आत्मचिंतन विश्रांति योग – प.पू. संत श्री आशारामजी बापू

bapuji

 

आत्मचिंतन विश्रांति योग – प.पू. संत श्री आशारामजी बापू

ॐ…. ॐ……ॐ….. ॐ……
संसाररूपी समुद्र में वासनारूपी जल भरा है | अनेक प्रकार की  इच्छाएँ वासनाओं में ये जीव डूबते, तैरते, उतरते आखिर बह जाते है संसार समुद्र में | जिसके पास सत्संग रूपी सतमती, उस सत्संग रूपी सतमती की नाव में बैठकर संसार सागर से तर जाता है | शम, संतोष, विचार और सत्संग ये चार महाद्वारपाल है मोक्षरुपी राज्य के, मन को एकाग्र करके आत्मसुख ले तो बुद्धि विलक्षण लक्षणों से संपन्न होती है | सत्संग अच्छी तरह से समझ में आ जायेगा | जीवन में अंतरात्मा का संतोष रहेगा, संतुष्टी, तृप्ति रहेगी और ये विचार उत्पन्न होगा की – किम्छं कश्य कामाये शरीर स्वजयते ……. ये नश्वर शरीर के लिए क्या-क्या इच्छा करे, क्या-क्या कामना करोगे, आखिर क्षणभंगुर शरीर है, तो इच्छाएँ, कामनाएँ छोड़कर अपने अनिच्छित पदार्थ पद में प्राप्त हो जावो, स्थित हो जावो | एक श्लोक लग गया वो श्लोक पढते ही घर छोड़कर रवाना हो गया हूँ | वो श्लोक हर लगातार – सर्वमं अधितं तेन …… ये श्लोक था, हितोपनिषिध का हितोपदेष नाम का छोटा-सा पुस्तक संस्कृत भाषा का प्रारंभिक विद्यार्थियों के लिए,

सर्वमं अधितं तेन— उसके द्वारा सारा अध्ययन हो गया | तेनं सर्वेमं अनिश्चितमं – उसके द्वारा सारे अनुष्ठान हो गये |
सर्वमं अधितं तेन | तेनं सर्वेमं अनिश्चितमं| येन आशा पृथवक्त्वा| नैराश्य अवलिबम्तम ||
ये मिल  जाये, वो मिल जाये दुष्ट आशों को त्याग दिया और इच्छा रहित अवस्था में आ गया, उस दिन सारे अनुष्ठान कर लिए, सारा अध्ययन कर लिया | सर्वमं अधितं तेन – सब अध्ययन हो गया उसका तेनं सर्वेमं अनिश्चितमं – उसके द्वारा सारे अनुष्ठान हो गये, येन आशा पृथवक्त्वा – इच्छा, वासनाओं उसका पृथक कर दिया | नैराश्य अवलिबम्तम – नहीं तो बाबा ये तो संसार सागर में वासनारूपी जल है | कैसे गोते खाता है, जन्म-मरण की परंपरा में जा डूब मरते है | रामतीर्थ ने बड़ा सुंदर भजन गाया था – कोई हाल मस्त …. ऐसे ऐसे स्थिति बन जाए – गाड़ी हो, बंगला हो, यश हो बस … और क्या चाहिए ? अरे मुर्ख मौत सिर पर है ! कोई हाल मस्त-कुछ मिल गया मस्त लेकिन कब तक, सुख के लिए भटकेगा, आत्मसुख नहीं मिला तो कैसा भी हाल हो जाये, कैसा भी माल आ जाये, कौन-सा भी तोता-तोती, पक्षी पालो, कुत्ते-बिल्लियाँ पालो उनसे मस्ती लोगे, मारे जाओगे बुरी तरह से ‘गुंडी’ नाम के जंतु निकलते है बिल्ली के शरीर से, जो बिल्ली पालते तो उनके और कई बिमारियाँ और बिल्ली के जन्म में जाना पड़ता है | जो कुत्ता, बिल्ली पालकर उनसे खुशी ले रहे है लेकिन अपने आपको बंधन में डालने का ही तरीका है | रामतीर्थ का भजन है – कोई हाल मस्त, कोई माल मस्त, कोई तूती-मैना सुये में एक खुद मस्ती बिन  और मस्त सब पड़े अविद्या कुएँ में | कोई योग मस्त- योग आसन कर लिया शरीर हलका–फुलका हो गया अरे बड़ी मस्ती है | ठीक से खाया-पीया स्वस्थ रहा ये अभ्यासजन्य मस्ती है | आत्ममस्ती अलग है | जो कोई योग मस्त, कोई भोग मस्त, अच्छा खाने पीने को मिला बड़े मस्त हो गये, संतुष्ट हो गये | ठीक है, लेकिन आत्ममस्ती के बिना ये सारी मस्तियाँ क्षणभंगुर है, कोई योग मस्त को, कोई भोग मस्त, कोई रिद्धि मस्त, कोई सिद्धि मस्त, रिद्धि-सिद्धि ऐसे पुरुषों को मै जानता हूँ – जिनके पास रिद्धि-सिद्धियाँ थी बहुत सारे ऊँच कोटि रिद्धि-सिद्धि के वालोंमे मेरा संपर्क रहा, लेकिन आत्मसिद्धि के बिना ये सब खिलवाड़ मात्र है | हाथ घुमाकर मनोवंछित वास्तु दे दिए आपको ऐसे लोग मेरे मित्र है | अदृश्य हो जाये इसी योगियों का संपर्क किया | पृथ्वीतत्त्व  की सिद्धि, जलतत्त्व की सिद्धि, वायुतत्त्व की सिद्धि, वायु में मिलकर वायु हो जाये ऐसे पुरुष को संपर्क नही हुआ लेकिन ये सिद्धियाँ भी होती है | अष्टसिद्धि और नवविधियाँ होती है | सामान्य राजे-महाराजे तो ऐसे व्यक्ति के दास बनकर आपना भाग्य बना लेते | ये अष्टसिद्धि, नवविधियां हनुमान के पास थी, लेकिन हनुमानजी उसमे रुके नहीं, रामजी के शरण गये आत्मसाक्षात्कार के लिए | आत्मसाक्षात्कार बहुत ऊँची चीज है | कोई योग मस्त, कोई भोग मस्त, कोई रिद्धि मस्त, कोई सिद्धि मस्त ऐसी रिद्धि-सिद्धि हो की आप जो चाहे तो और रात को दस बजे भी मालपुआ चाहे तो मंगवा के खिला दे, लेकिन फिर पता चला की मालपुआ  किसीके घर से प्रेत उठा लाये ये तो छोटी तुच्छ सिद्धियों होते है, प्रेत के द्वारा और तांत्रिक-वांत्रिक वो सुना जाता है उसमे मैंने ये कभी नहीं सुना की बच्चों को बली देते है, ये करते है, ये नीचता तो हमने  सुनी नहीं, जो झूठे आरोप करते है, उनको अपना उल्लू सीधा करना होता है | घटना तो जैसे घट गयी दुर्भाग्यपूर्ण  लेकिन तांत्रिक, वो हुआ ये सब बकवास है | हमने तो योग की शुद्ध सिद्धियाँ  भी हमने त्याज्य मानी तो तांत्रिक की बहुत शुद्र होती होगी प्रक्रिया, उसने हमारी रूचि भी नहीं थी और हमारे गुरुदेव भी उस दिशा के और भगवान शिवजी ने ही गुरुगीता में जो तांत्रिक रिद्धि-सिद्धियाँ और तांत्रिक कुछ करते है उनको तो झाडा और वो गुरुगीता अपने आश्रम का खास ग्रंथ है, अपने आश्रमवासी सभी पढते है | उसको शिवगीता बोलते है, गुरुगीता बोलते है | उसमे तांत्रिक बातों की निंदा की है, वो तो अपने पड़ते है | लेकिन हनुमानजी के पास ये तांत्रिक-पांत्रिक तुच्छ चीजे नहीं थी, ऊँची सिद्धियाँ थी, ऊँची सिद्धियाँ होने के बाद भी हनुमानजी रुके नहीं आत्मसिद्धि पाने गये | नारदजी के पास ऊँच सिद्धियाँ थी, लोक लोकांतर में जाने की रूप बदलने की, दूसरे की बात जानकर उसका उपाय खोजकर समाधान करने की दैत्य, देवता और असुर भी नारदजी की बात मानते थे | दैत्य भी मानते थे, राक्षस भी मानते थे ऐसी सर्वहितकारी सिद्धियों के धनी नारदजी | आत्मसिद्धि के लिए सनकादी ऋषियों की शरण गये | योगत भूमात सुखां भूमा – व्याप्त परमेंश्वर को जानोगे तो पूर्ण संतुष्टि होगी, ऐसा सनकादी ऋषियों ने नारदजी को उपदेश दिया और नारदजी आत्मसिद्धियों का आत्मलाभात परम लाभात न विद्यते | आत्मसुखात परम सुखात न विद्यते | आत्मज्ञानात परम ज्ञान न विद्यते || आपना वो मार्ग है इसलिए आपन बड़े तृप्त है अभी ये हेलीकाप्टर की दुर्घटना आत्मसिद्धि बिना टल नहीं सकती | ये सब ईश्वर की अलौकिक लीला है | तो कितनी भी उपलब्धियों हो जाये लेकिन आत्म उपलब्धि के बिना जीवआत्म की तपन नहीं जाती | रामायण में आता है– आत्म के बिना जीवआत्म की कुछ ना कुछ कमी जाती नहीं | अपने दिल को दिलबर के ज्ञान से, दिलबर के माधुर्य से, दिलबर के आनंद से, दिलबर के सामर्थ्य से संपन्न करना है | दिलरुबा दिल की सुनाऊ सुननेवाला कौन है ? जाम में हक भर-भर पिलाऊ पीनेवाला कौन है? हक माना सत्यस्वरूप ईश्वरीय रस | ये ईश्वरीय रस में आड़ा आता है संसार की तुच्छ वासंनाये ……. बुद्धि प्रखर हो तो संसाररूपी समुद्र में वासना के जल में डूबते-तरके, डूबते-तराने तबाह हो जाये लेकिन तीव्रबुद्धि हो उसमे बैठ के जीव तर जाता है | योगवासिष्ठ में आया – सम संतोष विचार तत् निति बुद्धि को संपन्न करने देते, मन को रोख देते | मुझे वेद पुराण से क्या, मुझे प्रेम का पाठ पढ़ा दे कोई, मुझे मंदिर, मस्जिद जाना नहीं, ह्रदय मंदिर में जो शांति दिला दे जहाँ ऊँच और नीच का भेद नहीं |  ॐ….. ॐ….. ॐ…..  
    तीन घंटा प्रतिदिन ॐकार जप करे, तीन घंटा परमात्मा का ध्यान एक प्रहार, तीन घंटे योगवाशिष्ठ का विचार, तीन घंटे सदगुरु की सेवा युँ तर गए संसार, सबसे ऊँची पद मिल जाए, उससे बड़ी कोई पदवी नही | भगवान दर्शन अष्टसिद्धि, नवनिधि, चक्रवर्तीराज, इंद्र का पद सब छोटे हो जायेंगे |
हे हरि…. हे हरि…. हे हरि…….
    राजा बलि का बड़ा प्रभाव बन गया | इस समय प्रखर प्रभावशाली कोई व्यक्ति होता तो इर्दगिर्दवाले भी खुमारी में आते है उपद्रव करने लगे | युग-युग में अलग-अलग कथाएँ होती है | किसी कल्प में तो वामन भगवान आये बलि का सब कुछ लेके गए | किसी कल्प में बलिराजा के साथ इंद्र भिड गए और इंद्र ने बलि को परास्त कर दिया और बलिराजा सत्ता छोड़कर चले गए | इंद्र उसको खोजकर मारना चाहता था | इंद्र के पास दैवी शक्तियाँ थी तो सारी पृथ्वी छान मारी और स्वर्ग में तो बलि कहाँ पहुंचे अत्तल-बित्तल, तलातल, स्वर्गतल, भूलोक, जानलोक, तपलोक सब देवताओ के द्वारा और अपने अनुचरों के द्वारा छान मारा, कही बलि का पता नहीं चलता, आखिर थककर इंद्र देवता ब्रम्हाजी के पास गए की बलि का राज्यवैभव तो मैंने पा लिया, लेकिन बलि मिलते नहीं, आप सृष्टि के कर्ता हो, भुवानों से रास्ते जानते हो, पितामह कृपा करो | बलि मुझे कहाँ मिलेगा ? तो ब्रम्हाजी कहा बलि मारने योग्य नहीं है ? तुम मारोगे नहीं बलि को, मै बताता हूँ | बोले नही मारूँगा ब्रम्हाजी मै वचन देता हूँ | बोले जहाँ उज्जाड घर कही पड़ा हो उज्जाड घर कोई ढोर-धाकड मनुष्य का आना जाना न हो और अकेला में गधा दिखे, समझ लेना बलि में मै गधे का रूप धारण करू कोई संकल्प करके गधे का रूप धारण करके ब्रम्ह परमात्मा का चिंतन करता है | कोई मेरे को विघ्न न करे इसलिए गधा का रूप धारण किया | उसने जहाँ भी उज्जाड एकांति में कोई घर दिखे और उसमे गधा दिखे तो समझ लेना ये बलि है | तो इंद्र को पता चला गया घुमने जानने कहा पर उज्जाड घर खोज ने लगा और उसने खी गधा दिखा तो इंद्र ने ठहाका मारकर मजाक उड़ाई की वाह क्या रूप बनाया है | कहाँ तो राजाधिराज महाराज और कहाँ उज्जाड घरमे गधे के रूप में आकर छपे हो ? कहाँ गया तुम्हारा राज्य और कहा तू ललनाओ से चँवर डुलते थे ? कहाँ तू सुवर्ण के बरतनों में भोजन खाते थे और अब गधे बनकर यहाँ उज्जाड घर में खड़े हो ? क्या तुम्हारा दुर्भाग्य हुआ ? ये कथा योगवासिष्ठ में आती है पढ़ लेना विस्तार से | बलि ने कहा इंद्र गर्व मत करो | ऐसा राज्य तुमको भी कई बार मिला और फिर शत्रुओं ने छीन लिया और मृत्यु ने तुमसे छीन लिया मुझे भी मिला अब मै लाचार, मोहताज होकर, डरकर गधे के रुप पर यहाँ छुपकर जीवन व्यापन नहीं करता हूँ, लेकिन लोकसंपर्क न रहे इसलिए मैंने गधे की धारणा करके गधे का शरीर बनाया है और उस पद को पाऊंगा जहाँ से कोई पतन नहीं है | समझे वो कौनसा पद है ? यत गतवानी वर्तन्ते तत् धामो पर्मोम्म: – जहाँ जाने के बाद पतन नहीं होता, इंद्र गर्व मत करो ऐसे राज्य तो कई बार मुझे मिले और कई बाद छूटे और तुम्हारे से भी छूटे |  अभी भी मेरे में वो बल है एक लात मारूँ की खाते-खाते सीधे स्वर्ग में पहुँच जाओगे तो दुबारा आने का नाम न लो, अभी भी मेरे में वो बल है | लेकिन ये वक्त बल दिखाने का नहीं है बल को बल दाता को पहचानने में लगाना है | इसलिए मैंने गधे का रूप धारण किया है | गधा बनकर उज्जाड घर में रहकर भी आत्मचिंतन में विश्रांति मिले तो सौदा सस्ता है, ऐसा बुद्धिमान बलि के जीवन से जानने को मिलता है जहाँ भगवान स्वयं वामनरूप लेकर बलि से मांगते है, ऐसे बुद्धिमान बलि आखिर इस राज-काज से व्यर्थ समय बरबाद करना पड़ेगा | परमात्मा चिंतन करो और परमात्मा में स्थिति करो, ब्राह्मी स्थिति करो | गुरुनानक ६० वर्ष में ऐसे उग्ररूप धारण किये कि कोई नजदीक न आये | मै भी ५८-६० साल की उम्र से ये सोच रहा हूँ, अपन भी एकांत में जायेंगे | लोकसंपर्क बंद करे, लेकिन कोई पात्र ढूंढता हूँ, मिल जाये तो वो ढेरा उसको संभालू और अपन निवृति जीवन जियूँ | जो कोई मिलाता नहीं है और ये पूनम व्रत धारियों का  ठेका ऐसा लग पड़ा है कि बिचारों को तकलीफ ना हो | बिचारो-बिचारो में मै ही बिचारा बनकर भागता फिरता हूँ | ये २-३ दिनों में बड़ा पुराना स्वभाव जागृत हुआ निवृति का ………ॐ.. ॐ… ॐ…. एकांत का क्या फायदा मिलाता है और भगवत चिंतन में क्या-क्या खजाने पड़े है ये आपाधापी वालों को, बिचारों को पता ही नहीं | वासना के समुद्र में तराने तराने, राग-द्वेष में अहंकार कितना बड़ा है | बड़े में बड़े परमात्मा में विश्रांति पाने के लिए सत्कर्म करो, तत्परता से सत्कर्म करो, फिर एकांत में अंतरात्मा में आ जावो, शांति-खुशी के मोके पर खुश दिखो बाहर से लेकिन अंदर समझो ये भी हर्ष मन का है और हर्ष भोगोंगे तो सुख भी भोगना पड़ेगा | सुख-दुःख में जाननेवाले परमात्मा में अपने को लाओ | ये बहुत ऊँची उपलब्धियाँ है, कठिन नहीं थोडा एकांत चाहिए | ॐकार का जप, ध्यान, योगवाशिष्ठ, मौन, सात्विक भोजन बस ! ये बारह महीना बहुत हो गया और ४० दिन बहुत काम करते है | नहीं मिलते किसी से ऐसा वो मिलते है वो जमाना आएगा की हर महीने में दस बार दर्शन होगा, वो जमाना जल्दी ला दूँगा | तुम चिंता मत करो | हफ्ते में एक बार दर्शन, फिर महीने में एक बार, फिर साल में एक बार दर्शन हुआ न हुआ अदृश्य | ऐसे दिन भी आ जायेंगे | चिंता मत करना ॐ…. ॐ…. ॐ….

हुआ तो फकीर, तो रहा नाता किसी से | क्या छोड़ अपने दिलबर को मिलना किसी से क्या ||
तू बड़ी बेल पर, अपनी दिलबर से खेल | भव ना रखना, किसी से मोल ||

कौन किसके साथ जायेगा कौन किसके साथ आया था अकेले आये अकेले जाना है तो अपने रहो अपने ईश्वर में रहो |

ॐ…. ॐ…. ॐ…. ॐ….. ॐ…….

About Asaram Bapuji

Asumal Sirumalani Harpalani, known as Asaram Bapu, Asharam Bapu, Bapuji, and Jogi by his followers, is a religious leader in India. Starting to come in the limelight in the early 1970s, he gradually established over 400 ashrams in India and abroad.