दुखों से निवृति का अचूक उपाय- प.पू.संत श्री आशाराम बापूजी

1058_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPUॐकार मंत्र अन्तर्यामी परमात्मा का नाम है | इसकी शक्तियाँ खोजने वाले भगवान नारायण हैं | इसलिए भगवान नारायण इसके ऋषि माने जाते हैं | इसकी छंद गायत्री है | जो भी भगवान के नाम हैं उसकी छंद गायत्री बन जाती है | जैसे गायत्री मंत्र की छंद गायत्री है, उसके देवता भगवान सूर्य नारायण हैं और ऋषि विश्वामित्र हैं | ॐ नमह शिवाय के देवता शिवजी हैं | और ऋषि वशिष्टजी हैं | ऐसे ही ॐकार मंत्र के ऋषि भगवान नारायण हैं | ऋषि उसको बोलते है जो खोज करते हैं | ऋषि तू मंत्र दृष्टार ना करतार | मंत्र की शक्तियों के दर्शक हैं, मंत्र करने वाले नही है | ऋषि मंत्र बनाते नही, खोजते हैं | तो भगवान नारायण ने खोजा |
एक होता है निर्माण, जो पहले नही था उसका होता है निर्माण | और जो पहले होता है उसकी होती है खोज | ये श्रृष्टि के पहले ही ॐकार का अस्तित्व था | भगवान नारायण ने, ब्रह्माजी ने ॐकार मंत्र बनाया नही | जैसे श्रृष्टि बनाई ऐसे ॐकार मंत्र बनाया नही | लेकिन विष्णुजी ने खोजा ये ध्वनि क्या है ? इसी चैतन्य ध्वनि से नारायण का नारायण पना और ब्रह्मा का ब्रह्मपना है | ये सबका आत्मदेव होकर बस रहा है | ये ॐकार मंत्र, इसके ऋषि भगवान हैं, इसकी छंद गायत्री है | इस ॐकार मंत्र के ६ बार जप हो जाएँ, तो सतवी बार जप करते ही आप अनंत ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ एक हो जाते हैं | ये सूरज, चंदा, आकाश गंगा, इससे भी पार होती है ब्रह्मांडीय उर्जा | ऐसे अदभुद लाभ के अधिकारी बन जाते हैं |
ये ॐकार मंत्र ३ घंटे रोज जप करें, ३ घंटे परमात्म ध्यान, ३ घंटे शास्त्र और ३ घंटे सद्गुरु की सेवा | एक वर्ष में आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है |
१२० माला रोज ५० दिन तक जप करें, और खीर का भोग लगाये सूर्य देव को | ७ जन्मो की दरिद्रता मिट जायेगी और ७ पीढ़ियों में दरिद्रता नही आएगी | ॐकार मंत्र के जप से पेट की खराबियां भाग जाती हैं, लीवर, दिमाग की कमजोरी ठीक हो जाती है | और कितने सारे फायदे हैं, २२,००० श्लोक हैं ये ॐकार मंत्र की महिमा के | जितना वो खोज सके वो २२,००० श्लोक में है | ॐ तो एक शब्द है लेकिन उसके फायदे २२,००० श्लोक में | अब हो सकता है दूसरा ऋषि कुछ और भी खोज सके | भगवान नारायण तो इसकी महिमा खोज के इसके ऋषि हो गए |
गीता में भगवान ने कहा प्रणव सर्व वेदेषु, शब्द्खे पुरुषम मिशु || वेदों में ॐकार मैं हूँ | और ये शाश्वत भी है | बच्चा जन्म लेता है तभी उवा-उवा और बुढा होकर बिस्तर पर पड़ा होता है तभी उ-उ | उसे कुछ तसल्ली मिलती है | ये ॐकार मंत्र जप करते-करते जप में लीन हो गए, चलते-फिरते भी जप हो सकता है |
महिलओं को मासिक धर्म में जप नही करना चाहिए नही तो नुकसान होता है |
संसार में जितने भी दुःख, भय और क्लेश हैं उन सबके मूल में अविद्या है, नासमझी | अविद्या माना जो पहले नही था, बाद में नही रहेगा, अविद्यमान है, उसको सच्चा दिखाने की बेवकूफी उसको अविद्या बोलते हैं | ये पहले नही था, बाद में नही रहेगा, अभी भी नही की तरफ जा रहा है | ऐसे ही ये शरीर पहले नही था, बाद में नही रहेगा | लेकिन आत्मा पहले था, अभी है, बाद में रहेगा | तो सदा विद्यमान को ढक दे और अविद्यमान को सच्चा दिखाए | उस नासमझी को अविद्या बोलते हैं | अविद्या नही मिटाया और दुनिया की सब विद्या पा लिया तो भी धिक्कार है उसे | जिसने सत्संग में रूचि नही की उसको धिक्कार है और अपने आत्मा पर जो विद्यमान काई है, नासमझी है वो हटाते नही तो उसको धिक्कार है | सोने की लंका बना ली लेकिन अविद्या की काई नही हटाई, तो रावण हार गया | शबरी भिलन ने अविद्या मिटा दी, तो रामजी उसके झूठे बेर खाते हैं |
तो एक है अविद्या जैसे पानी के ही बल से काई बनती है और पानी को ही ढकती है | ऐसे ही अविद्या आत्मा को ढक रही है, आत्मा के बल से ही बनी है | तो अविद्या से ४ दूसरे दोष आ जाते हैं, अस्मिता, जो पहले नही था, बाद में नही रहेगा उस शरीर में मैं बुद्धि आ जाती है | शरीर को मैं मानना, ये है अस्मिता | अस्मिता हुई तो फिर आएगा राग | अपने पुत्र, पति-पत्नी, अपनी मान्यता, अपने मन की बात होगी तो अच्छा लगेगा, ये हो गया राग | और फिर विपरीत में लगेगा द्वेष | तो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, पाँचवा दोष आएगा अधिनिवेश, मृत्यु का भय घुस जायेगा | अब मृत्यु के भय से तो कोई अमर नही हुआ, मरेगा तो पक्का | लेकिन मृत्यु के भय में जिंदगी भयावर हो जाती है | तू कितना भी भजन कर ले, देवी-देवतओं को रीछा ले और भगवान को प्रत्यक्ष कर ले | लेकिन अविद्या नही मिटी तो दुखों की जड़ नही कटेगी | श्री कृष्ण अर्जुन के प्रत्यक्ष थे | लेकिन फिर भी अर्जुन को अविद्या थी तो दुःख नही मिटा | अस्मिता, राग नही मिटा | अविद्या जाती है विद्या से | जब श्री कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया, अँधेरा जाता है प्रकाश से | तो आत्म विद्या से अविद्या जाती है | तपस्या, पुण्य से अविद्या नही जाती | पुण्य से अविद्या मिटाने के लिए हृदय पवित्र बनता है | लेकिन सद्गुरु विद्या दाता से ही अविद्या जाती है | तो अविद्या नही मिटी, तो चाहे दुनिया के सारे मित्र आपके होगये और सारे शत्रु मिट गए, फिर भी दुःख नही मिटेगा | अविद्या है ना | मृत्यु का भय, राग, द्वेष, अधिनेवेश बना रहेगा | वे लोग बहुत नीच लोग होते हैं के मेरा नाम हो | मेरे गुरूजी का नाम हो | अरे ये तो बहुत नीच लोग होते हैं | जो शरीर पहले था नही, बाद में रहेगा नही उसका कपोल, कल्पित नाम है, उसी नाम के पीछे मरे जा रहे हैं | जो अपना नाम करना चाहता है वो गुरु, गुरु नही मुर्ख है | ये सब अविद्या है | जो शरीर था नही, रहेगा नही उसके कपोल-कल्पित नाम के पीछे मरे जा रहे हैं |
अविद्या, राग, द्वेष, अधिनिवेश, अस्मिता ये पाँच दुर्गुण आत्म-विद्या से जायेंगे | तो आत्मविद्या कठिन नही है, लेकिन उसकी रूचि नही है दुर्भाग्य से | अपने आदत, राग के अनुसार होता है तो मजा आ गया | जो राग से सुखी होता है वो द्वेष से दुखी भी हो जाता है | और सुखी-दुखी होना ये मूर्खो का काम है | कुत्ता भी सुखी-दुखी होता रहता है, मनुष्य भी सुखी-दुखी हुआ तो उसमे महत्ता क्या रही | सुखाकार-दुखाकार वृतियाँ होती हैं | और वृतियाँ तो आती-जाती रहती हैं | लेकिन कुछ सत्य ऐसा है जो सदा रहता है | वो सदा विद्यमान है | जो सदा विद्यमान है, ॐकार जपने से उसमें स्तिथि होती है | (लम्बा) ॐ…… ॐ कार का अ और आखिर का म, उसके बिच में अविद्या नही रहेगी | संकल्प-विकल्प नही रहेगा | तो अविद्या मिटाने के लिए ॐ कार का जप करता है तो अविद्या थोड़े से उपदेश से मिट जायेगी | शांत होने के लिए ॐ कार का जप करता है तो थोड़ी देर में अशांति चली जायेगी | क्योंकी ये ॐ कार मंत्र सारे तत्व का, सारी पृथ्वी का मूल तत्व है | जैसे धरती से सारे फल सत्ता पा लेते हैं, फल, फुल, बीज, विटामिन्स सब आ जाते हैं | ऐसे ही धरती, चंदा, सूरज को सबको सत्ता जहाँ से मिलती है वो ॐ स्वरूप है चैतन्य से || सारे वृक्षों का मूल धरती है | ऐसे ही धरती, सूरज, चंदा, आकाश, सबको मूल तत्व प्रकृति है | और प्रकृति का मूल स्वरूप ॐ आत्मा-परमात्मा है | तो इसमें भगवान ने कहा प्रणव सर्व वेदेषु | सब वेदों में जो ॐ कार है मेरा ही स्वरूप है | जिनको ॐ कार मंत्र जपने की आदत पड़ जाती है फिर दुर्गति का सवाल ही नही होता |
कभी ना छूटे पिंड दुखो से जिसे ब्रह्म का ज्ञान नही | ॐ कार ब्रह्म विद्या को पचाने की शक्ति दे देता है | आत्म ज्ञानम परम ज्ञानम न विद्यते, आत्म ज्ञान से बड़ा कोई ज्ञान नही है | आत्म लाभात परम लाभम न विद्यते , आत्म लाभ से बड़ा कोई लाभ नही है | आत्म-सुखात परम सुखम न विद्यते, आत्म सुख से बड़ा कोई सुख नही | आत्म ज्ञानी गुरु का एक क्षण का सत्संग करोडों तीर्थ करने का फल दे देता है | हजारों यज्ञ, सैकडों एकादशी का फल दे देता है | तीर्थ नहाये एक फल, संत मिले फल ४, सद्गुरु मिले अनंत फल | पुण्य-पाप का फल सुख-दुःख देकर नाश हो जायेगा | लेकिन सद्गुरु के सत्संग, दर्शन, कृपा का फल सुख-दुःख देकर नाश नही होता | अनंत है | क्योंकी अविद्या मिटी तो सद्गुरु अनंत से एक हो गए | अनंत से एक वाली दृष्टि, ज्ञान, सूझ-बुझ, शिष्य को भी अनंत की तरफ ले जाती है |
वेद धर्म एक संत थे | कई शिष्यों में से उनका एक विशेष शिष्य था संदीपक | उसको कुछ देना चाहा तो परीक्षा भी लेते | और वो सभी परीक्षाओं में पास हो गया | तो वेद धर्म ने अपने संकल्प से अपने शरीर में कोड पैदा कर दिया |
और आँखे देखती नही | अब मैं आश्रम में बोझा नही रहना चाहता | मैं काशी जाऊँगा | संदीपक कहता है गुरूजी मैं सेवा में रहूँगा | अरे तू वहाँ क्या करेगा | कोड़ी शरीर से बदबू आ रही है | गंदा शरीर | नही गुरुदेव, बहुत हाथा-जोड़ी करके सेवा में लग गया | अब भिक्षा माँगकर आवे, गुरूजी को अर्पण करे, बाकि का धो-धाके खट्टा-खारा हटा के दे देवे संदीपक को, बिना स्वाद का | ऐसा करते-करते महीनों की कतारे बीती | शिवजी को जच गया के कैसा साधक गुरु को शिव रूप मानता है | शिवजी प्रकट हुए और बोले तेरे को जो चाहिए वो ले ले मैं तेरे पर प्रसन्न हूँ | काशी का इष्ट-देव मैं हूँ | लोगो को मरने के बाद मुक्ति देता हूँ, जीतेजी तू मुझ से कुछ भी माँग ले | मैं आपसे क्यों मांगू, मेरे तो सद्गुरु हैं | जबतक सद्गुरु नही मिला तब तक इष्ट देव | और सद्गुरु की भक्ति का फल ही ऐसा है | तो तू सद्गुरु के लिए माँग लें | बोले मेरे गुरूजी की आँखे, कोड़ ठीक हो जाये | मैं तो तथास्तु कह दूँ लेकिन अपने गुरु से पूछो और भी कुछ चाहिए तो |
वो गया और कहा गुरूजी शिवजी आये हैं और मैंने आपके लिए नेत्र ज्योति और कोड़ की निवृति माँगी है | ओ दुर्बुद्धि, मैं अपना प्रारब्ध भोग रहा हूँ | ये भिखमंगा शिवजी से ये माँग रहा है मतलब शिवजी इतने प्यारे नही जितना कोड़ मिटाना है | शिवजी अपने आत्मरूप है ये महत्व का नही है जितनी नेत्र है | दुष्ट, दुर्बुद्धि, सेवा नही करनी तो चला जा | भिखारी, मेरे लिए शिवजी से ऐसा माँगता है | गुरूजी ने तो ऐसा डाटा के भागता हुआ शिवजी से आकर बोला के महाराज आप जहाँ से आये वहाँ पधारो | शिवजी भीतर से तो प्रसन्न हुए | बोले अच्छा लगे रहो इनके पीछे | अपने आप रोयेगा | भीतर से तो बड़े प्रसन्न होकर गए | शिवजी विष्णुजी के पास गए और उनको बताया ऐसा-ऐसा है लड़का | भगवान विष्णुजी आये | संदिपक शिवजी तेरी प्रशंसा कर रहे थे, पगले | और मैं तेरे को पहले वरदान नही दूँगा | मैं तेरी गुरु भक्ति पर प्रसन्न हूँ | लोग तो गिडगिडा के थक जाते हैं शिवजी के दर्शन नही होते | लेकिन सद्गुरु मिले अनंत फल ऐसे सद्गुरु की आज्ञा में तू रहता है और सद्गुरु ताड़न-मारन करते है तो भी तेरी श्रद्धा अटूट है | ऐसे सत्पात्र को देखकर हम लोग बहुत प्रसन्न होते हैं | तो मैं तुझसे मिलने आया हूँ | अब तू जैसा भी चाहता है वरदान माँग ले | लेकिन पहले माँगेगा तो गुरूजी नाराज हुए थे | गुरूजी की आज्ञा लेकर फिर माँग | जाओ गुरूजी को बोलो विष्णु आये हैं, तो आपकी क्या आज्ञा है | गुरूजी प्रसन्न होंगे | गुरूजी के पास गए बोले भगवान नारायण पधारे हैं | और उन्होंने ही कहा के आपकी क्या आज्ञा है | बोले अच्छा शिवजी ने तेरी सरहाना की इसलिए नारायण आये हैं | तो तेरे को क्या चाहिए ? बोले गुरूजी मेरी चाह तो अविद्या में भटकाएगी | अविद्या से ही चाह पैदा होती है | अविद्या से ही अधिनिवेश, राग, द्वेष,अस्मिता आती है | आपके ज्ञान से उस अविद्या का पर्दा धुंधला हो गया | अब मेरे को तो अपने लिए क्या चाहिए | गुरूजी जो आपकी आज्ञा होगी वही होगा | अच्छा जाओ देखो नारायण हैं के नही | देखा तो लगता है नारायण भी खड़े हैं, गुरूजी भी खड़े हैं | भागा कमरे में, तो देखा यहाँ भी गुरूजी और नारायण दोनों हैं | और गुरूजी की आँखे, कोड सब ठीक हो गया | नारायण ने कहा बेटा तेरी परीक्षा लेने के लिए तेरे गुरूजी ने ये लीला की थी और हम ने भी लीला की थी |
मेरे गुरूजी का नाम हो, ऐसे मुर्ख लोग क्या समझते हैं के गुरु इतना मुर्ख है के नाम के लिए भटकता है | मान पूड़ी है जहर की जो खाए सो मर जाये, चाह उसी की राखता वो भी अति दुःख पाए |
तो इश्वर तो पाना कठिन नही है लेकिन रूचि नही होती है इश्वर की तरफ | अपने राग-द्वेष के अनुसार ही आदमी खपते जाते हैं | वाह-वाही हो तो बाँछे खिल जाती हैं | और गुरूजी कुछ पात्रता बढाने के लिए कुछ भी बोले तो चल मेरे भैया | जैसे कीड़े-मकोड़े होते हैं जरा सी गर्मी आई तो भागो | जरा सी असुविधा आई तो भागो | चूहे, घोड़े, गधे, ऐसी मेंटेलिटी होती है | कहने भर को शिष्य होते हैं, शिष्यत्व का गुण नही होता | पूरा प्रभु आराधिए, पूरा जा का नाम, नानीक पूरा पाइए, पुरे के गुण-गान | गुरूजी पूर्ण हैं तो शिष्य को भी पूर्ण होना चाहिए | जरा-जरा बात में मन की चाही पूर्ण करे तो पूर्ण कैसे होगा | मन खुद ही अपूर्ण है | मन की चाही में ही रहे तो क्या | मन की चाही में ज्यादा खुश मत होओं | मन के विपरीत भी हो और समता रहे तब बहादुरी है |
तो श्री कृष्ण ने कहा सुखम वा यदि वा दुखम, मन के चाहे में सुख होता है, और विपरीत में दुःख | दुखहार वृति आई उसी में भागते रहते हैं, हिजड़े कहीं के | हिजड़े भी उनसे अच्छे होते हीं | जो गुरु के द्वार डट जाते हैं, सुख-दुःख सब नगण्य है, वो बाजी मार जाते हैं | जो उस सिंद्धांत पर डटे रहे | जरा-जरा बात में आकर्षित-विकर्षित होते तो तुच्छ हो जाते हैं |
महादेव गोविन्द राम के पास उनकी पत्नी २ आम, हापुस और केसर सवार के लाई | जरा टुकड़ा-टुकड़ा खा लिया बोले बाँट दो | आम तो आपको बहुत प्यारे लगते हैं और भूख भी लगी होगी | बोले भूख तो बहुत है, आम मीठे भी हैं और सुगन्धित भी हैं | बोले खाते क्यों नही | बोले जो चीज ज्यादा प्रिय होती है उसकी आसक्ति से बचो | इसलिए बाँट देते हैं | लोग क्या करते हैं जो प्रिय चेला हो उसी की गाड़ी में भागो | प्रिय के पीछे ही भागते हैं, नीच गति को जायेंगे | जीवन में कोई ना कोई सिद्धांत होना चाहिए नही तो ये इन्द्रियां, मन फसायेंगी, रुलायेंगी | वास्तविक प्रिय परमात्मा है | बोले ये करूं, ये ना करूं, ये ठीक है, ये बेठीक है, कभी शिष्य नही है | शिष्य वो है जो गुरु ने कहा वो ठीक है | गुरु जो करते हैं वो ठीक है |
छाती पे चढ़ के गुरु चाकू घुमा रहे हैं गर्दन पे | आँख खुली फिर आँख बंद कर दी | गुरूजी ने थोड़ी खून की बूंद निकाली, बड के पत्ते पर साँप को दे दिया, गया | बांध दिया | चेला राजकुमार था, चेला हो गया | शाम हुई चलने लगे | बोले मैं तेरी छाती पर बैठ गया था, तुने आँख खोली फिर बंद क्यों कर दी | मेरे हाथ में छुरा था | बोले छाती पर बैठे तो नींद खुल गयी | फिर देखा के गुरूजी के हाथ में छुरा है तो जो भी होगा भला होगा | बेटा तेरे अगले जन्म का कोई प्रारब्ध होगा | तो साँप आया था तुझे काँटने, तो मैंने उसको रोका | तो बोला मैं अभी तो चला जाऊँगा, लेकिन मैंने इसके गले का खून तो पीना है, फिर कभी आऊंगा | गुरु ने कहा किसी भी जन्म में काहेको | अभी मैं दे देता हूँ | शिष्य ने कहा गुरूजी मेरे समर्पण में कोई कमी है इसलिए आपको क्लेरिफिकेशन देना पड़ता है | नही तो जब मैं गुरु की शरण हो गया तो चाहे सर काटे, चाहे ऊँगली काटे की जन्मो में मुर्गे, बकरी होकर कट गए | कट-मर भी जाते तो भी गुरु के हाथो से | मेरे समर्थन की कमी है इसलिए आपको बताना पड़ता है के ऐसा-ऐसा | गुरु ने कहा शाबाश है |
तो ये सब जो खिचाव, तनाव, पलायनवादी, फिसलना है ये ५ दोषों में ही आ जाता है | तो अविद्या को मिटाना चाहिए | सत्संग से जितनी सहेज में अविद्या मिटती है, उतना ६०,००० वर्ष की तपस्या से भी नही मिटती है | ६०,००० वर्ष की तपस्या के बाद भी सोने की लंका बनाने की वासना लगी | रावण, हिरण्यकश्यप का क्या हुआ दुनिया जानती है | शबरी भिलन को मतंग गुरु का ज्ञान मिला तो ऐसा आत्म वैभव जगा के शबरी के झूठे बेर खाकर भगवान सरहाना करते हैं |
आत्मलाभ सर्वोपरी लाभ है | आत्मज्ञान सर्वोपरी ज्ञान है | आत्मसुख सर्वोपरी सुख है | इसके लिए गम्भीर होना चाहिए | हरि ॐ हरि ॐ   ………. |

About Asaram Bapuji

Asumal Sirumalani Harpalani, known as Asaram Bapu, Asharam Bapu, Bapuji, and Jogi by his followers, is a religious leader in India. Starting to come in the limelight in the early 1970s, he gradually established over 400 ashrams in India and abroad.