कौन ? – प.पू. संत श्री आशारामजी बापू

bhagwat

 

ऐसा कोई कण नहीं जिसमे भगवत सत्ता नहीं – प.पू. संत श्री आशारामजी बापू

सबसे से जादा सुखी कौन? सबसे से जादा उदार कौन? सबसे से जादा हितेषी कौन ? सबसे से जादा शाश्वत कौन ? सबसे से जादा निकट कौन ? सबसे से जादा दूर कौन ? इस प्रकार के प्रश्न बुद्धि में उठ जाये और मनमानी श्रद्धा होती है तो मनमाना फल मिलता है और मन थोडीसी इमानी होता है | मन की अपनी सीमा है |  श्रद्धा, सात्विक, राजस, तामस ऐसा ही फल होता है  | आप देवता किसी देवता को ले जाते तो फल चाहते है ……… देवता लोक ब्रम्हाजी के एक दिनमे चौदा इंद्र बदलते है |तो देवता की उपासना करोगे तो वो बदल जाते है | नये इंद्र का नया कानून हो जाता है | तो सवाल है की सबसे अधिक सहनशील कौन ? उससे अधिक निकट कौन ? सबसे अधिक भगवान भगवान …….. उड़िया बाबा को इस्पितल में ले गया था बाबा हमारे इस्पिताल में थे | बड़ी से बड़ी ईलाज इस्पिताल में होती | इसप्रकार से लौटे तो बाबा बड़े गुस्सायेर हुए थे | हाथोसे ईशारे रखते थे, हाथ पैर पटकते और कुछ खरी-खोटी सुनाई जाती है भगवान को | ऐसी खरी-खोटी सुनाई जाती | कुत्ता मनुष्य की भाषा बोल रहा है ये भी लीला कर देखा है ? पत्थर की मूर्ति दूध पिने लग जाये तो वो भी लीला है | हेलीकाप्टर चूर-चूर हो जाय और खरोज भी नहीं आये वो भी लीला करके देखा है | ह्रदय में न जाने  कितनी होती जाती रहती है कितना सहनशील उडीयाबाबा सुनाये जा रहे है ऐसा नही की वो सुनता नहीं है |  आखिर आखंडनंद ने पूछा क्या … आप भगवान को नहीं मानते क्या ? बोले नहीं मानता तो गाली क्यू देता है? मानता हूँ ! तभी तो ले आऊ, कुछ सुनाऊ | तुम मेरे बोल रहे मेरे से जीभ दूर है लेकिन तुम हाजरा हाजिर है | जितने लोग दुखी है तो गुस्सा आ गया…. लेकिन वो सुनाई तो सही…… लेकिन बाबा को क्या किया ? ईश्वर के पाच भुत भी है सेवदार पृथ्वी देखो खड्डा खोदो वो मुर्दे गाडो, सौच करो, गंदगी करो, सब सह जा रही है | धन, धान्य, अन्न, फुल, फल इत्यादि समुद्र में गंधा करो, डालो वो लहराते है बस | सबसे बाधिक–जोधिक शक्ति है तो परमात्मा है | छोटी बुद्धि होती है तो ग्राम देवता को मानते है | किसी स्थान देवता को मानते है, कोई कुलदेवता को मानते है, कोई किसी देवता को मानते है | छोटी-छोटी मती है छोटी-छोटी देव में अटक जाती है और फटक कोई ग्रामदेवता मर जाये, कोई कुलदेवता मर जाये | ये पता नही है की कुलदेवता के द्वारा और ग्रामदेवता के द्वारा कुछ भी कृपा होगी तो उसीकी होगी | सत्ता होगी तो उसकी होगी, संकल्प-सामर्थ्य होगा तो उसकी का होगा | देवतार्म यज्ञं तत् सारं सर्व लोकं महेश्वरं सुहृदम र्व भुतामं ज्ञातामं शांतम मृछ्ते | सारे यज्ञं और तापोंका फल का भोक्ता मै हूँ | मातृपिंड करो पितृपिंड करी सब के अंदर वो ब्रह्म है वो | छोटे छोटे आकृतियों छोटे छोटे खतम हुआ तुम्हारा उपलब्धी ही खतम हुई उन सबमे मै हूँ | ईश्वर तो बहोत है एक-एक सृष्टि के अलग-अलग ईश्वर है | सृष्टि कितने भी है वो पार नहीं लेकिन ये सब सृष्टियों का ईश्वर अंतर्मयी आत्मा मै महेश्वर ही हूँ | और कैसा हूँ  सुहृदम सर्व भुतामं ज्ञातामं   प्राणिमात्र का सुहृद हूँ | आकारण – हित करने वाला हूँ |  सुहृदम सर्व भुतामं ज्ञातामं शांतम मृछ्ते … प्राणिमात्र का सुहृद हूँ  ऐसा मुझे जानता है  उसे शांति प्राप्त होती है | बस इतना पक्का करो की सारे भगवान, सारे देवता, सारे यक्ष, राक्षस, किन्नर की नजरो में परमेश्वर है | तो आपकी नजरो ये बड़ी हो जाय. बुद्धि विशाल हो जाय, खंड में अखंड में चली जाय, परीक्षण से व्यापक हो जाय, बिंदु में सिंधु बन जाय | ऐसा कोई बिंदु नहीं है की सिंधु से अलग है | ऐसा कोई बढे का आकाश नहीं महाकाश से बढे हो | ऐसा कोई जिव नहीं उस परमेश्वर की सत्ता, स्फूर्ति, चेतना, ज्ञान के बिना उसका अस्तित्व नहीं | गीता का ज्ञान, उपनिषदों का ज्ञान है तो भी मकड़ी के जालों में भगवान का ज्ञान आता है | जिधर देखता हूँ खुदा ही खुदा है, खुदासे न कोई चीज जुदा है | जब अवल और आखिर खुदा ही खुदा है, तो अब भी वही है क्या उसके सिवा है  |

गोरखनाथ ने कहा कि कौन है आज्ञाकारी शिष्य पेड पे चढ जाय ? त्रिशूल भोंक दिया बोले इसे आ के जंप मारे | गुरूजी का चेला हूँ … गुरूजी …गुरूजी.. बस गुरूजी… गुरूजी त्रिशूल भोंक दिया, गस्ती में गाड दिया, ऊँचे पेड पे चढ के उसी डाले पर खड़ा रहकर सीधा त्रिशूल के आगे गिरे, जवान है तो चढ़ जावो | ऐसा करके गोरखनाथ चढ गए थोडा आगे | एक दूसरा के मुहँ तारते थोडा आगे वो कोई खास शिष्य आ गए बोले क्या बात है? बोले गुरुजीने ऐसा कहा है ? अरे बोले जो मेरा शिष्य है वो करेगा, मै तो हूँ ही… वो चढ़ गया | तो त्रिशूल और शिष्य के बीच गोरखनाथ के अदृश्य हाथ अपने हाथो में डाल दिया | बोले त्रिशूल में कैसे गायब हो गया? तेरे बाप के हाथ तेरे को दीखते नहीं क्या ? अब गोरखनाथ के द्वारा वही तो करना है | मूर्तियों को दूध पिलाने का सामर्थ्य वास्तव मे है, वही बात तुमने सर्व भुत हितेरता इसे बह्मज्ञानी महापुरुष को देखो उड़िया बाबा का स्वभाव मरीजो को देख आये बिगड़े भगवान थे | भगवान कुछ नहीं बोलते ये तो अखंडनंद कहा….. आपको भगवान नहीं मानते तो नहीं मानते, तो सुना रखे, अगर नहीं होते तो क्यू सुना रखे | आकाश के फूलों को क्या सुनाई जाता है क्या? वंध्या पुत्रों को क्या सुनाई जाता है क्या ? कितनी सारी सहनशक्ति, सबसे बड़ी में बड़ी सहनशक्ति है तो प्रभु तुम्हारी और तुम्हारी सहनशक्ति का अंश मेरी माँ है, ईश्वर का सहनशक्ति का अंश तेरे में है, हम दूध पीते-पीते काटते थे, तुम्हने बर्दास किया, नाख़ून लगा तुम्हने बर्दास किया, सोते -सोते गीला कर दिया, ये सहनशक्तिया है माँ तुम्हारे में , ईश्वर का स्वभाव तेरे में छुपा है | ऐसी मेरी पृथ्वी माँ…. कोई चाहे कुछ भी करो, भला ही भला करो |खाली सहनशक्ति ये बात नहीं है सूह्रुद भी है | हाँ हाँ – सुहृदम सर्व भुतामं ज्ञातामं शांतम मृछ्ते … एक दूसरे की बुराई करके मैनेजमेंट करना चाहते है वो दो कवडी के अक्कल नहीं रखते | राग, द्वेष, निंदा, बुद्धि मारी गई हाँ | क्या आनंदमय ब्रम्ह बरसा, क्या पत्ते-पत्ते में उसका कला-कौशल्य है, क्या करोजमें ने मकड़ी जाले बनाने में उसकी कला-कुशलता है वो देख-देख के आनंद ले जब से सहृद से जगाता उसके सुहृद जगा | जो भगवान का स्वभाव है, उसका अंश तुम्हारे में छुपा है | उससे छू कर तामसी, राजस्वी अंश में क्यों उलछ्ते हो | हिजाडा, लढाई, निंदा ये राजस्वी, तामसी दुर्गुण है, प्रकृति का परमात्मा का तो अपना स्वभाव है | अब ब्रह्मवेताओ को ये सारा जगत ब्रह्ममय  ही दिखेगा | वासुदेव सर्व मिति – सब वासुदेव है और विद्यार्थिओं को भगवान की लीला देखे और जो राजद्वेशी है उनको ये संसार काटता, दंगता, राग द्वेषी आग में तपता हुआ नेत्रोंसे आकर्षण से ढूस करता हुआ , वा वा…. आकर्षण से ढूस करता हुआ उसके लिए ये संसार नरकालय हो जाता है | नरकालय भी हो जाता है और भगवान की लीला कली भी हो जाता है | सब भगवान ही भगवान है | ऐसा कोई कण नहीं जिसमे भगवत सत्ता नहीं और ऐसा कोई क्षण नहीं जिसमे भगवत अंश न हो | आप सो जाते है.. इंद्रिय, मन सो जाता है. भगवत कण और भगवत क्षण तो रक्तसंचार करते है | अरे क्यों भ्रमित हो रहे भोंदू , नाली के कीड़े बन रहे हो. हे नाथ तू सुख दे अर्जुन के द्वारा, हे मूत्र इंद्रिय पति-पत्नी के द्वारा तबा हो जाते बिचारे | भक्ति सब साधन मूल जो मिले तो हुई संत अनकूल |

भक्ति सारी सुखोंकी खान है, सब साधनों की मूल है और तब मिले सब संत अनकूल – ईश्वर की भक्ति मिल जाय सत्संग मिल जाय | संतो के पास जायेंगे तो धीरे-धीरे उस माहोल से मन इंद्रिय बदलेगी लेकिन चाहे उधर रहे आदत पुरानी अपनी नहीं छोड़े तो क्या फायदा | बड़ी विलक्षण माया, बड़ी विलक्षण लीला है | बोले भगवान पाना बड़ा कठिन है और भगवान का पाना इतना सरल है की | खाली आप इरादा बना लो ईश्वर को पाना है तो सारी जिम्मेदारी वो अपने आप पर लेता है | उसकी प्राप्ति की इच्छा कर लो बस इमानदारी से | जितना हित हराम से उतना हरि से होये कहे कबीर वा दास का पला न पकड़े कोई |  हे प्रभु, हे हरि ……..

चरित्र की पवित्रता, बुद्धि में सत्य का प्रकाश, सत्य ज्ञान स्वरुप है, सत्य सर्वत्र है, सत्य सदा है, और सत्य सबका हितेशी, साक्षी है | बुद्धि वो ज्ञान भर लो, मन में सदभाव भर लो, इंद्रिय में चरित्र निर्माण कर लो | बस हो गया……. ये तीन भी पढ़ लिया आपके ऊपर बड़ा उपकार किया . ऐसे हमने तीन पढ़ दिया वैसे प्रभु तुम्हारे परे कृपा कर दिई | प्रभु के साथ रहो वास्तव में रहो लेकिन ये पता नहीं इसलिए दुःख भोग रहे हो | वास्तव में हो लेकिन जो तुच्छ है उसको तो मै और मेरा मन और जो शाश्वत है उसको समजते है वो दूर है, दुर्लभ है, पराये है  तो जो स्वास्वत है उसको समजते है वो दूर नहीं है, दुर्लभ नहीं है, पराये नहीं है | वो कभी बिछड़ता नहीं उसके लिए जरा खोज कर ले | उसको जरा अपना मान लो | इसके लिए जरासा जिज्ञासा जगा ले मंगल हो जायेगा मंगल | जयराथ भगवान ने भागवत में पंच विषयोंको मनुष्य के लिए बडे दुर्गम विषय में उनको पार कर लिया | देखेने की आसक्ति सुनने की चखने की वा वा सुनने की काम विकार, एक एक विकार को जितने के लिए बारा – बारा वर्ष का साधन भी बताया तब मन उसे विकार से विकलांग होता है | फिर क्या वेदव्यासजी बोले दिखते है भगवान पराशर के सदगुरु लेकिन वही है बोले – येतत सर्वम गुरु भक्त्या | ये सब गुरु भक्तिसे हो जाता है |

ब्राम्हिस्थिति प्राप्त कर कार्य नहीं ना शेष मोह कभी ना ठग सके | ऐसा नहीं की मोह सुबहें ना ठग सके, मोह रात को ना ठग सके, मोह अमावश्या को ना ठक सके, कभी ना ठक सके | मोह कभी ना ठग सके पिच्छा नहीं आवेश पूर्ण गुरु के पामिनी पूर्ण गुरु कहलावे |  ये प्रभु, ये मेरे भगवान, ये मेरे लीलाशाहजी  भगवान मागने तो आये कुछ और ले गए कुछ | मागने तो आये थे तो शिवजी का दर्शन घड़ा दिया लेकिन शिवजी जैसे शिवजी तो है | दाता तो तू सहृद भी है, उदार भी है राजा को क्या दान करेगा ? शेठ्जी तो क्या दान करेगा? कर्ण भी तो क्या दान करेगा ? चीज वस्तु का दान करेगा | अपने कवच का दान करेगा कर्ण लेकिन भगवान तो आपने आप सबसे बड़ा दाता तू ही है भगवान | दाताओं दान करते है वो भी तेरी सत्ता है | हे हरि ….. हे हरि ……

आपकी  तपस्यों का मै खुप – खुप धन्यवाद करता हूँ | संसारी के लिए संसार दुःख का विलास कभी बेटी का दुःख, कभी प्रसूति का दुःख, कभी पति का दुःख, कभी किसी पत्नी का दुःख | संसार के सुखा लेने का सुख चाहता है उस लिए संसार दुःख विलास है | जिज्ञासु के लिए, व्यर्थ के लिए माया का विलास है | और जिसको परमात्मा के लिए अपनी परम भक्ति देते तो ओके लिए ब्रम्ह का विलास है | अभी ब्रम्ह विलास है | श्रद्दा शास्त्र विलास से होती है तो ब्रम्ह विलास तक पहुँच जाती है | श्रद्दा मनमानी होती तो भुत, पिशाच बड़े पेट में रुकाकर जीवन भटका देती | कर्म का फल कर्म नहीं देता है, कर्म तो कृत है (किया जाता है) और जड है | कर्म फल देनेवाला चैतन्य ईश्वर है और वही ईश्वर जिसमे स्थापना करो देवता मेरा कर्म का फल देगा, देवता के द्वारा ही वो ईश्वर अपना कर्म का फल देगा | यहाँ तो साक्षात् परमात्मा निर्गुण निराकार है, मेरे से तो लीलाशाहजी बापू ही भगवान है, वो मेरे से कभी भी अलग नहीं हो सकते | हे हरि हे प्रभु …………

मालूम पडने से ही भोग होता है और रोख से सुख होता है | तो ज्ञान से मालूम पड़ेगा, ज्ञान से ही भोग होगा, ज्ञान से ही सुख होगा | अभी तुम लोग जो सुन रहे हो लेकिन अंधा और बहिरा हो उसे माहोल से भरा हो लेकिन उसको कभी वो सुख नहीं मिलेगा | तुम्हारे से ज्ञान से सुख मिलता है | फालूत वस्तु से, व्यक्ति से नहीं होता खुर्ची मिल गयी उससे ये फल नहीं है लेकिन खुर्ची का सुख ह्रदय में वही फल है | चीज, वस्तु पड़ी है वो फल नही है लेकिन उसे में ह्रदय में जो  होता है सुख वही फल है अथवा दुःख वही फल है | तो जब हृदय से सुख और दुःख फल ऐहसास तो हृदय में ऐसा बनो की भगवानमय हो जाये | विष्णुपुराण में आता है – समतुम आराधनां अच्युतंस्य | सारी आराधना अच्युतस्य की कैसे हो समता ही भगवान की आराधना है कोई भी परिस्तिती आ जाए | वर्षाम न निन्देत तद व्रतं …वर्षा की निंदा न करो , ग्रीष्म ना निन्देत — ऋतुम न निन्देत, लोकांन ना निन्देत पशुं न निन्देत तद व्रतं | बुद्धि में सत्य का ज्ञान, सत्य का प्रकाश, इंद्रिय में सत्य का प्रकाश, मन में सदभाव और ईश्वर को अपना मानो सौप दो उसको बस हो गया |

हरि ॐ … हरि ॐ

About Asaram Bapuji

Asumal Sirumalani Harpalani, known as Asaram Bapu, Asharam Bapu, Bapuji, and Jogi by his followers, is a religious leader in India. Starting to come in the limelight in the early 1970s, he gradually established over 400 ashrams in India and abroad.