आप क्या चाहते है ? – पूज्य आशाराम बापूजी

Rohtak_30Jun13_02

आप क्या चाहते है ? – पूज्य बापूजी 
आवश्यकताएँ कम करो | कम आवश्यकता में आप बादशाह बन जाओगे | जो बचा हुआ समय है, वह ईश्वर में लगा दो तो महान बन जाओगे | ॐ …. ॐ…. ॐ…
हर आदमी एक शक्तिपुंज है | हर आदमी से उसके विचारों के आंदोलन फैलाते हैं | भूमि में तमाम प्रकार के रस छुपे हैं | इन बाह्य आँखों से वह नहीं दीखता | एक ही जमीन लेकिन जैसा बीज होता है वैसा सर्जन होता है, जैसे – गन्ना, बाजरा, गेंहूँ इत्यादि | ऐसे ही हममें भी अनंत-अनंत रस भरा है, अनंत-अनंत क्षमताएँ भरी हैं | हमको जैसा बाहर से वातावरण मिलता है, उसी प्रकार की अंदर सिंचाई होती है |
आपके पास बाह्य जगत का कितना ज्ञान या धन है, यह मूल्यवान नहीं है | परमात्मा यह पूछता है कि आप क्या चाहते है ? आपको किस चीज की प्यास है ? किसको चाहते हो, श्वाश्व्त सुख चाहते हो या नश्वर ? नश्वर से जन्म-मरण, नरक-स्वर्ग की प्राप्ति एवं शाश्वत सुख से परमात्मा की प्राप्ति होगी | अहं को विकसित करना चाहते हो या विसर्जित करना चाहते हो ? जन्म-मरण का सामान बढ़ाना चाहते हो ? आपके पास क्या है इसका मूल्य नहीं है लेकिन आप क्या है इसका मूल्य है | आप जिज्ञासु है, भक्त हैं, साधक हैं कि फिर संसार के मजदूर हैं ? सब इकट्ठा किया, बनाया, कुटुम्बियों-मित्रों को खुश रखा लेकिन मौत का झटका आया, सब चला गया – ये हैं संसार के मजदूर !
आप संसार के मजदुर हो या संसार को साधन बनाकर उपयोग करते हुए अपनी यात्रा तय करनेवाले पथिक हो ? आपमें भगवान को पाने की तडप हैं या हाड-मांस के मरनेवाले शरीर की प्रतिष्ठा चाहते हो ? संसार के मजदुर से जिज्ञासु बहुत ऊँचा होता है | रावण ने सोने की लंका पायी परंतु एक टोला भी सोना अपने साथ ले नहीं गया | संत कबीरजी कहते हैं :
क्या करिये क्या जोडीये थोड़े जीवन काज |
छोड़ी-छोड़ी सब जात हैं देह गेह धन राज ||
शरीर को, धन को, राज्य को सब छोड़-छोडकर जा रहें है | सब चला-चली का मेल है | छूटनेवाले, मरनेवाले शरीर से अमर आत्मा की यात्रा कर लो | शरीर ख़ाक में मिले उसके पहले अपनी वासना, अनात्म अज्ञान को खाक में मिला दो | यह अपने हाथ की बात है | कुटुम्बी अर्थी पर बाँधकर श्मशान में जला दें उसके पहले ही अपनी समझ से अपने-आपको भगवान के चरणों में सौंप दो | जिन्होंने शरीर, मन, बुद्धि का सदुपयोग किया वे सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रम्ह स्वरुप में रहे और जो असत, जड़, दुःख में ही भटकते रहेंगे | इसलिए आँखों की रौशनी कम होने लगे उसके पहले भीतर की आँख खोल दो | बेडा पार हो जायेगा ! बहुएँ मुँह मोड़ लें उसके पहले अभी से संसार से मुँह लो तो बुढ़ापे में पश्चाताप नहीं होगा |
चाहे हरिभजन कर चाहे विषय कमाय |
चाहो तो परमात्मा का भजन कर मुक्त हो जाओ, अपनी २१ पीढ़ियों का उद्धार करो और चाहो तो हाय-हाय करके जगत की चीजे सँभालो, बटोरो और अंत में मृत्यु का झटका लगते ही छोड़ दो |
नौकरी-धंधा करने की मना नहीं हैं | यह सब करके अपनी आवश्यकता है श्वास लेने की, बिना परिश्रम के पूरी होती है | पानी और भोजन की आवश्यकता भी थोड़े परिश्रम से पूरी हो जाती है | लेकिन इच्छाएँ बढ़ जाती है तो बंधन होता है | जिस शरीर को जलाना है उसीको लाड लड़ाते रहते है और जो लाड लड़ाते है उन्हींकी हम नकल की जाय तो हमारा कल्याण हो जाय ! शुकदेवजी, संत कबीरजी, संत तुकारामजी, एकनाथजी महाराज, ज्ञानेश्वरजी महाराज, मीराबाई, स्वयंप्रभा, सुलभा, साँई लीलाशाहजी महाराज आदि की ऊँचाई को देखकर हम अपनी सच्ची आवश्यकता व स्वभाव बनाये तो आसानी से मुक्त हो सकते है |

About Asaram Bapuji

Asumal Sirumalani Harpalani, known as Asaram Bapu, Asharam Bapu, Bapuji, and Jogi by his followers, is a religious leader in India. Starting to come in the limelight in the early 1970s, he gradually established over 400 ashrams in India and abroad.