बचपन से विवेक – (बापूजी की लीला -३)

Untitled-3बचपन से विवेक

साधक की बुद्धि साधना करके इतनी सूक्ष्म हो जाती की उसमें विवेक जग जाता है | जगमगता रहेता है विवेक | ये मील गया फिर क्या ? ये खा लिया फिर क्या ? ऐसे बन गया आखिर क्या ? हम जब १८ -२० साल के थे ना क्या तो ऐसे बने तो फिर क्या ? एक बार तो मैं शेअर बाजार में उथल-उथल के आवाज मार रहे थे सटोरिया उनको देखने गया | मैं क्या समझा ये ऐसा बन गया | शेअर मार्केट में उथल-उथल | फिर एक तेल के व्यापारी थे बड़े धरती ब्राण्ड उनका चलता था | अब तो मर गया बाबा | हम १८-२० साल के थे तब वो बड़ा शेठ था | तो उसके जा के उसको दुसरे देखा उसकी पेडी तो समजो ऐसे आपन बन गये फिर क्या ? कुछ भी होता तो आखिर क्या ? ऐसा सवाल उठता था ऐसा विवेक जगता था | १० – १२ साल के १०-११ साल के थे पिताजी मर गये तो उनको कंधा देके गये | तो उनको जलके हुआ देखा की आखिर ये, तो उसी सब शमशान के पास बच्चों का शमशान था | उसमे चले जाते थे | चुपचाप बैठते थे बच्चों को गाड़ते थे, हम लोग मर गये ८-१० साल के तो ईधर गाड देंगे और बड़े हो जाये तो पिताजी को जलाया उधार जलायेंगे फिर क्या ? तो ये सब विवेक जगता था की कहीं फिर रूचि नहीं होती | फिर तो पढने में तो थोडासा पढ़ा तो पहिले नम्बर में ही पास होता था | थोडासा लिखना पड़ता था ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती थी | इन मीन नहीं पहिला नम्बर में पास होते था | और गुरूजी सवाल पूछे तो सवाल भी वैसे ही देते थे, दबंग | लेकिन आखिर ये सब पाकर क्या ?
तो एक बार गुरूजी ने भेज दिया हमको रामायण वेदांत सम्मेलन, शंकराचार्य ये वो सब आये थे कानपुर में आयनगर | तो बोले आपका डिग्री, डिग्री अब क्या-क्या बोलू मैं ३ पढ़ा वो तो ऐसा ३ पढ़े आसाराम बापू वो आपको सुनायेंगे, लीलाशाह बापू के शिष्य | स्वामी लीलाशाह नहीं पधारे तो उनके शिष्य आये है आसारामजी वो सुनाये बस ! तो मेरे को हुआ की ये क्या ? सब वेदान्ताचार्य, दक्षिणाचार्य, फलानाचार्य तो मैं चला गया वेदांत का परीक्षा देने में | मैं कहा ये डिग्री ले ले | उसमे प्रस्थानत्रय होता है गीता, उपनिषद और ब्रम्हसुत्र | क्या – क्या होती है सूक्ष्म होती है | शंकराचार्यजी इडास लेकिन ब्रम्हचर्य आदि आदि गीता सुप्रसिद्द वेदांवो उनकी मैंने तो सारा शुरू किया | गीता का ६ वाँ अध्याय पर आया तो उसमें तो आचार्य की परीक्षा ईक्वल एम्.ए. की परीक्षा | तो ये मेरे लिए दायाँ हाथ का खेल था एम्. ए. की डिग्री लेना आचार्य में पास हो जाता | ऋषिकेश में शिवानंद डिवाईन लाइफ के नीचे दर्शन महाविद्यालय था अभी भी है लेकिन पहिले अच्छे आचार्य थे | कुछ दिन तो हम रहें, पढ़े फिर वो जब व्याख्या करें तो हम लोग उसे पूछे तो २ – ३ विद्यार्थी पाठ थे | आचार्य के विद्यार्थी वो लोग व्याख्या करें उससे मेरी व्याख्या तेज होती थी | तो आचार्य कहा की तुमने पहिले आचार्य कही किया हो क्या ? मैं कहा किया हुआ नहीं | उसको मैं नहीं बताया था की मैं पढ़ा हूँ | मैं पहिले आचार्य नहीं किया है | फिर भी अपने तो अच्छी व्याख्या कीई | पास में फिर गंगाजी थी, उधर एक साधू आके चुपचाप बैठा रहेता था | पहिले एम् बी एस किया था साधू बन गया और उसकी स्थिति अच्छी थी | तो मैं भी गंगा किनारे बैठता हूँ | तो एक दुसरे से बात हुई तो थोड़ी मित्रता हो गई | ऐसे करते करते आप ईधर कहाँ ठहरें मैं कहा दर्शन महाविद्यालय | क्यों ? मैं कहाँ मुझे आचार्य की डिग्री लेनी है, इसलिए थोडा करते है | अच्छा, अभी इतना पाने के बाद षड्गुद आपको डिग्री लेना बाकी है ? मैंने कहाँ डिग्री की जरूरत नहीं है लेकिन ये सम्मेलन में डिग्री की जरूरत जरा … अच्छा.. अच्छा ठीक है | खूब हँसे मैं नहीं हंसा कर लो डिग्री | फिर अभी तक पढाई चल रही है | अभी डिग्री के लिए पढाई चल रही है | मैं कहा बस पूरी हो गई | हम नहीं जाते बात तो सच्ची है डिग्री – बिग्री क्या ? आत्मविश्रांति मिली तो डिग्रीओं की कोई किंमत ही नहीं है | लेकिन थोड़ी थी बुद्धि में बचकानी तो लगे तो साधू के द्वारा भगवान ने सावधान कर दिया | मैं कहा नहीं जाना | नहीं तो वेदान्ताचार्य लिखते है आसाराम बापू वेदान्ताचार्य मान गये | बुद्धि की इमानते से ही मान गये | आप अपने को कुछ भी मान लो बुद्धि की कमजोरी जब कुछ मान करो | कुछ मान गये हो तो नींद नहीं आयेगी | सारी माने भूलते है तो नींद आती है | क्या खयाल है | सत्यता में कोई भी मान्यता की अवहेलना नहीं है | कोई भी मान्यता का महत्त्व नहीं है | मैं मनुष्य हूँ , यह सो रहा हूँ सोया तो नींद नहीं आयेगी |

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