Asht Satvik Bhaav (अष्ट सात्विक भाव ) -Shri Sureshanand ji

pashupatastra
सत्संग के मुख्य अंश:

*आठ प्रकार के सात्विक भाव होते हैं| उन में से एक-आध भी साधक को अगर अनुभव में आता हो अपने जीवन में, तो बहुत अच्छा है|

*आठ में पहला है- स्तंभ| दूसरा-स्वेद | तीसरा है रोमांच|

*हनुमानजी को अष्ट सात्विक भाव बहुत होता था |मारुतसुत तब मारुत करहिं पुलक बपुष ये तीसरा सात्विक भाव|

* मेरा सौभाग्य कि सेवा मुझे मिल गई और भी कोई कर सकता था| मेरा अहोभाग्य! मुझे सेवा मिली, सेवा करनी हो तो इस भाव से करनी चाहिए|

* अश्रुपात – चौथा| पाँचवा- कम्प| छठा सात्विक भाव है- विवर्णता| सातवाँ सात्विक भाव- प्रलय| आठवां है- स्वर भंग|

*लक्ष्मणजी ने जब सुना कि रामजी बनवास को जा रहे हैं| सुनते ही आठों प्रकार के सात्विक भाव एक साथ लक्ष्मणजी में उभर आये|

*आठ में से कोई भी हो रहा हो, तो निश्चित जानना की गुरुदेव ने आपका हाथ थाम लिया| आपको अपना मान लिया| इसीलिए ये अनुभव होते हैं|