सत्य में विश्रांति … प.पू. संत श्री आशारामजी बापू

 

सत्य में विश्रांति

सत्य रसमय स्वरुप है … प.पू. संत श्री आशारामजी बापू

मिथ्या का उपयोग करके अपने लिए और दूसरों के लिए सुखद हो जाओगे | अपने लिए और दूसरों के लिए क्या रसमय होता है, सत्य रसमय स्वरुप है | भागवात में आता है – हे परमात्मा रसस्वरूप है, जब उसका रस मिलेगा ये संसारी विकार आपको उल्लु नही बनायेंगे, संसारी विकारों में आप रस लेने के गिरते  है | अंदर का रस नहीं मिला तो बीडी से रस लेते है, पान-मसाले से रस लेते है | पान-मसाला में जो चीजें डालते है उसमे से कई चीजें जानवरों के चमड़े के रस निकालते है और उसी से पावडर बनाके वो पान-मसाला में डालते है और भी ऐसी वैसी चीजें, तो ये पान-मसाला क्यूँ खाते है ? रस के लिए | रस का ही पुजारी है क्योंकि वास्तव में उत्पत्ति रसस्वरूप चैतन्य से हुई है, तो दिन-रात इन चीजों के द्वारा बाहर से रस भीतर भरता है, तो मिथ्या में मिथ्या और गिरता है | एक होती है आवश्यकता, दूसरी होती वासना, तीसरी होती है जिज्ञासा | आवश्यकता की पूर्ति आसानी से होती है, जैसे भूख में रोटी की आवश्यकता है, प्यास में पानी की आवश्यकता है, आँधी-तूफान में घर की आवश्यकता है, ठंडी में स्वेटर या कपडे की आवश्यकता है, गर्मी में ठंडी हवा की आवश्यकता है | ये आवश्यकता प्राकृतिक ढंग से आरंभ से पूरी होती है, लेकिन इच्छा नई-नई  पैदा होती रहती है, इच्छा-इच्छा में और मिथ्या में उलझ के अशांत हो जाता है | जितना बड़ा आदमी उतनी जरा-जरा बातों में दु:खी होगा, सामान्य आदमी जो गर्मी सह लेता है, बड़ा आदमी इतनी गर्मी नही सहन कर पायेगा | सामान्य आदमी मान-अपमान जितना पचा लेगा, बड़े आदमी इतना नही पचा पायेगा क्योंकि आदत पड़ गयी मान की | तो मान भी मिथ्या है, अपमान भी मिथ्या है, गर्मी भी मिथ्या है, सर्दी भी मिथ्या है |

ये सब प्रकृति का है बदलनेवाला है अनित्य और तुम नित्य हो | जब सिगरेट की शरण लेते है, शराब की शरण लेते है, मांस की शरण लेते है, राग-द्वेष की शरण लेते है, प्राकृतिक की चीजों में आसक्ति की शरण लेते है तो बुद्धि में परमात्मा प्रकाश जितना हम ले सकते है उतना नहीं ले पाते इसीलिए  सत्यानाश हो जाता है | अगर हम अपनी आवश्यकता के अनुसार, शरीर के स्वास्थ्य के अनुसार भोजन करें, व्यर्थ के शराब, कबाब, दुराचार ये नही करते तो तुम्हारी बुद्धि में सत्य का प्रकाश ज्यादा होगा |

भगवानदास डॉक्टर थे, अस्पताल अच्छी चलती थी | धनराज पंडित सूरदास थे डॉक्टर मुझे तुम्हारे घरपर भोजन मिल जायेगा ! बोले महाराज अभी पूछ लेता हूँ, पत्नी से कहा स्नान करके रसोई में गई हूँ  एक घंटे में सब तैयार हो जायेगा | महाराज एक घंटे के बाद आ जाना, बोले अंधा आदमी मै सूरदास कहाँ एक घंटे जावू ? तुम्हारे दवाखाना में जगह हो तो बैठ जाता हूँ| महाराज बैठो, मरीजों को दवा दिया जब टाइम मिला तो धनराज पंडित को डॉक्टर भगवानदास ने पूछा की महाराज परमात्मा का नाम ॐस्वरुप है, अंतर्यामी है, उसका उच्चारण करके उसमे शांत होते है तो सामर्थ्य आता है | अरे बोले –ॐकार प्रणव सब वेदांत है….. महाराज ने सत्संग चालू कर दिया ……. डॉक्टर भगवानदास दंग रहे की इतना…….. कल भी आना, कुछ दिन महाराज आये डॉक्टर ने कहा की, बाबा आप की आज्ञा हो तो मै पण्डित अम्बाप्रसाद शास्त्री, जो विद्वानों में प्रसिद्ध है उनको बुलाऊ और आप ॐकार विषय पर बोलते है वो लिखते जाए | बोले बुलाओ ….. अम्बाप्रसाद लिखे जाए और वो सूरदास महाराज धनराजजी बोलते जाए १००-२००, ५०० नही १००० श्लोक जब आ गए तो उस भगवानदास को आश्चर्य हुआ की इतना सारा ॐकार मंत्र के विषय में आप कहाँ से लाये… अरे बोले गार्गायण ऋषि ने ॐकार मंत्र की शक्ति को खोजा था | गार्गायण संहिता थी अभी उपलब्ध नहीं है, मिलती नहीं फिर भी है, २२ हजार श्लोक बोल दिए गार्गायण संहिता के ॐकार मंत्र महिमा के | सत जो है वो चित्त है, वो आनंदस्वरूप है, वो शास्वत है, तो हमारी असली जिगरी जान आत्मा है और शरीर साधन है | जैसे गाडी मिली यात्रा के लिए, ऐसे शरीर मिला इश्वर प्राप्ति के लिए | तो शरीर चले जाए और प्रकृति के आकर्षण में रहे और मरने के बाद प्रेत हो के भटकते रहे | गुरुमंत्र भगवान की चोटी, चोटी पकड़ी तो चोटीवाला जहाँ भी जायेगा आप वही चले जाओगे |

तुलसीदास कहते है – नाम जपत मगल दिशा दशो |

भगवान नाम का आश्रय लो और भगवान के स्वभाव को जानो | मै प्राणिमात्र का सुहृदय हूँ ऐसा जो मानता है वो शांति पाता है | अशान्तस्य कुतं सुखं शान्तस्य कुतं दुखं, परमात्म में शांत हो जा | ॐकार में सब वेदों में मेरा स्वरुप है | तो ॐकार जल्दी-जल्दी जपोंगे तो पाप नाशिनी उर्जा पैदा होती है, ॐकार को धीरे-धीरे जपोंगे तो कार्य साफल्य उर्जा पैदा होती है, अगर ॐकार का प्लुत जपोंगे तो उस सत्य में विश्रांति मिलेगी |

ॐ ॐ ॐ …………..

 

 

About Asaram Bapuji

Asumal Sirumalani Harpalani, known as Asaram Bapu, Asharam Bapu, Bapuji, and Jogi by his followers, is a religious leader in India. Starting to come in the limelight in the early 1970s, he gradually established over 400 ashrams in India and abroad.