अग्निपुराण भाग- ४२

agnipuran||श्रीहरि:||
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

अग्निपुराण

अध्याय – ४२

तीर्थ माहात्म्य

अग्निदेव कहते है – अब मैं सब तीर्थों का माहात्म्य बताऊँगा, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है | जिसके हाथ, पैर और मन भलीभाँति संयम में रहे तथा जिसमें विद्या, तपस्या और उत्तम कीर्ति हो, वहीं तीर्थ के पूर्ण फल का भागी होता है | जो प्रतिग्रह छोड़ चूका है, नियमित भोजन करता और इन्द्रियों को काबू में रखता है, वह पापरहित तीर्थयात्री सब यज्ञों का फल पाता है | जिसने कभी तीन राततक उपवास नहीं किया; तीर्थों की यात्रा नहीं की और सुवर्ण एवं गौ का दान नहीं किया, वह दरिद्र होता है | यज्ञ से जिस फल की प्राप्ति होती है, वही तीर्थ सेवन से भी मिलता है ||१-४||

ब्रह्मन ! पुष्कर श्रेष्ठ तीर्थ है | वहाँ तीनों संध्याओं के समय दस हजार कोटि तीर्थों का निवास रहता है | पुष्कर में सम्पूर्ण देवताओं के साथ ब्रह्माजी निवास करते है | सब कुछ चाहनेवाले मुनि और देवता वहाँ स्नान करके सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं | पुष्कर में देवताओं और पितरों की पूजा करनेवाले मनुष्य अश्वमेधयज्ञ का फल प्राप्त करके ब्रह्मलोक में जाते है | जो कार्तिक की पूर्णिमा को वहाँ अन्नदान करता हैं, वह शुद्धचित्त होकर ब्रह्मलोक का भागी होता हैं | पुष्कर में जाना दुष्कर हैं, पुष्कर में तपस्या का सुयोग मिलना दुष्कर है पुष्कर में दान का अवसर प्राप्त होना भी दुष्कर है और वहाँ निवास का सौभाग्य होना तो अत्यंत ही दुष्कर है | वहाँ निवास, जप और श्राद्ध करनेसे मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियों का उद्धार करता है | वहीँ जम्बूमार्ग तथा तंडुलिकाश्रम तीर्थ भी है ||५-९||

(अब अन्य तीर्थों के विषय में सुनो) कण्वाश्रम, कोटितीर्थ, नर्मदा और अर्बुद (आबू) भी उत्तम तीर्थ हैं | चर्मन्वती (चम्बल), सिन्धु, सोमनाथ, प्रभास, सरस्वती-समुद्र-संगम तथा सागर भी श्रेष्ठ तीर्थ है | पिंडारक क्षेत्र, द्वारका और गोमती – ये सब प्रकार की सिद्धि देनेवाले तीर्थ हैं | भूमितीर्थ, गिरीन्द्रतीर्थ, पापनाशिनी देविका नदी, पवित्र विनशनतीर्थ (कुरुक्षेत्र), नागोभ्देद, अघार्दन तथा कुमारकोटि तीर्थ – ये सब कुछ देनेवाले बताये गये हैं | ‘मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, कुरुक्षेत्र में निवास करूँगा’ जो सदा ऐसा कहता हैं, वह शुद्ध हो जाता है और उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है | वहाँ विष्णु आदि देवता रहते हैं | वहाँ निवास करनेसे मनुष्य श्रीहरि के धाम में जाता हैं | कुरुक्षेत्र में समीप ही सरस्वती बहती है | उसमें स्नान करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोक का भागी होता है | कुरुक्षेत्र की धूलि भी परम गति की प्राप्ति कराती है | धर्मतीर्थ, सुवर्णतीर्थ, परम उत्तम गंगाद्वार (हरिद्वार), पवित्र तीर्थ कनखल, भद्र्कर्ण-हृद, गंगा-सरस्वती-संगम और ब्रह्मावर्त – ये पापनाशक तीर्थ हैं ||१०-१७||

भृततुंग, कुब्जाम्र तथा गंगोभ्देद – ये भी पापों को दूर करनेवाले हैं | वाराणसी (काशी)सर्वोत्तम तीर्थ हैं | उसे श्रेष्ठ अविमुक्त क्षेत्र भी कहते है | कपाल-मोचनतीर्थ भी उत्तम है, प्रयाग तो सब तीर्थो का राजा ही है | गोमती और गंगा का संगम भी पावन तीर्थ हैं | गंगाजी कहीं भी क्यों न हों, सर्वत्र स्वर्गलोक की प्राप्ति करानेवाली हैं | राजगृह पवित्र तीर्थ है | शालग्राम तीर्थ पापों का नाश करनेवाला है | वटेश, वामन तथा कालिका संगम तीर्थ भी उत्तम है ||१८-२०||

लौहित्य तीर्थ, करतोया नदी, शोणभद्र तथा ऋषभतीर्थ भी श्रेष्ठ हैं | श्रीपर्वत, कोलाचल, सह्यगिरी, मलयगिरी, गोदावरी, तुंगभद्रा, वरदायिनी कावेरी नदी, तापी, पयोष्नी, रेवा (नर्मदा) और दण्डकारण्य भी उत्तम तीर्थ हैं | कालंजर, मुंचवट, शुर्पारक, मन्दाकिनी, चित्रकूट और श्रंगवेरपुर श्रेष्ठ हैं | अवन्ती भी उत्तम तीर्थ है | अयोध्या सब पापों का नाश करनेवाली है | नौमिषारण्य परम पवित्र तीर्थ है | वह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला हैं ||२१-२४||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘तीर्थमाहात्म्य-वर्णन’ नामक बेतालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ ||४२||

– ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ –