ब्रह्मपुराण अध्याय – ६१

brmhapuran|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

ब्रह्मपुराण

अध्याय – ६१

भगवान का अवतार, गोकुलगमन, पूतना-वध, शक्त-भंजन, यमलार्जुन-उद्धार, गोपों का वृन्दावनगमन तथा बलराम और श्रीकृष्ण का बछड़े चराना

व्यासजी कहते हैं – देवाधिदेव श्रीहरि ने पहले जैसा आदेश दिया था, उसके अनुसार जगज्जननी योगमायाने देवकी के उदर में क्रमश: छ: गर्भ स्थापित किये और सातवें को खींचकर रोहिणी के उदरमें डाल दिया | तदनंतर तीनों लोकों का उपकार करने के लिये साक्षात श्रीहरि ने देवकी के गर्भ में प्रवेश किया और उसी दिन योगनिद्रा यशोदा के उदर में प्रविष्ट हुई | भगवान विष्णु के अंश के भूतलपर आते ही आकाश में ग्रहों की गति यथावत होने लगी | समस्त ऋतुएँ सुखदायिनी हो गयीं | देवकी के शरीर में इतना तेज आ गया कि कोई उनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता था | देवतागण स्त्री-पुरुषों से अदृश्य रहकर अपने उदरमें श्रीविष्णु को धारण करनेवाली माता देवकी का प्रतिदिन स्तवन करने लगे |

देवता बोले – देवि ! तुम स्वाहा, तुम स्वधा और तुम्हीं विद्या, सुधा एवं ज्योति हो | इस पृथ्वीपर सम्पूर्ण लोकों की रक्षाके लिये तुम्हारा अवतार हुआ है | तुम प्रसन्न होकर सम्पूर्ण जगत का कल्याण करो | हमारी प्रसन्नता के लिये उन परमेश्वर को अपने गर्भ में धारण करो, जिन्होंने स्वयं सम्पूर्ण जगत को धारण कर रखा हैं |

इसप्रकार देवताओंद्वारा की हुई स्तुतिको सुनती हुई माता देवकी ने जगत की रक्षा करनेवाले कमलनयन भगवान विष्णु को अपने गर्भ में धारण किया | तदनंतर वह शुभ समय उपस्थित हुआ, जब की समस्त विश्वरूपी कमल को विकसित करने के लिये महात्मा श्रीविष्णुरूपी सूर्यदेव का देवकी रूपी प्रभातवेला में उदय हुआ | आधी रात का समय था | मेघ मंद-मंद स्वर में गरज रहे थे | शुब मुहूर्त में भगवान जनार्दन प्रकट हुए | उस समय सम्पूर्ण देवता फूलों की वर्षा करने लगे | विकसित नील कमल के समान श्यामवर्ण, श्रीवत्सचिन्ह से सुशोभित वक्ष-स्थलवाले चतुर्भुज बालक को उत्पन्न हुआ देख परम बुद्धिमान वसुदेवजी ने उल्लासपूर्ण वचनों में भगवान का स्तवन किया और कंस से भयभीत होकर कहा- ‘शंख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर ! मैंने जान लिया, आप साक्षात भगवान हैं; परन्तु देव ! आप मुझपर कृपा करके अपने दिव्य रूप को छिपा लीजिये | आप मेरे भवन में अवतीर्ण हुए है, यह बात जान लेनेपर कंस अभी मुझे कष्ट देगा |’

देवकी बोली – जिनके अनंत रूप हैं, यह सम्पूर्ण विश्व जिनका ही स्वरूप हैं, जो गर्भ में स्थित होकर भी अपने शरीर से सम्पूर्ण लोकों को धारण करते हैं तथा जिन्होंने अपनी मायासे ही बाल-रूप धारण किया है, वे देवदेव प्रसन्न हों | सर्वात्मन ! आप अपने इस चतुर्भुज रूपका उपसंहार कीजिये | दैत्यों का संहार करनेवाले देवेश्वर ! आपके इस अवतार का वृतांत कंस न जानने पाये |

श्रीभगवान बोले – देवि ! पूर्वजन्म में तुमने मुझ-जैसे पुत्र को पाने की अभिलाषा से जो मेरा स्तवन किया था, वह आज सफल हो गया; क्योंकि आज मैंने तुम्हारे उदर से जन्म लिया है |

मुनिवरो ! यों कहकर भगवान मौन हो गये तथा वसुदेवजी भी रात में ही उन्हें लेकर घरसे बाहर निकले | वसुदेवजी के जाते समय पहरा देनेवाले मथुरा के द्वारपाल योगनिद्रा के प्रभाव से अचेत हो गये थे | उस रात में बादल वर्षा कर रहे थे | यह देख शेषनागने छत्र की भांति अपने फणों से भगवान को ढँक लिया और वे वसुदेवजी के पीछे-पीछे चलने लगे | मार्ग में अत्यंत गहरी यमुना वह रही थी | उनके जलमें नाना प्रकार की सैकड़ों लहरें उठ रही थी, किन्तु भगवान विष्णु को ले जाते समय वे वसुदेवजी के घुटनोंतक होकर बहने लगीं | वसुदेवजी ने उसी अवस्था में यमुना को पार किया | उन्होंने देखा, नन्द आदि बड़े-बूढ़े गोप राजा कंस का कर लेकर यमुना के तटपर आये हुए हैं | इसीसमय यशोदाजी ने भी योगमाया को कन्यारूप में जन्म दिया | परन्तु वे योगनिद्रा से मोहित थी; अत: ‘पुत्र हैं या पुत्री’ इस बात को जान न सकी | प्रसूतिगृह में और भी जो स्त्रियाँ थी, वे सब निद्रा केर कारण अचेत पड़ी थी | वसुदेवजी ने चुपके से अपने बालक को यशोदा की शय्यापर सुला दिया और कन्याको ;लेकर तुरंत लौट गये | जागनेपर यशोदा ने देखा, ‘मेरे नील कमल के समान श्यामसुंदर बालक हुआ है |’ इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई | वसुदेवजी भी कन्या को लेकर अपने घर लौट आये और देवकी की शय्यापर उसे सुलाकर पहले की भांति बैठ रहे | इतने में ही बालक के रोने का शब्द सुनकर पहरा देनेवाले द्वारपाल सहसा उठकर खड़े हो गये | उन्होंने देवकी के सन्तान होने का समाचार कंस से निवेदन किया | कंस ने शीघ्र ही वहाँ पहुँचकर उस बालिका को उठा लिया | देवकी रुँधे हुए कंठ से ‘छोडो, छोड़ दो इसे’ यों कहकर उसे रोकती ही रह गयीं | कंस ने उस कन्या को एक शिलापर दे मारा; किन्तु वह आकाश में ही ठहर गयी और आयुधोंसहित आठ बड़ी-बड़ी भुजाओंवाली देवी के रूप में प्रकट हुई | उसने ऊँचे स्वर से अट्टहास किया और कंससे रोषपूर्वक कहा – ओ कंस ! मुझे पटकने से क्या लाभ हुआ | जो तेरा वध करेंगे, वे प्रकट हो चुके हैं | देवताओं के सर्वस्वभुत वे श्रीहरि पूर्वजन्म में भी तेरे काल थे | इस सब बातोंपर विचार करके तू शीघ्र ही अपने कल्याण का उपाय कर |’ यों कहकर देवी कंस के देखते-देखते आकाशमार्ग से चली गयी | उसके शरीरपर दिव्या हार, दिव्य चंदन और दिव्य आभूषण शोभा पा रहे थे और सिद्धगण उसकी स्तुति करते थे |

तदनंतर कंस के मन में बड़ा उद्वेग हुआ | उसने प्रलम्ब और केशी आदि समस्त प्रधान असुरों को बुलाकर कहा – ‘महाबाहू प्रलम्ब ! केशी ! धेनुक ! और पूतना ! अरिष्ट आदि अन्य सब वीरों के साथ तुमलोग मेरी बात सुनो | दुरात्मा देवताओं ने मुझे मार डालने का यत्न प्रारम्भ किया हैं | किन्तु वे मेरे पराक्रम से भलीभांति पीड़ित हो चुके हैं | अत: मैं उन्हें वीरों की श्रेणी में नहीं गिनता | दैत्यवीरों ! मुझे तो कन्या की कही हुई बात आश्चर्य-सी प्रतीत होती है | देवता मेरे विरुद्ध प्रयत्न कर रहे हैं – यह जानकर मुझे हँसी आ रही है | तथापि दैत्येश्वरो ! अब हमें उन दुष्टों का और अधिक अपकार करने की चेष्टा करनी चाहिये | देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुई बालिकाने यह भी कहा है कि ‘भुत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी विष्णु, जो पूर्वजन्म में भी मेरी मृत्यु के कारण बन चुके हैं, कहीं-न-कहीं उत्पन्न हो गये |’ अत: इस भूतलपर बालकों के दमन का हमें विशेष प्रयत्न करना चाहिये | जिस बालक में बल की अधिकता जान पड़े, उसे यत्नपूर्वक मौत के घाट उतार देना चाहिये |’

असुर्यों को ऐसी आज्ञा देकर कंस अपने घर गया और विरोध छोडकर वसुदेव तथा देवकी से बोला- ‘मैंने आप दोनों के इतने बालक व्यर्थ ही मारे | मेरे नाश के लिये तो कोई दूसरा ही बालक उत्पन्न हुआ है | आपलोग संताप न करें | आपके बालकों की भवितव्यता ही ऐसी थी | आयु पूरी होनेपर कौन नहीं मारा जाता |’ इसप्रकार सांत्वना दे कंस ने उन दोनों के बंधन खोल दिये और उन्हें सब प्रकार से संतुष्ट किया | तत्पश्चात वह अपने महल के भीतर चला गया |

बंधन से मुक्त होनेपर वसुदेवजी नन्द के छकड़े के पास आये | नन्द बड़े प्रसन्न दिखायी दिये | मुझे पुत्र हुआ है, यह सोचकर वे फूले नही समाते थे | वसुदेवजी ने भी कहा- ‘बड़े सौभाग्य की बात हैं कि इससमय वृद्धावस्था में आपको पुत्र हुआ है | अब तो आपलोगों ने राजा का वार्षिक कर चूका दिया होगा | जिसके लिये यहाँ आये थे, वह काम पूरा हो गया | यहाँ किसी श्रेष्ठ पुरुष को अधिक नही ठहरना चाहिये | नंदजी ! जब कार्य हो गया, तब आपलोग क्यों यहाँ बैठे है | शीघ्र ही अपने गोकुल में जाइये | वहाँ रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न मेरा भी एक बालक हैं | उसका भी अपने ही पुत्र की भांति लालन-पालन कीजियेगा |’

वसुदेवजी के यों कहनेपर नन्द आदि गोप छकड़ोंपर सामान लादकर वहाँ से चल दिये | उनके गोकुलमे रहते समय रात में बालकों की हत्या करनेवाली पूतना आयी और सोये हुए कृष्ण को लेकर अपना स्तन पिलाने लगी | पूतना रातमें जिस-जिस के मुख में अपना स्तन डालती थी, उस-उस बालक का शरीर क्षणभर में निर्जीव हो जाता था | श्रीकृष्ण ने उसके स्तन को दोनों हाथों से पकडकर खूब जोरसे दबाया और क्रोध में भरकर उसके प्राणोंसहित दूध पीना आरम्भ किया | उस राक्षसी के शरीर की नस-नाड़ियों के बंधन छिन्न-भिन्न हो गये | वह जोर-जोरसे कराहती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी | मरते समय उसका शरीर बड़ा भयंकर हो गया | पूतना का चीत्कार सुनकर समस्त व्रजवासी भय के मारे जाग उठे | उन्होंने आकर देखा, पूतना मरी पड़ी है और श्रीकृष्ण उसकी गोद में बैठे है | यह देखकर माता यशोदा थर्रा उठी और श्रीकृष्ण को शीघ्र ही गोदमें उठाकर गाय की पूँछ घुमाने आदि के द्वारा अपने बालक के ग्रह-दोष को शांत किया | नन्द ने भी गाय का गोबर ले श्रीकृष्ण के मस्तक में लगाया और उनकी रक्षा करते हुए इस प्रकार बोले – ‘समस्त प्राणियों की उत्पत्ति करनेवाले भगवान श्रीहरि, जिनके नाभिकमल से सम्पूर्ण जगत उत्पन्न हुआ हैं, तुम्हारी रक्षा करें | जिनकी दाढ के अग्रभागपर रखी हुई यह पृथ्वी सम्पूर्ण जगत को धारण करती हैं, वे वराहरूपधारी केशव तुम्हारी रक्षा करें | तुम्हारें गुदाभाग और उदर की रक्षा भगवान विष्णु तथा जंघा और चरणों की रक्षा श्रीजनार्दन करें | जो एक ही क्षण में वामन से विराट बन गये और तीन पगों से सारी त्रिलोकी को नापकर नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न दिखायी देने लगे, वे भगवान वामन तुम्हारी सदा रक्षा करे | तुम्हारे सिर की गोविन्द तथा कंठ की केशव रक्षा करें |

इसप्रकार नंदगोपद्वारा स्वस्तिवाचन होनेपर बालक श्रीकृष्ण छकड़े के नीचे एक खटोलेपर सुलाये गये | गोपों को मरी हुई पूतना का विशाल शरीर देखकर अत्यंत भय और आश्चर्य हुआ | इ कदीन की बात हैं, मधुसुदन श्रीकृष्ण छकड़े के नीचे सोये हुए थे | उससमय वे दूध पीने ले ;लिये जोर-जोरसे रोने लगे | रोते – ही – रोते उन्होंने अपने दोनों पैर ऊपर की ओर फेंकने आरम्भ किये | उनका एक पैर छकड़े से छू गया | उसके हल्के आघात से ही वह छकड़ा उलटकर गिर पड़ा | उसपर र्केह हुए मटके और घड़े आदि टूट-फुट गये | उससमय समस्त गोप-गोपियाँ हाहाकार करती हुई वहाँ आ पहुँची | उन्होंने देखा, ‘बालक श्रीकृष्ण उतान सोये हुए है |’ तब गोपों ने पूछा – ‘किसने इस छकड़े को उलट दिया ?’ वही कुछ बालक खेल रहे थे | उन्होंने कहा ‘ इस बच्चे ने ही गिराया है |’ यह सुनकर गोपों के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ | नन्दगोप ने अत्यंत विस्मित होकर बालक को गोद में उठा लिया | यशोदा ने भी आश्चर्यचकित हो टूटे-फूटे भाँड़ो के टुकड़ों और छकड़े की दही, फूल, फल और अक्षत से पूजा की |

एक दिन वसुदेवजी की प्रेरणा से गर्गजी गोकुल में आये और अन्य गोपों से छिपे-छिपे ही उन्होंने उन दोनों बालकों के द्विजोचित संस्कार किये | उनके नामकरण –संस्कार करते हुए परम बुद्धिमान गर्गजी ने बड़े बालक का नाम ‘राम’ और छोटे का ‘कृष्ण’ रखा | थोड़े ही दिनों में वे दोनों बालक महाबलवान के रूप में प्रसिद्ध हो गये | घुटनों के बलसे चलने के कारण उनके दोनों घुटनों और हाथों में रगड़ पड़ गयी थी | वे शरीर में गोबर और राख लपेटे इधर-उधर घुमा करते थे | यशोदा और रोहिणी उन्हें रोक नही पाती थी | कभी गौओ के बाड़े में खेलते-खेलते बछड़ों के बाड़े में निकल जाते थे | कभी उसी दिन पैदा हुए बछड़ों की पूँछ पकडकर खींचने लगते थे | वे दोनों बालक एक ही स्थानपर साथ-साथ खेलते और अत्यंत चपलता दिखाते थे | एक दिन, जब यशोदा उन्हें किसी प्रकार रोक न सकीं, तब उनके मनमें कुछ क्रोध हो आया | उन्होंने अनायास ही बड़े-बड़े कार्य करनेवाले श्रीकृष्ण की कमर में रस्सी कस दी और उन्हें ऊखल से बाँध दिया | उसके बाद कहा – ‘ओ चंचल ! तू बहुत ऊधम मचा रहा था | अब तुझमें समार्थ्य हो तो जा |’ यों कहकर गृहस्वामिनी यशोदा अपने काम-काज में लग गयीं | जब यशोदा घरके काम-धंधे में फँस गयीं, तब कमलनयन श्रीकृष्ण ऊखल को घसीटते हुए दो अर्जुन वृक्षों के बीच से जा निकले | वे दोनों वृक्ष जुड़वे उत्पन्न हुए थे | उन वृक्षों के बीच में तिरछी पड़ी हुई ऊखली को ज्यों ही उन्होंने खींचा, उसी समय ऊँची शाखाओंवाले वे दोनों वृक्ष जड़ से ऊखडकर गिर पड़े | वृक्षों के उखड़ते समय बड़े जोर से कडकडाहटकी आवाज हुई | उसे सुनकर समस्त व्रजवासी कातरभाव से वहाँ दौड़े आये | आनेपर सबने देखा वे दोनों महावृक्ष पृथ्वीपर गिरे पड़े हैं | उनकी मोटी-मोटी डालियाँ और पतली शाखाएँ भी टूट-टूटकर बिखर गयी हैं | उन दोनों के बीच में बालक कृष्ण मंद-मंद मुसकरा रहा है | उसके खुले हुए मुख से थोड़े से दांत झलक रहे हैं | उसकी कमर में खूब कसकर रस्सी बँधी हुई है | ऊदर में दाम (रस्सी) बाँधने के कारण की श्रीकृष्ण की दामोदर के नामसे प्रसिद्धि हुई |

तदनंतर नन्द आदि समस्त बड़े-बड़े गोप, जो बड़े-बड़े उत्पातों के कारण बहुत डर गये थे, उद्धिग्न होकर आपसमें सलाह करने लगे – ‘अब हमें इस स्थानपर रहने की कोई आवश्कता नहीं हैं | किसी दूसरे महान वन में चलना चाहिये | यहाँ नाश के हेतुभूत अनेक उत्पात देखे जाते हैं – जैसे पूतना का विनाश, छकड़े का उलट जाना और बिना आँधी वर्षा के ही दोनों वृक्षों का गिरना आदि | अत: अब हम बिलम्ब न करके शीघ्र ही यहाँ से वृन्दावन को चल दें | जबतक कोई भूमिसंबंधी दूसरा महान उत्पात व्रज को नष्ट न कर दे, तबतक ही हमें उसकी व्यवस्था कर लेनी चाहिये |’ इस प्रकार वहाँ से चले जाने का निश्चय करके समस्त व्रजवासो अपने-अपने कुटुंब के लोगों से कहने लगे – ‘शीघ्र चले, विलम्ब न करो |’ फिर तो एक ही क्षण में छकड़ों और गौओं के साथ सब लोग वहाँ से चल दिये | बछड़ों के चरवाहे झुण्ड -के – झुण्ड एक साथ होकर उन बछड़ों को चराते हुए चलते थे | व्रज का वह खाली किया हुआ स्थान अन्न के दाने बिखरे होने के कारण क्षणभर में कौए आदि पक्षियों से व्याप्त हो गया | अत: अत्यंत रुक्ष ग्रीष्मकाल में भी वहाँ सब ओर वर्षाकाल की भांति नयी-नयी घास जम गयी | वृन्दावन में पहुँचकर वह समस्त गोप-गौओं का समुदाय चारों ओरसे अर्धचन्द्रकार छकड़ों की बाड़ लगाकर बस गया | और वृन्दावन धाम का चिन्तन किया |

तत्पश्चात बलराम और श्रीकृष्ण बछड़ों की चरवाही करने लगे | गोष्ठ में रहकर वे दोनों भाई अनेक प्रकार की बाल लीलाएँ किया करते थे | मोर के पंख का मुकुट बनाकर पहनते, जंगली पुष्पों को कानों में धारण करते, कभी मुरली बजाते, उन्ही के छिद्रों से तरह-तरह की ध्वनि निकालते थे | दोनों काक-पक्षधारी बालक हँसते-खेलते हुए उस महान वनमें विचरण करते थे | कभी आपस में ही एक-दूसरे को हँसाते हुए खेलते और कभी दूसरे ग्वालबालों के साथ बालोचित क्रीड़ाएँ करते फिरते थे | इससमय समय बीतने पर बलराम और श्रीकृष्ण सात वर्ष के हो गये | जो सम्पूर्ण जगत का पालन करनेवाले हैं, वे उस महाव्रज में बछड़ों के पालक बने हुए थे | धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतू के बाद वहाँ वर्षाका समय आया | मेघों की घटासे सम्पूर्ण आकाश आच्छादित हो गया | निरंतर धारावाहिक वृष्टि होने से सम्पूर्ण दिशाएँ एक-सी जान पढती थी | पानी पड़ने से नयी-नयी घास उग आयी | स्थान-स्थानपर बीरबहूटीयों से पृथ्वी आच्छादित हो गयी | जैसे पन्ने के फर्शपर लाल मणि की ढेरी शोभा पाती है | जैसे नूतन सम्पत्ति पाकर उद्धत मनुष्यों के मन कुमार्ग में प्रवृत्त होने लगते हैं, उसी प्रकार वर्षा के जल से भरी हुई नदियों का पानी बाँध तोडकर तटके ऊपरसे बहने लगा | संध्या होनेपर महाबली राम और श्रीकृष्ण इच्छानुसार व्रज में लौट आते और अपने समवयस्क ग्वाल बालों के साथ देवताओं की भान्ति क्रीडा करते थे |

– नारायण नारायण –