पुरुषार्थ बड़ा कि प्रारब्ध ?

होगा वही जो राम ने रचा होगा

प्रारब्ध पहले रचा पीछे रचा शरीर

भगवान का भजन करो क्योंकि भक्ति सब साधन का मूल है

हम जो सब चाहते हैं वह होता नहीं जो सब होता है वह भाता नहीं

संसार के पद कभी नहीं टिकते

अगर हम सब प्रारंभ पर छोड़ देंगे तो निकम्मे हो जाएंगे

रावण का प्रसंग

युक्ति से भक्ति मिलती है

तीन प्रकार का प्रारब्ध

पुरुषार्थ में प्रारब्ध को मिटाने की ताकत

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