झटका लगते ही छोड़ दो |
नौकरी-धंधा करने की मना नहीं हैं | यह सब करके अपनी आवश्यकता है श्वास लेने की, बिना परिश्रम के पूरी होती है | पानी और भोजन की आवश्यकता भी थोड़े परिश्रम से पूरी हो जाती है | लेकिन इच्छाएँ बढ़ जाती है तो बंधन होता है | जिस शरीर को जलाना है उसीको लाड लड़ाते रहते है और जो लाड लड़ाते है उन्हींकी हम नकल की जाय तो हमारा कल्याण हो जाय ! शुकदेवजी, संत कबीरजी, संत तुकारामजी, एकनाथजी महाराज, ज्ञानेश्वरजी महाराज, मीराबाई, स्वयंप्रभा, सुलभा, साँई लीलाशाहजी महाराज आदि की ऊँचाई को देखकर हम अपनी सच्ची आवश्यकता व स्वभाव बनाये तो आसानी से मुक्त हो सकते है |

अलख पुरुष की आरसी – पूज्य आशाराम बापूजी

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अलख पुरुष की आरसी – पूज्य बापूजी
संत कबीरजी से किसीने कहा : “हम निर्गुण, निराकार परमात्मा को देख नहीं पाते, फिर भी देखे विना रह न जायें ऐसा कोई उपाय बताइये |”
कबीरजी ने कहा : “परमात्मा को देखने के लिए ये चमड़े की आँखे काम नहीं आतीं | इन आखों से तो परमात्मा नहीं दिखेगा परंतु यदि तुम देखना ही चाहते हो तो जिनके ह्रदय में आत्मस्वरुपाकार वृत्ति प्रकट हुई है, जिनके ह्रदय में समतारूपी परमात्मा प्रगट हुआ है, अद्वैत ज्ञानरुपी परमात्मा प्रकट हुआ हाउ ऐसे किन्ही महापुरुष को तुम देख सकते हो | जिन्हे देखकर तुम्हें परमात्मा याद आ जायें, जिस दिल में ईश्वर निरावरण हुआ है, उन संत-महापुरुष को देख सकते हो |
अलख पुरुष की आरसी साधू का ही देह | लखा जो चाहे अलख को इन्हीं में तू लख लेह ||
साधू की देह एक ऐसा दर्पण है जिसमें तुम उस अलख पुरुष परमात्मा के दर्शन कर सकते हो | इसलिए अलख पुरुष को देखना चाहते हो तो ऐसे किन्हीं परमात्मा के प्यारे आत्मसाक्षात्कारी परमत्मास्वरुप संत का बार-बार सत्संग व सान्निध्य पाना चाहिए |
शुद्ध ह्रदय से, ईमानदारी से उन महापुरुष के गुणों का चिंतन करके ह्रदय को धन्यवाद से भरते जाओगे तो तुम्हारे ह्रदय में उस परमात्मा को प्रकट होने में देर न लगेगी | परमात्मा को पाना इतना सरल होते हुए भी लोग इसका फायदा तो ले नहीं पाते वरन अपनी क्षुद्र मति से उनको नापते रहते हैं और अपना ही नुकसान करते हैं |
वशिष्ठजी महाराज कहते हैं : “ हे रामजी !  अज्ञानी जो कुछ मेरे लिए कहते और हँसते हैं, सो सब मैं जानता हूँ परंतु मेरा दया को स्वभाव है, इससे मैं चाहता हूँ कि किसी प्रकार वे नरकरूप संसार से निकलें | इसी कारण मैं उपदेश करता हूँ |”
अयोध्या नरेश दशरथ जिनले चरणों में अपना सिर झुकाकर अपने को सौभाग्यशाली मानते है और श्रीराम जिनके शिष्य हैं, ऐसे गुरु वसिष्ठजी को भी उन निंदकों ने क्या-क्या नहीं कहा होगा ? तो तुम्हारे लिए भी कोई कुछ कह दे तो चिंता मत करना |
अपनी महिमा में मस्त रहनेवाले संतों-महापुरुषों पर लोगों की अच्छी-बुरी बातों का कोई असर नहीं पड़ता है परंतु जो संतों का आदर, पूजन, सेवा करता है वह अपना भाग्य उज्ज्वल बनाता है, उसका ह्रदय आत्मसुख से सम्पन्न होने लगता है और जो उनकी निंदा करता है वह अपने भाग्य को अंधकार में डालता है | संतों की नजर में कोई अच्छा-बुरा नही होता है | संतों की नजर में तो बस, केवल वही होता है – एक्मेवाद्वितीयोsहम |   
जिसकी जैसी भावना, जिसकी जैसी दृष्टी और जिसका जैसा प्रेम, वैसा ही उसको लाभ या हानि होती है |
करमी आपो आपनी के नेडै के दूरि |
अपनी ही करनी से, अपने ही भावों से आप स्वयं को अपने गुरु के, संत के नजदीक अनुभव करते हो और अपने ही भावों से दुरी का अनुभव करते हो | संत के ह्रदय में अपना-पराया कुछ नहीं होता है लेकिन कलियुगी अल्प मतिवाले गलत बात तो बहुत जल्दी स्वीकार कर लेंगे, अच्छी बात को स्वीकार नहीं करेंगे | सच्चाई फ़ैलाने में तो जीवन पूरा हो जाता है परंतु कुछ अफवाह फैलानी है तो फटाफट फ़ैल जाती है | जो लोग तुरंत कुप्रचार के शिकार बन जाते हैं वे अल्प मतिवाले हैं, उनकी विचारशक्ति कुंठित हो गयी है |
गुजरात में नरसिंह मेहता नाम के प्रसिद्द संत हो गये | उनके लिए भी ईर्ष्यालु लोगों ने कई बार अफवाहें फैलायी थी, गलत बातों का खूब प्रचार किया था लेकिन अफवाहें फैलानेवाले कौन-से नरक में गये होंगे, किस माता के गर्भ में लटकते होंगे यह हम और तुम नहीं जानते परंतु नरसिंह मेहता को तो आज भी करोड़ों लोग जानते-मानते हैं, आदर से उनका नाम लेते हैं |
नरसिंह मेहता के बारे में जब अफवाहें गलत साबित हुई, जब लोगों को पता चला कि नरसिंह मेहता की दृढ़ भक्ति के कारण चमत्कार होते हैं तो चमत्कार के प्यारे उनके आस-पास इकट्टे होते रहते थे | वे चमत्कार के भक्त थे, नरसिंह मेहता के भक्त नहीं थे |
ऐसा कई संतो के साथ होता है | जब तक सब ठीक लगता है तब तक तो लोग संत के साथ होते है, अपने को संत का भक्त कहलाते हैं किंतु जरा-सी कुछ दिक्कत लगी कि खिसक जाते है | ऐसे लीग सुबिधा के भक्त होते है, संत के भक्त नहीं होते | संत का भक्त वही है कि कितनी भी विपरीत परिस्थिति आ जाय किंतु उसका भक्तिभाव नहीं छूटता | सुविधा के भक्त तो कब उलझ जायें, कब भाग जायें पता नहीं | जो नि:स्वार्थ भक्त होते हैं वे अडिंग रहते हैं, कभी फरियाद नहीं करते | वे तो संत के दर्शन, सत्संग से और उनकी महिमा का गुणगान करके आनंदित, उल्लसित, रोमांचित होते है | किसीकी निंदा या विरोध से संत को कोई हानि नहीं होती और किसीके द्वारा प्रशंसा करने से वे बड़े नहीं हो जाते |
सच्चे संतों का आदर-पूजन जिनसे नहीं सहा गया, ऐसे ईर्ष्यालु लोगों ने ही जोर-शोर से कुप्रचार किया है | संतो के व्यवहार को पाखंड बताकर मानो उन्होंने ही धर्म के प्रचार का ठेका उठाया है | ऐसे लोगों को पता ही नहीं कि वे क्या कर रहे हैं | जब कबीरजी आये तब निंदकों ने कहा : ‘हम धर्म की जजय कर रहें हैं |’ तब सुकरात आये तब राजा तथा अन्य कुछ लोगों ने कहा “ ‘हम धर्म की जय कर रहे हैं |’ इस प्रकार संतों पर जुल्म किये गये |
पिछले दो हजार वर्षों में जो धर्म-पंथ हुए हैं, उन्होंने हिन्दू धर्म की गरिमा को न जानकर ऐसी-ऐसी साजिशे की कि हिन्दू हाथे बन गये साजिश के और आपस में लड़ –भिड़े | अपने ही लोग संतों की निंदा करके हिन्दू संकृति को क्षीण करने का जघन्य अपराध करते आ रहे हैं | लेकिन चाहे कैसी भी मुसीबतें आयी  तो भी जो सच्चे भक्त थे, श्रद्धालु थे, उन लोगों ने सच्चे संतों की शरण नहीं छोड़ी और दैवी कार्य नहीं छोड़ा | निंदा की दलदल में फँसे नहीं, कुप्रचार के आँधी – तूफानों में पतझड़ की नाई गिरे नहीं; डटे रहे, धनभागी हुए | संत कबीरजी के साथ सलूका-मलूका, गुरु नानकजी के साथ बाला-मरदाना ऐसे श्रद्धालु शिष्य थे, जिनके नाम इतिहास में अमर हो गये |इसी प्रकार तुकारामजी महाराज, ज्ञानेश्वरजी महाराज, संत एकनाथजी, रामसुखदासजी महाराज, सांई टेऊँरामजी, सांई लीलाशाहजी महाराज )और संत आशारामजी बापू ) आदि सभी संतों के प्रति निंदकों ने अपने लक्षण दिखाये व सज्जनों ने अपनी सज्जनता से फायदा उठाया | वे सौभाग्यशाली सज्जन यहाँ भी सुख-शांति व परमात्म-ध्यान की प्राप्ति में सफल हुए व परलोक में भी सफल हुए और होते रहेंगे |
शिवजी कहते हैं : धन्या माता ….
धन्य हैं वे शिष्य, जो अलख पुरुष की आरसी स्वरुप ब्र्म्हवेत्ता संतो को श्रद्धा-भक्ति से देखते हैं और उनसे आखिरी डीएम तक निभा पाते हैं | जो निंदा या कुप्रचार के शिकार बनाकर अपनी शांति का घात नहीं करते वे बडभागी है |    
             

मेवों द्वारा बल व स्वास्थ्य प्राप्ति

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मेवों द्वारा बल व स्वास्थ्य प्राप्ति 
  • अखरोट : १० ग्राम अखरोट को गाय के घी में भूनकर मिश्री मिला के खाने से स्मरणशक्ति तीव्र होती    है व मानसिक थकावट दूर हो जाती है | २० ग्राम अखरोट, मिश्री व केसर को दूध में मिलाकर पीने से नपुंसकता में लाभ होता है |
  • अंजीर : इसमें लौह प्रचुर मात्रा में होने से रक्त की वृद्धि होती है | यह रक्त की शुद्धि भी करता है | इसमें निहित विटामिन ‘ए’ नेत्रज्योति की सुरक्षा करता है | अंजीर में पेट के मल को निष्कासित करने की विशेष क्षमता है | २ सूखे अंजीर रात को पानी में भिगोकर सुबह और सुबह भिगोकर शाम को खाने से पुराणी खाँसी, डीएमए, टी. बी., रक्तपित्त, पुराना गठिया रोग, बवासीर, पित्तजन्य त्वचाविकारों में लाभ होता है |
  • काजू : यह स्निग्ध, पौष्टिक, वायुशामक, पाचनशक्ति बढ़ानेवाला, जठराग्नि-प्रदीपक व शांतिदायक है | सुबह शहद के साथ ५ – ७ काजू खाने से दिमाग की कमजोरी मिटती है | किशमिश के साथ सेवन करने से रक्त की वृद्धि होती है | पानी में पीसकर चटनी बनाकर खाने से अजीर्ण, अफरा मिट जाता है | दूध के साथ सेवन करने से ह्रदय, मस्तिष्क व नाड़ी संस्थान को बल मिलता है |
  • बादाम : यह उत्कृष्ट वायुशामक व सप्तधातुवर्धक है | ५ भीगे हुए बादाम छिलके उतारकर २ – ३ काली मिर्च के साथ खूब पीस के मक्खन-मिश्री अथवा दूध के साथ सेवन करने से स्मरणशक्ति व नेत्रज्योति बढती है |
अमेरिकन बादाम बलहीन, सत्त्व निकाले हुए होते हैं | यदि मामरी बादाम मील जायें तो रात का भिगोया हुआ १ बादाम सुबह दाँतों से पीसकर खाने से १० बादाम खाने की ताकत मिलती है |
बादाम का तेल नाक में डालने से मस्तिष्क को शीध्र ही बल मिलता है, सिरदर्द भी मिट जाता है | इसका निरंतर प्रयोग हिस्टिरिया में बहुत लाभदायी है | गर्भवती स्त्री को ९वाँ महिना लगते ही १० ग्राम बादाम का तेल दूध व मिश्री के साथ देने से प्रसव सुलभ हो जाता है |
  • पिस्ता : सूखे मेवों में आँतों को बल प्रदान करने में पिस्ता सर्वोत्तम हैं |
सावधानी : सूखे मेवों का सेवन विशेषत: सर्दियों में तथा मात्रावत करना उचित है |

लौकी द्वारा स्वास्थ्य-सुरक्षा

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लौकी द्वारा स्वास्थ्य-सुरक्षा 
  • लौकी पौष्टिक, कफ-पित्त शामक, वीर्यवर्धक, रुचिकर, शीतल, रेचक तथा ह्रदय के लिए बलप्रद, गर्भपोषक तथा गर्भावस्था की कब्जियत दूर करती है | इसका तेल मस्तिष्क की गर्मी दूर करता है | क्षयरोगियों के लिए लौकी बहुत हितकर है |
  • २० से २५ मि.ली. लौकी के रस में आधा चम्मच शहद या शक्कर मिलाकर लेने से शरीर का दाह, गले की जलन, रक्तविकार, फोड़े, शीतपित्त आदि रोगों में लाभ होता है |
  • २ से ४ चम्मच लौकी के रस में पाँव चम्मच जीरा चूर्ण व एक चम्मच शहद मिलाकर सुबह खाली पेट लेने से ह्रदय के स्नायुओं को बल मिलता है,  पित्त के कारण होनेवाली पेट और छाती की जलन कम होती है, भोजन में रूचि बढती है | प्रयोग के एक घंटे बाद तक कुछ न लें |
  • ताज़ी लौकी को कद्दूकश कर घी में भुन लें | इसमें मिश्री, जीरा, सेंधा नमक डाल के खाने से धातु का पोषण होकर शरीर स्वस्थ्य बनता है | इससे शौच साफ़ आता है |
  • ह्र्द्यरोगियों के लिए उबली लौकी में धनिया, जीरा, हल्दी और हरा धनिया डालकर खाना लाभदायक है |

सावधानी :१] अतिसार, सर्दी-खाँसी, दमे के रोगी लौकी न खायें |

२] पुरानी ( पकी ) लौकी से कब्जियत होने के कारण उसका उपयोग न करें |

३] कडवी लौकी ( तुमड़ी ) विषैली होने से उसका सेवन निषिद्ध है |

Veshya Ki Putri Kanupatra ki Bhagwad Bhakti- Pujya Bapuji

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Vaishya Ki Putri Kanupatra ki Bhagwad Bhakti- Pujya Bapuji
Shayama naam ki vaishya kaami logo ko apna sharir bech kar gujara karti thi.. uskibeti kanupatra jitni bahar se sundar thi utni hi andar se bhi sundar thi…usne apni maa se vaishya ka dhanda karne se mana kar diya.. to maa ne use kisi sabhya vyukti se shadi karke ghar basane ki salaah di.. lekin kanupatra patni ke haad mans ko noch kar sukhi  hokar apne or patni ke swasthaya ka satya naash karne wala pati nahi chahti thi.. Jo patni ko bhi bhagwan ke raste chalne me madad kare or  khud bhi bhagwan me man lagaye aisa pati chahti thi.. lekin aisa pati to ya to bhagwan ko paya hua mahapurush ho sakta hai ya bhagwan swayam honge.. ab brahmgyani kaha dhoodu.. to brahm swaroop bhagwan vitthal ke paas jane lagi.. or bhagwan ko 1 tak dekhti.. ektak dekhne se sankalp vikalp kam hote hai to mansik shaktiya viksit hone lagi..dhyan moolam guru murti se chithda pahan ne wala eklavya itna uncha gaya ki arjun jinko satat bhagwan ka sang the we bhi uske age bone ho gaye.. bhagwan or guru jab apne lagne lagte hai to unme prema bhakti jaagti hai.. or prema bhakti dosho ko har leti hai.. uska sondarya or shraddha bhakti dekh kar sab uski sarahna karne lage or wahi uske liye musibat ban gaya..

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मुक्‍ति और आत्‍मसाक्षात्‍कार एक ही है या अलग-अलग है – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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मुक्‍ति और आत्‍मसाक्षात्‍कार एक ही है या अलग-अलग  है – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू
मुक्‍त का मतलब है बंधनों से मुक्‍त होना और दुखों से मुक्‍त होना । दुखों से मुक्‍त…. आत्‍मसाक्षात्‍कार के बिना हुआ नहीं जाता । परमात्‍मा की प्राप्‍ति कहो, मुक्‍ति कहो एक ही बात है । मुक्‍ति भी पांच प्रकार की होती है – यहां से मर गये, स्‍वर्ग में चले गये, इसको स्‍वर्गीय मुक्‍ति कहते है । ठाकुरजी का भजन करके ठाकुरजी के देश में चले गये वो सायुज्‍य मुक्‍ति होती है । ठाकुरजी के नजदीक रहे तो सामीप्‍य मुक्‍ति । और नजदीक हो गये मंत्री की नाईं…….. सायुज्‍य मुक्‍ति, सामीप्‍य मुक्‍ति……. लेकिन वास्‍तविक में पूर्ण मुक्‍ति होती है कि जिसमें ठाकुरजी जिस आत्‍मा में, मैं रूप में जगे है उसमें अपने आप को जानना…. ये जीवनमुक्‍ति होती है …. जीते-जी यहां होती है । दूसरी मुक्‍ति मरने के बाद होती है …. स्‍वर्गीय मुक्‍ति, सालोक्‍य मुक्‍ति, सामीप्‍य मुक्‍ति, सायुज्‍य मुक्‍ति, सारूप्‍य मुक्‍ति । इष्‍ट के लोक में रहना सालोक्‍य मुक्‍ति है । उनका चपरासी अथवा द्वारपाल जितनी नजदीकी लाना सायुज्‍य मुक्‍ति है । सामीप्‍य मुक्‍ति …. उनका खास मंत्री अथवा भाई की बराबरी । जैसे रहते है राजा का भाई ऐसे हो जाना भक्‍ति से सारूप्‍य मुक्‍ति । इन मुक्‍तियों में द्वैत बना रहता है । ये अलग है, मैं अलग हूँ और ये खुश रहें । उनके जैसा सुख-सुविधा, अधिकार भोगना, ये सालोक्‍य, सामीप्‍य मुक्‍तियां है और पूर्ण मुक्‍ति है कि अपनी आत्‍मा की पूर्णता का साक्षात्‍कार करके यहीं……… पूर्ण गुरूकृपा मिली, पूर्ण गुरू के ज्ञान में अनंत ब्रह्माण्‍डव्‍यापी अपने चैतन्‍य स्‍वभाव से एकाकार होना…….. ये जीवनमुक्‍ति है, परममुक्‍ति है । मुक्‍तियों के पांच भेद है – यहां से मरकर स्‍वर्ग में गये, चलो मुक्‍त हो गये । वहां राग-द्वेष भी ज्‍यादा नहीं होता, और कम होता है लेकिन फिर भी इधर से तो बहुत अच्‍छा है । ….तो हो गये मुक्‍त । जैसे कर्जे से मुक्‍त हो गये, झगड़े से मुक्‍त हो गये । तलाक दे दिया, झंझट से मुक्‍त हो गये, ऐसी मुक्‍तियां तो बहुत है लेकिन पूर्ण परमात्‍मा को पाकर, बाहर से सुखी होने क बदले सत में, चित में, आनंद में स्‍थिति हो गई वो है पूर्ण मोक्ष……….. इसको जीवन्‍मुक्‍ति बोलते है, कैवल्‍यमुक्‍ति बोलते है ।

 

भगवान ने जगत क्‍यों बनाया ? – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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भगवान ने जगत क्‍यों बनाया ? – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू 
ये संसार भगवान ने पुजवाने के लिये नहीं बनाया, जैसे नेता वोट बैंक के लिये अपने एरिया में घूमता है ऐसे भगवान सृष्‍टि करके अवतार लेकर वोट बैंक के लिये नहीं आते अथवा वोट बैंक के लिये भगवान ने ये सृष्‍टि नहीं बनाई । भगवान ने आपको गुलाम बनाने के लिये भी सृष्‍टि नहीं बनार्इ । भगवान ने आपको अपने अलौकिक आनंद, माधुर्य, ज्ञान और प्रेमाभक्‍ति के द्वारा अपने से मिलने के लिये सृष्‍टि बनाई । भगवान परम प्रेमास्‍पद है । बिछड़े हुए जीव अपने स्‍वरूप से मिले इसलिये सृष्‍टि है । वो सृष्‍टि में अनुकूलता देकर, योग्‍यता देकर आपको उदार बनाता है कि इस योग्‍यता का आप ‘‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’’ सदुपयोग करो और प्रतिकूलता, विघ्‍न-बाधा देकर आपको सावधान करता है कि संसार तुम्‍हारा घर नहीं है । ये एक पाठशाला है, यहां से आप यात्रा करके मुझ परमेश्‍वर से मिलने आये हो । इसलिये दुख भी भेजता है । दुख सदा नहीं रहता और सुख भी सदा नहीं रहता । धरती का कोई व्‍यक्‍ति सुख को टिकाये रखे, संभव ही नहीं । दुख को टिकाये रखो, संभव नहीं है क्‍योंकि उसकी व्‍यवस्‍था है । सुख भी आकर तुम्‍हे उदार और परोपकारी बनाने का संदेश देता है । आप सुख के भोगी हो जाते हो तो रावण का रास्‍ता है और सुख को ‘’बहुजन हिताय’’ बांटते हो तो रामजी का रास्‍ता है । सुख को अपना भोग बनाते हो तो कंस का रास्‍ता है और सुख को बहुतों के लिये काम में लाते हो तो कृष्‍ण का रास्‍ता है । ऐसे ही दुख आया तो आप दुख के भोगी मत बनो । दुख आया है तो आपको पाठशाला में सिखाता है कि आप लापरवाही से उपर उठो, आप संसारी स्‍वाद से उपर उठें । संसारी स्‍वाद लेकर आपने कुछ ज्‍यादा खाया है तो बीमारी रूपी दुख आता है अथवा वाहवाही में आप लगे तो विघ्‍न और निंदा रूपी दुख आता है लेकिन वाहवाही में नहीं लगे फिर भी महापुरूषों के लिये कई कई उपद्रव पैदा होते है ताकि समाज को सीख मिले कि महापुरूषों के उपर इतने-इतने उपद्रव आते है, अवतारों पर इतने उपद्रव आते है पर वो मस्‍त रहते है, सम रहते है तो हम काहे को डिगें? हम काहे को घबरायें? ये व्‍यवस्‍था है । कृष्‍ण पर लांछन आये, रामजी पर लांछन आये, बुद्ध पर लांछन आये, कबीरजी पर आये, धरती पर ऐसा कोई सुप्रसिद्ध महापुरूष नहीं हुआ जिन पर लांछन की बौछार न पड़ी हो ।

दृढ़ संकल्प से ईश्वर प्राप्ति – पुराना दुर्लभ सत्संग

संत आसाराम बापू, ब्रम्ह ज्ञानी, कवि कालिदास, कवि दंडी, सरस्वती, श्री कृष्ण, ज्ञानी, देवता, राग-द्वेष, ब्राह्मण, संत, त्राटक, दृढ़ निश्चय

  • कवि कालिदास और कवि दंडी में कौन श्रष्ठ ?
  • माँ सरस्वती की आराधना
  • श्री कृष्ण – ज्ञानी मेरा स्वरुप
  • ज्ञानी की कोई इच्छा नहीं
  • देवता की आराधना
  • राग-द्वेष से शाक्तियो का नाश
  • एक ब्राह्मण की कथा
  • संत के संकेत से लाभ
  • त्राटक- एकाग्रता बढ़ाने की कुंजी
  • दृढ़ निश्चय -आत्म ज्ञान की कुंजी

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पूज्य आसाराम बापूजी के साथ प्रश्न और उत्तर

gurujii

Question & Answer with Pujaya Bapuji
पूज्य आसाराम बापूजी के साथ प्रश्न और उत्तर
१] मंत्र के अर्थ में प्रीति कैसे हो ?
अर्थ प्रेमस्वरुप ही तो है | बार-बार जपे, बार–बार अर्थ में गोते मारे तो प्रीति बढती है |
 
२] ध्यान में मन नहीं लगता | कुसंगति  से कैसे बचें ? कामविकार से कैसे बचें ? स्वप्नदोष से कैसे बचें ? पानी पड़ने की बीमारी से कैसे बचें ?
ध्यान-भजन करते तो, मन इधर-उधर जाता है तो चुपचाप बैठते तो मन सुन्न हो जाता है | तो लंबा श्वास लिया और हरि ॐ…. ॐ….. ॐ… ॐ…. ॐ….. किया तो ये मनोराज मिटाने का, ध्यान लगाने का पद्धति है, ये मनोराज भगा देगा | 
कुसंगति  से कैसे बचें ? कामविकार से कैसे बचें ? स्वप्नदोष से कैसे बचें ? पानी पड़ने की बीमारी से कैसे बचें
नाक से श्वास निकाल दी…. उतनी देर योनिमुद्रा को सिकोड़ लिया और हमारी जीवनशक्ति ऊपर को उठ रही है ऐसी भावना की | फिर श्वास लिया.. फिर जब श्वास निकाल लिया तो योनि सिकोड़ लिया ..ऐसे १०-१५ बार किया और फिर उर्ध्व सर्वांगासन आसन करके योनि को १०-१५-२० धक्के मारे वीर्य को ऊपर आने को | तो पानी पड़ने की बीमारी, कामविकार का आकर्षण कम हो जायेगा और ब्रम्हचर्य की ओर” (दिव्य प्रेरणा प्रकाश) पुस्तक पढना और ब्रह्मचर्य की बुटीलेना | उससे वीर्य मजबूत हो जायेगा और कुसंगति से जान छूटेगी |
 
३] अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिये, पर कैसे पता चले कि, ये आत्मा की आवाज है या मन की आवाज है ?
आत्मा की आवाज होगी तो निर्वासनिक होगी और मन की आवाज होगी तो सवासनिक होगी | अनुष्ठान किया और लड़का लौट के आया, “गुरूजी ! गुरूजी !! अंतरात्मा की आवाज है कि बेटा शादी कर ले |” गुरूजी ने कहा कि ये अंतरात्मा की आवाज नहीं है ये तेरे काम-विकार की, वासना की आवाज है| मन को बोलती है कि भगवान ने बोला है | अगर किसी के प्रति बोलते कि ये ऐसा ही होगा तो क्या हमारे मन में तटस्थता है कि द्वेष है ? अगर द्वेष है तो फिर उसका घाटा होने वाला हो चाहे न होने वाला, हमको लगेगा कि इसको ऐसा होगा | चुनाव के दिनों में जिन नेतोओं के प्रति नफरत थी तो बोले वो हार जाएगा और देवयोग से वो हारा तो बोले देखा, मैं बोल रहा था ना… हार गया | लेकिन ऐसे कई है जिनके लिए हार जाय.. वो जीते है और जिनके लिए जीतेंगे अंतरात्मा के आवाज सुनकर… सट्टा भी लगाये वो हार गये | तो ये अंतरात्मा की आवाज नहीं है अपनी मन की मलिनता, वासना, बेवकूफी होती है |तो अंतरात्मा की आवाज क्या होती है ? तो ज्यों-ज्यों आप निष्पक्ष हो जाओगे , अंत:करण शांत, स्वस्थ हो जायेगा त्यों-त्यों आत्मा की आवाज होगी | 
 
४] जब साधन-भजन के लिए बैठते है तो मन शांत हो जाता है, न प्रार्थना, न बातें और ना ही मन में कोई भाव उठता है तो क्या करें ? 
कुछ करने के झंझट से बाहर हो जाओ, जो प्रभु तेरी मर्जी | बातें करके भी क्या करोगे | बातें करते-कराते जो अच्छी बातें हो तो भगवान में शांत हो जाओ, संकल्प रहित हो जाओ | वो तो आ गई तो फिर बातें करने के झंझट को क्यों बुलाते हो | मेरे से मानसिक बातें करोगे तो इतना खुश नहीं होऊगा जितना उस भगवान में शांत हो जाओ तो मैं खुश हो जाऊँगा | शराबी दूसरे शराबी को देख के खुश हो जाता है ऐसे ही भगवान में स्थित होने लगोगे तो मुझे प्रसन्नता होगी | न बाहर से मिलने की कोशिश करो, न बातें करने की कोशिश करों.. जो हो रहा है उसी में आगे बढ़ो | ईश्वर की ओर पुस्तक पढ़ते-पढ़ते, नारायण स्तुति पुस्तक पढ़ते-पढ़ते भगवान के स्वभाव में डूबते जाओ |
 
५] ध्यान के अवस्था में कैसे पहुँचे ? अगर घर की परिस्थिति साधना के अनुकूल न हो तो क्या करें ?
घर की परिस्थिति ध्यान-भजन के अनुकूल नहीं है इसलिए ध्यान न करें ऐसी बात नहीं है | परिस्थितियों  को अनुकूल बनाकर ध्यान नहीं होता | हर परिस्थिति में ध्यान का माहौल अथवा सावधानी का माहौल, साक्षीभाव का माहौल, अपने चित्त में और वातावरण में बनाना चाहिये और कभी-कभी अलग से एकांत में, साधना की जगह पर, या आश्रम में एकांत जैसे मौन-मंदिर कर लिया.. ८ – ८ दिन के दो-चार, तो ध्यान का  रस आने से घर की परिस्थितियों और वातावरण बनाने में भी बल मिल जायेगा |
हम घर में थे तो रजोगुण, तमोगुण होता हैं  ध्यान-भजन में बरकत आती नहीं ये तो सीधी बात है तो किसी संत महापुरुष ने मौन-मंदिर बनाया था उसमे हम सात दिन रहे जिससे बड़ा बल मिला | अपने कई आश्रमों में मौन-मंदिर हैं और बहुत सारे आश्रम हमने इसी उद्देश्य से बनाये हैं कि जो ध्यान-भजन करना चाहे १५ दिन, महिना, २ महिना या ४ महिना अपने एकांत के आश्रम में रहकर कर सकते हैं, फिर घर जा सकते हैं |घर की परिस्थिति ध्यान-भजन के अनुकूल नहीं है इसलिए ध्यान न करें ऐसी बात नहीं है | परिस्थितियों  को अनुकूल बनाकर ध्यान नहीं होता | हर परिस्थिति में ध्यान का माहौल अथवा सावधानी का माहौल, साक्षीभाव का माहौल, अपने चित्त में और वातावरण में बनाना चाहिये और कभी-कभी अलग से एकांत में, साधना की जगह पर, या आश्रम में एकांत जैसे मौन-मंदिर कर लिया.. ८ – ८ दिन के दो-चार, तो ध्यान का  रस आने से घर की परिस्थितियों और वातावरण बनाने में भी बल मिल जायेगा | 
 
६] यदि  कोई  दीक्षित  साधक ,आवेश  में  आकर ,किसी  कारण  के  बिना,  दूसरे  साधक  को  श्राप दे  तो वो  फलित  होगा ?  
श्राप  देना, देने  वाले  के  लिए  खतरे  से  खाली  नहीं  है । श्राप  देना अपनी  तपस्या  नाश  करना  है  । आवेश  में  जो  श्राप  दे  देते  हैं उनके  श्राप  में  दम  भी  नहीं  होता  ।   जितना  दमदार  हो और  हमने  गलती  की  है, वो  श्राप  दे  चाहे  न  दे,  थोड़ा  सा  उसके  हृदय  में  झटका  भी  लग  गया,  हमारे  नाराजी का,  तो   हमको  हानि  हो  जाती  है और  थोड़ा  सा  हमारे   लिए  उनके  हृदय  में  सद्‍भाव भी  आ  गया, तो   हमको  बड़ा  फायदा  मिलता  है ।
केवल  हम  उनकी  दृष्टि  के  सामने  आयें और  उनके  हृदय  में  सद्‍भाव आया  तो  हम  को  बहुत  कुछ  मिल  जाता  है ।  महापुरुषों  के  हृदय  में  तो  सद्‍भाव स्वाभाविक  होता  रहता  है  लेकिन  श्राप  तो  उनको  कभी-कभार  कहीं  आता  होगा अथवा  दुर्वासा  अवतार  कोई  श्राप  देकर  भी  लोगो  को  मोड़ने  की  कोई  लीला  हुई  तो  अलग  बात  है  ।
जरा-जरा बात  में  गुस्सा  होकर  जो  श्राप  देते  है  और  दम  मारते  है तो  आप  उस  समय  थोड़े  शांत  और  निर्भीक  रहो ।
नारायण नारायण !
७] श्री आसारामायण के  १०८ पाठ जल्दी-जल्दी करना ठीक है ,या   ५ – १०  पाठ अच्छे से करना उचित होगा ?
आसारामायण का पाठ शांति से भी कर सकते है और विश्रांति पाए तो भी लाभ देते है । लेकिन ,”एक सौ आठ जो पाठ करेंगे ,उनके सारे काज सरेंगे…” कोई कारज (कार्य) की सिद्धि करनी हो ,और यह विश्वास पक्का हो तो वह (जल्दी पाठ करना ) भी ठीक है और वह (धीरे पाठ करना ) भी ठीक है ।
८] काम विकार जब जब आता है तो अच्छे तरीके से गिरा देता है | इससे बचने का उपाय बताये |
सर्वांग आसन करो और मूलबंध करो सर्वांग आसन करके ताकि वो जो वीर्य बनता है वो ऊपर आये मस्तक में शरीर में और मजबूती करे |
प्राणायाम कस के करो सवा मिनट अंदर श्वास रोके और चालीस सेकण्ड बाहर श्वास रोके. और आवले के चूर्ण में २० प्रतिशत हल्दी मिलाकर ३-३ ग्राम सेवन करो .युवाधन पुस्तक पढ़ा करो |
शादी नहीं किया है तो पहले ईश्वर प्राप्ति करके फिर संसार में जाओ अथवा तो खाली होकर मरो फिर जन्मो तुम्हारी मर्जी की बात है |
 
९] सेवा और साधना का संगम कैसे हो ? सेवा किसको बोलते हैं? 
जिसमें अपने स्वार्थ का, वाहवाही का उद्देश्य न हो, उसका नाम है सेवा और वो सेवा कर्म योग है | कर्म योग भी एक साधना है | जप करते हैं तो भक्ति योग हो गया, ज्ञान सुनते, विचारते हैं तो ज्ञान योग हो गया | लेकिन अपने हित का ,अपने स्वार्थ का छोड़कर दूसरों के हित में और वो भी भगवान और समाज को जोड़ने वाली सेवा | संत और समाज को जोड़ने वाली सेवा तो परम सेवा है | तो उस सेवा से कर्म योग हो जाता है, कर्म योग एक उत्तम साधना है | चाहे झाड़ू लगाती है शबरी भीलन, तो भी उसकी साधना है | हम गुरु के द्वार पर सब्जी खरीद के आते थे, बर्तन मांजते , चिट्ठियाँ पढ़ते , चिट्ठियों के उत्तर देते, सत्संग पढ़ते और बापूजी उस पर व्याख्या करते थें| तो पटावाला से लेकर खास अंगद सेक्रेटरी का काम हम करते थे | हमारी सभी साधना हो गयी वो  |ऐसा नहीं कि हम अलग से माला घुमाने को ही बैठ जाते थे | माला घुमाने का नियम कर लिया | सारा दिन तो माला नहीं घुमती, सारा दिन साधना नहीं होती, तो कर्म योग भी साधना है, उपासना योग भी साधना है , ज्ञान योग भी साधना है , ये समझ लेना चाहिए | फिर भी १००० बार तो भगवान का नाम लेना ही लेना चाहिए |
कम से कम १००० बार भगवान का नाम अर्थ सहित जपने से अनर्थ से रक्षा होती है, और भगवान का नाम अर्थ सहित जपने के बाद उसमें थोड़ा  शांत हो जायें| फिर अपनी जो पुस्तके हैं, “नारायण स्तुति” है, “भगवन्नाम जप महिमा” है, “युवाधन” है अथवा “निर्भय नाद” है ये जो भी “पंचामृत” हैं उसे पढें, उसी विचार में थोड़े खो जायें | तो इस प्रकार का इरादा होने से सब ठीक होने लगता है | उद्देश्य ऊँचा हो जाये बस  | ईश्वर प्राप्ति का उद्देश्य  होने से बेईमानी भी छूट जाएगी| कर्म में से पलायनवादिता भी छूट जाएगी, लापरवाही भी छूट जाएगी | राम काज बिन कहाँ विश्रामा | मैनाक पर्वत खड़ा हो जाता है बीच में कि  हनुमानजी आराम कर लो, लम्बा सफर करके आये हो, बोले नहीं-नहीं, भगवान के कार्य के बिना विश्राम कहाँ ? तो उद्देश्य भगवान के कार्य का है तो फिर सेवा में भी ईमानदारी होगी और साधना भी, और जिनको साधना में रूचि है वो सेवा ईमानदारी से करते हैं | जो ईमानदारी से सेवा करते हैं उनका चिन्तन साधनामय हो जाता है | इसलिए सेवा और साधना को अलग नहीं कर सकते आप | दायाँ पैर अलग से निकाल कर बाएँ पैर से नहीं जा सकते आप, बायाँ पैर निकाल कर दाएँ से नहीं जा सकते आप | जैसे दोनों पैर से हम चल सकते हैं ठीक से, ऐसे ही सेवा और साधना |
 जिसके जीवन में साधना है, उसके जीवन में सेवा का सद्गुण आ ही जाता है और जो सेवा तत्परता से करता है तो उसको साधना का रस सेवा से भी मिलेगा और साधना में भी मन लग ही जाएगा |
 
१०]  गृहस्थ जीवन में कई बार साधना से विक्षेप होता है | इससे कैसे बचें ?
गृहस्थ जीवन में साधना से विक्षेप होता है तो गृहस्थ छोड़कर भागो | तो जहाँ भागोगे वहाँ भी विक्षेप होगा ,विक्षेप से भागो मत | अपने मन की हो तो खुश मत हो और अपने मन के विपरीत हो तो विक्षिप्त मत हो | अपने मन के नही हुई तो चलो हम चाहते हैं ऐसी नही हुई तो कोई सत्ता है, जो उसके चाह का हुआ है, तो भगवान ने अपना चाहा किया वाह-वाह | अपने मन की होती है तो हम फसते हैं आसक्ति में , अपने मन की नही हुई तो हमे मुक्ति का मजा आएगा, क्या फर्क पड़ता है ? तो विक्षेप कहाँ रहेगा ? विक्षेप उन्हीं बेवकूफ लोगों को होता है, जो अपने मन की ठानते हैं और नही होती है तो परेशानी पैदा करते हैं |
प्रकृति के, ईश्वर के अथवा नियम के आड़े खड़े होते हैं वे लोग परेशान होते हैं | मैं तो बड़ा परेशान हूँ , मैं तो बड़ा परेशान हूँ, मैं तो बड़ा परेशान हूँ | अरे संसार के नियम हैं, सब एक व्यक्ति की चाही नही होगी, अपने मन की चाही सबकी नही होती और थोड़ी-बहुत किसी की होती है | हम जो चाहते सब होता नही, जो होता है वो टिकता नहीं , जो होता है वो भाता नही, और जो भाता है वो टिकता नही | ये कथा तो हमने बार-बार कही है |
अपने मन की, किसी की चाहे रामजी हो, चाहे ईसामसीह हो, चाहे बड़ा अवतारी हो, अपने मन की सब नही होती | अगर सब किसी एक व्यक्ति या एक अवतार के मन की हो तो प्रकृति में उथल-पुथल हो जाये , व्यवस्था भंग हो जाये | वो तो जो होता है, आदि नियम है, उसी अनुसार होगा | हम जो चाहते वो सब होता नही, जो होता है वो सब भाता नही, और जो भाता है वो टिकता नही | इसी में नया रस है, आनंद है और उन्नति है |
भाया, मेरी पत्नी सदा रहे, मेरा पति सदा रहे, मेरा बेटा सदा रहे | तो टिकेंगे क्या ? अगर टिके तो संसार नर्क हो जाये | ये अच्छा है मरते हैं तो नये आते हैं, जरा फुल खिलते रहते हैं | मेरी दुकान मिटे नही, मेरा ये मिटे नही, वो मिटे नही, ये मिटे नही | कौन चाहेगा अपना कल्पना का संसार हट जाये, मिट जाये | लेकिन वो मिटता है, हटता है, तो नया आता है, अच्छा है न | तो विक्षेप, विक्षेप से भागो नही, विक्षेप न हो ऐसे ज्ञान में रहो | मन में विक्षेप आता है, लेकिन जैसे आग लगती है जंगल में तो आप सरोवर में खड़े तो जाते हैं तो आग से बच जाते हैं | ऐसे ही जब मन में विक्षेप आये तो ज्ञान के तालाब में आ जाओ |
 
 ११] पूज्य गुरुदेव, संसार सत्य क्यों भासता है ?संसार मिथ्या है, यह बार बार सत्संग में सुनने को मिलता है, मगर यह सत्य क्यों भासता है ?
संसार नश्वर है, मिथ्या है, धोखा है, यह बार बार सुनते हैं फिर भी संसार में मन क्यों भागता है ? उधर के भागने की आदत पुरानी है और सुना है उसमें ज़रा दृढ़ता कम है इसीलिये बार बार भागता है, भागे तो भागे लेकिन तुम जागे रहो , यह मन भाग रहा है अब मैं भागु या जागु, मैं भगवान का हूँ, हे भगवान मन भाग रहा है अब इसके पीछे मैं क्यों भागु, मैं तो तेरा हूँ, ऐसे करते करते भगवान के भाव में आ जाओ, तो भागने से बचाव हो जायेगा, जैसे घर में कोई कुत्ता बिल्ली आ जाए तो आप दूध घी दही की रक्षा कर लेते हो जोर से आवाज लगाकर , ठीक ऐसे ही मन की रक्षा कर लो|
हे हरि, हे गोविन्द, हे प्रभु, आ गये चोर, संसार में भागने वाली वासना आ गयी महाराज, ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ प्रभुजी, प्यारेजी, गुरूजी ॐ, हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ हा हा हा तो मन को भगवान में लगा दो और क्या, तुलसीदास जी ने कहा प्रभु यह मेरा हृदय नहीं है यह तो आपका घर है लेकिन इसमें चोर घुस गए हैं कभी काम, कभी क्रोध, कभी लोभ , कभी मोह, ऐसे कई चोर घुस गए हैं आप जरा ख्याल करो|
लोग मुझे साधु बोलते हैं लेकिन मैं तो कभी काम में ,कभी क्रोध में ,कभी लोभ-मोह में फिसलता हूँ| लोग बोलेंगे भगवान का भक्त होकर ऐसा करता है मेरी ज़िन्दगी का भी सवाल है तो आपकी इज्ज़त का भी तो सवाल है |
मम हृदय भवन प्रभु तोरा, ताहि बसे आई बहु चोरा, इसमें बहुत चोर घुस गए हैं , मैं एकल अमित भट मारा कोई सुनत नहीं मोर पुकारा, रघुनायक बेगी करो सम्हारा, जल्दी सम्भाल लो, यह आपके ह्रदय को आप ही सम्भालो नहीं तो विकार इसे नोच लेंगे | महाराज महाराज हरि हरि सुबह शाम कमरा बंद कर के भगवान को पुकारो, रोओ, नाचों , हँसो , लम्बे पड़ जाओ, अंदर से बल मिलेगा, भगवान संभाल लेंगे |