मोक्षदा एकादशी – १० दिसम्बर

Ekadashibannerमोक्षदा एकादशी

युधिष्ठिर बोले: देवदेवेश्वर ! मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? उसकी क्या विधि है तथा उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है? स्वामिन् ! यह सब यथार्थ रुप से बताइये । 

श्रीकृष्ण ने कहा : नृपश्रेष्ठ ! मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का वर्णन करुँगा, जिसके श्रवणमात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है ।मोक्षदा एकादशी  उसका नाम ‘मोक्षदा एकादशी’ है जो सब पापों का अपहरण करनेवाली है । राजन् ! उस दिन यत्नपूर्वक तुलसी की मंजरी तथा धूप दीपादि से भगवान दामोदर का पूजन करना चाहिए । पूर्वाक्त विधि से ही दशमी और एकादशी के नियम का पालन करना उचित है । मोक्षदा एकादशी बड़े-बड़े पातकों का नाश करनेवाली है । उस दिन रात्रि में मेरी प्रसन्न्ता के लिए नृत्य, गीत और स्तुति के द्वारा जागरण करना चाहिए । मोक्षदा एकादशी जिसके पितर पापवश नीच योनि में पड़े हों, वे इस एकादशी का व्रत करके इसका पुण्यदान अपने पितरों को करें तो पितर मोक्ष को प्राप्त होते हैं । इसमें तनिक भी संदेह नहीं है । 

पूर्वकाल की बात है, वैष्णवों से विभूषित परम रमणीय चम्पक नगर में वैखानस नामक राजा रहते थे । वे अपनी प्रजा का पुत्र की भाँति पालन करते थे । मोक्षदा एकादशी इस प्रकार राज्य करते हुए राजा ने एक दिन रात को स्वप्न में अपने पितरों को नीच योनि में पड़ा हुआ देखा । मोक्षदा एकादशी उन सबको इस अवस्था में देखकर राजा के मन में बड़ा विस्मय हुआ और प्रात: काल ब्राह्मणों से उन्होंने उस स्वप्न का सारा हाल कह सुनाया ।

राजा बोले: ब्रह्माणो ! मैने अपने पितरों को नरक में गिरा हुआ देखा है । वे बारंबार रोते हुए मुझसे यों कह रहे थे कि : ‘तुम हमारे तनुज हो, इसलिए इस नरक समुद्र से हम लोगों का उद्धार करो। ’ द्विजवरो ! इस रुप में मुझे पितरों के दर्शन हुए हैं इससे मुझे चैन नहीं मिलता । क्या करुँ ? कहाँ जाऊँ? मेरा हृदय रुँधा जा रहा है । द्विजोत्तमो ! वह व्रत, वह तप और वह योग, जिससे मेरे पूर्वज तत्काल नरक से छुटकारा पा जायें, बताने की कृपा करें । मुझ बलवान तथा साहसी पुत्र के जीते जी मेरे माता पिता घोर नरक में पड़े हुए हैं ! अत: ऐसे पुत्र से क्या लाभ है ?

ब्राह्मण बोले: राजन् ! यहाँ से निकट ही पर्वत मुनि का महान आश्रम है ।मोक्षदा एकादशी वे भूत और भविष्य के भी ज्ञाता हैं । नृपश्रेष्ठ ! आप उन्हीं के पास चले जाइये । 

ब्राह्मणों की बात सुनकर महाराज वैखानस शीघ्र ही पर्वत मुनि के आश्रम पर गये और वहाँ उन मुनिश्रेष्ठ को देखकर उन्होंने दण्डवत् प्रणाम करके मुनि के चरणों का स्पर्श किया ।मोक्षदा एकादशी मुनि ने भी राजा से राज्य के सातों अंगों की कुशलता पूछी । 

राजा बोले: स्वामिन् ! मोक्षदा एकादशी आपकी कृपा से मेरे राज्य के सातों अंग सकुशल हैं किन्तु मैंने स्वप्न में देखा है कि मेरे पितर नरक में पड़े हैं । मोक्षदा एकादशी अत: बताइये कि किस पुण्य के प्रभाव से उनका वहाँ से छुटकारा होगा ?

राजा की यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ पर्वत एक मुहूर्त तक ध्यानस्थ रहे । मोक्षदा एकादशी इसके बाद वे राजा से बोले :
‘महाराज! मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष में जो ‘मोक्षदा’ नाम की एकादशी होती है, तुम सब लोग उसका व्रत करो और उसका पुण्य पितरों को दे डालो । उस पुण्य के प्रभाव से उनका नरक से उद्धार हो जायेगा ।’ 

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: युधिष्ठिर ! मुनि की यह बात सुनकर राजा पुन: अपने घर लौट आये । जब उत्तम मार्गशीर्ष मास आया, तब राजा वैखानस ने मुनि के कथनानुसार ‘मोक्षदा एकादशी’ का व्रत करके उसका पुण्य समस्त पितरोंसहित पिता को दे दिया । मोक्षदा एकादशी पुण्य देते ही क्षणभर में आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी । वैखानस के पिता पितरोंसहित नरक से छुटकारा पा गये और आकाश में आकर राजा के प्रति यह पवित्र वचन बोले: ‘बेटा ! तुम्हारा कल्याण हो ।’ यह कहकर वे स्वर्ग में चले गये ।

राजन् ! जो इस प्रकार कल्याणमयी ‘मोक्षदा एकादशी’ का व्रत करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और मरने के बाद वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है । यह मोक्ष देनेवाली ‘मोक्षदा एकादशी’ मनुष्यों के लिए चिन्तामणि के समान समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाली है । इस माहात्मय के पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है ।

लोक – परलोक सँवारनेवाली गीता की १२ विद्याएँ – पूज्य बापूजी

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 (श्रीमद् भगवद्गीता जयंती : १० दिसम्बर )

गीता का ज्ञान मनुष्यमात्र का मंगल करने की सत्प्रेरणा देता है, सद्ज्ञान देता है | गीता की १२ विद्याएँ हैं | गीता सिखाती है कि भोजन कैसा करना चाहिए जिससे आपका तन तंदुरुस्त रहे, व्यवहार कैसा करना चाहिए जिससे आपका मन तंदुरुस्त रहे और ज्ञान कैसा सुनना – समझना चाहिए जिससे आपकी बुद्धि में ज्ञान – ध्यान का प्रकाश हो जाय | जीवन कैसा जीना चाहिए कि मरने के पहले मौत के सिर पर पैर रख के आप अमर परमात्मा की यात्रा करने में सफल हो जायें, ऐसा गीता का दिव्य ज्ञान है | इसकी १२ विद्याएँ समझ लो :

१] शोक-निवृत्ति की विद्या : गीता आशा का ग्रंथ है, उत्साह का ग्रन्ध है | मरा कौन है ? जिसकी आशा, उत्साह मर गये वह जीते – जी मरा हुआ है | सफल कौन होता है ? जिसके पास बहुत लोग हैं, बहुत धन होता है, वही वास्तव में जिंदा है | गीता जिंदादिली देनेवाला सदग्रंथ है | गीता का सत्संग सुननेवाला बीते हुए का शोक नहीं करता है, भविष्य की कल्पनाओं से भयभीत नहीं होता, वर्तमान के व्यवहार को अपने सिर पर हावी नहीं होने देता और चिंता का शिकार नहीं बनता | गीता का सत्संग सुननेवाला कर्म – कौशल्य पा लेता है |

२] कर्तव्य – कर्म करने की विद्या : कर्तव्य – कर्म कुशलता से करें | लापरवाही, द्वेष, फल की लिप्सा से कर्मों को गंदा न होने दें | आप कर्तव्य – कर्म करें और फल ईश्वर के हवाले कर दें | फल की लोलुपता से कर्म करोगे तो आपकी योग्यता नपी – तुली हो जायेगी | कर्म को ‘कर्मयोग’ बना दें |

३] त्याग की विद्या : चित्त से तृष्णाओं का, कर्तापन का, बेवकूफी का त्याग करना |

    …. त्यागाच्छान्तिरनन्तरम | (गीता : १२.१२)

त्याग से आपके ह्रदय में निरंतर परमात्म – शान्ति रहेगी |

४] भोजन करने की विद्या : युद्ध के मैदान में भी भगवान स्वास्थ्य की बात नहीं भूलते हैं | भोजन ऐसा करें कि आपको बिमारी स्पर्श न करे और बीमारी आयी तो भोजन ऐसे बदल जाय कि बीमारी टिके नहीं |

युक्ताहारविहारस्य…. (गीता :६.१७)

५] पाप न लगने की विद्या : युद्ध जैसा घोर कर्म करते हुए अर्जुन को पाप नहीं लगे, ऐसी विद्या है गीता में | कर्तृत्वभाव से, फल की इच्छा से तुम कर्म करते हो तो पाप लगता है लेकिन कर्तृत्व के अहंकार से नहीं, फल की इच्छा से नहीं, मंगल भावना से भरकर करते हो तो आपको पाप नहीं लगता |

यस्य नाहंकृतो भावो…. (गीता:१८.१७)

यह सनातन धर्म की कैसी महान विद्या है ! जरा – जरा बात में झूठ बोलने का लाइसेंस (अनुज्ञापत्र ) नहीं मिल रहा है लेकिन जिससे सामनेवाले का हित होता हो और आपका स्वार्थ नहीं है तो आपको ऐसा कर्म बंधनकारी नहीं होता, पाप नहीं लगता |

६] विषय – सेवन की विद्या : आप ऐसे रहें, ऐसे खायें – पियें कि आप संसार का उपयोग करें, उपभोग करके संसार में डूब न मरें | जैसे मुर्ख मक्खी चाशनी में डूब मरती है, सयानी मक्खी किनारे से अपना काम निकालकर चली जाती है, ऐसे आप संसार में पहले थे नहीं, बाद में रहोगे नहीं तो संसार से अपनी जीविकाभर की गाडी चला के बाकी का समय बचाकर अपनी आत्मिक उन्नति करें | इस प्रकार संसार की वस्तु का उपयोग करने की, विषय – सेवन की विद्या भी गीता ने बतायी |

७] भगवद् – अर्पण करने की विद्या : शरीर, वाणी तथा मन से आप जो कुछ करें, उसे भगवान को अर्पित कर दें | आपका हाथ उठने में स्वतंत्र नहीं है | आपके मन, जीभ और बुद्धि कुछ भी करने में स्वतंत्र नहीं हैं | आप डॉक्टर या अधिकारी बन गये तो क्या आप अकेले अपने पुरुषार्थ से बने ? नहीं, कई पुस्तकों के लेखकों की, शिक्षकों की, माता – पिता की और समाज के न जाने कितने सारे अंगों की सहायता से आप कुछ बन पाये | और उसमें परम सहायता परमात्मा की चेतना की है तो इसमें आपके अहं का है क्या ? जब आपके अहं का नहीं है तो फिर जिस ईश्वर की सत्ता से अआप कर्म करते हो तो उसको भगवद् – अर्पण बुद्धि से कर्म अर्पण करोगे तो अहं रावण जैसा नहीं होगा, राम की नाई अहं अपने आत्मा में आराम पायेगा |

८] दान देने की विद्या : नजर चीजें छोड़कर ही मरना है तो इनका सदुपयोग, दान – पुण्य करते जाइये | दातव्यमिति यद्दानं ….. (गीता : १७.२०) आपके पास विशेष बुद्धि या बल है तो दूसरों के हित में उसका दान करो | धनवान हो तो आपके पास जो धन है उसका पाँचवाँ अथवा दसवाँ हिस्सा सत्कर्म में लगाना ही चाहिए |

९] यज्ञ – विद्या : गीता (१७.११ ) में आता है कि फलेच्छारहित होकर शास्त्र – विधि से नियत यज्ञ करना ही कर्तव्य है – ऐसा जान के जो यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक होता है | यज्ञ – याग आदि करने से बुद्धि पवित्र होती है और पवित्र बुद्धि में शोक, दुःख एवं व्यर्थ की चेष्टा नहीं होती |

आहुति डालने से वातावरण शुद्ध होता है एवं संकल्प दूर तक फैलता है लेकिन केवल यही यज्ञ नहीं है | भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी देना, अनजान व्यक्ति को रास्ता बताना भी यज्ञ हैं |

१०] पूजन – विद्या : देवता का पूजन, पितरों का पूजन, श्रेष्ठ जनों का पूजन करने की विद्या गीता में है | पूजन करनेवाले को यश, बल, आयु और विद्या प्राप्त होते हैं |

लेकिन जर्रे – जर्रे में रामजी हैं, ठाकुरजी हैं, प्रभुजी हैं – वासुदेव: सर्वम्…. यह व्यापक पूजन – विद्या भी ‘गीता’ में हैं |

११] समता लाने की विद्या : यह ईश्वर बनानेवाली विद्या है, जिसे कहा गया समत्वयोग | अपने जीवन में समता का सद्गुण लाइये | दुःख आये तो पक्का समझिये कि आया है तो जायेगा | इससे दबें नहीं | दुःख आने का रस लीजिये | सुख आये तो सुख आने का रस लीजिये कि ‘तू जानेवाला है | तेरे से चिपकेंगे नहीं जी सकते लेकिन विकारी रस में आप जियेंगे तो जन्म-मरण के चक्कर में जा गिरेंगे और यदि आप निर्विकारी रस की तरफ आते हैं तो आप शाश्वत, रसस्वरूप ईश्वर को पाते हैं |

१२] कर्मों को सत् बनाने की विद्या :  आप कर्मो को सत बना लीजिये | वे कर्म आपको सतस्वरूप की तरफ ले जायेंगे | आप कभी यह न सोचिये कि ‘मेरे १० मकान हैं, मेरे पास इतने रुपये हैं…..’ इनकी अहंता मत लाइये, आप अपना गला घोंटने का पाप न करिये | ‘मकान हमारे हैं, रूपये मेरे हैं …..’ तो आपने असत को मूल्य दिया, आप तुच्छ हो गये | आपने कर्मों को इतना महत्त्व दिया कि आपको असत् कर्म दबा रहे हैं |

आप कर्म करो, कर्म तो असत् हैं, नश्वर हैं लेकिन कर्म करने की कुशलता आ जाय तो आप सत में पहुँच जायेंगे | आप परमात्मा के लिए कर्म करें तो कर्मों के द्वारा आप सत् का संग कर लेंगे |

कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते |

‘उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्  – ऐसे कहा जाता है |’  (गीता : १७.२७)

स्त्रोत – ऋषि प्रसाद दिसम्बर २०१५ से (निरंतर अंक -२७६ )  

 

श्री योग वशिष्ठ महारामायण (वैराग्य प्रकरण) – कालनिरूपण – अंतिम भाग

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|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण

वैराग्य प्रकरण – कालनिरूपण – अंतिम भाग 

ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, कुबेर, आदि सब मूर्ति काल की धरी हुई है | यह उनको भी अन्तर्धान कर देता है | हे मुनीश्वर उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय सब काल से होते हैं | अनेक बेर इसने महाकल्प का भी ग्रास किया है और अनेक बेर करेगा | काल को भोजन करने से तृप्ति कदाचित नहीं होती और कदाचित होनेवाली भी नहीं | जैसे अग्नि घृत की आहुति से तृप्त नहीं होता | वैसे ही जगत और सब ब्रह्मांड का भोजन करके भी काल तृप्त नहीं होता | इसका ऐसा स्वभाव है की इंद्र को दरिद्री कर देता है और दरिद्री को इंद्र कर देता है, सुमेरु को राई बनाता है और राई को सुमेरु करता है | सबसे बड़े ऐश्वर्यवान को नीच कर डालता है और सबसे नीच को ऊँच कर डालता है | बूँद को समुद्र कर डालता है और समुद्र को बूँद करता है | ऐसी शक्ति काल में हैं | यह जीवरूपी मच्छरों को शुभाशुभ कर्मरूपी छुरे से छेदता रहता है | कालरूप का चक्र जीवरूपी हँडिया की शुभ – अशुभ कर्मरूपी रस्सी से बाँधकर फिराता है और जीवरूपी वृक्ष को रात्रि और दिनरुपी कुल्हाड़े से छेदता है | हे मुनीश्वर ! जितना कुछ जगत विलास भासता है काल सबको ग्रास कर लेगा | जीवरूप रत्न का काल डब्बा है सो सबको अपने उदर में डालता जाता है | काल यों खेल करता है कि चन्द्र सूर्यरूपी गेंद को कभी उर्ध्व को उछालता है और कभी नीचे डालता है | जो महापुरुष है वह उत्पत्ति और प्रलय के पदार्थों में से किसी के साथ स्नेह नहीं करता और उसका काल भी नाश नहीं कर सकता | जैसे मुंड की माल महादेवजी गले में धारें हैं वैसे ही यह भी जीवों की माला गले में डालता है |

हे मुनीश्वर ! जो बड़े बलिष्ठ हैं उनको भी काल ग्रहण कर लेता है | जैसे समुद्र बड़ा है उसको बडवानल पान कर लेता है और जैसे पवन भोजपत्र को उड़ाता है वैसे ही काल का भी बल है, किसी की सामर्थ्य नहीं जो इसके आगे स्थित रहे | हे मुनीश्वर ! शान्तिगुण प्रधान देवता; रजोगुण प्रधान बड़े राजा और तमोगुण प्रधान दैत्य और राक्षस हैं उनमें किसी को सामर्थ्य नही जो इसके आगे स्थिर रहे | जैसे तौली में अन्न और जल भर के अग्नि पर चढ़ा देने से अन्न उछलता है और वह अन्न के दाने करछी से कभी ऊपर और कभी नीचे फिर जाते हैं वैसे ही जीवरूपी अन्नके दाने जगतरूपी तौली में पड़े हुए रागद्वेषरूपी अग्नि पर चढ़े है | और कर्मरूपी करछी से कभी ऊपर जाते हैं और कभी नीचे आते हैं | हे मुनीश्वर ! यह काल किसी को स्थिर नहीं होने देता यह महा कठोर है, दया किसी पर नहीं करता | इसका भी मुझको रहता हैं इससे वही उपाय मुझसे कहिये जिससे मैं काल से निर्भय हो जाऊँ |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे कालनिरूपणन्नामाष्टादशस्सर्ग: || १८ ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण वैराग्य प्रकरण – कालनिरूपण भाग १

YVMR111016|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||
श्री योग वशिष्ठ महारामायण
वैराग्य प्रकरण – कालनिरूपण – भाग १

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! संसाररूपी गढ़ा है उसमें अज्ञानी गिरा है, पर संसाररूपी गढ़ा तो अल्प है और अज्ञानी बड़ा हो गया है | संकल्प विकल्प की अधिकता से बढ़ा है | जो ज्ञानवान पुरुष है वह संसार को मिथ्या जानता है और संसाररूपी जाल में नहीं फँसता और जो अज्ञानी पुरुष है वह संसार को सत्य जानकर उसकी आस्थारुपी जाल में फँसता है और भोग की वाच्छा करता है | वह ऐसा है जसे दर्पण में प्रतिबिम्ब देखकर बालक पकड़ने की इच्छा करता है वैसे ही अज्ञानी संसार को सत्य जानकर जगत के पदार्थ की वाच्छा करता है कि यह मुझे प्राप्त हो और यह न हो | यह सब सुख नाशात्मक हैं अभिप्राय यह की आते हैं और जाते हैं स्थिर नहीं रहते; इनको काल ग्रास करता है | जैसे पक्के अनार को चूहा खा जाता है वैसे ही सब पदार्थों को काल खाता है | हे मुनीश्वर ! यह सब पदार्थ कालग्रसित है | जैसे नेवला सर्प को भक्षण कर जाता है वैसे ही बड़े – बड़े बलि सुमेरु ऐसे गम्भीर पुरुषों को काल ने ग्रसित किया है | जगतरूपी एक गूलर का फल है; उसमें मज्जा ब्रह्मादिक हैं और उसका वन ब्रह्मरूप है | उस ब्रह्मरूप वन में जितने वन हैं सो सब इसका आहार हैं | यह काल सबको भक्षण कर जाता है |
हे मुनीश्वर ! यह काल बड़ा बलिष्ठ है; जो कुछ देखने में आता है सो सब इसने ग्रास कर लिया है | हमारे जो बड़े ब्रह्मादिक है उनका भी काल ग्रास कर जाता है तो और का क्या कहना है जैसे सिंह मृग का ग्रास कर लेता है | काल किसी से जाना नहीं जाता | क्षण, घरी, प्रहर, दिन, मास और वर्षादिक से जानिये सोई काल है और काल की मूर्ति प्रकट नहीं है | यह किसी को स्थिर नहीं देता | एक बेलि, काल ने पसारी है उसकी त्वचा रात्रि है और फूल दिन है और जीवरूपी भौरे उस पर आ बैठते हैं | हे मुनीश्वर ! जगतरूपी गूलर का फल है उसमें जीवरूपी बहुत मच्छर रहते हैं | जैसे तोता अनार का भक्षण करता है वैसे ही काल उस फल का भक्षण करता है | जगतरूपी वृक्ष हैं; जीवरूपी उसके पत्र हैं और कालरुपी हस्ती उसका भक्षण कर जाता है | शुभ – अशुभ रूपी भैसे को कालरुपी सिंह छेद – छेद के खाता है | हे मुनीश्वर ! यह काल महाक्रूर है; किसी पर दया नहीं करता; सबको खा जाता है | जैसे मृग सब कमलों को खा जाता उससे कोई नहीं बचता वैसे ही काल भी सबको खाता है परन्तु एक कमल बचा है उस कमल के शान्ति और मैत्री अंकुर हैं और चेतनामात्र प्रकाश है, इस कारण वह बचा है | कालरुपी मृग इस तक नहीं पहुँच सकता बल्कि इसमें प्राप्त हुआ काल भी लीन हो जाता है | जो कुछ प्रपंच हैं सो सब काल के मुख में हैं |

क्रमशः

श्री योग वशिष्ठ महारामायण (वैराग्य प्रकरण) – जरावस्थानिरूपणं -अंतिम भाग

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|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण

वैराग्य प्रकरण – जरावस्थानिरूपणं – -अंतिम भाग

हे मुनीश्वर ! जैसे बिल्ली चिंतन करती है कि चूहा आवे तो पकड़ लूँ वैसेही मृत्यु भी देखती है कि जरावस्था आवें तो मैं इसका ग्रास कर लूँ | हे मुनीश्वर ! यह परम नीच अवस्था हैं | यह जब आती हैं तब शरीर को जर्जरीभूत कर देती हैं; कँपाने लगती है और शरीर को निर्बल और क्रूर कर देती है | जैसे कमल पर बर्फ की वर्षा हो और वह जर्जरीभूत हो जाय वैसे ही यह शरीर को जर्जरीभूत कर डालती है | जैसे वन में बाघ आकर शब्द करते हैं और मृग का नाश करते हैं वैसे ही खाँसी रूपी बाघ आकर मृगरूपी बल का नाश करते हैं |

हे मुनीश्वर ! जब जरा आती है तब जैसे चन्द्रमा के उदय से कमलिनी खिल आती है वैसे ही मृत्यु प्रसन्न होती है | यह जरावस्था बड़ी दुष्टा है; इसने बड़े – बड़े योधों को भी दीन कर दिया है | यद्यपि बड़े-बड़े शुर संग्राम में शत्रुओं को जीतते हैं पर उनको भी जरा ने जीत लिया है | जो बड़े – बड़े पर्वतों को चूर्ण कर डालते है उनको भी जरा पिशाचिनी ने महादीन कर दिया है | इस जरारुपी राक्षसी ने सबको दीन कर दिया हैं | यह सबको जितने वाली है | हे मुनीश्वर ! जैसे वृक्ष में अग्नि लगती और उसमें से धूम निकलता है | वैसे ही शरीररूपी वृक्ष में से जरारुपी अग्नि लगकर तृष्णारूपी धुँवा निकलता है | जैसे डिब्बे में बड़े रत्न रहते हैं वैसे ही जरारुपी डिब्बे में दुःखरूपी अनेक रत्न रहते हैं | जरारुपी वसंत ऋतू हैं; उससे शरीररूपी वृक्ष दुःखरूपी रस से होता है | जैसे हाथी जंजीर से बँधा हुआ दीन हो जाता है वैसे ही जरारुपी जंजीर से बँधा पुरुष दीन हो जाता है | उसके सब अंग शिथिल हो जाते हैं बल क्षीण हो जाता है, इन्द्रियाँ भी निर्बल हो जाती हैं और शरीर जर्जरी भाव को प्राप्त होता है, परन्तु तृष्णा नहीं घटती वह तो नित्य बढ़ती ही चली जाती है | जैसे रात्रि आती है तब सूर्यवंशी कमल सब मूँद जाते है और पिशाचिनी आ विचरने लगती है और प्रसन्न होती है वैसे ही जरारुपी रात्रि के आने से सब शक्तिरूप कमल मूँद जाते हैं, तृष्णारूपी पिशाचिनी प्रसन्न होती है | हे मुनीश्वर ! जैसे गंगातट के वृक्ष गंगाजल के वेग से जर्जरीभूत हो जाते हैं वैसे ही जो यह आयुरूपी प्रवाह चलता है उसके वेग से शरीर जर्जरीभूत हो जाता है जैसे माँस के टुकड़े को देख आकाश से उड़ती चील नीचे आकर ले जाती है वैसे ही जरावस्था में शरीररूपी माँस को काल ले जाता है |

हे मुनीश्वर ! यह तो काल का ग्रास बना हुआ है | जैसे वृक्ष को हाथी खा जाता है वैसे जरावाले शरीर को काल देख के खाता है |

इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे जरावस्थानिरूपणंनाम सप्तदशस्सर्ग: || १७ ||

बेलोदी(दुर्ग) में तुलसी पूजन

 बेलोदी (दुर्ग) में तुलसी पूजन

संत श्री आशारामजी आश्रम बेलोदी ,दुर्ग द्वारा ग्राम बघेरा में साधको ने  प्रभात फेरी निकालकर भागवत श्रीमद भगवतगीता एवं तुलसी पूजन  किया गया |तुलसी माता व गीता  की महिमा व गुण बताकर उसके लाभ की जानकारी देकर लोगो को साहित्य वितरण भी किया गया

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भोथली (अंबिकापुर ) में तुलसी पूजन

भोथली (अंबिकापुर ) में तुलसी पूजन 

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की पावन प्रेरणा से ग्राम भोथली जिला – अंबिकापुर  में ग्रामीणों द्वारा तुलसी पूजन  कार्यक्रम किया गया |तुलसी माता की महिमा व गुण बताकर उसके लाभ की जानकारी दिया व साहित्य वितरण भी किया गया | 

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