कई जन्मों के अपराध सत्संग सुनने से माफ़ – प.पू. संत श्री आशारामजी बापू

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कई जन्मों के अपराध सत्संग सुनने से माफ़- प.पू. संत श्री आशारामजी बापू  (सत्संग हाथरस (उ.प्रदेश) दिनांक- ६ अक्टूबर २०१२)

तुलसीदासजी कहते है रामायण में सुत, धारा और संपति पापी को हो | सुत माना पुत्र, धारा माना पत्नी और संपति माना रुपया-पैसा ये तो पापीयों को भी होता है, धर्मात्मा को भी होता है | लेकिन संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दूर | संतो का सत्संग संग और भगवान की कथा ये दुर्लभ चीज है | इसका फल अमृत है, सुत छोड़ देगा समशान तक पहुँचायेगा अग्निदान देगा, दारा भी दो आसूं बहाकर बरांडे तक आयेगी, संपति यही पड़ी रहेगी लेकिन सत्संग फल जो है मौत का बाप भी छीन नहीं सकता | मनुष्य चाहे कितना भी धनी हो जाये कितना भी कुछ हो जाय सत्ताधीश हो जाय, जब तक उसे सत्संग नहीं मिलता, सोने की लंका मिल जाय, सोने का हिरणपुर मिल जाय लेकिन सत्संग नहीं मिलता तो नीरसता नहीं मिटती, नीरसता नहीं मिटती तो फिर अंदर का रस नहीं आता | दिले तस्वीरें है यार की गर्दन झुका ली और मुलाकात कर ली | जब भी चाहिए परमात्मा से अपना सीधा, ऑनलाइन बात हो सकती है | जय रामजी बोलना पड़ेगा ….

अध्यात्मिक जगत की युक्ति और तरकीब यहाँ है | भगवान शिवजी पार्वती को अगस्त्य आश्रम में ले जाते सत्संग सुनने को, भगवान राम सीताजी को वशिष्ठ  गुरु के आश्रम ले जाते थे, चौदह  साल का वनवास मिला तो श्री रामचंद्र भरतद्वाज आश्रम में सीता और लखनलाला को ले जाते सत्संग सुनते, अत्री आश्रम, अनुसूया आश्रम और ऋषि-मुनियों का आश्रम रामायण में वर्णन आता है | मनुष्य जीवन में अगर सत्संग नहीं मिला, कुछ अवसर मिल गया तब भी कुछ नहीं मिला |

श्रीमद भागवत में कथा आती है भगवान कृष्ण बाल-गोपियों को कभी-कभी वन दिवस मनाने के निमित्त शुद्ध हवा में ले जाते है, जंगल की हवा आयु, आरोग्य, पुष्टि देनेवाली है | अभी विज्ञानी बोलते है जो हमारे विज्ञानियों के बापों का बाप श्रीकृष्ण देहाती जीवन में लोगों को लाभ दिलाते थे उसकी अब विज्ञानी सराहना करते है | एक घन मीटर में पाँच करोड घन आयार्ण उर्जा होती है | जहाँ नदियाँ है, पर्वत है, जंगल है वहाँ की वायु शक्तिशाली होती है, आरोग्यप्रद होती है | वही वायु जब गावों के तरफ खींची देखी जाती है तब पाँच करोड की जगाह पर चार-पाँच लाख मतलब सौवाँ हिस्सा उसमे पौष्टिकता रहती है | अगर वही वायु शहर के तरफ की मापते है तो करीब छोटा गाँव है खेत कलियाँ तो लाख घन आयार्ण आदि, अगर शहरों की मापी तो पचास हजार | कहाँ पाँच करोड और कहाँ शहर की हवा पचास हजार | श्रीकृष्ण वन दिवस मनाने के निमित्त बाल-गोपालों को रुष्ट-पुष्ट होनेवाली शुद्ध हवा में ले गये, दोपहरी का भोजन किया, भोजन के बाद सभी इधर-उधर लकार मारने को जाते | अवधौव, बलराम, साकेती, कृतवर्मा दंग रहे की एक सूखे कुएँ में किरकिट गिर गया हाथ छटपटाता उसकी जान जोखम में सारे प्रयत्न करने के बाद भी किरकिट को निकालने में विफल हो गये, श्रीकृष्ण के पास गये और श्रीकृष्ण ने  फिर निकलवाया और अपनी नुरानी निगाह, नजरों से वे निहाल हो जाते जो संत और भगवंत की नज़रों में आ जाते है | उस किरकिट की पाप राशि कटी और उसकी गर्दन लुडक गयी | देखते-देखते उसके शरीर में से जीवरूपी ज्योती निकली और देवता का रूप धारण कर लिया |    दैदीप्यमान, तेजस्वी देवता को देखकर बाल-गोपाल, कृतवर्मा आदि सब चकित हो गये | सबकुछ जाननेवाले श्रीकृष्ण अनजान होकर देवता को पूछते कि – हे देवपुरुष ! आप इस जंगल में हम बाल-गोपों को दर्शन देने के लिए कहाँ से पधारे ? तब वो कहता है कि – हे माधव ! ये दुनियाँ में जो भी मधुरता है ना उस परमात्मा सत्ता से आती है ? ये पृथ्वी में गन्ने को मधुरता कहाँ से देते हो ? वो माधव की चेतना है | माँ में स्नेह की मधुरता कहाँ से आती है ? इसलिए हजार नामों में एक नाम भगवान का माधव भी है, एक नाम गोविंद भी है, गौ  माना इन्द्रियाँ, इन्द्रियाँ  जिसकी सत्ता से विचरण करती है | एक नाम गोपाल भी है, इन्द्रियाँ  थककर जिसमे आती है पालित होती है तो उसका नाम पड़ता है गोपाल | गोविंद बोलो हरि गोपाल बोलो, राधा रमण हरि गोविंद बोलो | राधा उलटा तो धारा, चेतना की धारा जिसकी सत्ता से रमण करती है वो भगवान क्या मंगलमय हजार-हजार नाम है, हरेक नाम का अपना महात्म्य है | अच्युत जो अपने पद से, अपनी सत्ता से, अपनी महिमा से, अपनी पूर्णता से कभी च्युत नहीं होते | शरीर जवानी से कभी च्युत होता है तो बुढ़ापे में गिरता है, बुढ़ापे से च्युत होता है मौत में जाता है, राष्ट्रपति हर पाँच साल में अपने पद से च्युत होते है, चार साल में कभी कई कई |  किसी देश का राष्ट्रपति था और च्युत हुआ और उसे फांसी की सजा लग गई और मर भी गया | इंद्र भी अपने पद से च्युत हो जाता है | लेकिन एक परब्रम्ह परमात्मा है ये प्रलय हो जाय ये एक सूरज नहीं बारह  सूरज तपते है, तो आग-आग हो जाती है, सब वाष्पिभूत हो जाता है, तब भी परमात्मा चेतना च्युत की च्युत रह जाती है इसलिए भगवान का नाम है “अच्युत” |

इसी भगवान का नाम है केशव, क माना ब्रह्मा , श माना शिव, व माना विष्णु | विष्णु, शिव और ब्रम्ह के हृदय में भी आप ही हो | हमारे हिंदू धर्म में बहुत ऊँची खोज की गयी है हजार नाम भगवान के इस्लाम में एक-सौ-एक नाम खोजे, ईसाइयत  ने नव्वान नाम खोजे, किसी पारसी आदि धर्म में सत्ताईस नाम खोजे लेकिन हमने हजार-हजार नाम खोजे और हमारे ऋषि कहते कि हरि अनंत, हरि के नाम और हरि का स्वभाव, प्रभाव अनंत है | हजार तो खोजे लेकिन और भी कई है | तो वो देवता कहता है कि हे अच्युत, हे केशव, हे गोविंद, हे गोपाल, हे माधव | मै अमेरिका के वर्ल्ड रिलेजियस पार्लमेंट में प्रवचन कर रहा था दुनिया के सातसो धर्मगुरु इकठ्ठे हुए थे | अपने हिंदुस्तान में तो पाँच सो चालीस होते है, वहाँ सांसद में सातसों हम लोग साधु-संत थे, भारत के संस्कृति के विषय में मैंने कहा ….फिर कभी मौका मिलेगा तो आपको बताऊंगा | तो वो देवता कहता है कि हे अच्युत, हे केशव, हे गोविंद, हे गोपाल, हे माधव आप सब जानते है फिर भी अनजान होकर पूछते है मै वो अभागा राजा था जो नीच योनियों में, नरकों में भटकते हुये किरकिट होकर कुएँ में पड़ा था, आप ही ने मुझे निकलवाया और अभी देवता के रूप में खड़ा हूँ | हे गोविंद ! धरती पे सभी राजाओं से बढ़कर मेरा चक्रवर्ती शासन था | आसमान से कोई तारे गिन सकता है लेकिन मैं विद्वानों और संतों को इतना गोएँ दान करके संतुष्ट किया था की मेरी अभी भी गाथा गायी जाती है | राजा हो तो फलाना हो गौ दान करने में मेरा नंबर अव्वल है | आसमान के तारे कोई गिन ले मैने कितनी गौ दान की कोई गिन नहीं सकता | तो श्रीकृष्ण समझ  गये अच्छा तूम राजा नृभ हो ? बोले हाँ  माधव ! हे  केशव ! वही अभागा नृभ हूँ | यश के लिए तो गाय दान की थी, लेकिन मुझ अभागे को पता नहीं था की सत्संग बाप-बाप है | ये जो सत्संग नहीं मिला था सबकुछ मिला, सबकुछ  रह गया और में किरकिट होकर छटपटा रहा हूँ | अब नृभ राजा बड़े दानी थे जो शरीर मर गया उसके जयजयकार हो रही है मुझे क्या मिला ? मुझे तो आपकी कृपा मिली कि इस नीच योनि से मेरी सदगति हुई | हे  परब्रम्ह ! आप कृपा करके आशीर्वाद दीजिये मै अब स्वर्ग का सुख भोगने जाऊँ | श्रीकृष्ण ने किरकिट में से देवता बनाया है और देवता बनाया है तो स्वर्ग के सुख की इच्छा है | शबरी स्वर्ग की इच्छा नहीं करती, मीरा स्वर्ग की इच्छा नहीं करती, मैंने गुरुजी के आगे स्वर्ग की इच्छा नही की | स्वर्ग का पुण्य है भोगा फिर गिरना है, हमें तो ऐसा मिले की फिर पतन न हो | वो सत्संग से मिल सकता है सत्संग के लिए नहीं रुका वो स्वर्ग मिले, जिसकी आदत होती हैं ना भोगने, खाने की……

राजा अज मरने के बाद सांप हो गये और जनक ने सत्संग करवाया और वो सांप…… सत्संग मंडप में कथा सुनने को आया, लोगों में हिलचाल हो गई घबरायें, त्रिकाल ज्ञानी सत्संग करनेवाले अष्टावक्र महाराज थे | सांप को देखकर तनिक ध्यान करके सब जान गये, बोले ये राजा अज है इसी मिथिला का एक चक्रवती  सम्राट है, मरने के बाद सांप की योनी को पाया है, सत्संग सुनने से पाप कटते है और उसकी यही सदगति होगी | आप को काटेगा नहीं भले जंगल से जंगली सांप है काटेगा नहीं | तुम्हे इससे डरना नहीं, छेड़ना नहीं | सत्संग जब एक दिन, दो दिन सत्संग पूरा होने को था तो कुंडली मार के बैठा वो सांप बार-बार फन ऊँची करे और पटके, फन ऊँची करे और पटके, फिर ऊँची करे पटके-झटके पाँच पचीस बार ऐसा पटक-झटक करने के बाद किसी पत्थर कंकर पर फन टकराई मुहं में से खून निकला उसकी जीवरुपी वृत्ति निकली, देवता के रूप में प्रगट हुए | राजा जनक का माथा सूंघा धन्यवाद दिया, अष्टावक्र मुनि की स्तुति की | अष्टावक्र कहते कि मै तो जानता हूँ राजा अज तुम मिथिला नरेश हो, आज से पहले सातवें  पीढ़ी के राजा हो लेकिन मेरे ये सत्संगियों को आप आपबीती कहो | तब राजा अज कहता की भाईयों इतिहास में तुमने सुना था सातवें पीढ़ी आज से सात पीढ़ी पहले का राजा अज राज करता था | मेरा यश तो बहुत था, मैंने भी दान, पुन करके यज्ञं-होम-हवन वालों को और ब्राम्हणों को गाय दान करके बड़ा अपना यशगान करवाया था लेकिन मुझ अभागे को सत्संग महत्व पता नहीं था | यश का तो फल भोगकर मर गये फिर सांप योनी, अजगर योनी में, यमराज ने कहा एक हजार वर्ष तुम्हे सांप, अजगर और डेंन्डू ( पाने के सांप को डेंन्डू बोलते है ) उस योनी में जाना पड़ेगा | मै तो घबराया कहाँ तो राजा अज मिथिला नरेश और कहाँ सांप, उसकी योनी में चूहे का भोजन चूहे को पकडने के लिए चूहे के बिल में घूसों,  मेंढक  को पकडने के लिए भागों, मेरी क्या दुर्गति हो गई क्षमा करो मैंने खूब  हाथा-जोड़ी की रुदन किया | यमराज ने कहा इससे काम नहीं चलेगा, हाँ एक उपाय है अगर तुम भगवान को प्रार्थना करो तुम्हारे कुल खानदान में कोई सच्चे, ब्रम्हज्ञानी, संत का आत्म-परमात्मा का विषय, मंदिर का भगवान का नहीं, मस्जिद, चर्चों का भगवान नहीं, जो कभी मरता नहीं, कभी टूटता-फूटता नहीं, कभी बेवफा नहीं होता, मंदिर, मस्जिद, चर्च ये तो टूटते–फूटते भी, कुटुंबी बेवफा भी होते, अपना शरीर बेवफा होता है लेकिन जो कभी मरता नहीं, बिछड़ता नहीं, बेवफा नहीं होता और हजार-हजार गलतियाँ करने पर हमारा बुरा नहीं करता वो अंतर्यामी परमेश्वर ही सबका साथी है, सबका हितेषी है, सबका मंगल करता है | उस मंगल करता भगवान को प्रार्थना करो की तुम्हारे कुल-खानदान में उस मंगल करता अंतर्यामी प्रभु की कथा करनेवाले, सत्संग करनेवाला हो संत, अगर तुम्हारा बेटा, बेटे का बेटा, पोते के पोता, परपोते का भी पोता अगर सत्संग करायेगा सातवें  पीढ़ी के अंदर तो तुम्हारी सदगति हो जायेगी | मैंने भगवान को प्रार्थना की लेकिन यमराज को कहा के हे यमपूरी के देवता अगर मेरा पुत्र, पौत्र, पुत्र का परपौत्र ब्रम्हज्ञानी गुरु का सत्संग करे, करवायें अथवा उसे भागीदार हो तो उस सत्संग का माहोल देखने का मेरी इन आखों को पुण्य मिले, सत्संग के वचन सुनने का इन कानों को पुण्य मिले, मुझे शांति मिले | सत्संग हो तो मुझे सर्प योनी में भी अवसर देने की तुम कृपा कर सकते हो | यमराज मेरी सज्जनता भरी मांग पर राजी हो गये | बढ़िया-बढ़िया !! , साधो-साधो !! तुम्हारी सीधी-साधी मांग है, ऐसा ही होगा | फिर मुझे गिरा दिया और चंद्रमाँ के किरणों के द्वारा मै धरती पे अजगर बना रात को पेट भरने को भटकता कभी मरा हुआ जीव जनावर मिल जाये छोटा-मोटा अथवा तो तेढे-मेढे पेड पे चढ के पक्षियों के घोंसले में बच्चे खा लिए | एक चांदनी रात को मै भटका कुछ मिला नहीं, सुबह हो गया जब अपने बिल के तरफ वापस लौट रहा था तो पत्तों की खटपट से जंगल में जानेवाले कठियारे, घसियारे शहद के चक्के खोजनेवाले आपस में तो टोला बनाके जा रहे थे पाँच- पचास लोग अरे वो सांप.., सांप, अजगर…, अजगर जा रहा मै तेजी से भागा अपने बिल की ओर लेकिन उनके पत्थरों ने, डंडों ने मेरी पूंछ पर खतरनाक घाव किये ओर मेरी पूंछ लहू-लुहान  हो गई | सोचा पूंछ को घसीट के अंदर आराम करूँगा लेकिन भाईयों जो सत्संग सुनकर अंतर्यामी प्रभु में आराम करने की कला नहीं जानता वो मरने के बाद सांप या घोडा-गधा बनकर क्या आराम जानेगा | मेरे खून की गंध जंगल की कीडियों  को लगी और कीडियों  की कतारें बिल में आने लगी, कहाँ तो राजाधिराज महाराज अन्नदाता अज की जय हो बोलते थे और कहाँ मै अब कीडियों  से अपनी जान नहीं छुडा सकता | दिनभर कीडियाँ मुझे नोचती रही, चुसती रही | दिन-तो-दिन लेकिन रातभर  भी कीडियाँ नोचती रही, रातको भी मुझे कीडियों ने बक्शा नहीं | एक दिन बिता, एक रात बीती, दूसरा दिन …. चौथे दिन की रात एक कोर पेट में नहीं और बूंद खून नहीं कीडियाँ नोचती रही | राजाधिराज होकर जो मजे लिए मानो ये सारो मजों  का बदला वो जीव मेरे ले रहे | पांचवे दिन की रात भगवान किसी की न बिताए और छट्टे दिन की रात तो मूर्छा-मूर्छा में जरा सा चेतन आये हिलू-डूलू और मूर्छित हो जावू | मुझ अभागे ने ऐसे तो  वहा-वाई के लिए दान भी बहुत किया लेकिन सत्संग में जाने अवसर नहीं मिला | एक घडी आधी घडी आधि में पुनिआध | तुलसी संगत साध की हरे कोटि अपराध || कई जन्मों के अपराध सत्संग सुनने से माफ़ हो जाते है |
सातवें दिन मेरा दम टुटा मै डेंन्डू बना ( पानी का सांप ) और मेंढक पकड़ा, मेंढक की कहरात देखकर कोई स्नान करने आया था उसने मेरे को पत्थर मारा मै मूर्छित होकर मरा | इसप्रकार २५० वर्ष मैंने बहुत दुःख भोगे लेकिन बेटा हो तो जनक जैसा हो, ब्रम्हज्ञान का सत्संग कराया | अभी ७५० वर्ष मेरी नीच योनिओं से मुक्ति हो गई | पुण्यशील और सुशिल पार्शद प्रगट हुए अष्टावक्र को प्रार्थना करके, आप जैसे समर्थ संत की हाजरी में आपके भक्त को ले जाए, आपकी आज्ञा के बिना नहीं  होगी, अव्हेलना होगी धर्म की इसलिए आज्ञा दीजिये | अष्टावक्र ने संकेत किया विमान में ले जा रहे पुण्यशील और सुशिल जहाँ तक नजर पड़ी राजा जनक ने उनका अभिवादन किया | आपके घर मे कोई मेहमान आये चार कदम चल कर जायें दो मिठ्ठे वचन बोले | गृहस्ती घर की ये शोभा है घर पे कोई भी आ जाये जरा अच्छी जगाह पर बिठाओ, नम्रता से पेश आओ | कौवा का का धन हारे, कोयल का को दे, मिट्ठे वचन बोल के जग अपना करी ले |
तो जनक देखते रहे और बिदाई दी राजा अज को | अष्टावक्र गुरु को कहते है जनक, महाराज आप के सत्संग का प्रभाव मैंने प्रत्यक्ष देख लिया आप खाली सत्संग करना वाले आत्मवेता संत है ऐसी बात नहीं आप योग सामर्थ्य के धनी है | मुझे योग विद्या सिखाओ ताकि ये शरीर यहाँ पड़ा रहे ये सूक्ष्म शरीर से मै यमपुरी जाऊँ, वहाँ से स्वर्ग में जाऊँ, अपने पूर्वजों का दर्शन करके आऊ | अष्टावक्र गुरु
ने ये पद्धति उन्हें सिखा दी, ये मै तुम्हे सिखा दूँ |

सत्संग से पता चलता है संसार का सार कहाँ है | संसार में कितना भी दौडोगे, कितना भी मिलेगा वो सार नहीं है | इसीलिए थोडा समय निकालकर संसार के स्वामी से मिलने की कला सीख लो | बैर को प्रीत में बदलने की कला सीख लो, हार में जितने की कला सीख लो, रुदन को गीत में बदलने की कला सीख लो अगर सत्संग मिलता रहे तो मौत को मुक्ति में बदलने की कला सीखी जाती है |

हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ   भोलेनाथ …………..
अष्टावक्र गुरु ने वो दिखाई, सिखाई रीत और राजा जनक ये शरीर यही कमरे में बंद, सूक्ष्म शरीर से यमपूरी पहुंचे, यमपूरी देवता ने कहा की जनक तुम मर कर नहीं आये हो, योगविद्या से आये हो फिर भी तुमने सत्संग का प्यायु खुलवाया, तुम स्वर्ग तो ईधर है तुम सीधे स्वर्ग से नहीं जा सकते हो, लेकिन मै व्यवस्था करता हूँ, मै अपने दो दूत देता हूँ | तो अस्सी नरक, रोरव  नर्क, कुंभीपात नर्क जब जनक गये तो नारकी जीव कष्ट पा रहे थे हाय कष्ट, हाय कष्ट पीड़ा | जनक अनजान होकर पूछते है क्या है ? बोले पुण्य का फल चाहते है लेकिन पुण्य नहीं करते, पाप का फल नहीं चाहते लेकिन पाप बड़ी सावधानी से करते है, किसीको पता न चले | पुण्यं फलं इन्छियंती, पुण्यं ना करोति मानवा, पाप फलं न इन्छियंती, पापं करोति यत्नतः | ऐसे लोग ये नारकीय दुःख भोग रहे है | जनक तनिक शांत हो गये | लंबी श्वास ली उस अंतरात्मा परमात्मा में विश्रांति पाकर और नारकीय जीवों पर नजर डाली | ऊँची बांची छिल गई, आखों में चमक आ गई, वे चेहरे में प्रसन्नता आ गई, जनक तुम्हारी जय हो जुग -जुग  जीओ जनक तुम्हारी जय हो ! जनक ने दूतों से पूछा ये क्या है ? बोले महाराज तुमने ब्रम्हज्ञानी गुरु का सत्संग सुना है, उनसे दीक्षा लीई है, तुमको अंतर्यामी परमात्मा का रस लेने की तरकीब है, उस रस में गोता मारकर तुमने मीठी निगाहें  डाली तो उन पापियों के पाप कट गये उनको शांति, आनंद और माधुर्य का आस्वादन हो रहा है |
सत्संगरूपी जनक के बीच हम कलजुग नारकीय जीव भोग रहे महंगाई का दुःख, पोलुशन का दुःख, बिमारियों का दुःख, शत्रुयों का दुःख न जाने क्या-क्या दुःख लेकिन जब सत्संग रूपी जनक के किसी महापुरुष के नुरानी निगाहों मे हम आते है तो हम भी स्वर्गीय सुख से भी ऊँची शांति का अहसास करते |

हरि ॐ ॐ

About Asaram Bapuji

Asumal Sirumalani Harpalani, known as Asaram Bapu, Asharam Bapu, Bapuji, and Jogi by his followers, is a religious leader in India. Starting to come in the limelight in the early 1970s, he gradually established over 400 ashrams in India and abroad.