बापूजी का संकेत – (बापूजी की लीला- ६)

002बापूजी का संकेत

अहमदाबाद आश्रम में आज से करीब ३० – ३२ साल पहिले की बात है | बहुत थोड़े लोग थे गुरुदेव सत्संग कर रहे थे | तो एक महिला चालू सत्संग में से खड़ी हो गयी, जाने लगी | गुरुदेव ने कहाँ बैठ जा बेटी थोड़ी देर बैठ जा, जल्दी क्या है ? बोले नहीं मेरे को जल्दी है जाना है | बापूजी ने कहा ठीक है जा | अब वो गई तो थोड़ी देर हो के रोटी आयी | क्या हुआ ? वो बोली गुरूजी ! मेरी चार तोले सोने की चैन लोफर खींचकर भाग गये | अब मेरी साँस को क्या बताऊंगी, वो देखेगी इसकी गले की चैन कहाँ गयी | तो गुरूजी मेरे को डर लग रहा है मेरी साँस डांटेगी | कारण के कहावत है कहावत मेरी नहीं है किसीने कही है | चौमासेनु सांसु गम्मे त्यारे वैसी पड़े | पर हर साँस ऐसी नहीं होती | सत्संगी हो तो वो धर्मात्मा होती है, पवित्र आत्मा होती है | अपने बहु को इतना प्यार देती है सत्संगी भक्त की साँस की बहु के माय के सारे टेलीफोन नंबर भूल जाती | और सत्संगी बहु अपनी साँस की इतनी इज्जत करती है की साँस अपने बेटी के फोन नंबर भूल जाती है | बेटी जहाँ गयी शादी करके उसके सब नंबर भूल जाती है बहु को ही अपनी बेटी मान लेती है | और होना ही चाहिए | तो वो रोने लगी की मेरी साँस मेरे को डाटेंगी चार तोले की सोने की चैन | तो गुरुदेव ने कहाँ मैं तुझे पहिले कहाँ रहा था मत जा अभी, बात माने नहीं | अब बैठ रो नहीं, गुरुदेव ने एक सेवक को बुलाया और कहाँ यहाँ से तू जा सरदार नगर बस स्टैंड की ओर, बस स्टैंडपर एक लड़का खाकी रंग की पैंट पहनाकर बैठा है, अमुक रंग का शर्ट पहनकर बैठा है | दो थप्पड़ उसको लगाना और उसकी जेब में सोने की चैन है इस महिला की जा लेकर आ |
वो गया और सचमुच बस स्टैंडपर तो आदमी वैसेही हुलयेवाला मिला चैन देता ही की नहीं देता | उसको लगा की इसको कैसे पता लगा की मेरी जेब में चैन है ? बोले हमारे बापू सबके बाप लगते है | निकाल जल्दी निकाल .. और सचमुच ये घटित घटना है | वो चैन लेके आया उस महिला को दे दीई, वो तो नाचती हुई घर गई, की अब कभी बीच में से कभी नहीं उठोंगी | और बापू ने कहाँ था की मत जा | फिर गुरूजी की बात काट गई तो चैन गई |
दूसरी बार क्या हुआ की अहमदाबाद आश्रम में बहोत कम लोग थे जाहिर सत्संग नहीं था | जो रोज दर्शन के लिए आत थे वो आ के बैठे थे | तो जूते-चप्पल दूर उतारते ना गुरु के सामने अदब से बैठते है | गुरु के सामने बैठे हो तो कभी भी एक पैर के ऊपर दूसरा पैर नहीं चढ़ा के बैठना चाहिए | गुरु के सामने शिष्य अदब में पेश आएगा उतना आठ प्रकार की लक्ष्मी उसे पीछे पड़ेगी | वो न चाहे भी वो आयेगी | अष्टलक्ष्मी मैं आठ नाम बतऊँगा | जितना आदर गुरु का करेगा तो आठ लक्ष्मी न आये तो आपका जूता और मेरा सर | सिंधी भाषे में कहावत है – जेत्रो अदब वोत्रो नशीब | कोई शिष्य ऐसा हो गुरु के सामने रूट जाय और गुरु के सामने ही न आये वो इतना बड़ा पाप नहीं है |

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