Nirjala Ekadashi (निर्जला एकादशी ) – Pujya Asaram Bapuji

NIrJala Ekadashi

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ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो । केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है । एकादशी को सूर्यौदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्यौदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है । जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे । जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं ।निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करनेवाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है । पर्याप्त दक्षिणा और भाँति भाँति के मिष्ठान्नों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए । ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं ।

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निर्जला एकादशी

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युधिष्ठिर ने कहा: जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले: राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं ।
तब वेदव्यासजी कहने लगे: दोनों ही पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन न करे । द्वादशी के दिन स्नान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान केशव की पूजा करे । फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे । राजन् ! जननाशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए ।
यह सुनकर भीमसेन बोले: परम बुद्धिमान पितामह ! मेरी उत्तम बात सुनिये । राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि : ‘भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो…’ किन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी ।
भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा : यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीयों के दिन भोजन न करना ।
भीमसेन बोले : महाबुद्धिमान पितामह ! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ । एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता, फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ? मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है । इसलिए महामुने ! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ । जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये । मैं उसका यथोचित रुप से पालन करुँगा ।
व्यासजी ने कहा: भीम ! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो । केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है । एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है । तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे । इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे । वर्षभर में जितनी एकादशीयाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि: ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है ।’
एकादशी व्रत करनेवाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते । अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाववाले, हाथ में सुदर्शन धारण करनेवाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आखिर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं । अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो । स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है । जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है । उसे एक-एक प्रहर में कोटि-कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है । मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है । निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है । जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है । इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है ।
जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे । जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं ।
कुन्तीनन्दन ! ‘निर्जला एकादशी’ के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करनेवाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है । पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ठान्नों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए । ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं । जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आनेवाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है । निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए । जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है । जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है । चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है ।
पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि : ‘मैं भगवान केशव की प्रसन्न्ता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा ।’
द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए । गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे :
देवदेव ह्रषीकेश संसारार्णवतारक ।
उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥
‘संसार सागर से तारने वाले हे देवदेव ह्रषीकेश ! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये ।’
भीमसेन ! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए । उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए । ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है । तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे । जो इस प्रकार पूर्ण रुप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है ।
यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया । तबसे यह लोक मे ‘पाण्डव द्वादशी’ के नाम से विख्यात हुई ।

निर्जला एकादशी व्रत से अधिक मास सहित २६  एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है । इस दिन किया गया स्नान, दान जप, होम आदि अक्षय होता है ।

त्रिस्पृशा एकादशी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाली है । इस दिन उपवास करने से करोडो तीर्थो, करोडो क्षेत्रो का पुण्य तथा १ ० ० ०  एकादशी व्रतों  का फल प्राप्त होता है ।

P.P.Sant Shri Asharamji Bapuji ka Satsang –
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वट सावित्री व्रत कथा (Vat Savitri Vrat katha)

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वट सावित्री व्रत

यह व्रत सौभाग्यवती स्त्रियों का मुख्य त्यौहार माना जाता है | यह व्रत मुख्यतः जेष्ठ शुद्ध की पोर्णिमा  को किया जाता है | इस दिन वट (बरगद) के वृक्ष की पूजा होती है | इस दिन सत्यवान-सावित्री और यमराज की पूजा की जाती है | स्त्रियां इस व्रत की अखंड सौभाग्यवती अर्थात अपने पति की लम्बी आयु, सेहत तथा तरक्की के लिए करती है | सावित्री ने इसी व्रत के द्वारा अपने पति सत्यवान की धर्मराज से छीन लिया था |

वट-सावित्री व्रत कथा     

एक समय मद देश में अश्वपति नामक परम ज्ञानी राजा राज करता था | उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए अपनी पत्नीं के साथ सावित्री देवी का विधिपूर्वक व्रत तथा पूजन किया और पुत्री होने का वर प्राप्त किया | इस पूजा के फल से उनके यहाँ सर्वगुण सम्पन्न सावित्री का जन्म हुआ |

सावित्री जब विवाह योग्य हुई तो राजा ने उसे स्वयं अपना वर चुनने को कहा | अश्वपति ने उसे अपने पति के साथ वर का चुनाव करने के लिए भेज दिया | एक दिन महर्षि नारदजी राजा अश्वपति के यहाँ आये हुए थे तभी सावित्री अपने वर का चयन करके लौटी | उसने आदरपूर्वक नारदजी को प्रणाम किया | नारदजी के पूछने पर सावित्री ने कहाँ – “ राजा धुमत्सेन, जिसका राज्य हर लिया हैं, जो अंधे होकर अपनी पत्नी के साथ वनों में भटक रहे है, उन्ही के इकलौते आज्ञाकारी पुत्र सत्यवान को मैंने अपने पतिरूप में वरण किया है |”

तब नारदजी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहों की गणना करके उसके भूत, वर्तमान  तथा भविष्य को देखकर राजा से कहाँ –“ राजन ! तुम्हारी कन्या ने नि:संदेह बहुत योग्य वर का चुनाव किया है | सत्वान गुणों तथा धर्मत्मा है | वह सावित्री के लिए सब प्रकार से योग्य है परंतु एक भारी दोष है | यह अल्पायु है और एक वर्ष के बाद अर्थात जब सावित्री बारह वर्ष की हो जायेगी उसकी मृत्यु हो जायेगी |

नारदजी की ऐसी भविष्यवाणी सुनकर राजा ने अपनी पुत्री को कोई अन्य वर खोजने के लिए कहा | इस पर सावित्री ने कहा – “ पिताजी ! आर्य कन्याएं जीवन में एक ही बार अपने पति का चयन करती है | मैंने भी सत्यवान को मन से अपना पति स्वीकार कर लिया है, अब चाहे वह अल्पायु हो या दीर्घायु, मैं किसी अन्य को अपने ह्रदय में स्थान नहीं दे सकती |”

सावित्री ने आगे कहा –“ पिताजी, आर्य कन्याएं अपना पति एक बार चुनती है | राजा एक बार ही आज्ञा देते है, पंडित एक बार प्रतिज्ञा करते हैं तथा कन्यादान भी एक बार किया जाता है | अब चाहे जो हो सत्यवान ही मेरे पति होगा |”

सावित्री के ऐसे दृढ़ वचन सुनकर राजा अश्वपति ने उसका विवाह सत्यवान से कर दिया | सावित्री ने नारदजी से अपने पति की मृत्यु का समय ज्ञात कर लिया था | सावित्री अपने पति और सास-ससुर की सेवा करती हुई वन में रहने लगी | समय बीतता गया और सावित्री बारह वर्ष की हो गयी | नारदजी के वचन उसको दिन-प्रतिदिन परेशान करते रहे | आखिर जब नारदजी के कथनानुसार उसके पति के जीवन के तीन दिन बचें, तभी से वह उपवास करें लगी | नारदजी द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया | प्रतिदिन की भांति उस दिन भी सत्यवान लकड़ियाँ काटने के लिए चला तो सास-ससुर से आज्ञा लेकर वह भी उसके साथ वन में चल दी |

वन में सत्यवान ने सावित्री को मीठे-मीठे फल लाकर दिये और स्वयं एक वृक्ष पर लकड़ियाँ काटने के लिए चढ़ गया | वृक्ष पर चढ़ते ही सत्यवान के सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी | वह वृक्ष से नीचे उतर आया | सावित्री ने उसे पास के बड के वृक्ष के नीचे लिटाकर सिर अपनी गोद में रख लिया | सावित्री का ह्रदय काँप रहा था | तभी उसने दाक्षिण दिशा से यमराज को आते देखा | यमराज और उसके दूत धर्मराज सत्यवान के जीव को लेकर चल दिये तो सावित्री भी उनके पीछे चल पड़ी | पीछा करती सावित्री की यमराज ने समझकर वापस लौट जाने को कहा | परंतु सावित्री ने कहा – “ हे यमराज ! पत्नी के पत्नीत्व की सार्थकता इसी में है कि वह पति का छाया के समान अनुसरण करे | पति के पीछे जाने जाना ही स्त्री धर्म है | पतिव्रत के प्रभाव से और आपकी कृपा से कोई मेरी गति नही रोक सकता यह मेरी मर्यादा है | इसके विरुद्ध कुछ भी बोलना आपके लिए शोभनीय नहीं है |”

सावित्री के धर्मयुक्त वचनों से प्रसन्न होकर यमराज ने उससे उसके पति के प्राणों के अतिरिक्त कोई भी वरदान माँगने को कहा | सावित्री ने यमराज से अपने सास-ससुर की आँखे की खोई हुई ज्योति तथा दीर्घायु माँग ली | उमराज ‘तथास्तु’ कहकर आगे बढ़ गये | फिर भी सावित्री ने यमराज का पीछा नहीं छोड़ा | उमराज ने उसे फिर वापस जाने के लिए कहा | इस पर सावित्री ने कहा – “ हे धर्मराज ! मुझे अपने पति के पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है | पति के बिना नारी जीवन की कोई सार्थकता नहीं है | हम पति-पत्नी भिन्न-भिन्न मार्ग कैसे जा सकते है | पति का अनुगमन मेरा कर्तव्य है |”

यमराज ने सावित्री के पतिव्रत धर्म की निष्ठा देख कर पुन: वर मांगने के लिए कहा | सावित्री ने अपने सास-ससुर के खोये हुए राज्य को प्राप्ति तथा सौ भाइयों की बहन होने का वर माँगा | उमराज पुन: “तथास्तु” कहकर आगे बढ़ गये | परंतु सावित्री अब भी यमराज का पीछा किये जा रही थी | यमराज ने फिर से उसे वापस लौट जाने को कहाँ, किंतु सावित्री अपने पण पर अडिग रही |

तब यमराज ने कहा – “ हे देवी ! यदि तुम्हारे मन में अब भी कोई कामना है तो कहो | जो माँगोगी वही मिलेगा |” इस पर सावित्री ने कहा –“यदि आप सच में मुझ पर प्रसन्न है और सच्चे हद्रय से वरदान देना चाहते है तो मुझे सौ पुत्रों की माँ बनने का वरदान दें |” यमराज “तथास्तु” कहकर आगे बढ़ गये |

यमराज ने पीछे मुडकर देखा और सावित्री से कहा – “ अब आगे मत बढ़ो | तुम्हे मुँह माँगा वर दे चूका हूँ, फिर भी मेरा पीछा क्यों कर रही है ?”

सावित्री बोली – “ धर्मराज ! आपने मुझे सौ पुत्रों की माँ होने का वरदान तो दे दिया, पर क्या मैं पति के बिना संतान को जन्म दे सकती हूँ ? मुझे मेरा पति वापस मिलना ही चाहिए, तभी मई आपका वरदान पूरा कर सकूँगी |”

सावित्री की धर्मनिष्ठा, पतिभक्ति और शुक्तिपूर्ण वचनों को सुनकर यमराज ने सत्यवान के जीव को मुक्त कर दिया | सावित्री को वर देकर यमराज अंतर्ध्यान हो गये |

सावित्री उसी वट वृक्ष के नीचे पहुंची जहाँ सत्यवान का शरीर पड़ा था | सावित्री ने प्रणाम करके जैसे ही वट वृक्ष की परिक्रमा पूर्ण की वैसे ही सत्यवान के मृत शरीर जीवित हो उठा | दोनों हर्षातुर से घर की ओर चल पड़े |

प्रसन्नचित सावित्री अपने पति सहित सास-ससुर के पास गई | उनकी नेत्र ज्योति वापस लौट आयी थी | उनके मंत्री उन्हें खोज चुके थे | धुमत्सेन ने पुन: अपना राज सिंहासन संभाल लिया था |

उधर महाराज अश्वसेन सौ पुत्रो के पिता हुए और सावित्री सौ भाइयों की बहन | यमराज के वरदान से सावित्री सौ पुत्रों की माँ बनी | इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रत का पालन करते हुए अपने पति के कुल एवं पितृकुल दोनों का कल्याण कर दिया |

सत्यवान और सावित्री चिरकाल तक राज सुख भोगते रहे और चारों दिशाओं में सावित्री के पतिव्रत धर्म की कीर्ति गूंज उठी |     

चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं… पूज्य बापूजी की तात्त्विक अमृतवाणी

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चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं… पूज्य बापूजी की तात्त्विक अमृतवाणी

श्री भोले बाबा ने कहा है :
पृथ्वी नहीं जल भी नहीं, नहीं अग्नि तू नहीं है पवन ।
आकाश भी तू है नहीं, तू नित्य है चैतन्यघन ॥
इन पाँचों का साक्षी सदा, निर्लेप है तू सर्व पर ।
निज रूप को पहिचानकर, हो जा अजर हो जा अमर ॥
आत्मा अमल साक्षी अचल, विभु पूर्ण शाश्वत मुक्त है ।
चेतन असंगी निःस्पृही, शुचि शांत अच्युत तृप्त है ॥
निज रूप के अज्ञान से, जन्मा करे फिर जाय मर ।
भोला ! स्वयं को जानकर, हो जा अजर हो जा अमर ॥
श्रीमद् आद्य शंकराचार्यजी ने इसी बात को अपनी भाषा में कहा है :
मनो बुद्धयहंकारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
सदा मे समत्वं न मुक्तिर्नबन्धः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
‘चिद्’ अर्थात् चैतन्य । ‘शिवोऽहम्’ अर्थात् कल्याणकारी आत्मस्वरूप मैं हूँ । दृढ़ भावना करो कि ‘मैं आत्मा हूँ… चैतन्यस्वरूप हूँ… आनंदस्वरूप हूँ…’ जिन क्षणों में हम जाने-अनजाने देहाध्यास भूल जाते हैं, उन्हीं क्षणों में हम ईश्वर के साथ एक हो जाते हैं । जाने-अनजाने जब हम देहाभिमान से ऊपर उठे हुए होते हैं, उस वक्त हमारा मन दैवी साम्राज्य में विहार करता है । जिस क्षण अनजाने में भी हम काम करते-करते ‘मैं-मेरापना’ भूल जाते हैं उसी समय अलौकिक आनंदस्वरूप आत्मा के राज्य में हम अठखेलियाँ करने लगते हैं और जब हम नामरूप के जगत को सत्य समझकर देखने, सुनने एवं विचारने लगते हैं, उसी क्षण अद्भुत आत्मराज्य से नीचे आ जाते हैं ।
दिन में न जाने कितनी बार ऐसी सुन्दर घड़ियाँ आती हैं, जब हम अनजाने में ही आत्मराज्य में होते हैं, आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में होते हैं लेकिन ‘यह वही अवस्था है…’ इसका हमें पता नहीं चलता । इसीलिए हम बार-बार मनोराज्य में, मानसिक कल्पनाओं में बह जाते हैं । ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो परमात्मा का दर्शन न करता हो, साक्षात्कार न करता हो लेकिन पता नहीं होता कि ‘यही वह अवस्था है…’ इसलिए प्रपंचों में उलझ जाता है ।
दूसरी बात यह है कि इन्द्रियाँ भी उसे बाहर खींच ले जाती हैं, बहिर्मुख कर देती हैं । स्वरूप का ज्ञान अगर एक बार भी ठीक से हो जाये तो इन्द्रियों के बाहर जाने पर भी वह अपने वास्तविक होश (भान) में बना रहता है ।
कई लोग सोचते हैं कि : ‘मैं ब्रह्म तो हूँ लेकिन यह भाव दृढ़ हो जाये… सोऽहम् अर्थात् वह मैं हूँ लेकिन यह भाव दृढ़ करूँ…’ तो यह दृढ़ करने का जो भाव आ रहा है वह इसीलिये कि अभी ब्रह्मतत्त्व को ठीक से नहीं समझ पाये हैं । यदि ठीक से समझ लें तो इसमें आवृत्ति की जरूरत नहीं और पा लेने के बाद खोने का भय नहीं ।
उस परमात्मा को भावना करके नहीं पाया जाता क्योंकि भावनाएँ सदा बदलती रहती हैं जबकि परमात्मज्ञान सदा एकरस रहता है । जैसे भावना करो कि ‘मेरे हाथ में चाँदी का सिक्का है ।’ आप भावना तो करेंगे लेकिन संदेह बना रहेगा कि ‘सच में है कि नहीं… या कुछ और है ?’ …लेकिन आपने यदि एक बार भी देख लिया कि ‘यह चाँदी का सिक्का है…’ तो इसका ज्ञान आपको हो गया । फिर यह ज्ञान मैं आपसे छीन नहीं सकता ।
आपको इसका विस्मरण हो सकता है, अदर्शन हो सकता है लेकिन अज्ञान नहीं होगा । ऐसे ही भगवान की भावना करते हो तो भावना बदल सकती है लेकिन एक बार भी भगवान के स्वरूप का ज्ञान हो जाये, भगवान के स्वरूप का साक्षात्कार हो जाये तो फिर चलते-फिरते, लेते-देते, जीते-मरते, इस लोक-परलोक में सर्वत्र, सर्व काल में ईश्वर का अनुभव होने लगता है । आवृत्ति करके पक्का नहीं किया जाता कि ‘मैं आत्मा हूँ… मैं आत्मा हूँ…’ क्योंकि परमात्मा तो आपका वास्तविक स्वरूप है, उसे रटना क्या ? जैसे आपका नाम मोहन है तो क्या आप दिन-रात ‘मैं मोहन हूँ… मोहन हूँ…’ रटते हो ? नहीं, मोहन तो आप हो ही । ऐसे ही ब्रह्म तो आप हो ही । अतः यह रटना नहीं है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ…’ वरन् इसका अनुभव करना है । परमात्मा के खोने का कभी भय नहीं रहता । रूपये-पैसे खो सकते हैं, पढ़ाई-लिखाई के शब्द आप खो सकते हो, भूल सकते हो लेकिन उस परमात्मा को भूलना चाहो तो भी नहीं भूल सकते । जो सदा है, सर्वत्र है, आपका अपना-आपा बना बैठा है, उसे कैसे भूल सकते हो ? उसको समझने के लिये केवल तत्परता चाहिए ।
उच्च कोटि के एक महात्मा थे । किसी शिष्य ने उनसे कहा : ‘‘गुरुजी ! मुझे भगवान का दर्शन कराइये ।’’
महात्मा ने उठाया डण्डा और कहा : ‘‘इतने रूपों में प्रभु दिख रहा है, उसका तूने क्या सदुपयोग किया ? फिर से प्रभु का कोई नया रूप तेरे आगे प्रगट कराऊँ ? कितने रूपों में वह गा रहा है ! कितने रूपों में वह गुनगुना रहा है ! उसका तूने क्या फायदा उठाया, जो फिर एक नया रूप देखना चाहता है ?’’ 
तुलसीदासजी कहते हैं :
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि ।
जड़ और चेतन सब परमात्ममय ही तो है ! जहाँ घन अवस्था है उसको जड़ बोलते हैं और जहाँ जाग्रत अवस्था है उसे चेतन कहते हैं । जैसे, एक ही पानी बर्फ भी बन जाता है और वाष्प भी । वाष्प एक सूक्ष्म और चेतन अवस्था है जबकि बर्फ घनीभूत और जड़ अवस्था है लेकिन हैं तो दोनों पानी ही । ऐसे ही चित्त की वृत्ति जब सूक्ष्म, अति सूक्ष्म होती है तब परब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है और स्थूल इन्द्रियों के द्वारा जो व्यवहार हो रहा है वह परब्रह्म परमात्मा का स्थूल रूप से साक्षात्कार ही है ।
अज्ञानी लोग देह को ही ‘मैं’ मानते हैं लेकिन देह के भीतर जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म चेतना कार्य करती है वह आनंदस्वरूप आत्मा है, सुखस्वरूप आत्मा है । परम पुरुषार्थ यही है कि उसे जान लें ।
उसे जानने की सबसे सरल युक्ति तो यही है कि ऐसी भावना करें : ‘जो कुछ दिख रहा है उसमें मेरा ही स्वरूप है ।’ जैसे केश, नख, त्वचा, रोमकूप आदि सब भिन्न-भिन्न होते हुए भी शरीर की एकता का अनुभव होता है, ऐसे ही स्थूल जगत में सब भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी ज्ञानवान् को सर्वत्र अपने अद्वैत स्वरूप का अनुभव होता है ।
‘जन्म और मृत्यु शरीर के होते हैं, जाति स्थूल शरीर की होती है, बन्धु और मित्र सब स्थूल शरीर के संबंध हैं ।
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता न जन्मः ।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
‘मैं तो चिदानंदस्वरूप हूँ… ॐ…ॐ…ॐ…’

बाह्य सुख-सुविधाओं के न होते हुए भी जितना सुख यहाँ ध्यानयोग शिविर में मिल रहा है, उतना सुख बड़ी-बड़ी होटलों में रहने पर भी नहीं मिला होगा क्योंकि वह सुख सदोष सुख था, विकारी सुख था । भगवान के रास्ते का, ईश्वरीय मार्ग का निर्दोष-निर्विकारी सुख वह नहीं था लेकिन यहाँ जो सुख मिल रहा है वह किसी विषय-भोग का नहीं, वरन् निर्विषय नारायण का सुख मिल रहा है ।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने ‘श्रीरामचरितमानस’ में कहा है :
सकल पदारथ इह जग मांही ।
कर्म हीन नर पावत नाहीं ॥

इस संसार में सब प्रकार के पदार्थ हैं फिर यत्न करके चाहे नर्क का सामान इकट्ठा करो चाहे स्वर्ग का, चाहे वैकुंठ का करो चाहे एकदम निर्दोष, शुद्ध-बुद्ध आत्मा का ज्ञान पाकर मुक्त हो जाओ… यह आपके हाथ की बात है ।

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Divya Prerna Prakash (दिव्य प्रेरणा प्रकाश)

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From the Satsang of His Holiness Sant Sri Asaramji Bapu and Quotes of those benefited by the grace of His Holiness Sant Sri Asaramji Bapu.
                                                                  Divine Inspiration:
                                                        The Secret of Eternal Youth
“Many good persons have been degraded by following the Freudian psychology, whereas many ordinary people have become great by following the Yoga psychology of Patanjali. ‘The Secret of Eternal Youth’ is a book based on the psychology of Rishi Patanjali. It must be read without fail. As you read this book, you will gradually get divine inspiration and light. You must not only read this book five times yourself but should also carry out the divine service of distributing it to others. This book provides moral understanding to the youths and helps them to get rid of their evil sex habits bringing about a divine transformation in their lives. So you too carry out the noble service of distributing this book to 2-5 people without fail. It will be considered a service to the nation and mankind as a whole, nay, to God Himself.”
                                 What is the Highest Penance? What has been eulogized by the sages?
                                    What is the source of zeal, prosperity and supernatural powers?
                                      What is the prime source of strength & bliss?… Brahmacharya.
 
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Shadshiti Sankranti षडशीति संक्रांति

Date : 15th June 2018

Time : 11.35 AM TO 6 PM

पद्म पुराण

Shadshiti Sankranti

षडशीति संक्रांति में किये गए जप ध्यान का फल ८६००० गुना होता है – (पद्म पुराण )

Jai Gurudev, Jai Sai Asaram, Jai Bapu Asharam, Jai Ho….

Apki Lila ki bharmar,

Apki Kripa hai Apaar,

Apki Mahima Hai Aparmpar,

Apki Mahajayjaykar !!!

 

श्री योगवासिष्ठ महारामायण

YVMR

श्री योगवासिष्ठ महारामायण (आश्रम)

वैराग्य प्रकरण, मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण,उत्पत्ति प्रकरण  

भाग – १ –  PDF-1

स्थिति प्रकरण, उपशम प्रकरण

भाग – २ – PDF-2

निर्वाण प्रकरण

भाग – ३ – PDF-3

भाग – ४ – PDF-4

Shri Guru Gita

image_gurugita-fullIt is the heart of Skanada Purana in form of a dialogue between Lord Shiva and goddess Parvati. The direct experience of Suta is brilliantly expressed through each and every couplet in it.

The couplets of this Guru Gita is the great remedy for the longlasting disease of birth and death. It is the sweetest nectar for Sadhakas. The merit is diminished by drinking the nectar of heaven. By drinking the nectar of this Gita sin is destroyed which leads to Absolute Peace and Knowledge of one’s real nature.
Shri Shiv Gita – Shri Guru Geeta (Voice: Pujya Narayan Sai Ji) – Sant Shri Asaram Ji Bapu