अनोखी दिवाली संतो की

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प्रातःकाल में मैं अपने हृदय में स्फुरित होने वाले आत्म-तत्त्व का स्मरण करता हूँ। जो आत्मा सच्चिदानन्द स्वरूप है, जो परमहंसों की अंतिम गति है, जो तुरीयावस्थारूप है, जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं को हमेशा जानता है और जो शुद्ध ब्रह्म है, वही मैं हूँ। पंचमहाभूतों से बनी हुई यह देह मैं नहीं हूँ।’

‘जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, ये तीनों अवस्थाएँ तो बदल जाती हैं फिर भी जो चिदघन चैतन्य नहीं बदलता। उस अखण्ड आत्म-चैतन्य का मैं ध्यान करता हूँ। क्योंकि वही मेरा स्वभाव है। शरीर का स्वभाव बदलता है, मन का स्वभाव बदलता है, बुद्धि के निर्णय बदलते हैं फिर भी जो नहीं बदलता वह अमर आत्मा मैं हूँ। मैं परमात्मा का सनातन अंश हूँ।’ ऐसा चिन्तन करने वाला साधक संसार में शीघ्र ही निर्लेपभाव को, निर्लेप पद को प्राप्त होता है।

चित्त की मलिनता चित्त का दोष है। चित्त की प्रसन्नता सदगुण है। अपने चित्त को सदा प्रसन्न रखो। राग-द्वेष के पोषक नहीं किन्तु राग-द्वेष के संहारक बनो।

आत्म-साक्षात्कारी सदगुरु के सिवाय अन्य किसी के ऊपर अति विश्वास न करो एवं अति सन्देह भी न करो।

अपने से छोटे लोगों से मिलो तब करुणा रखो। अपने से उत्तम व्यक्तियों से मिलो तब हृदय में श्रद्धा, भक्ति एवं विनय रखो। अपने समकक्ष लोगों से व्यवहार करने का प्रसंग आने पर हृदय में भगवान श्रीराम की तरह प्रेम रखो। अति उद्दण्ड लोग तुम्हारे संपर्क में आकर बदल न पायें तो ऐसे लोगों से थोड़े दूर रहकर अपना समय बचाओ। नौकरों को एवं आश्रित जनों को स्नेह दो। साथ ही साथ उन पर निगरानी रखो।

जो तुम्हारे मुख्य कार्यकर्ता हों, तुम्हारे धंधे-रोजगार के रहस्य जानते हों, तुम्हारी गुप्त बातें जानते हों उनके थोड़े बहुत नखरे भी सावधानीपूर्वक सहन करो।

अति भोलभाले भी मत बनो और अति चतुर भी मत बनो। अति भोलेभाले बनोगे तो लोग तुम्हें मूर्ख जानकर धोखा देंगे। अति चतुर बनोगे तो  संसार का आकर्षण बढ़ेगा।

लालची, मूर्ख और झगड़ालू लोगों के सम्पर्क में नहीं आना। त्यागी, तपस्वी और परहित परायण लोगों की संगति नहीं छोड़ना।

कार्य सिद्ध होने पर, सफलता मिलने पर गर्व नहीं करना। कार्य में विफल होने पर विषाद के गर्त्त में नहीं गिरना।

शस्त्रधारी पुरुष से शस्त्ररहित को वैर नहीं करना चाहिए। राज जानने वाले से कसूरमंद (अपराधी) को वैर नहीं करना चाहिए। स्वामी के साथ अनुचर को, शठ और दुर्जन के साथ सात्त्विक पुरुष को एवं धनी के साथ कंगाल पुरुष को वैर नहीं करना चाहिए। शूरवीर के साथ भाट को, राजा के साथ कवि को, वैद्य के साथ रोगी को एवं भण्डारी के साथ भोजन खाने वाले को भी वैर नहीं करना चाहिए। इन नौ लोगों से जो वैर या विरोध नहीं करता वह सुखी रहता है।

अति संपत्ति की लालच भी नहीं करना और संसार-व्यवहार चलाने के लिए लापरवाह भी नहीं होना। अक्ल, होशियारी, पुरुषार्थ एवं परिश्रम से धनोपार्जन करना चाहिए। धनोपार्जन के लिए पुरुषार्थ अवश्य करें किन्तु धर्म के अनुकूल रहकर। गरीबों का शोषण करके इकट्ठा किया हुआ धन सुख नहीं देता।

लक्ष्मी उसी को प्राप्त होती है जो पुरुषार्थ करता है, उद्योग करता है। आलसी को लक्ष्मी त्याग देती है। जिसके पास लक्ष्मी होती है उसको बड़े-बड़े लोग मान देते हैं। हाथी लक्ष्मी को माला पहनाता है।

लक्ष्मी के पास उल्लू दिखाई देता है। इस उल्लू के द्वारा निर्दिष्ट है कि निगुरों के पास लक्ष्मी के साथ ही साथ अहंकार का अन्धकार भी आ जाता है। उल्लू सावधान करता है कि सदा अच्छे पुरुषों का ही संग करना चाहिए। हमें सावधान करें, डाँटकर सुधारें ऐसे पुरुषों के चरणों में जाना चाहिए।

वाहवाही करने वाले तो बहुत मिल जाते हैं किन्तु तुम महान् बनो इस हेतु से तुम्हें सत्य सुनाकर सत्य परमात्मा की ओर आकर्षित करने वाले, ईश्वर-साक्षात्कार के मार्ग पर ले चलने वाले महापुरुष तो विरले ही होते हैं। ऐसे महापुरुषों का संग आदरपूर्वक एवं प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए। रामचन्द्रजी बड़ों से मिलते तो विनम्र भाव से मिलते थे, छोटों से मिलते तब करूणा से मिलते थे। अपने समकक्ष लोगों से मिलते तब स्नेहभाव से मिलते थे और त्याज्य लोगों की उपेक्षा करते थे।

जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए यह शास्त्रीय नियम आपके जीवन में आना ही चाहिए।

हररोज प्रभात में शुभ संकल्प करोः “मुझे जैसा होना है ऐसा मैं हूँ ही। मुझमें कुछ कमी होगी तो उसे मैं अवश्य निकालूँगा।” एक बार प्रयत्न करो…. दो बार करो….. तीन बार करो…. अवश्य सफल बनोगे।

‘मेरी मृत्यु कभी होती ही नहीं। मृत्यु होती है तो देह की होती है….’ ऐसा सदैव चिन्तन किया करो।

‘मैं कभी दुर्बल नहीं होता। दुर्बल और सबल शरीर होता है। मैं तो मुक्त आत्मा हूँ… चैतन्य परमात्मा का सनातन अंश हूँ…. मैं सदगुरु तत्त्व का हूँ। यह संसार मुझे हिला नहीं सकता, झकझोर नहीं सकता। झकझोरा जाता है शरीर, हिलता है मन। शरीर और मन को देखने वाला मैं चैतन्य आत्मा हूँ। घर का विस्तार, दुकान का विस्तार, राज्य की सीमा या राष्ट्र की सीमा बढ़ाकर मुझे बड़ा कहलवाने की आवश्यकता नहीं है। मैं तो असीम आत्मा हूँ। सीमाएँ सब माया में हैं, अविद्या में हैं। मुझ आत्मा में तो असीमता है। मैं तो मेरे इस असीम राज्य की प्राप्ति करूँगा और निश्चिन्त जिऊँगा। जो लोग सीमा सुरक्षित करके अहंकार बढ़ाकर जी गये, वे लोग भी आखिर सीमा छोड़कर गये। अतः ऐसी सीमाओं का आकर्षण मुझे नहीं है। मैं तो असीम आत्मा में ही स्थित होना चाहता हूँ….।’

ऐसा चिन्तन करने वाला साधक कुछ ही समय में असीम आत्मा का अनुभव करता है।

प्रेम के बल पर ही मनुष्य सुखी हो सकता है। बन्दूक पर हाथ रखकर अगर वह निश्चिन्त रहना चाहे तो वह मूर्ख है। जहाँ प्रेम है वहाँ ज्ञान की आवश्यकता है। सेवा में ज्ञान की आवश्यकता है और ज्ञान में प्रेम की आवश्यकत है। विज्ञान को तो आत्मज्ञान एवं प्रेम, दोनों की आवश्यकता है।

मानव बन मानव का कल्याण करो। बम बनाने में अरबों रुपये बरबाद हो रहे हैं। ….और वे ही बम मनुष्य जाति के विनाश में लगाये जाएँ ! नेताओं और राजाओं की अपेक्षा किसी आत्मज्ञानी गुरु के हाथ में बागडोर आ जाय तो विश्व नन्दनवन बन जाये।

हम उन ऋषियों को धन्यवाद देते हैं कि जिन्होंने दिवाली जैसे पर्वों का आयोजन करके मनुष्य से मनुष्य को नजदीक लाने का प्रयास किया है, मनुष्य की सुषुप्त शक्तियों को जगाने का सन्देश दिया है। जीवात्मा का परमात्मा से एक होने के लिए भिन्न-भिन्न उपाय खोजकर उनको समाज में, गाँव-गाँव और घर-घर में पहुँचाने के लिए उन आत्मज्ञानी महापुरुषों ने पुरुषार्थ किया है। उन महापुरुषों को आज हम हजार-हजार प्रणाम करते हैं।

मात्मा की ओर आकर्षित करने वाले, ईश्वर-साक्षात्कार के मार्ग पर ले चलने वाले महापुरुष तो विरले ही होते हैं। ऐसे महापुरुषों का संग आदरपूर्वक एवं प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए। रामचन्द्रजी बड़ों से मिलते तो विनम्र भाव से मिलते थे, छोटों से मिलते तब करूणा से मिलते थे। अपने समकक्ष लोगों से मिलते तब स्नेहभाव से मिलते थे और त्याज्य लोगों की उपेक्षा करते थे।

जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए यह शास्त्रीय नियम आपके जीवन में आना ही चाहिए।

हररोज प्रभात में शुभ संकल्प करोः “मुझे जैसा होना है ऐसा मैं हूँ ही। मुझमें कुछ कमी होगी तो उसे मैं अवश्य निकालूँगा।” एक बार प्रयत्न करो…. दो बार करो….. तीन बार करो…. अवश्य सफल बनोगे।

‘मेरी मृत्यु कभी होती ही नहीं। मृत्यु होती है तो देह की होती है….’ ऐसा सदैव चिन्तन किया करो।

‘मैं कभी दुर्बल नहीं होता। दुर्बल और सबल शरीर होता है। मैं तो मुक्त आत्मा हूँ… चैतन्य परमात्मा का सनातन अंश हूँ…. मैं सदगुरु तत्त्व का हूँ। यह संसार मुझे हिला नहीं सकता, झकझोर नहीं सकता। झकझोरा जाता है शरीर, हिलता है मन। शरीर और मन को देखने वाला मैं चैतन्य आत्मा हूँ। घर का विस्तार, दुकान का विस्तार, राज्य की सीमा या राष्ट्र की सीमा बढ़ाकर मुझे बड़ा कहलवाने की आवश्यकता नहीं है। मैं तो असीम आत्मा हूँ। सीमाएँ सब माया में हैं, अविद्या में हैं। मुझ आत्मा में तो असीमता है। मैं तो मेरे इस असीम राज्य की प्राप्ति करूँगा और निश्चिन्त जिऊँगा। जो लोग सीमा सुरक्षित करके अहंकार बढ़ाकर जी गये, वे लोग भी आखिर सीमा छोड़कर गये। अतः ऐसी सीमाओं का आकर्षण मुझे नहीं है। मैं तो असीम आत्मा में ही स्थित होना चाहता हूँ….।’

ऐसा चिन्तन करने वाला साधक कुछ ही समय में असीम आत्मा का अनुभव करता है।

प्रेम के बल पर ही मनुष्य सुखी हो सकता है। बन्दूक पर हाथ रखकर अगर वह निश्चिन्त रहना चाहे तो वह मूर्ख है। जहाँ प्रेम है वहाँ ज्ञान की आवश्यकता है। सेवा में ज्ञान की आवश्यकता है और ज्ञान में प्रेम की आवश्यकत है। विज्ञान को तो आत्मज्ञान एवं प्रेम, दोनों की आवश्यकता है।

मानव बन मानव का कल्याण करो। बम बनाने में अरबों रुपये बरबाद हो रहे हैं। ….और वे ही बम मनुष्य जाति के विनाश में लगाये जाएँ ! नेताओं और राजाओं की अपेक्षा किसी आत्मज्ञानी गुरु के हाथ में बागडोर आ जाय तो विश्व नन्दनवन बन जाये।

हम उन ऋषियों को धन्यवाद देते हैं कि जिन्होंने दिवाली जैसे पर्वों का आयोजन करके मनुष्य से मनुष्य को नजदीक लाने का प्रयास किया है, मनुष्य की सुषुप्त शक्तियों को जगाने का सन्देश दिया है। जीवात्मा का परमात्मा से एक होने के लिए भिन्न-भिन्न उपाय खोजकर उनको समाज में, गाँव-गाँव और घर-घर में पहुँचाने के लिए उन आत्मज्ञानी महापुरुषों ने पुरुषार्थ किया है। उन महापुरुषों को आज हम हजार-हजार प्रणाम करते हैं।