व्यर्थ की जानकारियाँ क्यों ? -प.पू.संत श्री आशारामजी बापू

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व्यर्थ की जानकारियाँ क्यों ?

ओम …… ॐ  | ओम नारायण हरि | और फिर कोई ना सुने, जिव्हा, होंठ भी ना हिले और शांत मन में वही मंत्र स्फुरित हो जैसे मैं बोलता हूँ वैसे आप बोलो प्यार से ओम…… चुप हो गए | वही भीतर चले और शांत हो रहे हैं हम उस ओम स्वरूप इश्वर में | ये भी अपने आप में स्वतंत्र साधन है | विश्रांति योग देने में सक्षम साधन | ओम…… | चुप हो गए औए हृदय में चले | २-४ बार ….. | जितनी देर बाहर उच्चारण किया उससे थोडा समय ज्यादा भीतर उच्चारण किया और उससे भी ज्यादा शांत हो गए | ना किंचित अपि चिन्तयेत ||

ये सारी शिक्षाओ से भी ऊँची शिक्षा है |  सारी आपा-धापी के कर्मों से बहुत ऊँचा कर्म है | ओम माना वो अंतर आत्मा परमेश्वर | जिसकी सत्ता हर वस्तु में, हर परिस्थिति में, हर देश में, हर काल में है |

एक महात्मा सत्संग करते थे | किसी नास्तिक को लगा के ये क्या बात है ? क्यों लोगों का समय खराब करना ? और प्रार्थना और भगवान ये सब क्या है ? व्यंग में, विनोद में, कटाक्ष के भाव में उलझा हुआ नास्तिक था | लेकिन महात्मा को देखकर मजा आता था | सत्संगियों के बीच बैठकर उसको अच्छा तो लगता था | लेकिन ये सब क्या है ? व्हाट इस थिस ? महात्माजी का सत्संग था, उसने अपने घर से २ नारंगी उठाई | जहां सत्संगी थे उधर जा रहा था | रस्ते में एक माई लेटी थी, बूढी थी ८० साल की | उसके हाथ जेब में गए और दोनों नारंगी उठकर हाथ फैलाई माई के हाथ पे रख दी | जब वो सत्संग से लौटा, देखा वो माई बड़ी प्रसन्नता से, बडे चाव से नारंगी चूस रही थी | बोला क्या खा रही हो ? बोले भई क्या खाऊ ? मैंने अपने पिता से जो चीज माँगी भेज दी उन्होंने | गैस हो गया था | तबियत जरा अच्मचा रहा था | मैं क्या मुझ बुढिया के पास कहाँ पैसे और कहाँ खरीद करने को जाऊँ ? हे पिता नारंगी भेज दे और मैंने तो एक माँगी | मैं लेटी थी और मेरे हाथ में दो नारंगी रख गया | नास्तिक के कपाट खुल गए | कि बुढिया का मेरा कोई परिचय नही था | वो कौन प्रेरक है जो मेरे को प्रेरणा दी, २ नारंगी मैंने जेब से उठाई और बुढिया सोई थी और उसके हाथ पे रखी | एक-आध घंटे के बाद लौटता हूँ तो बुढिया नारंगी खा रही है | कौन है तुम्हारा पिता, तुम ८० साल की | बोले वो पिता वही है जो प्रार्थना सुन लेता है | और उसी के अनुसार किसी को भी प्रेरित करके अपने प्यारों को तृप्त करता है | वो ही तो है परमात्मा |  नास्तिक के कपाट खुल गए कि मैं आज तक चीख रहा था, चिल्ला रहा था के प्रार्थना-व्रार्थ्ना में कुछ नही रखा | ये हरि ओम, हरि ओम में कुछ नही रखा | अब ये माई को तो पता नही, मेरे को भी पता नही, वो कौन प्रेरक है जो मेरे को २ नारंगी उठवाई और फिर सीधा मैं इस माई के हाथ में रख के गया सत्संग सुनने व्यंग में, मजाक में | और फिर प्रेरणा मिली माई से बात करने की | मेरे भ्रम को दूर करने वाला और माई के मनोरथ को पूर्ण करने वाला वो कोई आकृति वाला नही है | सारी आकृतियाँ जिससे चलती हैं महात्मा ने कहा वही परमेश्वर है |

उच्च शिक्षा और तुच्छ शिक्षा, साधारण पढ़ाई और ऊँची पढ़ाई जरा समझ लें | ऊँची पढ़ाई किसको कहते हैं और तुच्छ पढ़ाई किसको कहते हैं ?

तुच्छ पढ़ाई वो है जो तुच्छ शरीर को मैं माने और तुच्छ वस्तुओं की तरफ तुम्हारी इच्छाएँ, ख्वाइशे, वासनाएँ बढाएँ | एम.बी.ए. कर लो मतलब गंजे आदमी को भी कंघी बेच दो | नागालेंड में जो कपड़े नही पहनते उनको कपड़े धोने वाला साबुन पकड़ा दो | पैसे निकालो | ये तुच्छ शिक्षा है |

कबीरजी उच्च शिक्षा बोलते हैं | कबीरा आप ठगाइयो और ना ठ्गियो कोई | आप ठगे सुख उपजे और ठगे दुःख होए | तो उच्च शिक्षा क्या है ? उच्च शिक्षा है, महत्वपूर्ण शिक्षा है, शुद्ध प्रेम, आनंद कैसे बढ़े ? उसका उपाय और उसके तरफ की यात्रा |

उत्साही दृष्टि कैसे बढ़े ? कैसी भी परिस्थिति आये, हार कर उद्विघन होकर भागा-भागी ना करे | लेकिन परस्थिति के सर पर पैर रखके अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाये, फिसले नही | दुःख कैसे मिटे ? ये उच्च शिक्षा का उद्देश्य है | दुःख आये लेकिन हम तक दुःख ना पहुंचे, ये क्या कला है ? ये उच्च शिक्षा बताती है | आत्मविश्वास और एकाग्रता कैसे पाये ? ये उच्च शिक्षा का उद्देश्य है | महत्वहीन शिक्षा क्या है, अनावश्यक डिग्रियाँ, पढ़ते रहें, डिग्री तो ले लें | डिग्री तो मिल जाये और डिग्री लेके भटक रहें हैं | अनावश्यक डिग्रियाँ लेना, व्यर्थ चीजों को याद करना, व्यर्थ विषयों में उलझते रहना | व्यर्थ विषयों को याद रखना | व्यर्थ जानकारी एकत्रित करना | और किसी के क्षणिक प्रभाव में आ जाना | किसी का रूप, लावण्य देखकर इम्प्रेस हो जाना | किसी का कुछ देखकर प्रभावित हो जाना | लट्टू हो जाना | ये महत्वहीन शिक्षा है | जगतराम अनपढ़, गवार था | नाम तो जगतराम था पर अनपढ़, गवार था | हरिहर बाबा को कहा बाबा, मैं तो अनपढ़, गवार | मेरा भला हो जायेगा क्या ? मैं पढा-लिखा कुछ नही हूँ | और बाहर की योग्यताओ से दुःख नही मिटते | दुःखहारी प्रभु मेरे हैं | मैं पढा-लिखा हूँ या नही हूँ लेकिन तुम्हारा हूँ | मैं तुम्हारा हूँ | भीतर ओम……. | शांत हो गया और उस शांति से भीतर में भगवान का प्रसाद आया | महाराज भगवान कैसे हैं मैं तो नही जानता | मोको तो आप ही भगवान लगो | ओम….. | महाराज दिखे, महाराज से मन ही मन बाते करे | धीरे-धीरे मन शांत और गुरु भाव में इतना एकाग्र की जो होने वाला हो वो बोल देवे | जो मन में सोचे वो चीज, वस्तु, परिस्थिति आजाये | क्योंकी उच्च शिक्षा के मूल तक पहुंच गया |

आप जो लेते हैं वो प्राण, प्राण-अपान की क्रिया से सब व्यवहार चलता है | जैसे पौधा है तो उसकी प्राण शक्ति उपर ले आती है उसके पत्ते, फुल, टहनियाँ | और अपान शक्ति जड़े नीचे को जाती हैं | ऐसे ही आपके जीवन में भी चंद्र, सूर्य का प्रभाव | प्राण-अपान का प्रभाव जैसे सूर्य से आकर्षित चंदा और चंदा में सूर्य का प्रभाव | तो आपकी जो प्राण-अपान शक्ति चल रही है या जीवन चल रहा है | जब अपान का महत्व बढता है, नीचे के केन्द्रों में जीते हैं और दुष्ट वासनाओं की पूर्ति में लगते हैं | तमोगुण की प्रधानता होती है | वो नारिकीय जीवन का अधिकारी हो जाता है | कैसा भी करो, खाओ, पियो, भोगो, वार-तिथि का पता नही | अपान के आकर्षण में चलेगा, देखा जायेगा | हम नही मानते, ये अपान का आकर्षण नीचे के केन्द्रों में जीने वाले व्यक्ति को उलझा देता है | तमस होता है फिर |

रजस होता है तो कुछ में फिसलता है, कुछ में टिकता है |

जब सत्वगुण बढता है तो अपान के आकर्षण से, नीचे के केन्द्रों से, बातों से आकर्षित नही होता | भजन्ते माम दृढ़ व्रतः || दृढ़ता होगी, वो स्वर्गीय सुख का अधिकारी और तत्वज्ञानी गुरु मिल जाये तो आत्म साक्षात्कार कर ले | उन्नति की लिए प्राण को महत्व दो और अवन्ती के लिए अपान | तो अपन जब हरि ओम बोलते हैं तो प्राण उपर आते हैं | हरि, ओम, राम इन शब्दों से प्राण शक्ति हमारी उपर के तरफ चलती है |

मनुष्य का जन्म प्रज्ञा, बुद्धि, और कर्म का मिश्रण है | बुद्धि से निर्णय करेगा और इन्द्रियों से कर्म करेगा | बुद्धि और कर्म के मिश्रण से जो कर्म करके, बुद्धि से निर्णय करके कर्म करके सुखी होना चाहता है, डिग्रीयां पाकर सुखी होना चाहता है, पति पाकर, पत्नी पाकर, भोग पाकर, वाह-वाही पाकर सुखी होना चाहता है, उसको सुखद अवस्था तो मिलती है लेकिन उसका प्राण और मति प्रवृति की तरफ है | संसार के तरफ | और संसार फिर अपान में ले जायेगा | लेकिन जो वासना पूर्ति की इच्छा छोड़ने वाला सत्संग समझ लेता है कि वासना पूर्ति का सुख पतन की तरफ ले जायेगा, लेकिन वासना निवृति का सुख परमात्मा में ले जाता है | तो फिर वो वासना, अपनी इच्छा पूरी हो तो उस पचड़े में नही पड़ता | इच्छा निवृत हो उस सूझ-बूझ  में पड़ता है | तो बोले भगवान को पाने की इच्छा भी नही करे | भगवान को पाने की इच्छा सारी इच्छा को मिटाने का एक सबल साधन है | सारी इच्छा मिट गयी तो फिर भगवान को पाने की इच्छा भी अपने-आप शांत हो जाती है | भगवान ही प्रकट हो जाते हैं | तो संकल्प पूरा करके सुखी होना, वे लोग चमचों के चक्कर में आ जाते हैं | परिस्थिति के चक्कर में आ जाते हैं | राग-द्वेष के चक्कर में आ जाते हैं | एक बार राजा बन जाऊँ, ५ साल के लिए, बाबाजी आशीर्वाद करो | ५ साल हो गए फिर बाबा फिर से दया करो, फिर से दया करो, अब फिर फिर करते बाबा की जरूरत ही नही है | बाबा को कुचलो | ये अपान वृति जीव को अधोगति की तरफ ले जाती है |

संकल्प की निवृति की तरफ महत्व देते हो तो आपको अंदर का सुख मिलेगा | अंदर का सामर्थ्य मिलेगा और जीते-जी आप परिस्थितियों के प्रभाव से आप मुक्त हो जायेंगे | मरने का भय नही रहेगा, जीने की आशा नही रहेगी | जीवन में एक अवर्णीय शांति, अवर्णीय सामर्थ्य | कोई खोज-खोज के भी नी बता सके और आप जो बताएँगे वही बात सच्ची निकलेगी | नानक बोले सहज स्वभाव | वासना रहित जीवन में सहज स्वभाव | परमात्म ज्ञान, परमात्म हो जाते हो तुम | तो महत्वपूर्ण शिक्षा प्रेम, आनंद, उत्साह, दूरदृष्टि, सत्य संकल्प, सत्य परिणाम, सत्य वाक्य और महत्वपूर्ण शिक्षण | अनावश्क डिग्रीयां, अनावश्क सुचना, अनावश्क बोलना, हाथ हिलाते रहना, ये करना, मान नही है तो तुच्छ जीवन है तो चंचलता है | ये जन लो, वो सीख लो, वो सीख लो | जहाज में भी बैठेंगे तो बोलो थोड़ी देर शांत हो जाओ | तो वो पढेंगे, वो पढेंगे | बस खोपड़ी में भरो, भरो…. | नॉलेज, नॉलेज क्या कचरा भर के ? खिन्न हो जाते हैं | विश्रांति ओम….. | मन इधर-उधर जाता है तो दीर्घ उच्चरण फिर प्लुत या हर्ष उच्चारण |  जैसे भी मन शांत हो | इच्छाओ की गुलामी ना हो | परम आत्म शांति बढ़ जाये | व्यर्थ की जानकारियों में दिमाग खराब ना करें |

About Asaram Bapuji

Asumal Sirumalani Harpalani, known as Asaram Bapu, Asharam Bapu, Bapuji, and Jogi by his followers, is a religious leader in India. Starting to come in the limelight in the early 1970s, he gradually established over 400 ashrams in India and abroad.