गरुड़ पुराण (अध्याय – १ )

garoodh puran|ॐ श्रीपरमात्मने  नम : | ॐ श्री गणेशाय नम: | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |

गरुडपुराण

(आचारकाण्ड)

अध्याय – १

भगवान विष्णु की महिमा तथा उनके अवतारों का वर्णन

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम |
देवी सरस्वती व्यासं ततो जयमुदीरयेत ||

‘नरश्रेष्ठ भगवान श्रीनरनारायण और भगवती सरस्वती तथा व्यासदेवको नमन करके पुराणका प्रवचन करना चाहिये |’

जो जन्म और जरासे रहित कल्याणस्वरूप – अजन्मा तथा अजर हैं, अनंत एवं ज्ञानस्वरूप हैं, महान है, विशुद्ध (मलरहित), अनादि एवं पाँचभौतिक शरीर से हीन हैं,  समस्त इन्दिर्यों से रहित और सभी प्राणियों में स्थित हैं, मायासे हैं उन सर्वव्यापक, परम पवित्र, मंगलमय, अद्वय भगवान श्रीहरि की मैं वन्दना करता हूँ | मैं मन-वाणी और कर्मसे विष्णु, शिव, ब्रह्मा, गणेश तथा देवी सरस्वती को सर्वदा नमस्कार करता हूँ |     

एक बार सर्वशास्त्रपारंगत, पुराणविद्याकुशल, शांतचित्त महात्मा सूतजी तीर्थयात्रा के प्रसंग में नैमिषारण्य आये और एक पवित्र आसनपर स्थिर होकर भगवान विष्णुका ध्यान करने लगे | ऐसे उन क्रान्तदर्शी तपस्वीका दर्शन करके नैमिषारण्यवासी शौनकादि मुनियों ने उनकी पूजा की और स्तुति करते हुए उनसे यह निवेदन किया –

ऋषियों ने कहा –  हे सूतजी ! आप तो सब कुछ जानते हैं, इसलिये हम सब आपसे पूछते हैं कि देवताओं में सर्वश्रेष्ठ देव कौन हैं, ईश्वर कौन है और कौन पूज्य हैं ? ध्यान करने के योग्य कौन हैं ? इस जगत के स्त्रष्टा, पालनकर्ता और संहर्ता कौन हैं ? किनके द्वारा यह (सनातन) धर्म प्रवर्तित हो रहा हैं और दुष्टों के विनाशक कौन है ? उन देवका कैसा स्वरूप हैं ? किस प्रकार इस सम्पूर्ण जगतकी सृष्टि हुई है ? किन व्रतों का पालन करने से वे देव संतुष्ट होते हैं ? किस योगके द्वारा उनको प्राप्त किया जा सकता हैं ? उनके कितने अवतार हैं ? उनकी वंश-परम्परा कैसी है ? वर्णाश्रमादि धर्मों के प्रवर्तक एवं रक्षक कौन है ? हे महामते श्रीसूतजी ! इन सबकी और अन्य विषयों को हमें बतायें तथा भगवान नारायण की सभी उत्तम कथाओं का वर्णन करें |

सूतजी बोले – हे ऋषियों ! मैं उस गरुडमहापुराण का वर्णन करता हूँ, जो सारभूत हैं और भगवान विष्णु को कथाओं से परिपूर्ण हैं | प्राचीन काल में इस पुराण को श्रीगरुडजी ने कश्यप ऋषिको सुनाया था और मैंने इसे व्यासजी से सुना था | हे ऋषियों ! भगवान नारायण ही सब देवों में श्रेष्ठ देव हैं  | वे ही परमात्मा एवं परब्रह्म हैं | उन्हींसे इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति और संहार की क्रियाएँ होती हैं | वे जरा-मरणसे रहित हैं | वे भगवान वासुदेव अजन्मा होते हुए भी जगत की रक्षा के लिये सनत्कुमार आदि अनेक रूपों में अवतार ग्रहण करते हैं |

हे ब्रह्मन ! उन भगवान श्रीहरिने सर्वप्रथम कौमार-सर्ग में (सनत्कुमारादि के रूपमें ) अवतार धारण करके कठोर तथा अखंड ब्रह्मचर्यव्रत का पालन किया | दुसरे अवतार में उन्हीं यज्ञेश्वर श्रीहरि ने जगत की स्थिति के लिये (हिरण्याक्षके द्वारा ) रसातल में ले जाई गयी पृथिवी का उद्धार करते हुए ‘वराह’ -शरीर को धारण किया |  तीसरे ऋषि-सर्ग में देवर्षि (नारद ) के रुपमे अवतरित होकर उन्होंने ‘सात्वत तन्त्र’ (नारदपाश्वरात्र) का विस्तार किया, जिससे निष्काम कर्म का प्रवर्तन हुआ | चौथे ‘नरनारायण’ अवतार में भगवान श्रीहरि ने धर्म की रक्षा के लिये कठोर तपस्या की और वे देवताओं तथा असुरोद्वारा पूजित हुए | पाँचवे अवतार में भगवान श्रीहरि ‘कपिल’ नामसे अवतरित हुए, जो सिद्धों में सर्वश्रेष्ठ हैं और जिन्होंने काल के प्रभाव से लुप्त हो चुके सांख्यशास्त्र की शिक्षा दी | छठे अवतार में भगवान नारायण ने महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूया के गर्भ से ‘दत्तात्रेय’के रूपमें अवतीर्ण होकर राजा अलर्क और प्रल्हाद आदिको आर्विक्षिकी (ब्रम्ह) विद्याका उपदेश दिया | सातवें अवतार में श्रीनारायण ने इन्द्रादि देवगणों के साथ यज्ञ का अनुष्ठान किया और इसी स्वायम्भुव मन्वन्तर में वे आकूति के गर्भ से रूचि प्रजापति के पुत्ररूप में ‘यज्ञदेव’ नामसे अवतीर्ण हुए | आठवे अवतार में वे ही भगवान विष्णु नाभि एवं मेरुदेवी के पुत्ररूप में ‘ऋषभदेव’ नामसे प्रादुर्भूत हुए | इस अवतार में इन्होने नारियों के उस आदर्श मार्ग (गृहस्थाश्रम) का निदर्शन किया, जो सभी आश्रमोंद्वारा नमस्कृत है | ऋषियों की प्रार्थना से भगवान श्रीहरि ने नवें अवतार में पार्थिव शरीर अर्थात ‘पृथु’ का रूप धारण किया और (गोरुपा पृथिवीसे ) दुग्ध्ररूप में (अन्नादिक) महौषधियों का दोहन किया, जिससे प्रजाओं के जीवनकी रक्षा हुई | दसवें अवतार में ‘मत्स्यावतार’ ग्रहणकर इन्होने चाक्षुस मन्वन्तरके बाद आनेवाले प्रलयकाल में (निराश्रित) वैवस्वत म्नुको पृथ्वीरूपी नौका में बैठाकर सुरक्षा प्रदान की | ग्यारहवे अवतार में देवों और दानवों ने समुद्र-मंथन किया तो उस समय भगवान नारायण ने ‘कुर्म’ रूप ग्रहण करके मन्दराचल पर्वत को अपनी पीठपर धारण किया | उन्होंने बारहवे अवतार में ‘धन्वंतरि’ तथा तेरहवे अवतार में ‘मोहिनी’ का रूप ग्रहण किया और इसी स्त्रीरूप में उन्होंने (अपने सौन्दर्य से ) दैत्यों को मुग्ध करते हुए देवताओं को अमृतपान कराया | चौदहवे अवतार में भगवान विष्णु ने ‘नृसिंह’ का रूप धारणकर अपने तेज नखाग्रोंसे पराक्रमी दैत्यराज हिरण्यकशिपु के ह्रदय को उसी प्रकार विदीर्ण किया, जिस प्रकार चटाई बनानेवाला व्यक्ति तिनके को चीर डालता है | पंद्रहवे अवतार में ‘वामन’रूप धारणकर वे राजा बलि के यज्ञ में गये और देवों को तीनों लोक प्रदान करने की इच्छा में उनसे तीन पग भूमिकी याचना की | सोलहवे (परशुराम नामक) अवतार में ब्राह्मणद्रोही क्षत्रियों के अत्याचारों को देखकर उनको क्रोध आ गया और उसी भावावेश में उन्होंने इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियों से रहित कर दिया | तदनंतर सत्रहवे अवतार में ये पराशरद्वारा सत्यवती से (व्यास-नामसे) अवतरित हुए और मनुष्यों की अल्पज्ञता को जानकर इन्होने वेदरूपी वृक्ष को अनेक शाखाओं में विभक्त किया | श्रीहरि ने देवताओं के कार्यों को करनेकी इच्छासे राजाके रूप में ‘श्रीराम’ नामसे अट्ठारहवाँ अवतार लेकर समुद्रबंधन आदि अनेक पराक्रमपूर्ण कार्य किया | उन्नीसवें तथा बीसवें अवतार में श्रीहरि ने वृष्णिवंश में ‘कृष्ण’ एवं ‘बलराम’ का रूप धारण करके पृथ्वी के भार का हरण किया | इक्कीसवे अवतार में भगवान कलियुग की सन्धि के अंत में देवद्रोहियों को मोहित करने के लिये कीकट देश में जिनपुत्र ‘बुद्ध’ के नामसे अवतीर्ण होंगे और इसके पश्चात कलियुग की आठवी संध्यामें अधिकांश राजवर्ग के समाप्त होनेपर वे ही श्रीहरि विष्णुयशा नामक ब्राह्मण के घरमें ‘कल्कि’ नामसे अवतार ग्रहण करेंगे |

हे द्विजो ! (मैंने यहाँपर भगवान नारायण के कुछ ही अवतारों की कथाका वर्णन किया है | सत्य तो यह है कि ) सत्त्वगुण के अधिष्ठान भगवान विष्णु के असंख्य अवतार हैं | मनु, वेदवेत्ता तथा सृष्टिप्रवर्तक सभी ऋषि उन्हीं विष्णु की विभूतियाँ कही गयी हैं | उन्हीं मनु आदि श्रेष्ठ ऋषियों से इस जगत की सृष्टि आदि होती है, इसीलिये व्रत आदि के द्वारा इनकी पूजा करनी चाहिये | प्राचीन काल में भगवान वेदव्यास ने इसी ‘गरुडमहापुराण’ को मुझे सुनाया था |

————– नारायण  नारायण ————–