तीर्थ स्नान और मूर्ति पूजा का फल

पूर्ण गुरु की कृपा हजम हुई तो मनुष्य मुक्त

मूर्ति पूजा और तीर्थ स्थान में स्नान करने से पुण्य होता है

असली पुण्य और रस तो सत्संग से ही मिलता है

जब पुण्य जोर मारते हैं तभी संतो का संग मिलता है

निराकार नारायण के अमृत पुत्र हो तुम

संत तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रीति करनी है तो राम से करो

ब्रह्मज्ञानी संत ही असली मित्र है

पहले ईश्वर प्राप्ति करो संसारी काम बाद में

सत्संग मनुष्य को सहज सुलभ और उन्नत कर देता है

संसार में राग द्वेष की जन्म मरण का कारण

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