व्यवहार – कुशलता के आदर्श : श्रीरामजी

 

Lord rama

व्यवहार – कुशलता के आदर्श : श्रीरामजी

व्यवहार – कुशलता के आदर्श : श्रीरामजी 
सीता-स्वयंवर में गुरु विश्वामित्रजी की आज्ञा पाकर श्रीरामजी ने शिवजी का धनुष तोडा | उसी समय परशुरामजी वहाँ आ पहुँचे | वे शिवजी के टूटे हुए धनुष को देख क्रोध से तिलमिला उठे और गरजकर बोले : “जिसने भी शिवजी के धनुष को तोडा है, वह सहस्त्रबाहू के सामान मेरा शत्रु है | वह इस समाज को छोडकर अलग हो जाय नहीं तो यहाँ उपस्थित सारे राजा मारे जायेंगे |”

यह सुन लक्ष्मणजी अधीर हो उठे और परशुरामजी को अपमानयुक्त वचन बोलने लगे | लक्ष्मणजी और परशुरामजी में वाद-विवाद बढ़ने लगा | वातावरण बिगड़ता देख श्रीरामजी ने नेत्रों के इशारे से लक्ष्मणजी को रोक दिया और परशुरामजी की क्रोधाग्नि को शांत करने के लिए हाथ जोडकर जल के समान शीतल वचन बोले : “हे मुनीश्वर ! इस छोटा बच्चा और अपना सेवक जानकार इस पर कृपा कीजिये | बालक यदि कुछ चपलता भी करता है तो गुरु, पिता और माता उसे देखकर आनंदित होते हैं | आप तो समदर्शी, सुशील, धीर और ज्ञानी मुनि हैं | आपका अपराधी तो मैं हूँ | कृपा, क्रोध, वध, बंधन जो कुछ करना हो दास समझकर मुझ पर कीजिये |”

“तेरा यह भाई तेरी ही सम्मति से कटु वचन बोलता है और तू छल से हाथ जोडकर विनय करता है ! या तो तू युद्ध कर, नहीं तो राम कहलाना छोड़ दे |” इस प्रकार अपमानयुक्त वचन कहकर परशुरामजी ने कुठार (फरसा) उठा लिया |

तब धैर्य के मूर्तिमंतस्वरुप श्रीरामजी बड़ी विनम्रता से सिर झुकाकर बोले : “हे मुनीश्वर ! आपके हाथ में कुठार है और मेरा सिर आगे है | जिस प्रकार आपका क्रोध शांत हो, वाही कीजिये | स्वामीऔर सेवक में युद्ध कैसा ! हमारी और आपकी बराबरी कैसी ! कहाँ मेरा राममात्र छोटा-सा नाम और कहाँ आपका ‘परशु’ सहित बड़ा नाम (परशुराम) !”

इतना विनम्र होने पर भी जब परशुरामजी का क्रोध शांत नहीं हुआ बल्कि इसके विपरीत वे रामजी को और भी अपमानित और लांछित करने लगे तब श्रीरामजी ने कहा : “हे भृगुनाथ ! यह सत्य सुनिये, संसार में ऐसा कौन योद्धा हैं, जिसे हम डर के मारे मस्तक नवायें ! यदि रण में हमें कोई भी ललकारें तो हम उससे सुखपूर्वक लड़ेंगे |क्षत्रिय का शरीर धरकर जो युद्ध से डर गया, उस नीच ने अपने कुल पर कलंक लगा दिया | रघुवंशी रण में काल से भी नहीं डरते | पर ब्राम्हणदेव ! आपकी ऐसी प्रभुता है कि जो आपसे डरता है वह सबसे निर्भय हो जाता है |”

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसे कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजी का क्रोध तो शांत हो गया लेकिन अपने मन का संदेह दूर करने के लिए उन्होंने श्रीरामजी धनुष देने लगे, धनुष अपने-आप ही चला गया | यह देख वे आश्चर्यचकित हो गये | तब उन्हें श्रीरामजी के बल, प्रभाव व महिमा का पता चला | उन्होंने श्रीरामजी से क्षमायाचना की और उनको अनुपम स्तुति करके तप के लिए वन को चले गये |

कैसी अदभुत है श्रीरामजी की व्यवहार कुशलता ! गुरूजी के प्रति ऐसा आज्ञापालन कि स्वयंवर में गुरु विश्वामित्रजी की आज्ञा मिलने पर ही उन्होंने धनुष तोडा | छोटों के प्रति स्नेह व अनुशासन भरा व्यवहार भी इतना विलक्षण कि लक्ष्मणजी द्वारा अनुचित व्यवहार करने पर उन्हें भरी सभ में अपमानित न करते हुए केवल नेत्रों के संकेत से चुप करा दिया | नम्रता, समता, धैर्य व सर्वहितकारिता की साक्षात् मूर्ति भी ऐसे कि जब परशुरामजी खूब अधिक कोपायमान हुए, कुठार द्वारा उनका वध करने को आतुर हो गये, तब भी श्रीरामजी ने मधुर वचन बोलना व मधुर व्यवहार करना नहीं छोड़ा | न घबराये, न गिडगिडाये अपितु उनका क्रोध व तपन किस प्रकार शांत हो और उन्हें सिख प्राप्त हो, इसी उद्देश्य से उन्हें मना लिया | शौर्य भी इतना कि जब श्रीरामजी ने देखा कि क्षमायाचना से काम नहीं बन रहा है तो महायोद्धा परशुरामजी की युद्ध की चुनौती स्वीकार करके उन्होंने अपने रघुकुल की वीरता का परिचय भी दिया |

श्रीरामजी के ये सद्गुण सभीके लिए व्यवहार – कुशलता का मार्ग प्रशस्त करते है |

About Asaram Bapuji

Asumal Sirumalani Harpalani, known as Asaram Bapu, Asharam Bapu, Bapuji, and Jogi by his followers, is a religious leader in India. Starting to come in the limelight in the early 1970s, he gradually established over 400 ashrams in India and abroad.