भगवान के गुण अपने में आने दो ….

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कबीरा आप ठगायियो
और ना ठगियो कोई
आप ठगे सुख उपजे
और ठगे दुःख होई

किसी से धोका कर के आप ने उस के 25-50 हजार या लाख छीन लिए..तो वो मरता तो छोड़ के जाता..तो मरने के बाद छोड़ के जाने वाली चीज आप ने छिनी, लेकिन आप ने अपना ह्रदय खराब किया..आप मरने के बाद भी वो आदत और वो करम आप को तपाएगा..किसी का मैं बुरा चाहू तो उस का बुरा हो ना हो, लेकिन मेरा ह्रदय तो अभी से ही बुरा होने लगेगा..बुरा करने में सफल भी हो गया तो अहंकार बढेगा.. और दूसरों का बुरा करूंगा..अगर भला करने में सफल होता हूँ तो उस का तो बाहर का भला होगा, लेकिन मेरा तो ह्रदय भला होता चला जाएगा..ऐसा भला होगा, ऐसा भला होगा की भला बढ़ते बढ़ते भगवान की व्यापकता और मेरे दिल की व्यापकता एकाकार भी तो हो जाती है!

इसलिए भगवान के गुण अपने में आने दो.. क्यों की आप का असली स्वरुप भगवान से मिलता है..नकली स्वरुप संसार से मिलता है..शरीर नकली स्वरुप है..पहेले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा..बिच में दिख रहा है..स्वप्ना नकली होता है तो बिच में दीखता है न? ऐसे ही ये शरीर पहेले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा…लेकिन शरीर के पहेले तुम थे…
बचपन चला गया तब भी तुम थे..जवानी बुढापे में कब बदली पता नहीं लेकिन उस को जानने वाले तुम हो! और ये शरीर मर जाएगा उस के बाद भी तुम रहेते हो..तो तुम हो सत !

जो ‘सत’ है , वो चेतन भी है..हाथ को पता नहीं..हाथ चेतन नहीं, तुम्हारी चेतना से हाथ चेतन है..तो आप सत है, चेतन भी है..और जो सत है चेतन है वो आनंद स्वरुप भी है..अपने आनंद स्वभाव को जगाओ तो संसार के सुख लोलुपता से आप बच जायेंगे..फिर आप जहां नजर डालेंगे वहा सुख लहेरायेगा..
ब्रम्हग्यानी महापुरुषों की जहा निगाहें पड़ती है वहा लोग सारी सुविधाएं छोड़ कर धरती पर बैठ कर, भूक प्यास सहे कर भी उन के दर्शन से चिन्मय आनंद पाते है..

ब्रम्हग्यानी की मत कौन बखाने
नानक ब्रम्हाग्यानी की गत मत ब्रम्हग्यानी जाने

ये आत्म विद्या है..
भौतिक विद्या ..अधि दैविक विद्या और आत्म विद्या..३ विद्या है ..
सा विद्या या विमुक्तये..

जो सारे दुखो से, सारी चिंताओं से, सारे पापों से, तापों से मुक्त कर दे उसे आत्म विद्या कहेते है..जितने अंश में आप ये आत्म विद्या आत्म सात करते है उतने अंश में आप का शरीर का प्रभाव, दुखों का प्रभाव , विकारों का प्रभाव हलका फुलका हो जाएगा..

आप चाहते है क्या की हम दुखों के प्रभाव में दबे रहे? नहीं!
आप चाहते है क्या की हम विकारों के प्रभाव में दबे रहे? नहीं!
तो श्रीकृष्ण कहेते है की आओ! मेरे पास अध्यात्म बुध्दी ले लो!…अध्यात्म बुध्दी का नाम क्या है?

प्रसादे सर्व दुखानाम
हानि रस्योप जायते
प्रसन्न चेतसो यासु
बुध्दी पर्यवितिष्टते

उस आत्म प्रसाद से , ब्रम्हज्ञान के प्रसाद से सारे दुखों का अंत होता है..और आप की बुध्दी में परमात्म रस जगमगाता है..बुध्दी बलवान होती है तो मन को नियंत्रित रखती है..और मन इन्द्रियों को नियंत्रित रखता है..आप जानते हो गलत है फिर भी इन्द्रियों का प्रभाव मन को खींचता है..मन का प्रभाव बुध्दी को खींचता है और आप ना चाहते हुए भी गलतियाँ करते रहेते है..तो बाद में उस का फल भी भोगना पड़ता है..

अगर आप आत्म-विश्रांति का अभ्यास करे तो बुध्दी बलवान होगी..मन को नियंत्रित करेगी.. तो मन भी बलवान होगा..तो इन्द्रिया भी नियंत्रण में रहेंगी..आप की गाडी ठीक जगह पर चलेगी..आप तेजस्वी बनेंगे..बुरी जगह से अपने को रोकने में सफल हो जायेंगे..अच्छे लोगों का साथ सहयोग करने में आप बलवान हो जायेंगे..

तो रोज सुबह उठते समय जो नींद में से हमें जगाता है वो कौन है? कैसी कृपा है!
और रात को थके थकाए आप को अपनी नींद भरी गोद में ले जाता है वो कौन है?

पैसो से तुम एयर कंडीशन कमरा बना सकते हो; नींद तो उस की देन है!
पैसो से तुम पकवान व्यंजन बना सकते हो; भूक तो उस की देन है!
ऐसे ही दुनिया की चीजे ला कर तुम सुख के साधन जुटा सकते हो
लेकिन सुख और प्रसन्नता तो किसी संत और प्यारे प्रभु की देन है!
नहीं तो प्रसन्नता कहाँ मिलती है?

अगर अंतरात्मा में सुख होता तो क्लबों में क्यों जाते? काय को एक दुसरे की थूक चाटते? काय को शराब पिते ? काय को गाय का मांस खाते और आत्मह्त्या करते?
क्लबों में सुख होता तो सारे क्लबी सुखी हो जाते!

अगर सत्ता में सुख होता तो सारे सत्ताधीश सुखी होते! एलिज़ाबेथ बोलती सारी सत्ता ले लो , एक घंटा जीवित रखो तो मैं प्रार्थना कर लूँ..पश्चाताप कर लूँ ..मरने के बाद कहा जाउंगी आई डोंट नो …
अरे! मरने के बाद क्या हम तो जीते जी हम जिस के है उस के साथ मिलेंगे!..