मातृ-पितृ पूजन दिवस मनायें – (१४ फरवरी)

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मातृ-पितृ पूजन दिवस मनायें – (१४ फरवरी)
वेलेन्टाइन डे नहीं

मातृ-पितृ पूजन दिवस मनायें

(१४ फरवरी)

प्रिय आत्मन्,

हरि ॐ दिनाँक १४ फरवरी को सभी साधक भाई-बहन अपने घरों में अथवा सामूहिक रूप से मातृ-पितृ पूजन दिवस मनायें। बाल संस्कार केन्द्र संचालक अपने केन्द्र में बच्चों के माता-पिता को बुला कर सामूहिक कार्यक्रम कर सकते हैं। पूज्यश्री के इस पावन संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचायें। अपने क्षेत्र के समाचार-पत्र में पूज्यश्री का संदेश प्रकाशित करवायें। कार्यक्रम का लिखित विवरण एवं समाचार-पत्र की कटिंग (यदि समाचार पत्र में दिया हो तो) बाल संस्कार विभाग, अमदावाद मुख्यालय को अवश्य भेजें।

विश्व मानव की मंगल कामना से भरे पूज्य बापू जी का परम हितकारी संदेश पढ़ें- पढ़ायें।

भारतभूमि ऋषि-मुनियों, अवतारों की भूमि है। पहले लोग यहाँ मिलते तो राम राम कहकर एक दूसरे का अभिवादन करते थे।

दो बार राम कहने के पीछे कितना सुंदर अर्थ छुपा है कि सामने वाला व्यक्ति तथा मुझमें दोनों में उसी राम परमात्मा ईश्वर की चेतना है, उसे प्रणाम हो! ऐसी दिव्य भावना को प्रेम कहते हैं। निर्दोष, निष्कपट, निःस्वार्थ, निर्वासनिक स्नेह को प्रेम कहते हैं। इस प्रकार एक दूसरे से मिलने पर भी ईश्वर की याद ताजा हो जाती थी पर आज ऐसी भावना तो दूर की बात है, पतन करने वाले आकर्षण को ही प्रेम माना जाने लगा है।

१४ फरवरी को पश्चिमी देशों में युवक युवतियाँ एक दूसरे को ग्रीटिंग कार्डस, फूल आदि देकर वेलेन्टाइन डे मनाते हैं। यौन जीवन संबंधी परम्परागत नैतिक मूल्यों का त्याग करने वाले देशों की चारित्रिक सम्पदा नष्ट होने का मुख्य कारण ऐसे वेलेन्टाइन डे हैं जो लोगों को अनैतिक जीवन जीने को प्रोत्साहित करते हैं। इससे उन देशों का अधःपतन हुआ है। इससे जो समस्याएँ पैदा हुईं, उनको मिटाने के लिए वहाँ की सरकारों को स्कूलों में केवल संयम अभियानों पर करोड़ों डालर खर्च करने पर भी सफलता नहीं मिलती। अब यह कुप्रथा हमारे भारत में भी पैर जमा रही है। हमें अपने परम्परागत नैतिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए ऐसे वेलेन्टाइन डे का बहिष्कार करना चाहिए।

इसे य़ुवाधन विनाश डे संबोधित कर इसके भयंकर परिणामों से अवगत कराते हुए परम पूज्य बापू जी कहते हैं-

रोम के राजा क्लाउडियस ब्रह्मचर्य की महिमा से परिचित रहे होंगे, इसलिए उन्होंने अपने सैनिकों को शादी करने के लिए मना किया था, ताकि वे शारीरिक बल और मानसिक दक्षता से युद्ध में विजय प्राप्त कर सकें। सैनिकों को शादी करने के लिए ज़बरदस्ती मना किया गया था, इसलिए संत वेलेन्टाइन जो स्वयं इसाई पादरी होने के कारण ब्रह्मचर्य के विरोधी नहीं हो सकते थे, ने गुप्त ढंग से उनकी शादियाँ कराईं। राजा ने उन्हे दोषी घोषित किया और उन्हें फाँसी दे दी गयी। सन् 496 से पोप गैलेसियस ने उनकी याद में वेलेन्टाइन डे मनाना शुरू किया।

वेलेन्टाइन डे मनाने वाले लोग संत वेलेन्टाइन का ही अपमान करते हैं क्योंकि वे शादी के पहले ही अपने प्रेमास्पद को वेलेन्टाइन कार्ड भेजकर उनसे प्रणय-संबंध स्थापित करने का प्रयास करते हैं। यदि संत वेलेन्टाइन इससे सहमत होते तो वे शादियाँ कराते ही नहीं।

प्रेम दिवस (वेलेन्टाइन डे) जरूर मनायें लेकिन संयम और सच्चा विकास प्रेम दिवस में लाना चाहिए। युवक-युवती मिलेंगे तो विनाश दिवस बनेगा।

कहाँ तो………. परस्परं भावयन्तु……… हम एक दूसरे को उन्नत करें। तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु…. मेरा मन सदैव शुभ विचार ही किया करे। इस प्रकार की दिव्य भावना को जगाने वाले हमारे रक्षाबंधन, भाईदूज जैसे पर्व और कहाँ यह वासना, अभद्रता को बढ़ावा देने वाला वेलेन्टाइन डे।

यदि इसके परिणामों को देखा जाए तो आगे चलकर यह चिड़चिड़ापन, डिप्रैशन, खोखलापन, जल्दी बुढ़ापा और मौत लाने वाला दिवस साबित होगा। अतः भारतवासी इस अंधपरंपरा से सावधान हों! तुम भारत के लाल और लालियाँ (बेटियाँ) हो। प्रेम दिवस मनाओ, अपने माता-पिता का सम्मान करो और माता-पिता बच्चों को स्नेह करें। करोगे ने बेटे ऐसा! पाश्चात्य लोग विनाश की ओर जा रहे हैं। वे लोग ऐसे दिवस मना कर यौन रोगों का घर बन रहे हैं। अशांति की आग में तप रहे हैं। उनकी नकल तो नहीं करोगे?

मेरे प्यारे युवक-युवतियो और उनके माता-पिता! आप भारतवासी हैं। दूरदृष्टि के धनि ऋषि-मुनियों की संतान हैं। प्रेम दिवस (वेलेन्टाइन डे) के नाम पर बच्चों, युवान युवतियों की कमर टूटे, ऐसे दिवस का त्याग करके तथा प्रभु के नाते एक दूसरे को प्रेम करके अपने दिल के परमेश्वर को छलकने दें। काम विकार नहीं, रामरस… प्रभुरस…. प्रभुरस….

मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। बालिकादेवो भव। कन्यादेवो भव। पुत्रदेवो भव।

प्रेम दिवस वास्तव में सबमें छुपे हुए देव को प्रीति करने का दिवस है। देशवासी और विश्ववासी, सबका मंगल हो। भारत के भाई-बहनों! ऐसा आचरण करो, मेरे विश्व के भाई-बहनों का भी मंगल हो। उनका अनुकरण आप क्यों करें? आपका अनुकरण करके वे सदभागी हो जायें।

सभी राष्ट्रभक्त नागरिकों को यह राष्ट्रहित का कार्य करके भावी सुदृढ़ राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देना चाहिए।

कैसे मनायें मात-पितृ पूजन दिवस?

इस दिन बच्चे-बच्चियाँ अपने माता-पिता को प्रणाम करें तथा माता-पिता अपनी संतानों को प्रेम करें। संतान अपने माता पिता के गले लगे। इससे वास्तविक प्रेम का विकास होगा। बेटे-बेटियाँ अपने माता-पिता में ईश्वरीय अंश देखें और माता-पिता बच्चों में ईश्वरीय अंश देखें।

बच्चे-बच्चियाँ अपने माता-पिता का तिलक, पुष्प आदि के द्वारा पूजन करें। माता-पिता भी बच्चों को तिलक करें, आशीर्वचन कहें।

माता-पिता का पूजन करते हैं तो काम राम में बदलेगा, अहंकार प्रेम में बदलेगा, माता-पिता के आशीर्वाद से बच्चों का मंगल होगा।

बालक गणेषजी की पृथ्वी परिक्रमा, भक्त पुण्डलिक की मातृ-पितृ भक्ति, श्रवण कुमार की मातृ-पितृ भक्ति – इन कथाओं का पठन करें अथवा कोई एक व्यक्ति कथा सुनाये और अन्य लोग श्रवण करें।

इस दिन बच्चे बच्चियाँ पवित्र संकल्प करें – मैं अपने माता-पिता व गुरूजनों का आदर करूँगा/करूँगी। मेरे जीवन को महानता के रास्ते ले जाने वाली उनकी आज्ञाओं का पालन करना मेरा कर्त्तवय है और मैं उसे अवश्य पूरा करूँगा/करूँगी।

माता-पिता बाल संस्कार, युवाधन सुरक्षा, तू गुलाब होकर महक,   मधुर व्यवहार – इन पुस्तकों को अपनी क्षमतानुरूप बाँटे बँटवायें तथा प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा स्वयं पढ़ने का तथा बच्चों से पढ़ाने का संकल्प लें। श्री गणेष, पुण्डलिक, श्रवण कुमार आदि मातृ-पितृ भक्त बालकों की कथाओं को नाटक के रूप में प्रस्तुत करें।

(1) मात-पिता गुरू चरणों में प्रभु… (भजन दीपांजली कैसेट से) (2) भूलो सभी को तुम मगर… ऐसे भजनों का गान करें। इस दिन सभी मिलकर श्री आसारामायण पाठ व आरती करके बच्चों को मधुर प्रसाद बाँटें। नीचे लिखी पंक्तियाँ जैसी मातृ-पितृ भक्ति की कुछ पंक्तियाँ गत्ते पर लिख कर बोर्ड बना कर आयोजन स्थल पर लगायें। 1. बहुत रात तक पैर दबाते, भरे कंठ पित आशिष पाते। 2. पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम। लोगों के तुमसे सदा, पूरण होंगे काम। 3. मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव।

विश्वमंगल की कामना से भरे परम पूज्य बापू जी का परम हितकारी संदेश पढ़ें पढ़ायें। वेलेन्टाइन डे नहीं मातृ-पितृ पूजन दिवस मनायें।

मातृ-पितृ-गुरू भक्ति

अपनी भारतीय संस्कृति बालकों को छोटी उम्र में ही बड़ी ऊँचाईयों पर ले जाना चाहती है। इसमें सरल छोटे-छोटे सूत्रों द्वारा ऊँचा, कल्याणकारी ज्ञान बच्चों के हृदय में बैठाने की सुन्दर व्यवस्था है।

मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। माता-पिता एवं गुरू हमारे हितैषी है, अतः हम उनका आदर तो करें ही, साथ ही साथ उनमें भगवान के दर्शन कर उन्हें प्रणाम करें, उनका पूजन करें। आज्ञापालन के लिए आदरभाव पर्याप्त है परन्तु उसमें प्रेम की मिठास लाने के लिए पूज्यभाव आवश्यक है। पूज्यभाव से आज्ञापालन बंधनरूप न बनकर पूजारूप पवित्र, रसमय एवं सहज कर्म हो जाएगा।

पानी को ऊपर चढ़ाना हो तो बल लगाना पड़ता है। लिफ्ट से कुछ ऊपर ले जाना हो तो ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। पानी को भाप बनकर ऊपर उठना हो तो ताप सहना पड़ता है। गुल्ली को ऊपर उठने के लिए डंडा सहना पड़ता है। परन्तु प्यारे विद्यार्थियो! कैसी अनोखी है अपनी भारतीय सनातन संस्कृति कि जिसके ऋषियों महापुरूषों ने इस सूत्र द्वारा जीवन उन्नति को एक सहज, आनंददायक खेल बना दिया।

इस सूत्र को जिन्होंने भी अपना बना लिया वे खुद आदरणीय बन गये, पूजनीय बन गये। भगवान श्रीरामजी ने माता-पिता व गुरू को देव मानकर उनके आदर पूजन की ऐसी मर्यादा स्थापित की कि आज भी मर्यादापुरूषोत्तम श्रीरामजी की जय कह कर उनकी यशोगाथा गाय़ी जाती है। भगवान श्री कृष्ण ने नंदनंदन, यशोदानंदन बनकर नंद-घर में आनंद की वर्षा की, उनकी प्रसन्नता प्राप्त की तथा गुरू सांदीपनी के आश्रम में रहकर उनकी खूब प्रेम एवं निष्ठापूर्वक सेवा की। उन्होंने युधिष्ठिर महाराज के राजसूय यज्ञ में उपस्थित गुरूजनों, संत-महापुरूषों एवं ब्राह्मणों के चरण पखारने की सेवा भी अपने जिम्मे ली थी। उनकी ऐसी कर्म-कुशलता ने उन्हें कर्मयोगी भगवान श्री कृष्ण के रूप में जन-जन के दिलों में पूजनीय स्थान दिला दिया। मातृ-पितृ एवं गुरू भक्ति की पावन माला में भगवान गणेष जी, पितामह भीष्म, श्रवणकुमार, पुण्डलिक, आरूणि, उपमन्यु, तोटकाचार्य आदि कई सुरभित पुष्प हैं।

तोटक नाम का आद्य शंकराचार्य जी का शिष्य, जिसे अन्य शिष्य अज्ञानी, मूर्ख कहते थे, उसने आचार्यदेवो भव सूत्र को दृढ़ता से पकड़ लिया। परिणाम सभी जानते हैं कि सदगुरू की कृपा से उसे बिना पढ़े ही सभी शास्त्रों का ज्ञान हो गया और वे तोटकाचार्य के रूप में विख्यात व सम्मानित हुआ। वर्तमान युग का एक बालक बचपन में देर रात तक अपने पिताश्री के चरण दबाता था। उसके पिता जी उसे बार-बार कहते – बेटा! अब सो जाओ। बहुत रात हो गयी है। फिर भी वह प्रेम पूर्वक आग्रह करते हुए सेवा में लगा रहता था। उसके पूज्य पिता अपने पुत्र की अथक सेवा से प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद देते –

पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम। लोगों के तुमसे सदा, पूरण होंगे काम।

अपनी माताश्री की भी उसने उनके जीवन के आखिरी क्षण तक खूब सेवा की।

य़ुवावस्था प्राप्त होने पर उस बालक भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की भांति गुरू के श्रीचरणों में खूब आदर प्रेम रखते हुए सेवा तपोमय जीवन बिताया। गुरूद्वार पर सहे वे कसौटी-दुःख उसके लिए आखिर परम सुख के दाता साबित हुए। आज वही बालक महान संत के रूप में विश्ववंदनीय होकर करोड़ों-करोड़ों लोगों के द्वारा पूजित हो रहा है। ये महापुरूष अपने सत्संग में यदा-कदा अपने गुरूद्वार के जीवन प्रसंगों का जिक्र करके कबीरजी का यह दोहा दोहराते हैं –

गुरू के सम्मुख जाये के सहे कसौटी दुःख। कह कबीर ता दुःख पर कोटि वारूँ सुख।।

सदगुरू जैसा परम हितैषी संसार में दूसरा कोई नहीं है। आचार्यदेवो भव, यह शास्त्र-वचन मात्र वचन नहीं है। यह सभी महापुरूषों का अपना अनुभव है।

मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। यह सूत्र इन महापुरूष के जीवन में मूर्तिमान बनकर प्रकाशित हो रहा है और इसी की फलसिद्धि है कि इनकी पूजनीया माताश्री व सदगुरूदेव – दोनों ने अंतिम क्षणों में अपना शीश अपने प्रिय पुत्र व शिष्य की गोद में रखना पसंद किया। खोजो तो उस बालक का नाम जिसने मातृ-पितृ-गुरू भक्ति की ऐसी पावन मिसाल कायम की।

आज के बालकों को इन उदाहरणों से मातृ-पितृ-गुरूभक्ति की शिक्षा लेकर माता-पिता एवं गुरू की प्रसन्नता प्राप्त करते हुए अपने जीवन को उन्नति के रास्ते ले जाना चाहिए।

माँ-बाप को भूलना नहीं

भूलो सभी को मगर, माँ-बाप को भूलना नहीं।

उपकार अगणित हैं उनके, इस बात को भूलना नहीं।।

पत्थर पूजे कई तुम्हारे, जन्म के खातिर अरे।

पत्थर बन माँ-बाप का, दिल कभी कुचलना नहीं।।

मुख का निवाला दे अरे, जिनने तुम्हें बड़ा किया।

अमृत पिलाया तुमको जहर, उनको उगलना नहीं।।

कितने लड़ाए लाड़ सब, अरमान भी पूरे किये।

पूरे करो अरमान उनके, बात यह भूलना नहीं।।

लाखों कमाते हो भले, माँ-बाप से ज्यादा नहीं।

सेवा बिना सब राख है, मद में कभी फूलना नहीं।।

सन्तान से सेवा चाहो, सन्तान बन सेवा करो।

जैसी करनी वैसी भरनी, न्याय यह भूलना नहीं।।

सोकर स्वयं गीले में, सुलाया तुम्हें सूखी जगह।

माँ की अमीमय आँखों को, भूलकर कभी भिगोना नहीं।।

जिसने बिछाये फूल थे, हर दम तुम्हारी राहों में।

उस राहबर के राह के, कंटक कभी बनना नहीं।।

धन तो मिल जायेगा मगर, माँ-बाप क्या मिल पायेंगे?

पल पल पावन उन चरण की, चाह कभी भूलना नहीं।।

About Asaram Bapuji

Asumal Sirumalani Harpalani, known as Asaram Bapu, Asharam Bapu, Bapuji, and Jogi by his followers, is a religious leader in India. Starting to come in the limelight in the early 1970s, he gradually established over 400 ashrams in India and abroad.