बापूजी की आचार्य की पढाई -(बापूजी की लीला- ७)

1ASHARAM JI BAPUबापूजी की आचार्य की पढाई

हम आचार्य की परीक्षा देने गये तो संत ने हमारे से मजाग करने लगे तो अभी तुमको परीक्षा देना बाकी है | और जो परीक्षक था जो हमको आचार्य पढ़ानेवाला था, पढाता था, वो बोलता की तुम तो आचार्य की परीक्षा दे चुके हो, बोले नही दिया है | वल्लभाचार्य, रामानंदाचार्य, शंकराचार्यजी ये काय के लिए व्याख्या और विद्यार्थी करते उनकी अपेक्षा मेरी व्याख्या उनको अच्छी लगती | फिर वो बोलते की तुम्हारा तो किया हुआ है | एक संत गंगा किनारे स्वामी शिवानंद डिवाईन लाइफ के नीचे दर्शन महाविद्यालय में मैं आचार्य की परीक्षा देने के लिए रुका था | वो संत एम् बी एस थे और साधू भी बन गये | वो नदी किनारे चुप में बैठे रहते शाम को चुप बैठकर चले आते | एक दुसरे से बातचित हो जाती थोड़ी लेकिन उनको संन्यासीयों की तरह अहंकार नहीं था | ग्रंथि होने का अहंकार संन्यासी होने का अहंकार | केशवानंदजी थे हम संन्यासी है बापू सफेद कपडे पहनते है | उनकी बहुत भारी अनुभूति थी | वो दो क्षण में पता चला जाता है जगे हुये पुरुष साक्षात्कारी पुरुष तो वो मेरे स्नेह करने लगे | वो ज्ञानी की गति ज्ञानी ही जानता है | दूसरा नहीं पहेचान सकता है, तत्ववेत्ता को तत्तवेत्ता ही ठीक से जान सकता है | वो बाते करते-करते वो बोले अच्छा सुबह तो आचार्य ने कहा अपने तो पहिले वेदान्ताचार्य की परीक्षा तुम दे चुके हो ना ! मैंने कहा हम तो पहिली बार आये है, हम तो तीसरी पढ़े थे और बड़े-बड़े विद्वान, वेदान्ताचार्य, न्यायाचार्य, श्रध्दा-क्षमाचार्य वो कानपूर में संमेलन हुआ था रामायण वेदांत संमेलन उसमे सब जगद्गुरु शंकराचार्य, तो सब टाइटलवाले मेरे को बोले क्या उपाधि है ? तो मैं बोल देता आसाराम नाम है, तो स्वामी लीलाशाह महाराज जो जानेमाने संत है उनके सेवक आसाराम बापू सुनाये, तो मेरे को लगाये इतना की दूसरों को जरा टाइटल लगा तो अपने को ठीक लगा | गर्मी के दिन गुरूजी से सम्मति लेके हरिद्वार, ऋषिकेश पंहुचा दो बाकि हुआ दर्शन महाविद्यालय |

तो आचार्य बोले की तुमने तो वेदान्ताचार्य तुमने तो किया हुआ ना ! मैं कहा मैं तो अभी पहली बार भरती हुआ | तो फिर शाम को आ गये तो बोले अच्छा, अभी तक आप हो | मैं कहा हाँ अभीतक पढ़ रहें हो | मैं कहा नहीं महाराज अभी तो पूरा हो गया | कभी कभी संतों के व्येंगो में भी बड़ा फायदा होता है | फिर कटाक्ष में भी बड़ा फायदा होता है | क्या ये उपाधियों में चलो | वो तो बहुत ऊँची डिग्री है वेदान्ताचार्य इक्वल एम् ए डिग्री होंगी, शाश्त्रीय इक्वल बी. ए. डिग्री होती है | तो गुरुओं का रस लेना न आचार्य है ना, शास्त्रीय डिग्री है | नहीं तो हितोपदेश है, हितोपदेश एक श्लोक पढ़ा और मेरा काम बन गया | परीक्षा देना चाहता था जहाँ संसार से चले जाते थे वहा समाधियाँ बनी रहती थी | तो ५ – ६ साधू अश्रावा रहे जो श्री नाम है वो होगा | तो वहा मैं पाठशाला में संस्कृत पढने में भरती हो गया | परीक्षा के दिन आये तो चले तुम्हे परीक्षा के लिए थोडा तो श्लोक आ गया हितोपदेश का – सर्वम अधितम तेनउसने सबकुछ अध्ययन कर लिया | तेन सर्वम अनुष्ठितम – उसने सारे अनुष्टान कर लिए | येन आशा पृथकत्व: – जिसने इच्छा-वासना पृथक् कर दी | नैराश्या अवलम्बितं – उसने सब पढ़ लिया , सब अनुष्ठान कर लिया, सब अध्ययन कर लिया, सब इच्छा –वासना छोड़ दीई | न सुखमं चक्रवर्तीम ना सुखमं देवेन्द्र यत सुखमं हितरागस्य मुनि एकांतवाशी | चक्रवर्ती राजा को सुख नहीं है, इन्द्रदेव को भी वो सुख नहीं है | जो एक परमात्मा में सारी वृत्तियों का अंत करके ब्रम्हांडनंद में | खाली समाधि नहीं है आप चलते-फिरते योगी का सविकल्प योग होता है लेकिन आत्मवेता का अविकम्प योग होता है | जोगी समाधि में है तो आनंद में है, ब्रम्ह में है लेकिन उठा तो विक्षेप उसको हिलायेगा | लेकिन तत्त्ववेता समाधि में है लेकिन उठे तो साधू भय सहज समाधि | गुरुकृपा भय जा बीन दिन-दिन अधिक चली आँख न बुंदु नाक | कायाणु बोंदु काख न धारों खुली आँख ने हस हस देखू सुंदर राख रूप निहारु | पंचभूतों की गहराई में देविसचिदानंद तत्त्व है | वासुदेव सर्वमिति समआत्मासु दुर्लभ | ऐसा आत्मवेता का बड़ा भारी महत्त्व होता है |

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