Ashram – The Truth Behind The Lies

Asharamji Ashram

Till now we have heard and believed what media had told us about “Sant Shri Asharamji Ashram”.

Media has made several allegations against Sant Asharam Bapu and his ashram but none proved yet in so many years. This undoubtedly questions media’s intentions of maligning image of Sant Asharam Bapu and his Ashram.

Sant Asharam Bapu is still one of the most widely followed Saint and his followers are in millions world wide who strongly oppose all allegations put against Sant Asharam Bapu.

This movie is about Madhav who has a completely different conception about “Sant Shri Asharamji Ashram” which he has developed by blindly following paid media news. Watch this short movie to see how his belief changes when he accidentally visits Ashram and checks what happens in Ashram. See this twisting movie based on a real story.

गरुड़पुराण – अध्याय – १४६

garoodh puran

| ॐ श्रीपरमात्मने नम: | ॐ श्री गणेशाय नम: | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |

गरुड़पुराण

आचारकाण्ड

अध्याय – १४६

निदान का अर्थ तथा रोगों का सामान्य निदान – निरूपण

धन्वंतरिजी ने कहा – हे सुश्रुत ! प्राचीन काल में आत्रेय आदि श्रेष्ठ मुनियों ने जिस प्रकार सभी रोगों का निदान बताया है, वैसे ही मैं तुम्हें सुनाउँगा | पाप्मा, ज्वर, व्याधि, विकार, दुःख, आमय, यक्ष्मा, आतंग, गद और आवाध – ये पर्यायवाची शब्द हैं |

रोगके ज्ञान के पाँच उपाय हैं – निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और सम्प्राप्ति | निमित्त, हेतु, आयतन, प्रत्यय, उत्थान तथा कारण – इन पर्यायों से निदान कहा जाता है अर्थात निमित्त आदि शब्दों से जिस वस्तुका निश्चय होता है वही निदान है | दोष – विशेषक के ज्ञान के बिना ही उत्पन्न होनेवाला रोग जिन लक्षणों से जाना जाता है, उसे पूर्वरूप कहते है | यह पूर्वरूप सामान्य और विशिष्ट – भेदसे दो प्रकार का होता है | यह उत्पद्यमान रोग जिन लक्षणों से जाना जाता है, उन लक्षणों को अल्पता के कारण थोड़ा व्यक्त होने से पूर्वरूप कहा जाता है | वही पूर्वरूप व्यक्त हो जानेपर रूप कहलाता हैं  | संस्थान, व्यंजन, लिंग, लक्षण, चिन्ह और आकृति – ये रूप के पर्यायवाची शब्द हैं | हेतु – विपरीत, व्याधि – विपरीत, हेतु – व्याधि – उभय – विपरीत तथा हेतु – विपरीत अर्थकारी, व्याधि – विपरीत अर्थकारी और हेतु – व्याधि – उभय – विपरीत अर्थकारी औषध, अन्न तथा विहार के परिणाम में सुखदायक उपयोग को उपशय कहते हैं, इसीका नाम सात्म्य भी है | उपशय के विपरीत अनुपशय होता है | इसका दूसरा नाम व्याध्यसात्म्य भी है | विसर्पण करते हुए रोगको उत्पन्न करता हैं, उसे सम्प्राप्ति कहा जाता है | उसके पर्यायवाची शब्द हैं – जाति तथा आगति |

संख्या, विकल्प, प्राधान्य, बल और व्याधि कालकी विशेषताओं के आधारपर उस सम्प्राप्ति के भेद किये जाते हैं | जैसे इसी शास्त्र में बताया जायगा कि ज्वर के आठ भेद होते हैं | रोगोत्पत्तिमें कारणभुत दोषों की अंशांशकल्पना का विवेचन विकल्पसम्प्राप्ति, स्वतन्त्रता और परतंत्रताद्वारा दोषों का प्राधान्य या अप्राधान्य – विवेचन प्राधान्यसम्प्राप्ति, हेतु पूर्वरूप और रूप की सम्पूर्णता अथवा अल्पता के द्वारा बल या अबलका विवेचन बलसम्प्राप्ति और दोषानुसार रात्रि, दिन, ऋतू एवं भोजन के अंश द्वारा रोगकाल के ज्ञान को कालसम्प्राप्ति समझना चाहिये |

इस प्रकार निदान के सामान्य अभिधेयों ( निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और सम्प्राप्ति ) का निरूपण किया गया | सम्प्रति उनका विस्तार से वर्णन किया जायगा | सभी रोगों के मूल कारण कुपित दोष ही हैं | किन्तु दोष – प्रकोपका भी कारण अनेक प्रकार के अहितकर पदार्थों का सेवन हैं | यह अहितसेवन तीन प्रकार ( असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध तथा परिणाम ) का होता हैं, इन तीनों योगों को पहले बताया जा चूका हैं |

वात – प्रकोप का निदान

तिक्त, उष्ण, कटु, कषाय, अम्ल और रुक्ष खाद्यान्न का असंयमित आहार, दौड़ना, जोरसे बोलना, रात्रि – जागरण तथा उच्च भाषण, कार्यों में विशेष अनुरक्ति, भय, शोक, चिंता, व्यायाम एवं मैथुन करने से शरीर के अंतर्गत विद्यमान वायु प्रकुपित हो जाती हैं | विशेषत: यह वायु – विकार ग्रीष्म – ऋतू के दिन तथा रात्रि में भोजन करने के पश्चात पाक के अन्तमें होता है |

पित्त – प्रकोप का निदान

कटु, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण, लवण तथा क्रोधोत्पाद्क एवं दाहोत्पाद्क आहार करने से पित्त प्रकुपित होता है | पित्तका यह प्रकोप शरद – ऋतू के मध्यान्ह, अर्धरात्रि तथा अन्य दाह उत्पन्न करनेवाले क्षणों में विशेषरूप से होता है |

कफ – प्रकोप का निदान

मधुर, अम्ल, लवण, स्निग्ध, गुरु, अभिष्यन्दी तथा शीतल भोजनों के प्रयोग से,  बैठे रहनेसे, निद्रासे, सुख-भोगसे, आजीर्ण से , दिवा – शयनसे , अत्यंत बलकारक पदार्थों के प्रयोग से, वमन आदि न करने से , भोजन के परिपाक के प्रारम्भकालमें, दिन के प्रथम भागमें तथा रात्रिके प्रथम भाग में कफ कुपित होता है और दी – दो दोषों के प्रकोपक आहार – विहार का सेवन करने से दो – दो दोष प्रकुपित होते है |

त्रिदोषप्रकोप का निदान एवं सब रोगों की सामान्य सम्प्राप्ति

त्रिदोष के ( वात – पित्त तथा श्लेष्मा – इन सभीके ) प्रकुपित तथा मिश्रित स्वभावसे सन्निपात की उत्पत्ति होती है | संकीर्ण भोजन, अजीर्णता में भोजन, विषम तथा विरुद्ध भोजन, मद्यपान, सूखे शाक, कच्ची मूली, पिण्याक ( खली ), मृत्युवत्सर पूति ( सत्तू ) शुष्क, कृशा, मांस तथा मत्स्यादिका भक्षण करने से , वात – पित्त एवं श्लेष्मोत्पाद्क विभिन्न पदार्थों के उपभोग से , आहार्य अन्नका परिवर्तन, धातुजन्य – दोष, वात – पित्त, श्लेष्माका परस्पर मिलकर उपद्रव करनेसे शरीर में यह विकार (सन्निपात ) उत्पन्न होता है 

दूषित कच्चे अन्नका प्रयोग करने से, श्लेष्माजनित विकार से तथा ग्रहों के प्रभाव से , मिथ्था आहार – व्यवहार के योगसे, पूर्वजन्म में संचित विभिन्न पापों के प्रभाववश किये गये दुराचरण से, स्त्रियोंमें प्रसव – कालकी विषमता तथा मिथ्योपचारसे शरीर में सश्रिपात की विकृति उत्पन्न होती हैं | इस प्रकार प्रकुपित वात आदि दोष रोगों के अधिष्ठानों में जानेवाली रसवाहिनियों के द्वारा शरीर में पहुँचकर अनेक प्रकार के विकारों को उत्पन्न करते हैं |

नारायण नारायण

अश्वमेघ यज्ञ का फल देनेवाली : अजा एकादशी – २८ अगस्त

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अजा एकादशी

युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार श्रावण) मास के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? कृपया बताइये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! एकचित्त होकर सुनो । भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘अजा’ है । वह सब पापों का नाश करनेवाली बतायी गयी है । भगवान ह्रषीकेश का पूजन करके जो इसका व्रत करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।

पूर्वकाल में हरिश्चन्द्र नामक एक विख्यात चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो समस्त भूमण्डल के स्वामी और सत्यप्रतिज्ञ थे । एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर उन्हें राज्य से भ्रष्ट होना पड़ा । राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेच दिया । फिर अपने को भी बेच दिया । पुण्यात्मा होते हुए भी उन्हें चाण्डाल की दासता करनी पड़ी । वे मुर्दों का कफन लिया करते थे । इतने पर भी नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्र सत्य से विचलित नहीं हुए ।

इस प्रकार चाण्डाल की दासता करते हुए उनके अनेक वर्ष व्यतीत हो गये । इससे राजा को बड़ी चिन्ता हुई । वे अत्यन्त दु:खी होकर सोचने लगे: ‘क्या करुँ ? कहाँ जाऊँ? कैसे मेरा उद्धार होगा?’ इस प्रकार चिन्ता करते-करते वे शोक के समुद्र में डूब गये ।

राजा को शोकातुर जानकर महर्षि गौतम उनके पास आये । श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपने पास आया हुआ देखकर नृपश्रेष्ठ ने उनके चरणों में प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़ गौतम के सामने खड़े होकर अपना सारा दु:खमय समाचार कह सुनाया ।

राजा की बात सुनकर महर्षि गौतम ने कहा :‘राजन् ! भादों के कृष्णपक्ष में अत्यन्त कल्याणमयी ‘अजा’ नाम की एकादशी आ रही है, जो पुण्य प्रदान करनेवाली है । इसका व्रत करो । इससे पाप का अन्त होगा । तुम्हारे भाग्य से आज के सातवें दिन एकादशी है । उस दिन उपवास करके रात में जागरण करना ।’ ऐसा कहकर महर्षि गौतम अन्तर्धान हो गये ।

मुनि की बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र ने उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया । उस व्रत के प्रभाव से राजा सारे दु:खों से पार हो गये । उन्हें पत्नी पुन: प्राप्त हुई और पुत्र का जीवन मिल गया । आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं । देवलोक से फूलों की वर्षा होने लगी ।

एकादशी के प्रभाव से राजा ने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया और अन्त में वे पुरजन तथा परिजनों के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये ।

राजा युधिष्ठिर ! जो मनुष्य ऐसा व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो स्वर्गलोक में जाते हैं । इसके पढ़ने और सुनने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है ।

गरुड़पुराण – अध्याय – १४५

garoodh puran

| ॐ श्रीपरमात्मने नम: | ॐ श्री गणेशाय नम: | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |

गरुड़पुराण

आचारकाण्ड

अध्याय – १४५

महाभारतकी कथा एवं बुद्ध आदि अवतारों की कथाका वर्णन

ब्रह्माजीने कहा – अब मैं महाभारत के युद्ध की कथा वर्णन करूँगा, जो पृथिवीपर बढ़े हुए अत्याचार के भारको उतारने के लिये हुआ था, जिसकी योजन युधिष्ठिरादि पांडवों की रक्षा के लिये तत्पर कृष्ण ने स्वयं की थी |

भगवान विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई | ब्रह्मासे अत्रि, अत्रिसे सोम, सोमसे बुध हुए | बुधने इला नामक अपनी पत्नीसे पुरुरवा को उत्पन्न किया | पुरुरवासे आयु, आयुसे ययाति और ययाति के वंश में भरत, कुरु तथा शन्तनु हुए | राजा शन्तनु की पत्नी गंगासे भीष्म हुए | भीष्म सर्वगुणसम्पन्न तथा ब्रह्मविद्या के पारंगत विद्वान थे |

शन्तनु की सत्यवती नामक एक दूसरी पत्नी थी | उस पत्नी के दो पुत्र हुए, जिनका नाम चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य था | चित्रांगद नामवाले गन्धर्व के द्वारा युद्ध में चित्रांगद मार डाला गया | विचित्रवीर्य का विवाह काशिराज की पुत्री अम्बिका और अम्बालिका के साथ हुआ | विचित्रवीर्य भी नि:सन्तान ही मर गये थे | अत: व्याससे उनके दो क्षेत्रज पुत्रों – अम्बिका के गर्भ से धृतराष्ट्र तथा अम्बालिसा के गर्भ से पांडु का जन्म हुआ | उन्हीं व्यासके द्वारा दासीके गर्भ से विदुर का जन्म हुआ | धृतराष्ट्र के गांधारी से सौ पराक्रमी पुत्र हुए, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था | पांडूपत्नी कुंती और माद्रीसे पाँच पुत्रों का जन्म हुआ | युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव – ये पाँचों पुत्र बड़े ही बलवान और पराक्रमशाली थे |

दैववशात कौरव और पांडवों में वैरभाव उत्पन्न हो गया | उद्धत स्वभाववाले दुर्योधनद्वारा पांडवजन बहुत ही सताये गये | लाक्षागृह में उन्हें विश्वासघात से जलाया गया, किन्तु वे अपनी बुद्धिमत्तासे बच गये | उसके बाद उन लोगों ने एकचक्रा नामक पुरीमें जाकर एक ब्राह्मण के घर में शरण लीं | वहाँ रहते हुए उन सभीने बक नामक राक्षस का संहार किया | तदनन्तर पांचाल नगर में हो रहे द्रौपदी के स्वयंवर को जानकर वे सभी वहाँ पहुँचे | वहाँ अपने पराक्रम का परिचय देकर उन पांडवों ने द्रौपदी को पत्नी के रूपमें प्राप्त किया |

इसके बाद द्रोणाचार्य और भीष्म की अनुमतिसे धृतराष्ट्र ने पांडवों को अपने पास बुला लिया और आधा राज्य उन्हें दे दिया | आधा राज्य प्राप्त करने के पश्चात इन्द्रप्रस्थ नामक एक सुंदर नगरी में रहकर वे राज्य करने लगे | उन तपस्वी पांडवों ने वहाँपर एक सभामंडप का निर्माण करके राजसूय – यज्ञ का अनुष्ठान किया |

तत्पश्चात मुरारि भगवान वासुदेवकी अनुमतिसे ही द्वारकापूरी में जाकर अर्जुन ने उनकी बहन सुभद्रा का पाणिग्रहण किया | उन्हें अग्निदेव से नंदीघोष नामक दिव्य रथ, तीनों लोकों में प्रसिद्ध गांडीव नामका श्रेष्ठतम दिव्य धनुष, अविनाशी बाण तथा अभेद्य कवच प्राप्त हुआ | उसी धनुष से कृष्ण के सहचर वीर अर्जुन ने अग्निको खांडव वन में संतुष्ट किया था | दिग्विजय में देश – देशांतर के राजाओं को जीतकर उनसे प्राप्त रत्नराशि लाकर उन्होंने अपने निति-परायण ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर लप सौंप दी |

भाइयों के साथ धर्मराज युधिष्ठिर कर्ण, दु:शासन और शकुनिके मतमें स्थित पापी दुर्योधन के द्वारा द्युतक्रीडा के मायाजाल में जीत लिये गये | उसके बाद बारह वर्षोतक उन्हें वनमें महान कष्ट उठाना पड़ा | तदनन्तर धौम्य ऋषि तथा अन्य मुनियों के साथ द्रौपदीसहित वे पाँचों पांडव विराट – नगर गये और गुप्तरूप से वहाँ रहने लगे | एक वर्षतक वहाँ रहकर दुर्योधनद्वारा हरण की जाती हुई गायों का प्रत्याहरण करके अर्थात वापस लौटाकर वे अपने राज्यमें जा पहुँचे | सम्मानपूर्वक दुर्योधन से उन्होंने अपने आधे राज्य के हिस्से के रूपमें पाँच गाँव माँगे, किन्तु दुर्योधन से वे भी प्राप्त न हो सके | अत: कुरुक्षेत्र के मैदान में उन वीरों को युद्ध करना पड़ा | उसमें पांडवों की ओर साटी दिव्य अक्षौहिणी सेना थी और दुर्योधनादि ग्यारह अक्षौहिणी सेनासे युक्त थे | यह युद्ध देवासुर – संग्राम के समान महाभयंकर हुआ था |

सबसे पहले दुर्योधन की सेना के सेनापति भीष्म हुए और पांडवों का सेनापति शिखंडी बना | उन दोनों के बीचमें शस्त्र – से – शस्त्र तथा बाण – से – बाण भीड़ गये | दस दिनोंतक महाभयंकर युद्ध होता रहा | शिखंडी और अर्जुन के सैकड़ों बाणों से बिंधकर भीष्म धराशायी हो गये, किन्तु इच्छामृत्यु वरदान होने से भीष्म की उस समय मृत्यु नहीं हुई | जब सूर्य उत्तरायण में आ गये तब धर्म – सम्बन्धित विभिन्न उपदेश देकर उन्होंने अपने पितरों का तर्पण किया और भगवान गदाधर का ध्यान करते हुए अन्तमें वे उस परमपद को प्राप्त हुए, जहाँपर आनंद – ही – आनंद हैं और जो निर्मल आत्माओं के लिये मुक्तिका स्थान है |

तदनन्तर सेनापति के पदपर द्रोणाचार्य आसीन हुए | उनका युद्ध पांडव – सेनापति धृष्टद्युम्न के साथ हुआ | यह परम दारुण युद्ध पाँच दिनोंतक चलता रहा | जितने भी राजा इस युद्ध में सम्मिलित हुए, वे सभी अर्जुन के द्वारा मारे गये | पुत्रशोक का समाचार सुनकर द्रोणाचार्य उस शोक के सागर में डूबकर मर गये |

इसके बाद वीर अर्जुन से लड़ने के लिये कर्ण युद्धभूमि में आया | दो दिनोंतक महाभयानक युद्ध करके वह भी उनके द्वारा प्रयुक्त अस्त्रों से न बच सका | तत्पश्चात शल्य धर्मराज से युद्ध करने के लिये गया | अपराह्रकाल होने के पूर्व ही धर्मराज के तीक्ष्ण बाणों से वह भी चल बसा |

तदनन्तर कालांतक यमराज के समान क्रुद्ध दुर्योधन गदा लेकर भीमसेन को मारने के लिये दौड़ा, किन्तु वीर भीमसेन ने अपनी गदासे उसे गिरा दिया | उसके बाद द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने रात्रिमें सोयी हुई पांडवों की सेनापर आक्रमण कर दिया | अपने पिताके वधका स्मरण करके उसने बड़ी ही बहादुरी से बहुतों को मौत के घाट उतार दिया | धृष्टद्युम्न का वध करके उसने द्रौपदी के पुत्रों को भी मार डाला | इस प्रकार पुत्रों का वध होने से दु:खित एवं रोती हुई द्रौपदी को देखकर अर्जुन ने अश्वत्थामा को परास्तकर ऐषिक नामक अस्त्र से उसकी शिरोमणि को निकाल लिया |

उसके बाद अत्यंत शोकसंतप्त स्त्रीजनों को आश्वस्त करके धर्मराज युधिष्ठिरने स्नान करके देवता और पितृजनों का तर्पण किया | तत्पश्चात भीष्म के द्वारा दिये गये सदुपदेशों से आश्वस्त महात्मा युधिष्ठिर पुन: राज्यकार्य में लग गये | अश्वमेध – यज्ञ का अनुष्ठान करके उन्होंने भगवान विष्णुका पूजन किया तथा विधिवत ब्राह्मणों को दक्षिणादि देकर संतुष्ट किया | साम्ब के पेटसे निकले हुए मूसल के द्वारा यदुवंशियों के विनाश का समाचार सुनकर उन्होंने राज्यसिंहासनपर अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को बैठाकर भीमादि अपने सभी भाइयोंसहित विष्णुसहस्त्रनाम का जप करते हुए स्वयं भी स्वर्ग के मार्ग का अनुगमन किया |

वासुदेव कृष्ण असुरों को व्यामोहित करके लिये बुद्धरूप में अवतरित हुए | अब वे कल्कि होकर फिर सम्भल ग्राम में अवतार लेंगे और घोड़ेपर सवार होकर वे संसार के सभी विधर्मियों का विनाश करेंगे |

अधर्म को दूर करने के लिये, सत्त्वगुण – प्रधान देवता आदिकी रक्षा और दुष्टों का संहार करने के निमित्त भगवान विष्णुका समय – समयपर वैसे ही अवतार होता है, जैसे समुद्रमंथन के समय धन्वन्तरि होकर उन्होंने देवता आदिकी रक्षा के लिये विश्वामित्र के पुत्र महात्मा सुश्रुत को आयुर्वेद का उपदेश किया |

इस तरह महाभारत की कथा एवं भगवान के अवतारों की कथा का मैंने वर्णन किया, इसे सुनकर मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त करता हैं |

नारायण नारायण

बिलासपुर में बाईक रैली

बिलासपुर  में बाईक रैली 

14 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य पर श्री योग वेदांत सेवा समिति बिलासपुर द्वारा बाईक रैली निकली गई |

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निशुल्क नोट बुक वितरण

निशुल्क नोट बुक वितरण

श्री योग वेदांत सेवा समिति राजनांदगांव एवं बाजार अतरिया के सेवा समिति द्वारा जरूरत मन्द बच्चों को अवन्ति विद्या मंदिर बाजार अतरिया में निशुल्क नोट बुक वितरण किया गया !

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गरुड़पुराण – अध्याय – १४४ – हरिवंशवर्णन ( श्रीकृष्ण कथा )

garoodh puran

| ॐ श्रीपरमात्मने नम: | ॐ श्री गणेशाय नम: | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |

गरुड़पुराण

आचारकाण्ड

अध्याय – १४४

हरिवंशवर्णन ( श्रीकृष्ण कथा )

ब्रह्माजीने कहा – अब मैं हरिवंश का वर्णन करूँगा, जो भगवान कृष्ण के माहात्म्य से परिपूर्ण होने के कारण श्रेष्ठतम है |

पृथिवीपर धर्म आदिकी रक्षा और अधर्मादिके विनाश के लिये वसुदेव तथा देवकी से कृष्ण और बलराम का प्रादुर्भाव हुआ | जन्म के कुछ ही दिन बाद कृष्ण ने पूतना के स्तनों को दृढ़तापूर्वक पीकर उसे मृत्युके पास पहुँचा दिया था | तदनन्तर शकट ( छकड़े ) को बालक्रीडा में उलटकर सभीको विस्मित करते हुए इन्होने यमलार्जुन – उद्धार, कालियनाग – दमन, धेनुकासुर –वध, गोवर्धन – धारण आदि अनेक लीलाएँ कीं और इंद्रद्वारा पूजित होकर पृथिवी को भारसे विमुक्त किया तथा अर्जुन की रक्षा के लिये प्रतिज्ञा की |

इनके द्वारा अरिष्टासुर आदि अनेक बलवान शत्रु मारे गये | इन्होने केशी नामक दैत्यका वध किया तथा गोपों को संतुष्ट किया | उसके बाद चाणूर और मुष्टिक नामक मल्ल इनके द्वारा ही पराजित हुए | ऊँचे मंचपर अवस्थित कंस को वहाँसे नीचे पटककर इन्होने ही मारा था |

श्रीकृष्ण की रुक्मिणी, सत्यभामा आदि आठ प्रधान पत्नियाँ थीं | इनके अतिरिक्त महात्मा श्रीकृष्ण की सोलह हजार अन्य स्त्रियाँ थीं | उन स्त्रियों से उत्पन्न हुए पुत्र – पौत्रों की संख्या सैकड़ों – हजारों में थी | रुक्मिणी के गर्भ से प्रद्युम्न उत्पन्न हुए, जिन्होंने शम्बरासुर का वध किया था | इनके पुत्र अनिरुद्ध हुए, जो बाणासुर की पुत्री उषा के पति थे | अनिरुद्ध के विवाह में कृष्ण और शंकर का महाभयंकर युद्ध हुआ और इसी युद्ध में हजार भुजाओंवाले बाणासुर की दो भुजाओं को छोडकर शेष सभी भुजाएँ कृष्ण के द्वारा काट डाली गयीं |

नरकासुर का वध इन्ही महात्मा श्रीकृष्ण ने किया था | नन्दनवन से बलात पारिजात – वृक्ष सत्यभामा के लिये ये ही उखाड़कर लाये थे | बल  नामक दैत्य, शिशुपाल नामक राजा तथा द्विविद नामक बन्दर का वध इन्हीं के द्वारा हुआ था |

अनिरुद्ध से वज्र नामका पुत्र हुआ | कृष्ण के स्वर्गारोहण के पश्चात वही इस वंशका राजा बना था | सान्दीपनि नामक मुनि कृष्ण के गुरु थे | कृष्ण ने ही गुरु सान्दीपनि की पुत्रप्राप्ति की अभिलाषा को पूर्ण किया था | मथुरा में उग्रसेन और देवताओं की रक्षा इन्होने ही की थी |

नारायण नारायण

 

सर्व फलदायक जन्माष्टमी व्रत-उपवास (जन्माष्टमी व्रत : २५ अगस्त)

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सर्व फलदायक जन्माष्टमी व्रत-उपवास (जन्माष्टमी व्रत : २५ अगस्त)

जन्माष्टमी व्रत अति पुण्यदायी है | ‘स्कंद पुराण’ में आता है कि ‘जो लोग जन्माष्टमी व्रत करते हैं या करवाते हैं, उनके समीप सदा लक्ष्मी स्थिर रहती है | व्रत करनेवाले के सारे कार्य सिद्ध होते हैं | जो इसकी महिमा जानकर भी जन्माष्टमी व्रत नहीं करते, वे मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होते हैं |’

बीमार, बालक, अति कमजोर तथा बूढ़े लोग अनुकूलता के अनुसार थोडा फल आदि ले सकते हैं |

प्रेमावतार का प्रागट्य – दिवस : जन्माष्टमी

kirshan1प्रेमावतार का प्रागट्य दिवस : जन्माष्टमी 

 चित् की विश्रांति से सामर्थ्य का प्राकट्य होता है. सामर्थ्य क्या है . बिना व्यक्ति , बिना वस्तु के भी सुखी रहना – ये बड़ा सामर्थ्य है. अपना ह्रदय वस्तुओं के बिना , व्यक्तियों के बिना  परम सुख का अनुभव करें – यह स्वतंत्र सुख सामर्थ्य बढ़ाने वाला है .

श्रीकृष्ण के जीवन में सामर्थ्य है, माधुर्य है, प्रेम है. जितना सामर्थ्य उतना ही अधिक माधुर्य, उतना ही अधिक शुद्ध प्रेम है श्रीकृष्ण के पास |

 पैसे से प्रेम करोगे तो लोभी बनायेगा, पद से प्रेम करोगे तो अहंकारी बनायेगा, परिवार से प्रेम करोगे तो मोही बनायेगा लेकिन प्राणिमात्र के प्रति समभाववाला प्रेम रहेगा, शुद्ध प्रेम रहेगा तो वह परमात्मा का दीदार करवा देगा.

प्रेम सब कर सकते है ,शांत सब रह सकते हैं और माधुर्य सब पा सकते है . जितना शांत रहने का अभ्यास होगा उतना ही माधुर्य विकसित होता है . जितना माधुर्य विकसित है उतना ही शुद्ध प्रेम विकसित होता है  और ऐसे प्रेमी भक्त  किसी चीज की कमी नहीं रहती | प्रेमी सबका हो जाता है , सब प्रेमी के हो जाते हैं .पशु भी प्रेम से वश में हो जाते हैं , मनुष्य भी प्रेम से वश हो जाते हैं और भगवान भी प्रेम से वश हो जाते हैं |

श्रीकृष्ण जेल में जन्मे हैं , वे आनंदकंद सचिदानंद जेल में प्रगटे है . आनंद जेल में प्रगट तो हो सकता है लेकिन आनंद का विस्तार जेल में नहीं हो सकता , जब तक यशोदा के घर नहीं जाता , आनंद प्रेममय नहीं हो पता | योगी समाधि करते हैं एकांत में , जेल जैसी जगह में आनंद प्रगट तो होता है लेकिन समाधि टूटी तो आनंद गया ,आनंद प्रेम से बढता है , माधुर्य से विकसित होता है |  

प्रेम किसीका अहित नहीं करता. जो स्तनों में जहर लगाकर आयी उस पूतना को भी श्री कृष्ण ने स्वधाम पहुँच दिया. पूतना कौन थी ? पूतना कोई साधरण नहीं थी. पूर्वकाल में राजा बलि की बेटी थी , राजकन्या थी | भगवान वामन आये तो उनका रूप सोंदर्य देखकर उस राजकन्या को हुआ कि : ‘ मेरी सगाई हो गयी है , मुझे ऐसा बेटा हो तो में गले लगाऊं और उसको दूध पिलाऊ.’ लेकिन जब नन्हा – मुन्ना वामन विराट हो गया और बलि राजा का सर्वस्व छीन लिया तो उसने सोचा कि : ‘ मैं इसको दूध पिलाऊ ? इसको तो जहर पिलाऊ, जहर.’

वही राजकन्या पूतना हुई , दूध भी पिलाया और जहर भी. उसे भी भगवान ने अपना स्वधाम दे दिया. प्रेमास्पद जो ठहरे ……!

 प्रेम कभी फरियाद नहीं करता , उलाहना देता है. गोपियाँ उलाहना देती है यशोदा को :

“ यशोदा ! हम तुम्हारा गाँव छोडकर जा रही हैं .”

“ क्यों “

“ तुम्हारा कन्हैया मटकी फोड़ देता है ”

“ एक के बदले दस-दस मटकियाँ ले लो ”

“ऊं हूँ …तुम्हरा ही लाला है क्या ! हमारा नहीं है क्या ?“ मटकी फोडी तो क्या हुआ ?”

” अभी तो फरयाद कर रही थी , गाँव छोड़ने की बात कर रही थी” 

” वह तो ऐसे ही कर दी . तुम्हारा लाला कहाँ है ? दिखा दो तो जरा |”

उलाहना देने के बहाने भी दीदार करने आयी हैं , गोपियाँ ! प्रेम में परेशानी नहीं , झंझट नहीं केवल त्याग होता है , सेवा होती है . प्रेम की दुनिया ही निराली है |

        प्रेम न खेतों ऊपजे , प्रेम न हाट बिकाए .
       
राजा चहों प्रजा चहों शीश दिये ले जाय ..

प्रेम खेत में पैदा नहीं होता , बाजार में भी नहीं मिलता . जो प्रेम चाहे वह अपना शीश , अपना अभिमान दे दे ईश्वर के चरणों में , गुरु चरणों में ….

 एक बार यशोदा मैया मटकी फोड़नेवाले लाला के पीछे पड़ी कि : “ कभी प्रभावती, कभी कोई, कभी कोई… रोज – रोज तेरी फरियाद सुनकर में तो थक गयी तू खडा रह ”,  यशोदा ने उठाई लकड़ी. यशोदा के हाथ में लकड़ी देख कर श्रीकृष्ण भागे. श्रीकृष्ण आगे, यशोदा पीछे… श्रीकृष्ण ऐसी चाल से चलते कि माँ को तकलीफ भी न हो और माँ वापस भी न जाये ! थोड़ा दोड़ते, थोडा रुकते. ऐसा करते – करते देखा कि : ‘ अब माँ थक गयी है और माँ हार जाये तो उसको आनंद नहीं आयेगा.’ प्रेमदाता श्रीकृष्ण ने अपने को पकडवा दिया. पकडवा लिया तो माँ रस्सी लायी बांधने के लिए | रस्सी है माया, मायातीत श्रीकृष्ण को कैसे बाँधे ? हर बार रस्सी छोटी पड़ जाये. थोड़ी देर बाद देखा कि : ‘माँ कहीं निराश न हो जाये तो प्रेम के वशीभूत मायातीत भी बंध गये.’ माँ बांधकर चली गयी और इधर ओखली को घसीटते – घसीटते ये तो पहुँचे यमलार्जुन ( नल – कूबर ) का उदार करने … नल – कूबर को शाप से मुक्ति दिलाने … धडाकधूम वृक्ष गिरे , नल – कूबर प्रणाम करके चले गये… अपने को बंधवाया भी तो किसी पर करुणा करने हेतु बाकी, उस मायातीत को कौन बाँधे ?

 एक बार किसी गोपी ने कहा : “ देख, तू ऐसा मत कर. माँ ने ओखली से बांधा तो रस्सी छोटी पड़ गयी लेकिन मेरी रस्सी देख. चार – चार गायें बंध सके इतनी बड़ी रस्सी है. तुझे तो ऐसा बांधूगी कि तू भी क्या याद रखेगा, हाँ.”

कृष्ण : “ अच्छा बांध.”

वह गोपी ‘कोमल – कोमल हाथों में रस्सी बांधना है, यह सोचकर धीरे – धीरे बांधने लगी.

कृष्ण : “तुझे रस्सी बांधना आता ही नहीं है.”

गोपी : “मेरे बाप ! केसे रस्सी बांधी जाती है.”

कृष्ण : “ ला ,मैं तुझे बताता हूँ .” ऐसा करके गोपी के दोनों हाथ पीछे करके रस्सी से बांधकर फिर खंबे से बांध दिया और दूर जाकर बोले :

“ ले ले , बांधने वाली खुद बंध गयी… तू मुझे बांधने आयी थी लेकिन तू ही बंध गयी. ऐसे ही माया जीव को बांधने आये उसकी जगह जीव ही माया को बांध दे में यही सिखाने आया हूँ .

केसा रहा होगा वह नटखटइया ! केसा रहा होगा उसका दिव्य प्रेम ! अपनी एक – एक लीला से जीव की उन्नति का संदेश देता है वह प्रेमस्वरूप परमात्मा !

आनंद प्रगट तो हो जाता है जेल में लेकिन बढ़ता है यशोदा के यँहा, प्रेम से.

यशोदा विश्रांति करती है तो शक्ति आती है ऐसे ही चित् की विश्रांति सामर्थ्य को जन्म देती है लेकिन शक्ति जब कंस के यँहा जाती है तो हाथ में से छटक जाती हे, ऐसे ही सामर्थ्य अहंकारी के पास आता है तो छटक जाता है. जेसे , शक्ति अहंकार रहित के पास टिकती है ऐसे ही प्रेम भी निरभिमानी के पास ही टिकता है.

प्रेम में कोई चाह नहीं होती. एक बार देवतों के राजा इन्द्र प्रसन्न हो गये एवं श्रीकृष्ण से बोले : “ कुछ मांग लो. “

श्रीकृष्ण : “ अगर आप कुछ देना ही चाहते है तो यही दीजिये कि अर्जुन के प्रति मेरा प्रेम बढ़ता रहे.”

अर्जुन अहोभाव से भर गया कि : ‘मेरे लिए मेरे स्वामी ने क्या माँगा ?’

प्रेम में अपनत्व होता है , निःस्वार्थता होती है, विश्वास होता है, विनम्रता होती है और त्याग होता है. सच पूछो तो प्रेम ही परमात्मा है और ऐसे परम प्रेमास्पद श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव ही है – जन्माष्टमी.

आप सबके जीवन में भी उस परम प्रेमास्पद के लिए दिव्य प्रेम निरंतर बढ़ता रहे. आप उसी में खोये रहें उसी के होते रहें ऊं माधुर्य…. ऊं शांति… मधुमय मधुर्यदाता , प्रेमावतार , नित्य नवीन रस , नवीन सूझबूझ देनेवाले. गीता जो प्रेमावतार का ह्रदय है – गीता मं ह्रदय पार्थ. “ गीता मेरा ह्रदय है.”

प्रेमाव्तार श्रीकृष्ण के ह्रदय को समझने के लिए गीता ही तो है आप – हम प्रतिदिन गीता ज्ञान में परमेश्वरीय प्रेम में खोते जायं , उसमय होते जायं… खोते जायं…होते जायं.