आत्मशिव को कैसे पायें ? (महाशिवरात्रि : २७ फरवरी)-पूज्य बापूजी

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आत्मशिव को कैसे पायें ? (महाशिवरात्रि : २७ फरवरी) – पूज्य बापूजी

भगवान कहते है :

न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्धन्ते नराधमा: |

जो मनुष्यों में अधम हैं वे मुझ आत्मशिव को, आत्मकृष्ण को नहीं भजते हैं क्योंकि माया ने उनका ज्ञान हर लिया हैं | यह पाऊँ,यह पाऊँ …. पहले जो था नहीं, वह मिलेगा तो भी छूट जायेगा | पहले जो था, अभी हैं, बाद में रहेगा उसको तो सहज में पा सकते हैं | लेकिन जो सहज में पा सकते हैं और जिसे खोने का भय नहीं, उधर को जो नहीं जाते, उनकी बुद्धि मारी गयी है | और वे धनभागी है जिनकी बुद्धि में भगवान् और सत्संग का महत्त्व हैं | वे भगवान् का रस,ज्ञान, आनंद पाते है और भगवान् शाश्वत हैं तो उस शाश्वतता में एकाकार हो जाते हैं, कुछ बनाना नहीं है, जो है उसको जान लेते हैं |

माययापह्रतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता : (गीता : ७.१५) 

‘मा… या’, जो हो नहीं और सच्ची दिखे बचपन सच्चा लगता था, रहा नहीं | सुख सच्चा लगता था, चला गया | दुःख सच्चा लगता था, चल गया लेकिन उसको जाननेवाला सत्यस्वरूप अभी भी है, मरने के बाद भी रहता है | हम उस शिवस्वरूप की उपासना करते है ॐ .. ॐ … ॐ …

वे ही ब्रम्हा, विष्णु, महेश रूप हैं | कृष्णरूप, रामरूप, गुरुरूप….. एक ही परमेश्वर अनेक रूपों में भासता हैं | जैसे एक ही समुद्र अनेक किनारों से, अनेक तरंगों से, अनेक तटों से, अनेक राज्यों, राष्ट्रों से अनेक प्रकार का भासता है, ऐसे ही वह एक ही परब्रम्ह परमात्मा अनेकरूप में विराजमान है | हम उसको आत्मरूप से, सर्वेश्वररूप से स्नेह करते हैं | ॐ…ॐ… ॐ….

शिवजी ने पार्वतीजी से कहा : ‘मेरे दो रूपों की ऋषियों ने पूजा के लिए व्यवस्था की है | एक तो मेरे सर्प, जटा, बाघंबरवाले रूप की ॐ नम: शिवाय मन्त्र से पूजा -अर्चना  करने से उनका भाव शुद्ध होते-होते वे मुझ आत्मा में पहुँचते हैं | दूसरा है शिवलिंग | ॐकार के जप से शिवलिंग की पूजा होती है, निराकार रूप की | और मेरा तात्त्विक रूप तो सत्संग से सुनेगा तो पता चलेगा कि मैं कितना सहज हूँ, कितना स्वाभाविक हूँ |”

जैसे ॐकार का और ॐकार का आखिरी , ॐकार का उच्चारण दीर्घ करेंगे तो और के बीच मन इधर-उधर नहीं जायेगा, आत्मशिव में स्थिति हो जाती है | यह आत्मस्थिति कि तरफ जाने का भुत सुंदर मार्ग है | इस प्रकार सभी साधक रोज १५,२०,२५ मिनट अभ्यास करो… तो आप नरक से तो बचे हुए हो, दीक्षा ली है लेकिन स्वर्ग और पितृलोक में भी झख मारने कि आपकी रूचि नहीं होगी | शिवजी जिसमें सुखी हैं, संतुष्ट है, परितृप्त हैं, उसीमें आप हो जाओगे | उसको बोलते है आत्मलाभ ! आत्मलाभ से बढ़कर कोई लाभ नहीं है, आत्मज्ञान से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं है, आत्मसुख से बढ़कर कोई सुख नहीं है |

ॐकार का लम्बा उच्चारण क्यों करना पड़ता हैं ? क्योंकि देखना, सूँघना – ये आदतें पड़ी हैं न, इसलिए साधना करनी पड़ती है | शिवजी कि इतना लम्बा उच्चारण करना नहीं पड़ता | मेरे को आशाराम बापू से माइन के लिए क्या करना पड़ेगा ? हम ही हैं ! ऐसे ही आत्मा होने के लिए क्या करना पड़ेगा, आनंदस्वरूप होने के लिए क्या होना ? हैं ही ! आँख बंद भी करने की जरुरत नहीं पड़ती | फिर ध्यान,कर्म, कर्त्तव्य नहीं है, मौज है ! लोगों का उद्धार करना यह कर्त्तव्य नहीं है, महापुरुष का स्वनिर्मित विनोद है | तो स्वनिर्मित विनोद में जगत का जितना सच्चा भला होता हैं, उतना सुधारकों के द्वारा नहीं होता | सोने का हिरण्यपुर बना लिया, बड़ा सुधार हो गया लेकिन फिर मरे और जन्मे ! सच्चा सुधार तो उन्हीं पुरुषों के द्वारा होता है जो अपने सतस्वभाव, चेतनस्वभाव, आनंदस्वभाव, शिवस्वभाव में एकाकार हुए हैं |

महाशिवरात्रि को किये गए जप, तप और व्रत हजारों गुना पुण्य देते है | शिवरात्रि को भक्तिभाव से रात्रि-जागरण किया जाता है | जल, पंचामृत, फल-फूल एवं बिल्वपत्र से शिवजी का पूजन करते हैं | शिवरात्रि को घी का दिया जलाकर बीजमंत्र बंका सवा लाख जप करना बहुत हितकारी है | शुद्ध, सात्विक भावनाओं को सफल करने में बड़ा सहयोग देगा यह मन्त्र | हो सके तो एकांत में शिवजी का विधिवत पूजन करें या मानसिक पूजन करें | सवा लाख बार ‘बं’ मन्त्र का उच्चारण भिन्न-भिन्न सफलताएँ प्राप्त करने में मदद करेगा | जोड़ों का दर्द, वामन,कफ, पेट के रोग, मधुमेह (डायबिटीज) आदि बिमारियों में यह लाभ पहुँचता है | यह बीजमंत्र स्थूल शरीर को तो फायदा पहुँचता ही है, साथ ही सूक्ष्म और कारण शरीर में भी अपनी दैवी विशेषता जागृत करता है |

शिवरात्रि का फायदा लेना उपवास करके | शिवरात्रि की एक रात पहले संकल्प करना कि ‘कल मैं जप करूँगा, शांत होऊँगा |’ बाह्य सुख की सुख की वासना मिटाते-मिटाते अंदर की शांति, माधुर्य, सुख, जो सारों – का – सार है, उसमें विश्रांति पाने का पक्का इरादा करना ‘ ॐ …. ॐ…. ॐ…