माँ दुर्गा के 51 शक्तिपीठ

sati-and-shivaराजा प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में माता जगदम्बिका ने सती के रूप में जन्म लिया था और भगवान शिव से विवाह किया। एक बार मुनियों का एक समूह यज्ञ करवा रहा था। यज्ञ में सभी देवताओं को बुलाया गया था। जब राजा दक्ष आए तो सभी लोग खड़े हो गए लेकिन भगवान शिव खड़े नहीं हुए। भगवान शिव दक्ष के दामाद थे। यह देख कर राजा दक्ष बेहद क्रोधित हुए। दक्ष अपने दामाद शिव को हमेशा निरादर भाव से देखते थे। सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व / ब्रिहासनी’ नामक यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता और सती के पति भगवान शिव को इस यज्ञ में शामिल होने के लिए निमन्त्रण नहीं भेजा था। जिससे भगवान शिव इस यज्ञ में शामिल नहीं हुए। नारद जी से सती को पता चला कि उनके पिता के यहां यज्ञ हो रहा है लेकिन उन्हें निमंत्रित नहीं किया गया है। इसे जानकर वे क्रोधित हो उठीं। नारद ने उन्हें सलाह दी कि पिता के यहां जाने के लिए बुलावे की ज़रूरत नहीं होती है। जब सती अपने पिता के घर जाने लगीं तब भगवान शिव ने मना कर दिया। लेकिन सती पिता द्वारा न बुलाए जाने पर और शंकरजी के रोकने पर भी जिद्द कर यज्ञ में शामिल होने चली गई। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष ने भगवान शंकर के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें करने लगे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती को यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ और वहीं यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। सर्वत्र प्रलय-सा हाहाकार मच गया। भगवान शंकर के आदेश पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया और अन्य देवताओं को शिव निंदा सुनने की भी सज़ा दी और उनके गणों के उग्र कोप से भयभीत सारे देवता और ऋषिगण यज्ञस्थल से भाग गये। तब भगवान शिव ने सती के वियोग में यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए सम्पूर्ण भूमण्डल पर भ्रमण करने लगे। भगवती सती ने अन्तरिक्ष में शिव को दर्शन दिया और उनसे कहा कि जिस-जिस स्थान पर उनके शरीर के खण्ड विभक्त होकर गिरेंगे, वहाँ महाशक्तिपीठ का उदय होगा। सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर विचरण करते हुए तांडव नृत्य भी करने लगे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देखकर और देवों के अनुनय-विनय पर भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खण्ड-खण्ड कर धरती पर गिराते गए। जब-जब शिव नृत्य मुद्रा में पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरा देते। ‘तंत्र-चूड़ामणि’ के अनुसार इस प्रकार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया। इस तरह कुल 51 स्थानों में माता की शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर शिव को पुन: पति रूप में प्राप्त किया।
51 शक्ति पीठो का विवरण (Details of 51 Shakti Peethas) :

1. किरीट शक्तिपीठ (Kirit Shakti Peeth) :
किरीट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट लालबाग कोट पर स्थित है। यहां सती माता का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा था। यहां की शक्ति विमला अथवा भुवनेश्वरी तथा भैरव संवर्त हैं।
(शक्ति का मतलब माता का वह रूप जिसकी पूजा की जाती है तथा भैरव का मतलब शिवजी का वह अवतार जो माता के इस रूप के स्वांगी है )

2. कात्यायनी शक्तिपीठ (Katyayani Shakti Peeth ) :
वृन्दावन, मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृन्दावन शक्तिपीठ जहां सती का केशपाश गिरा था। यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं तथा भैरव भूतेश है।

3. करवीर शक्तिपीठ (Karveer shakti Peeth) :
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का त्रिनेत्र गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव क्रोधशिश हैं। यहां महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है।

4. श्री पर्वत शक्तिपीठ (Shri Parvat Shakti Peeth) :
इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतान्तर है कुछ विद्वानों का मानना है कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ का मानना है कि यह असम के सिलहट में है जहां माता सती का दक्षिण तल्प यानी कनपटी गिरा था। यहां की शक्ति श्री सुन्दरी एवं भैरव सुन्दरानन्द हैं।

5. विशालाक्षी शक्तिपीठ (Vishalakshi Shakti Peeth) :
उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है शक्तिपीठ जहां माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। यहां की शक्ति विशालाक्षी तथा भैरव काल भैरव हैं।

6. गोदावरी तट शक्तिपीठ (Godavari Coast Shakti Peeth) :
आंध्रप्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का वामगण्ड यानी बायां कपोल गिरा था। यहां की शक्ति विश्वेश्वरी या रुक्मणी तथा भैरव दण्डपाणि हैं।

7. शुचीन्द्रम शक्तिपीठ (Suchindram shakti Peeth) :
तमिलनाडु, कन्याकुमारी के त्रिासागर संगम स्थल पर स्थित है यह शुची शक्तिपीठ, जहां सती के उफध्र्वदन्त (मतान्तर से पृष्ठ भागद्ध गिरे थे। यहां की शक्ति नारायणी तथा भैरव संहार या संकूर हैं।

8. पंच सागर शक्तिपीठ (Panchsagar Shakti Peeth) :
इस शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है लेकिन यहां माता का नीचे के दान्त गिरे थे। यहां की शक्ति वाराही तथा भैरव महारुद्र हैं।

9. ज्वालामुखी शक्तिपीठ (Jwalamukhi Shakti Peeth) :
हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां सती का जिह्वा गिरी थी। यहां की शक्ति सिद्धिदा व भैरव उन्मत्त हैं।

10. भैरव पर्वत शक्तिपीठ (Bhairavparvat Shakti Peeth) :
इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतदभेद है। कुछ गुजरात के गिरिनार के निकट भैरव पर्वत को तो कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षीप्रा नदी तट पर वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं, जहां माता का उफध्र्व ओष्ठ गिरा है। यहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण हैं।

11. अट्टहास शक्तिपीठ ( Attahas Shakti Peeth) :
अट्टहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। जहां माता का अध्रोष्ठ यानी नीचे का होंठ गिरा था। यहां की शक्ति पफुल्लरा तथा भैरव विश्वेश हैं।

12. जनस्थान शक्तिपीठ (Janasthan Shakti Peeth) :
महाराष्ट्र नासिक के पंचवटी में स्थित है जनस्थान शक्तिपीठ जहां माता का ठुड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव विकृताक्ष हैं।

13. कश्मीर शक्तिपीठ या अमरनाथ शक्तिपीठ (Kashmir Shakti Peeth or Amarnath Shakti Peeth) :
जम्मू-कश्मीर के अमरनाथ में स्थित है यह शक्तिपीठ जहां माता का कण्ठ गिरा था। यहां की शक्ति महामाया तथा भैरव त्रिसंध्येश्वर हैं।

14. नन्दीपुर शक्तिपीठ (Nandipur Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है यह पीठ, जहां देवी की देह का कण्ठहार गिरा था। यहां कि शक्ति निन्दनी और भैरव निन्दकेश्वर हैं।

15. श्री शैल शक्तिपीठ (Shri Shail Shakti Peeth ) :
आंध्रप्रदेश के कुर्नूल के पास है श्री शैल का शक्तिपीठ, जहां माता का ग्रीवा गिरा था। यहां की शक्ति महालक्ष्मी तथा भैरव संवरानन्द अथव ईश्वरानन्द हैं।

16. नलहटी शक्तिपीठ (Nalhati Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के बोलपुर में है नलहटी शक्तिपीठ, जहां माता का उदरनली गिरी थी। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव योगीश हैं।

17. मिथिला शक्तिपीठ (Mithila Shakti Peeth ) :
इसका निश्चित स्थान अज्ञात है। स्थान को लेकर मन्तारतर है तीन स्थानों पर मिथिला शक्तिपीठ को माना जाता है, वह है नेपाल के जनकपुर, बिहार के समस्तीपुर और सहरसा, जहां माता का वाम स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति उमा या महादेवी तथा भैरव महोदर हैं।

18. रत्नावली शक्तिपीठ (Ratnavali Shakti Peeth) :
इसका निश्चित स्थान अज्ञात है, बंगाज पंजिका के अनुसार यह तमिलनाडु के चेन्नई में कहीं स्थित है रत्नावली शक्तिपीठ जहां माता का दक्षिण स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति कुमारी तथा भैरव शिव हैं।

19. अम्बाजी शक्तिपीठ (Ambaji Shakti Peeth) :
गुजरात गूना गढ़ के गिरनार पर्वत के शिखर पर देवी अम्बिका का भव्य विशाल मन्दिर है, जहां माता का उदर गिरा था। यहां की शक्ति चन्द्रभागा तथा भैरव वक्रतुण्ड है। ऐसी भी मान्यता है कि गिरिनार पर्वत के निकट ही सती का उध्र्वोष्ठ गिरा था, जहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण है।

20. जालंध्र शक्तिपीठ (Jalandhar Shakti Peeth) :
पंजाब के जालंध्र में स्थित है माता का जालंध्र शक्तिपीठ जहां माता का वामस्तन गिरा था। यहां की शक्ति त्रिापुरमालिनी तथा भैरव भीषण हैं।.

21. रामागरि शक्तिपीठ (Ramgiri Shakti Peeth) :
इस शक्ति पीठ की स्थिति को लेकर भी विद्वानों में मतान्तर है। कुछ उत्तर प्रदेश के चित्राकूट तो कुछ मध्य प्रदेश के मैहर में मानते हैं, जहां माता का दाहिना स्तन गिरा था। यहा की शक्ति शिवानी तथा भैरव चण्ड हैं।

22. वैद्यनाथ शक्तिपीठ (Vaidhnath Shakti Peeth) :
झारखण्ड के गिरिडीह, देवघर स्थित है वैद्यनाथ हार्द शक्तिपीठ, जहां माता का हृदय गिरा था। यहां की शक्ति जयदुर्गा तथा भैरव वैद्यनाथ है। एक मान्यतानुसार यहीं पर सती का दाह-संस्कार भी हुआ था।

23. वक्त्रोश्वर शक्तिपीठ (Varkreshwar Shakti Peeth) :
माता का यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है जहां माता का मन गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव वक्त्रानाथ हैं।

24. कण्यकाश्रम कन्याकुमारी शक्तिपीठ (Kanyakumari Shakti Peeth) :
तमिलनाडु के कन्याकुमारी के तीन सागरों हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ीद्ध के संगम पर स्थित है कण्यकाश्रम शक्तिपीठ, जहां माता का पीठ मतान्तर से उध्र्वदन्त गिरा था। यहां की शक्ति शर्वाणि या नारायणी तथा भैरव निमषि या स्थाणु हैं।

25. बहुला शक्तिपीठ (Bahula Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के कटवा जंक्शन के निकट केतुग्राम में स्थित है बहुला शक्तिपीठ, जहां माता का वाम बाहु गिरा था। यहां की शक्ति बहुला तथा भैरव भीरुक हैं।

26. उज्जयिनी शक्तिपीठ (Ujjaini Shakti Peeth) :
मध्य प्रदेश के उज्जैन के पावन क्षिप्रा के दोनों तटों पर स्थित है उज्जयिनी शक्तिपीठ। जहां माता का कुहनी गिरा था। यहां की शक्ति मंगल चण्डिका तथा भैरव मांगल्य कपिलांबर हैं।

27. मणिवेदिका शक्तिपीठ (Manivedika Shakti Peeth) :
राजस्थान के पुष्कर में स्थित है मणिदेविका शक्तिपीठ, जिसे गायत्री मन्दिर के नाम से जाना जाता है यहीं माता की कलाइयां गिरी थीं। यहां की शक्ति गायत्री तथा भैरव शर्वानन्द हैं।

28. प्रयाग शक्तिपीठ (Prayag Shakti peeth) :
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित है। यहां माता की हाथ की अंगुलियां गिरी थी। लेकिन, स्थानों को लेकर मतभेद इसे यहां अक्षयवट, मीरापुर और अलोपी स्थानों गिरा माना जाता है। तीनों शक्तिपीठ की शक्ति ललिता हैं तथा भैरव भव है।

29. विरजाक्षेत्रा, उत्कल शक्तिपीठ (Utakal Shakti Peeth) :
उड़ीसा के पुरी और याजपुर में माना जाता है जहां माता की नाभि गिरा था। यहां की शक्ति विमला तथा भैरव जगन्नाथ पुरुषोत्तम हैं।

30. कांची शक्तिपीठ (Kanchi Shakti Peeth) :
तमिलनाडु के कांचीवरम् में स्थित है माता का कांची शक्तिपीठ, जहां माता का कंकाल गिरा था। यहां की शक्ति देवगर्भा तथा भैरव रुरु हैं।

31. कालमाध्व शक्तिपीठ (Kalmadhav Shakti Peeth) :
इस शक्तिपीठ के बारे कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है। परन्तु, यहां माता का वाम नितम्ब गिरा था। यहां की शक्ति काली तथा भैरव असितांग हैं।

32. शोण शक्तिपीठ (Shondesh Shakti Peeth) :
मध्य प्रदेश के अमरकंटक के नर्मदा मन्दिर शोण शक्तिपीठ है। यहां माता का दक्षिण नितम्ब गिरा था। एक दूसरी मान्यता यह है कि बिहार के सासाराम का ताराचण्डी मन्दिर ही शोण तटस्था शक्तिपीठ है।
यहां सती का दायां नेत्रा गिरा था ऐसा माना जाता है। यहां की शक्ति नर्मदा या शोणाक्षी तथा भैरव भद्रसेन हैं।

33. कामाख्या शक्तिपीठ (Kamakhya Shakti peeth) :
कामगिरि असम गुवाहाटी के कामगिरि पर्वत पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का योनि गिरा था। यहां की शक्ति कामाख्या तथा भैरव उमानन्द हैं।

34. जयन्ती शक्तिपीठ (Jayanti Shakti Peeth) :
जयन्ती शक्तिपीठ मेघालय के जयन्तिया पहाडी पर स्थित है, जहां माता का वाम जंघा गिरा था। यहां की शक्ति जयन्ती तथा भैरव क्रमदीश्वर हैं।

35. मगध् शक्तिपीठ (Magadh Shakti Peeth) :
बिहार की राजधनी पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है जहां माता का दाहिना जंघा गिरा था। यहां की शक्ति सर्वानन्दकरी तथा भैरव व्योमकेश हैं।

36. त्रिस्तोता शक्तिपीठ (Trishota Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के शालवाड़ी गांव में तीस्ता नदी पर स्थित है त्रिस्तोता शक्तिपीठ, जहां माता का वामपाद गिरा था। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव ईश्वर हैं।

37. त्रिपुरी सुन्दरी शक्तित्रिपुरी पीठ (Tripura Sundari Shakti Peeth) :
त्रिपुरा के राध किशोर ग्राम में स्थित है त्रिपुरे सुन्दरी शक्तिपीठ, जहां माता का दक्षिण पाद गिरा था। यहां की शक्ति त्रिापुर सुन्दरी तथा भैरव त्रिपुरेश हैं।

38 . विभाष शक्तिपीठ (Vibhasha Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के ताम्रलुक ग्राम में स्थित है विभाष शक्तिपीठ, जहां माता का वाम टखना गिरा था। यहां की शक्ति कापालिनी, भीमरूपा तथा भैरव सर्वानन्द हैं।

39. देवीकूप पीठ कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ (Kurukshetra Shakti Peeth) :
हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन के निकट द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ, जिसे श्रीदेवीकूप भद्रकाली पीठ के नाम से भी जाना जाता है। यहां माता के दहिने चरण (गुल्पफद्ध) गिरे थे। यहां की शक्ति सावित्री तथा भैरव स्थाणु हैं।

40. युगाद्या शक्तिपीठ, क्षीरग्राम शक्तिपीठ (Ughadha Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के बर्दमान जिले के क्षीरग्राम में स्थित है युगाद्या शक्तिपीठ, यहां सती के दाहिने चरण का अंगूठा गिरा था। यहां की शक्ति जुगाड़या और भैरव क्षीर खंडक है।

41. विराट का अम्बिका शक्तिपीठ (Virat Nagar Shakti Peeth) :
राजस्थान के गुलाबी नगरी जयपुर के वैराटग्राम में स्थित है विराट शक्तिपीठ, जहाँ सती के ‘दायें पाँव की उँगलियाँ’ गिरी थीं।। यहां की शक्ति अंबिका तथा भैरव अमृत हैं।

42. कालीघाट शक्तिपीठ (Kalighat Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल, कोलकाता के कालीघाट में कालीमन्दिर के नाम से प्रसिध यह शक्तिपीठ, जहां माता के दाएं पांव की अंगूठा छोड़ 4 अन्य अंगुलियां गिरी थीं। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव नकुलेश हैं।

43. मानस शक्तिपीठ (Manasa Shakti Peeth) :
तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना हथेली का निपात हुआ था। यहां की शक्ति की दाक्षायणी तथा भैरव अमर हैं।

44. लंका शक्तिपीठ (Lanka Shakti Peeth) :
श्रीलंका में स्थित है लंका शक्तिपीठ, जहां माता का नूपुर गिरा था। यहां की शक्ति इन्द्राक्षी तथा भैरव राक्षसेश्वर हैं। लेकिन, उस स्थान ज्ञात नहीं है कि श्रीलंका के किस स्थान पर गिरे थे।

45. गण्डकी शक्तिपीठ (Gandaki Shakti Peeth) :
नेपाल में गण्डकी नदी के उद्गम पर स्थित है गण्डकी शक्तिपीठ, जहां सती के दक्षिणगण्ड(कपोल) गिरा था। यहां शक्ति `गण्डकी´ तथा भैरव `चक्रपाणि´ हैं।

46. गुह्येश्वरी शक्तिपीठ (Guhyeshwari Shakti Peeth) :
नेपाल के काठमाण्डू में पशुपतिनाथ मन्दिर के पास ही स्थित है गुह्येश्वरी शक्तिपीठ है, जहां माता सती के दोनों जानु (घुटने) गिरे थे। यहां की शक्ति `महामाया´ और भैरव `कपाल´ हैं।

47. हिंगलाज शक्तिपीठ (Hinglaj Shakti Peeth) :
पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रान्त में स्थित है माता हिंगलाज शक्तिपीठ, जहां माता का ब्रह्मरन्ध्र (सर का ऊपरी भाग) गिरा था। यहां की शक्ति कोट्टरी और भैरव भीमलोचन है।

48. सुगंध शक्तिपीठ (Sugandha Shakti Peeth) :
बांग्लादेश के खुलना में सुगंध नदी के तट पर स्थित है उग्रतारा देवी का शक्तिपीठ, जहां माता का नासिका गिरा था। यहां की देवी सुनन्दा है तथा भैरव त्रयम्बक हैं।

49. करतोयाघाट शक्तिपीठ (Kartoyatat Shakti Peeth) :
बंग्लादेश भवानीपुर के बेगड़ा में करतोया नदी के तट पर स्थित है करतोयाघाट शक्तिपीठ, जहां माता का वाम तल्प गिरा था। यहां देवी अपर्णा रूप में तथा शिव वामन भैरव रूप में वास करते हैं।

50. चट्टल शक्तिपीठ (Chatal Shakti Peeth) :
बंग्लादेश के चटगांव में स्थित है चट्टल का भवानी शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना बाहु यानी भुजा गिरा था। यहां की शक्ति भवानी तथा भेरव चन्द्रशेखर हैं।

51. यशोर शक्तिपीठ (Yashor Shakti Peeth) :
बांग्लादेश के जैसोर खुलना में स्थित है माता का यशोरेश्वरी शक्तिपीठ, जहां माता का बायीं हथेली गिरा था। यहां शक्ति यशोरेश्वरी तथा भैरव चन्द्र हैं।

श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशत नामावलिः

Navratriश्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशत नामावलिः

ॐ प्रकृत्यै नमः ।                       ॐ विकृत्यै नमः ।               ॐ विद्यायै नमः ।

ॐ सर्वभूतहितप्रदायै नमः ।        ॐ श्रद्धायै नमः ।                  ॐ विभूत्यै नमः ।

ॐ सुरभ्यै नमः ।                       ॐ परमात्मिकायै नमः ।        ॐ वाचे नमः ।

ॐ पद्मालयायै नमः ।                  ॐ पद्मायै नमः ।                   ॐ शुचये नमः ।

ॐ स्वाहायै नमः ।                      ॐ स्वधायै नमः ।                 ॐ सुधायै नमः ।

ॐ धन्यायै नमः ।                      ॐ हिरण्मय्यै नमः ।             ॐ लक्ष्म्यै नमः ।

ॐ नित्यपुष्टायै नमः ।                ॐ विभावर्यै नमः ।                ॐ अदित्यै नमः ।

ॐ दित्ये नमः ।                         ॐ दीपायै नमः ।                   ॐ वसुधायै नमः ।

ॐ वसुधारिण्यै नमः ।                 ॐ कमलायै नमः ।               ॐ कान्तायै नमः ।

ॐ कामाक्ष्यै नमः ।                     ॐ क्रोधसंभवायै नमः ।         ॐ अनुग्रहप्रदायै नमः ।

ॐ बुद्धये नमः ।                          ॐ अनघायै नमः ।               ॐ हरिवल्लभायै नमः ।

ॐ अशोकायै नमः ।                    ॐ अमृतायै नमः ।               ॐ दीप्तायै नमः ।

ॐ लोकशोकविनाशिन्यै नमः ।    ॐ धर्मनिलयायै नमः ।        ॐ करुणायै नमः ।

ॐ लोकमात्रे नमः ।                     ॐ पद्मप्रियायै नमः ।           ॐ पद्महस्तायै नमः ।

ॐ पद्माक्ष्यै नमः ।                       ॐ पद्मसुन्दर्यै नमः ।           ॐ पद्मोद्भवायै नमः ।

ॐ पद्ममुख्यै नमः ।                     ॐ पद्मनाभप्रियायै नमः ।     ॐ रमायै नमः ।

ॐ पद्ममालाधरायै नमः ।             ॐ देव्यै नमः ।                    ॐ पद्मिन्यै नमः ।

ॐ पद्मगन्धिन्यै नमः ।                ॐ पुण्यगन्धायै नमः ।        ॐ सुप्रसन्नायै नमः ।

ॐ प्रसादाभिमुख्यै नमः ।             ॐ प्रभायै नमः ।                 ॐ चन्द्रवदनायै नमः ।

ॐ चन्द्रायै नमः ।                        ॐ चन्द्रसहोदर्यै नमः ।        ॐ चतुर्भुजायै नमः ।

ॐ चन्द्ररूपायै नमः ।                   ॐ इन्दिरायै नमः ।             ॐ इन्दुशीतलायै नमः ।

ॐ आह्लादजनन्यै नमः ।               ॐ पुष्टयै नमः ।                   ॐ शिवायै नमः ।

ॐ शिवकर्यै नमः ।                       ॐ सत्यै नमः ।                   ॐ विमलायै नमः ।

ॐ विश्वजनन्यै नमः ।                  ॐ तुष्टयै नमः ।                   ॐ दारिद्र्यनाशिन्यै नमः ।

ॐ प्रीतिपुष्करिण्यै नमः ।             ॐ शान्तायै नमः ।               ॐ शुक्लमाल्यांबरायै नमः ।

ॐ श्रियै नमः ।                            ॐ भास्कर्यै नमः ।               ॐ बिल्वनिलयायै नमः ।

ॐ वरारोहायै नमः ।                     ॐ यशस्विन्यै नमः ।           ॐ वसुन्धरायै नमः ।

ॐ उदारांगायै नमः ।                    ॐ हरिण्यै नमः ।                 ॐ हेममालिन्यै नमः ।

ॐ धनधान्यकर्ये नमः ।                ॐ सिद्धये नमः ।                 ॐ स्त्रैणसौम्यायै नमः ।

ॐ शुभप्रदाये नमः ।                     ॐ नृपवेश्मगतानन्दायै नमः । ॐ वरलक्ष्म्यै नमः ।

ॐ वसुप्रदायै नमः ।                      ॐ शुभायै नमः ।                 ॐ हिरण्यप्राकारायै नमः ।

ॐ समुद्रतनयायै नमः ।                ॐ जयायै नमः ।                 ॐ मंगळा देव्यै नमः ।

ॐ विष्णुवक्षस्स्थलस्थितायै नमः । ॐ विष्णुपत्न्यै नमः ।         ॐ प्रसन्नाक्ष्यै नमः ।

ॐ नारायणसमाश्रितायै नमः ।       ॐ दारिद्र्यध्वंसिन्यै नमः ।  ॐ देव्यै नमः ।

ॐ सर्वोपद्रव वारिण्यै नमः ।           ॐ नवदुर्गायै नमः ।            ॐ महाकाल्यै नमः ।

ॐ ब्रह्माविष्णुशिवात्मिकायै नमः । ॐ त्रिकालज्ञानसंपन्नायै नमः । ॐ भुवनेश्वर्यै नमः ।

॥ इति श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशत नामावलिः ॥

शारदीय नवरात्रि – १ अक्टूबर से ११ अक्टूबर तक

Goddess Durgaनवरात्रि के दिनों में ‘ ॐ श्रीं ॐ ‘ का जप करें|
यदि कोई पूरे नवरात्रि के उपवास-व्रत न कर सकता हो तो सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीन दिन उपवास करके देवी की पूजा करने से वह सम्पूर्ण नवरात्रि के उपवास के फल को प्राप्त करता है।

वर्ष में ४ नवरात्रियाँ
साल में ४ नवरात्रियाँ होती हैं, जिनमे से २ नवरात्रियाँ गुप्त होती हैं –
 माघ शुक्ल पक्ष की प्रथम ९ तिथियाँ
 चैत्र मास की रामनवमी के समय आती हैं वो ९ तिथियाँ
 आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष के ९ दिन
 अश्विन महीने की दशहरे के पहले आनेवाली ९ तिथियाँ
‘ नवरात्रियों में उपवास करते, तो एक मंत्र जप करें ……..ये मंत्र वेद व्यास जी भगवान ने कहा है ….इस से श्रेष्ट अर्थ की प्राप्ति हो जाती है……दरिद्रता दूर हो जाती है । “ॐ श्रीं ह्रीं क्लिं ऐं कमल वसिन्ये स्वाहा”

नवरात्रि के दिनों का अर्थ
 नवरात्रि के प्रथम तीन दिन होते हैं माँ काली की उपासना के होते हैं …….जिसमे अपने काले कर्मो की निवृति के लिए जप किया जाता है ।
 नवरात्रि के दूसरे ३ दिन लक्ष्मी की उपासना के होते है …….ताकि हम सफल सम्पदा के अधिकारी बनें ।
 आखिरी ३ दिन सरस्वती की उपासना के होते हैं ………ताकि हमारे जीवन में प्रज्ञा ज्ञान का अर्जन हो । उसके लिए सारस्वत्य मंत्र का जप और सूर्य नारायण का ध्यान करना चाहिये ।

उपासना के नौ दिन  (पूज्य बापू जी के सत्संग से)
नवरात्रि में शुभ संकल्पों को पोषित करने, रक्षित करने और शत्रुओं को मित्र बनाने वाले मंत्र की सिद्धि का योग होता है। वर्ष में दो नवरात्रियाँ आती हैं। शारदीय नवरात्रि और चैत्री नवरात्रि। चैत्री नवरात्रि के अंत में रामनवमी आती है और दशहरे को पूरी होने वाली नवरात्रि के अंत में राम जी का विजय-दिवस विजयादशमी आता है। एक नवरात्रि के आखिरी दिन राम जी प्रागट्य होता है और दूसरी नवरात्रि आती तब रामजी की विजय होती है, विजयादशमी मनायी जाती है। इसी दिन समाज को शोषित करने वाले, विषय-विकार को सत्य मानकर रमण करने वाले रावण का श्रीरामजी ने वध किया था।

नवरात्रि को तीन हिस्सों में बाँटा जा सकता है। इसमें पहले तीन दिन तमस को जीतने की आराधना के हैं। दूसरे तीन दिन रजस् को और तीसरे दिन सत्त्व को जीतने की आराधना के हैं। आखिरी दिन दशहरा है। वह सत्त्व-रज-तम तीन गुणों को जीत के जीव को माया के जाल से छुड़ाकर शिव से मिलाने का दिन है। शारदीय नवरात्रि विषय-विकारों में उलझे हुए मन पर विजय पाने के लिए और चैत्री नवरात्रि रचनात्मक संकल्प, रचनात्मक कार्य, रचनात्मक जीवन के लिए, राम-प्रागट्य के लिए हैं।

नवरात्रि के प्रथम तीन दिन होते हैं माँ काली की आराधना करने के लिए, काले (तामसी) कर्मों की आदत से ऊपर उठने के लिए लिए। पिक्चर देखना, पानमसाला खाना, बीड़ी-सिगरेट पीना, काम-विकार में फिसलना – इन सब पाशविक वृत्तियों पर विजय पाने के लिए नवरात्रि के प्रथम तीन दिन माँ काली की उपासना की जाती है।

दूसरे तीन दिन सुख-सम्पदा के अधिकारी बनने के लिए हैं। इसमें लक्ष्मी जी की उपासना होती है। नवरात्रि के तीसरे तीन दिन सरस्वती की आराधना-उपासना के हैं। प्रज्ञा तथा ज्ञान का अर्जन करने के लिए हैं। हमारे जीवन में सत्-स्वभाव, ज्ञान-स्वभाव और आनन्द-स्वभाव का प्रागट्य हो। बुद्धि व ज्ञान का विकास करना हो तो सूर्यदेवता का भ्रूमध्य में ध्यान करें। विद्यार्थी सारस्वत्य मंत्र का जप करें। जिनको गुरुमंत्र मिला है वे गुरुमंत्र का, गुरुदेव का, सूर्यनारायण का ध्यान करें।

आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक का पर्व शारदीय नवरात्रि के रूप में जाना जाता है। यह व्रत-उपवास, आद्यशक्ति माँ जगदम्बा के पूजन-अर्चन व जप-ध्यान का पर्व है। यदि कोई पूरे नवरात्रि के उपवास-व्रत न कर सकता हो तो सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीन दिन उपवास करके देवी की पूजा करने से वह सम्पूर्ण नवरात्रि के उपवास के फल को प्राप्त करता है। देवी की उपासना के लिए तो नौ दिन हैं लेकिन जिन्हें ईश्वरप्राप्ति करनी है उनके लिए तो सभी दिन हैं।

घटस्थापना – १ अक्टूबर २०१६

ghatasthapanaश्री गणेशजी और माँ भगवती का ध्यान और क्षमा प्रार्थना करते हुए अधिक से अधिक अभिजित मुहुर्त तक घटस्थापन संपन्न करें |
नवरात्रका प्रयोग प्रारम्भ करनेके पहले सुगन्धयुक्त तैलके उद्वर्तनादिसे मङ्गलस्त्रान करके नित्यकर्म करे और स्थिर शान्तिके पवित्र स्थानमें शुभ मृत्तिकाकी वेदी बनाये । उसमें जौ और गेहूँ – इन दोनोंको मिलाकर बोये । वहीं सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टीके कलशको यथाविधि स्थापन करके गणेशादिका पूजन और पुण्याहवाचन करे और पीछे देवी ( या देव ) के समीप शुभासनपर पूर्व ( या उत्तर ) मुख बैठकर

“मम महामायाभगवती ( वा मायाधिपति भगवत ) प्रीतये ( युर्बलवित्तारोयसमादरादिप्राप्तये वा ) नवरात्रव्रतमहं करिष्ये ।”

यह संकल्प करके मण्डलके मध्यमें रखे हु‌ए कलशपर सोने, चाँदी, धातु, पाषाण, मृत्तिका या चित्रमय मूर्ति विराजमान करे और उसका आवाहन आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्त्रान, वस्त्र, गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल, नीराजन, पुष्पाञ्जलि, नमस्कार और प्रार्थना आदि उपचारोंसे पूजन करे । स्त्री हो या पुरुष, सबको नवरात्र करना चाहिये । यदि कारणवश स्वयं न कर सकें तो प्रतिनिधि ( पति – पत्नी, ज्येष्ठ पुत्र, सहोदर या ब्राह्मण ) द्वारा करायें । नवरात्र नौ रात्रि पूर्ण होनेसे पूर्ण होता है । इसलिये यदि इतना समय न मिले या सामर्थ्य न हो तो सात, पाँच, तीन या एक दिन व्रत करे और व्रतमें भी उपवास, अयाचित, नक्त या एकभुक्त – जो बन सके यथासामर्थ्य वही कर ले ।

Rekha Didi ka Satsang – Shindiya, Bhubaneshwar (Odisa )

सिन्धियाँ , भुवनेश्वर (ओड़िसा) में २५ सितम्बर को रेखा दीदी जी के सानिध्य में मंगलमय सत्संग सम्पन्न हुआ |

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गरुड़पुराण -धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प -अध्याय- १

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|| ॐ श्रीपरमात्मने नम: ||

गरुडपुराण

धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प

अध्याय – १

वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्न कर्तव्यों के बारेमें गरुडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम

श्रीगणेशजीको नमस्कार है | ‘ॐ’कारसे युक्त भगवान वासुदेव हरिको प्रणाम है | वासुदेव हरिको प्रणाम है |

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम |

देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत ||

भगवान श्रीनारायण, नरोत्तम नर एवं भगवती श्रीसरस्वती देवीको नमस्कार करके पुराणका वाचन करना चाहिये | जिन भगवानका धर्म की मूल हैं, वेद जिनका स्कन्ध है, पुराणरूपी शाखासे जो समृद्ध हैं, यज्ञ जिनके पुष्प हैं, मोक्ष जिनका फल है – ऐसे भगवान मधुसुदनरूपी कल्पवृक्षकी जय हो |

देवक्षेत्र नैमिषारण्यमें शौनकादिक श्रेष्ठ मुनियोंने सुखपूर्वक विराजमान श्रीसूतजी महाराजसे कहा –

हे श्रीसूतजी ! आप श्रीवेदव्यासजी की कृपासे सब कुछ जानते हैं | अत: आप हम सभीके संदेहका निवारण करें | कुछ लोगोंका कहना है कि जिस प्रकार कोई र्जोक तिनकेसे तिनकेका सहारा लेकर आगे बढ़ती है, उसी प्रकार शरीरधारी जीव एक शरीरके बाद दूसरे शरीरका आश्रय ग्रहण करता है | दूसरे विद्वानोंका कहना है कि प्राणी मृत्युके पश्चात यमराजकी यातनाओंका भोग करता हैं, तदनन्तर उसको दूसरे शरीरकी प्राप्ति होती है – इन दोनोंमें क्या सत्य हैं ? यह हमें बतानेकी कृपा करें |

सूतजीने कहा – हे महाभाग ! आप लोगोंने अच्छा प्रश्न किया है | आप लोगोंको संदेह हो यह असम्भव हैं | आप लोगोंने तो लोकहितसे प्रेरित होकर ही ऐसा प्रश्न किया है | हे विप्रगणों ! मैं आप सबके ह्रदयमें अवस्थित उस संदेहको भगवान श्रीकृष्ण और गरुडके बीच हुए संवादके द्वारा दूर करूँगा | सर्वप्रथम मैं उन भगवान श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ, जिनका आश्रय लेकर मनुष्य इस भवसागरको एक क्षुद्र नदीकी भाँति अनायास ही पार कर जाते हैं |

हे मुनियों ! एक बार विनतापुत्र गरुडके ह्रदयमें इस ब्रह्माण्डके सभी लोकोंको देखनेकी इच्छा हुई | अत: हरिनामका उच्चारण करते हुए उन्होंने सभी लोकोंका भ्रमण किया | पाताल, पृथ्वीलोक तथा स्वर्गलोकका भ्रमण करते हुए वे पृथ्वीलोक के दुःखसे अत्यंत दु:खित एवं अशांतचित्त होकर पुन: वैकुण्ठ लोक वापस आ गये |

वैकुण्ठ लोकमें न रजोगुणकी प्रवृत्ति है, न तमोगुणकी ही प्रवृत्ति है, रजोगुण तथा तमोगुणसे मिश्रित सत्त्वगुणकी भी प्रवृत्ति वहाँ नहीं है | वहाँ केवल शुद्ध सत्त्वगुण ही अवस्थित रहता है | वहाँ माया भी नहीं है, वहाँ किसीका विनाश नहीं होता | वहाँ राग-द्वेष आदि षड्विकार भी नहीं हैं | वहाँ देव और असुर-वर्गद्वारा पूजित श्यामवर्णकी सुंदर कान्तिसे सुशोभित राजीवलोचन भगवान विष्णुके पार्षद विराजमान रहते हैं, जिनके शरीर पीतवसन और मनोहारी आभुषणोंसे विभूषित हैं और मणियुक्त स्वर्णके अलंकारणोंसे सुशोभित हैं | भगवानके वे सभी पार्षद चार-चार भुजाओंसे युक्त हैं | उनके कानोंमें कुण्डल और सिरपर मुकुट है | उनका वक्ष:स्थल सुंदर पुष्पोंकी मालासे सुशोभित है | मनको मोहित करनेवाली अप्सराओंसे युक्त, महात्माओंके चमकते हुए विमानोंकी पंक्तिकी कान्तिसे वे सभी सदा भास्वरित होते रहते हैं | वहाँ नाना प्रकारके वैभवोंसे समन्वित लक्ष्मी प्रसन्नतापूर्वक भगवान श्रीहरिके चरणोंकी पूजा करती रहती हैं |

गरुडजीने वहाँ देखा कि श्रीहरि झुलेपर विराजमान हैं | सखियोंद्वारा स्तुत्य लक्ष्मीजी झुलेमें स्थित भगवानकी स्तुति कर रही हैं | अपने लाल-लाल बड़े-बड़े नेत्रोंसे युक्त प्रसन्नमुख देवोंके अधिपति, श्रीपति, जगत्पति और यज्ञपति भगवान श्रीहरि अपने नन्द, सुनन्द आदि प्रदान पार्षदोंको देख रहे थे | उनके सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और वक्ष:स्थल श्रीसे सुशोभित था | वे पीताम्बरसे विभूषित थे | उनकी चार भुजाएँ थीं | प्रसन्नमुद्रामें हँसता हुआ उनका मुख था | बहुमूल्य आसनपर विराजमान वे हरि उस समय अपनी अन्यान्य शक्तियोंसे आवृत थे | प्रकृति, पुरुष, महत, अहंकार, पंचकर्मेंद्रिय. पंचज्ञानेंद्रिय, मन, पंचमहाभूत तथा पंचतन्मात्राओंसे निर्मित शरीरवाले अपने ही स्वरूपमें रमण करते हुए उन भगवान हरिका दर्शन करनेसे विनतासुत गरुडका अंत:करण आनन्दविभोर हो उठा | उनका शरीर रोमांचित हो गया | उनके नेत्रोंसे प्रेमाश्रओंकी धारा बहने लगी | आनन्दमग्न होकर उन्होंने प्रभुको प्रणाम किया | प्रणाम करते हुए अपने वाहन गरुडको देखकर भगवान विष्णुने कहा – हे पक्षिन ! आपने इतने दिनों में इस जगतकी किस भूमिका परिभ्रमण किया है ?

गरुडने कहा – भगवन ! आपकी कृपासे मैंने समस्त त्रिलोकीका परिभ्रमण किया है | उनमें स्थित जगतके सभी स्थावर और जंगम प्राणियोंको भी देखा | हे प्रभो ! यमलोकको छोडकर पृथ्वीलोकसे सत्यलोकतक सब कुछ मेरे द्वारा देखा जा चूका है | सभी योनियोंमें मानवयोनि ही भोग और मोक्षका शुभ आश्रय हैं | अत: सुकृतियोंके लिये ऐसा लोक न तो अभीतक बना है और ण भविष्यमें बनेगा | देवता लोग भी इस लोककी प्रशंसामें गीत गाते हुए कहते हैं – ‘जो लोग पवित्र भारतकी भूमिमें जन्म लेकर निवास करते हैं, वे धन्य हैं | देवता लोग भी स्वर्ग एवं अपवर्गरूप फलकी प्राप्तिके लिये पुन: भारतभूमिमें मनुष्यरूपमें जन्म लेते हैं’ –

गायन्ति देवा: किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे |

स्वर्गापवर्गास्य फलार्जनाय भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्वात || ( १/२७)

हे प्रभो ! आप यह बतानेकी कृपा करें कि मृत्युको प्राप्त हुआ प्रेत किस कारण पृथ्वीपर दाल दिया जाता है ? उसके मुखमें पंचरत्न (सोना, चाँदी,मोती, लाजावर्त तथा मूँगा – ये पाँच पंचरत्न कहलाते हैं |) क्यों डाला जाता हैं ? मरे हुए प्राणीके नीचे लोग कुश किसलिये बिछा देते हैं ? उसके दोनों पैर दक्षिण दिशाकी ओर क्यों कर दिये जाते हैं ? मरनेके समय मनुष्यके आगे पुत्र-पौत्रादि क्यों खड़े रहते हैं ? हे केशव ! मृत्युके समय विविध वस्तुओंका दान एवं गोदान किसलिये दिया जाता हैं ? बन्धु-बान्धव, मित्र और शत्रु आदि सभी मिलकर क्यों क्षमा-याचना करते हैं ? किससे प्रेरित होकर लोग मृत्युकालमें तिल, लोहा, स्वर्ण, कपास, नमक, सप्तधान्य ( जौ, धान, तिल, कंगनी, मूँग, चना तथा सौवा), भूमि और गौका दान देते हैं ?  प्राणी कैसे मरता है और मरनेके बाद कहाँ जाता हैं ? उस समय वह आतिवाहिक शरीर (निराधार-रूपमें आत्माको वहन करनेवाले शरीर ) को कैसे प्राप्त करता हैं ? अग्नि देनेवाले पुत्र और पौत्र इसे कंधेपर क्यों ले जाते हैं ? शवमें घृतका लेप क्यों किया जाता हैं ? उस समय एक आहुति देनेकी परम्परा कहाँसे चली हैं ? शवको भूमिस्पर्श किसलिये करवाया जाता है ? स्त्रियाँ उस मरे हुए व्यक्तिके लिये क्यों विलाप करती हैं ? शवके उत्तर दिशामें ‘यमसूक्त’ का पाठ क्यों किया जाता हैं ? मरे हुए व्यक्तिको पीनेके लिये जल एक ही वस्त्र धारण करके क्यों दिया जाता है ? उस समय सुर्यबिम्ब-निरिक्षण, पत्थरपर स्थापित यव, सरसों, दुर्वा और नीमकी पत्तियोंका स्पर्श करनेका विधान क्यों है ? उस समय स्त्री एवं पुरुष दोनों नीचे – ऊपर एक ही वस्त्र क्यों धारण करते हैं ? शवका दाह-संस्कार करनेके पश्चात उस व्यक्तिको अपने परिजनोंके साथ बैठकर भोजनादि क्यों नहीं करना चाहिये ? मरे हुए व्यक्तिके पुत्र दस दिनके पूर्व किसलिये पिंडोंका दान देते हैं ? चबूतरे ( वेदी ) पर पके हुए मिट्टीके पात्रमें दूध क्यों रखा जाता है ? रस्सीसे बँधे हुए तीन काष्ठ ( तिगोडिया ) के ऊपर रात्रिमें गाँवके चौराहेपर एकांतमें वर्षपर्यन्त प्रतिदिन दीपक क्यों दिया जाता हैं ? शवका दाह-संस्कार तथा अन्य लोगोंके साथ जल-तर्पणकी क्रिया क्यों की जाती है ? हे भगवन ! मृत्युके बाद प्राणी आतिवाहिक शरीरमें चला जाता है, उसके लिये नौ पिंड देने चाहिये, इसका क्या प्रयोजन है ? किस विधानसे पितरोंको पिंड प्रदान करना चाहिये और उस पिंडको स्वीकार करनेके लिये उनका आवाहन कैसे किया जाय ?

हे देव ! यदि ये सभी कार्य मरनेके तुरंत बाद सम्पन्न हो जाते हैं तो फिर बादमें पिंडदान क्यों किया जाता है ? पूर्व किये गये पिंडदानके बाद पुन: पिंडदान या अन्य क्रियाओंको करनेकी क्या आवश्यकता है ? दाह-संस्कारके बाद अस्थि-संचयन और घट फोड़नेका विधान क्यों है ? दूसरे दिन और चौथे दिन साग्निक द्विजके स्नान का विधान क्यों है ? दसवें दिन सभी परिजनोंके साथ शुद्धिके लिये स्नान क्यों किया जाता हैं ? दसवें दिन तेल एवं उबटनका प्रयोग क्यों किया जाता है | उस तेल और उबटनका प्रयोग भी एक विशाल जलाशयके तटपर होना अपेक्षित है, इसका क्या कारण है ? दसवें दिन पिंडदान क्यों करना चाहिये ? एकादशाहके दिन वृषोत्सर्ग आदिके सहित पिंडदान करनेका क्या प्रयोजन है ? पात्र, पादुका, छत्र, वस्त्र तथा अंगूठी आदि वस्तुओंका दान क्यों दिया जाता है ? तेरहवें दिन पददान क्यों दिया जाता है | वर्षपर्यंत सोलह श्राद्ध क्यों किये जाते हैं तथा तीन सौ साठ सान्नोद्क घट क्यों दिये जाते हैं | प्रेततृप्तिके लिये प्रतिदिन अन्नसे भरे हुए एक घटका दान क्यों करना चाहिये |

हे प्रभो ! मनुष्य अनित्य है और समय आनेपर ही वह मरता है, किन्तु मैं उस छिद्रको नहीं देख पाता हूँ, जिससे जीव निकल जाता है ? प्राणीके शरीरमें स्थित किस छिद्रसे पृथ्वी, जल, मन, तेज, वायु और आकाश निकल जाते हैं ? हे जनार्दन ! इसी शरीरमें स्थित जो पाँच कर्मेंद्रियाँ और पाँच ज्ञानेंद्रियाँ तथा पाँच वायु हैं, वे कहाँसे निकल जाते हैं | लोभ, मोह, तृष्णा, काम और अहंकाररूपी जो पाँच चोर शरीरमें छिपे रहते हैं, वे कहाँसे निकल जाते हैं |

हे माधव ! प्राणी अपने जीवनकालमें पुण्य अथवा पाप जो कुछ भी कर्म करता है, नाना प्रकारके दान देता हैं, वे सब शरीरके नष्ट हो जानेपर उसके साथ कैसे चले जाते हैं | वर्षके समाप्त हो जानेपर भी मरे हुए प्राणीके लिये सपिण्डीकरण क्यों होता है ? उस प्रेतकृत्यमें ( सपिण्डन ) प्रेतपिंडका मिलन किसके साथ किस विधिसे होना चाहिये, इसे आप बतानेकी कृपा करें |

हे हरे ! मुर्च्छासे अथवा पतनसे जिनकी मृत्यु होती है, उनके लिये क्या होना चाहिये | जो पतित मनुष्य जलाये गये अथवा नहीं जलाये गये तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य प्राणी हैं, उनके मरनेपर अन्तमें क्या होना चाहिये | जो मनुष्य पापी, दुराचारी अथवा हतबुद्धि हैं, मरनेके बाद वे किस स्थितिको प्राप्त करते हैं ? जो पुरुष आत्मघाती, ब्रह्महत्यारा, स्वर्णादिकी चोरी करनेवाला, मित्रादिके साथ विश्वासघात करनेवाला है, उस महापातकीका क्या होता है ? हे माधव ! जो शुद्र कपिला गौका दूध पीता है अथवा प्रणव महामंत्रका जप करता है या ब्रह्मपुत्र अर्थात यज्ञोपवीतको धारण करता है तो मृत्युके बाद उसकी क्या गति होती है ? हे संसारके स्वामी ! जब कोई शुद्र किसी ब्राह्मणीको पत्नी बना लेता है तो उस पापीसे मैं भी डरता हूँ | आप बतायें कि उस पापीकी क्या दशा होती है ? साथ ही उस पापकर्मके फलको बतानेकी भी कृपा करें |

हे विश्वात्मन ! आप मेरी दूसरी बातपर भी ध्यान दें | मैं कौतुहलवश वेगपूर्वक लोकोंको देखता हुआ सम्पूर्ण जगतमें जा चूका हूँ, उसमें रहनेवाले लोगोंको मैंने देखा है कि वे सभी दु:खमें ही डूबे रहे हैं | उनके अत्यंत कष्टोंको देखकर मेरा अंत:करण पीड़ासे भर गया है | स्वर्गमें दैत्योंकी शत्रुतासे भय हैं | पृथ्वीलोक में मृत्यु और रोगादिसे तथा अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे लोग दु:खित हैं | पाताललोकमें रहनेवाले प्राणियोंको मेरे भयसे दुःख बना रहता है | हे ईश्वर ! आपके इस वैष्णव पद ( वैकुण्ठ ) के अतिरिक्त अन्यत्र किसी भी लोकमं ऐसी निर्भयता नहीं दिखायी देती | कालके वशीभूत इस जगतकी स्थिति स्वप्नकी माया के समान असत्य है | उसमें भी इस भारतवर्षमें रहनेवाले लोग बहुत-से दु:खोंको भोग रहे हैं | मैंने वहाँ देखा है कि उस देशके मनुष्य राग-द्वेष तथा मोह आदिमें आकण्ठ डूबे हुए हैं | उस देशमें कुछ लोग अंधे हैं, कुछ टेढ़ी दृष्टिवाले, दुष्ट वाणीवाले, लूले, लँगड़े, काने, बहरे, गूँगे, कोढ़ी, लोमश ( अधिक रोमवाले) है, कुछ नाना रोगसे घिरे हैं और कुछ आकाश-कुसुमकी तरह नितांत मिथ्या अभिमानसे चूर है | उनके विचित्र दोषोंको देखकर तथा उनकी मृत्युको देखकर मेरे मनमें जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी है कि यह मृत्यु क्या है ? इस भारतवर्षमें यह कैसी विचित्रता है ? ऋषियोंसे मैंने पहले ही इस विषयमें सामान्यत: यह सुन रखा है कि जिसकी विधिपूर्वक वार्षिक क्रियाएँ नहीं होती हैं, उसकी दुर्गति होती है | फिर भी हे प्रभो ! इसकी विशेष जानकारी के लिये मैं आपसे पूछ रहा हूँ |

हे उपेन्द्र ! मनुष्यकी मृत्युके समय उसके कल्याणके लिये क्या करना चाहिये ? कैसा दान देना चाहिये | मृत्यु और श्मशान-भूमितक पहुँचनेके बीच कौन-सी विधि अपेक्षित है | चितामें शवको जलानेकी क्या विधि है ? तत्काल अथवा विलम्बसे उस जीवको कैसे दूसरी देह प्राप्त होती है, यमलोक को जानेवाले के लिये वर्षपर्यंत कौन-सी क्रियाएँ करनी चाहिये | दुर्बुद्धि अर्थात दुराचारी व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर उसका प्रायश्चित्त क्या है ? पंचक आदिमें मृत्यु होनेपर पंचकशान्ति के लिये क्या करना चाहिये | हे देव ! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों | आप मेरे इस सम्पूर्ण भ्रमको विनष्ट करनेमें समर्थ हैं | मैंने आपसे यह सब लोकमंगलकी कामनासे पूछा है, मुझे बतानेकी कृपा करें |

नारायण नारायण

इन्दिरा एकादशी- २६ सितम्बर २०१६

एकादशी,ekadashi,इन्दिरा एकादशी
युधिष्ठिर ने पूछा : हे मधुसूदन ! कृपा करके मुझे यह बताइये कि आश्विन के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ?

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आश्विन (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार भाद्रपद) के कृष्णपक्ष में ‘इन्दिरा’ नाम की एकादशी होती है । उसके व्रत के प्रभाव से बड़े बड़े पापों का नाश हो जाता है । नीच योनि में पड़े हुए पितरों को भी यह एकादशी सदगति देनेवाली है ।

राजन् ! पूर्वकाल की बात है । सत्ययुग में इन्द्रसेन नाम से विख्यात एक राजकुमार थे, जो माहिष्मतीपुरी के राजा होकर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते थे । उनका यश सब ओर फैल चुका था ।

राजा इन्द्रसेन भगवान विष्णु की भक्ति में तत्पर हो गोविन्द के मोक्षदायक नामों का जप करते हुए समय व्यतीत करते थे और विधिपूर्वक अध्यात्मतत्त्व के चिन्तन में संलग्न रहते थे । एक दिन राजा राजसभा में सुखपूर्वक बैठे हुए थे, इतने में ही देवर्षि नारद आकाश से उतरकर वहाँ आ पहुँचे । उन्हें आया हुआ देख राजा हाथ जोड़कर खड़े हो गये और विधिपूर्वक पूजन करके उन्हें आसन पर बिठाया । इसके बाद वे इस प्रकार बोले: ‘मुनिश्रेष्ठ ! आपकी कृपा से मेरी सर्वथा कुशल है । आज आपके दर्शन से मेरी सम्पूर्ण यज्ञ क्रियाएँ सफल हो गयीं । देवर्षे ! अपने आगमन का कारण बताकर मुझ पर कृपा करें ।

नारदजी ने कहा : नृपश्रेष्ठ ! सुनो । मेरी बात तुम्हें आश्चर्य में डालनेवाली है । मैं ब्रह्मलोक से यमलोक में गया था । वहाँ एक श्रेष्ठ आसन पर बैठा और यमराज ने भक्तिपूर्वक मेरी पूजा की । उस समय यमराज की सभा में मैंने तुम्हारे पिता को भी देखा था । वे व्रतभंग के दोष से वहाँ आये थे । राजन् ! उन्होंने तुमसे कहने के लिए एक सन्देश दिया है, उसे सुनो । उन्होंने कहा है: ‘बेटा ! मुझे ‘इन्दिरा एकादशी’ के व्रत का पुण्य देकर स्वर्ग में भेजो ।’ उनका यह सन्देश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ । राजन् ! अपने पिता को स्वर्गलोक की प्राप्ति कराने के लिए ‘इन्दिरा एकादशी’ का व्रत करो ।

राजा ने पूछा : भगवन् ! कृपा करके ‘इन्दिरा एकादशी’ का व्रत बताइये । किस पक्ष में, किस तिथि को और किस विधि से यह व्रत करना चाहिए ।

नारदजी ने कहा : राजेन्द्र ! सुनो । मैं तुम्हें इस व्रत की शुभकारक विधि बतलाता हूँ । आश्विन मास के कृष्णपक्ष में दशमी के उत्तम दिन को श्रद्धायुक्त चित्त से प्रतःकाल स्नान करो । फिर मध्याह्नकाल में स्नान करके एकाग्रचित्त हो एक समय भोजन करो तथा रात्रि में भूमि पर सोओ । रात्रि के अन्त में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन दातुन करके मुँह धोओ । इसके बाद भक्तिभाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करो :

अघ स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः ।

श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥

कमलनयन भगवान नारायण ! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करुँगा । अच्युत ! आप मुझे शरण दें |’

एकादशी,ekadashi,इन्दिरा एकादशी

इस प्रकार नियम करके मध्याह्नकाल में पितरों की प्रसन्नता के लिए शालग्राम शिला के सम्मुख विधिपूर्वक श्राद्ध करो तथा दक्षिणा से ब्राह्मणों का सत्कार करके उन्हें भोजन कराओ । पितरों को दिये हुए अन्नमय पिण्ड को सूँघकर गाय को खिला दो । फिर धूप और गन्ध आदि से भगवान ह्रषिकेश का पूजन करके रात्रि में उनके समीप जागरण करो । तत्पश्चात् सवेरा होने पर द्वादशी के दिन पुनः भक्तिपूर्वक श्रीहरि की पूजा करो । उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर भाई बन्धु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करो ।

राजन् ! इस विधि से आलस्यरहित होकर यह व्रत करो । इससे तुम्हारे पितर भगवान विष्णु के वैकुण्ठधाम में चले जायेंगे ।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजन् ! राजा इन्द्रसेन से ऐसा कहकर देवर्षि नारद अन्तर्धान हो गये । राजा ने उनकी बतायी हुई विधि से अन्त: पुर की रानियों, पुत्रों और भृत्योंसहित उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया ।

कुन्तीनन्दन ! व्रत पूर्ण होने पर आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी । इन्द्रसेन के पिता गरुड़ पर आरुढ़ होकर श्रीविष्णुधाम को चले गये और राजर्षि इन्द्रसेन भी निष्कण्टक राज्य का उपभोग करके अपने पुत्र को राजसिंहासन पर बैठाकर स्वयं स्वर्गलोक को चले गये । इस प्रकार मैंने तुम्हारे सामने ‘इन्दिरा एकादशी’ व्रत के माहात्म्य का वर्णन किया है । इसको पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।