BrahmGyani ki Drishti AmritVarshi – Aatm Shiv ki Aaraadhna

brahmgayani

*सुख मन को होता है, सुविधा शरीर को होती है | असुविधा शरीर को होती है और सुख-दुःख मन को होता है |

*सुख अनुकूलता से आता है, मन सुखी होता है | दुःख प्रतिकूलता से आता है, मन दुखी होता है |

* बच्चा चलते-चलते गिर पड़ता है लेकिन हर समय रोकर नही उठता है | चोट तो लगी |
लेकिन जब तक उसकी दुखाकार वृति पैदा नही होती तब तक वो दुखी नही होता है |

*बच्चा चलते-चलते गिर पड़ता है, लेकिन दुखाकार वृति उत्पन नही हुई तो वो दुखी नही होता है |तो आपकी वृति उत्पन होती है दुखाकार तब आप अपने को दुखी मानते हैं |सुखाकार वृति उत्पन होती है तो आप अपने को सुखी मानते हैं |

*आप बीमार हो या तंदुरुस्त ? बाबाजी! हम कभी बीमार हो जाते हैं, कभी तंदुरुस्त | आप अच्छे आदमी हो कि बुरे हो ? बाबा! कभी-कभी तो अच्छे, अभी तो बहुत अच्छे हैं | इस समय तो हम लोग बहुत अच्छे हैं |

* तो तुम बुरे आदमी हो के भले आदमी हो ? बाबा हम तो कभी भले आदमी कभी बुरे आदमी |

*हम गलती क्या करते हैं? कि अपने शिव स्वभाव से भूले, आत्मशिव की पूजा नही जानते इसलिए इन वृतियों के साथ जुडकर जूझते रहते हैं | जैसे तरंगों को देखते हो तो आलाह्दित रहते हो, लेकिन दरिया की तरंगों से जुड़ते हो तो थपेड़े खाने पड़ते हैं |