Category Archives: संत वाणी

‘बॉलीवुड के हीरो को जेल और बेल’और ‘संतों को जेल’ ।। शांतिदूत श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

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सिंहस्थ कुंभ उज्जैन 2016- शांतिदूत श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा- “बॉलीवुड के हीरो को जेल और बेल”और “संतों को जेल”

(1) हिंदू धर्म साधु संत,गुरु ,मठ ,मंदिर आदि जगह से ही चलता है, आज इन्ही जगहों को टारगेट किया जा रहा है |

(2) जब भी हिंदू साधू संतों की बात होती है तो उन्हें तुरंत अरेस्ट कर लिया जाता है, जबकि मौलवी,फादर या किसी अन्य पर आरोप होता है तो भारत का कानून शांति का गुरु बन जाता है ।

(3) भारत के कानून में जंग लगी पड़ी है, देश को आगे बढ़ाना है तो कानून में बदलाव होना जरुरी है |

(4) बापूजी को बेल न देकर ही सबसे बड़ा गुनाह हो रहा है विशेष तौर पर कुछ-न-कुछ साजिश तो जरूर है |

(5) हमारे धर्म को किसी ने इतनी चोट नहीं पहुंचाई जितना हमारे अपने लोगों ने पहुँचाया |

पूज्य बापू जी के सद्गुरु साईं श्री लीलाशाहजी महाराज द्वारा पूज्य श्री को लिखा हुआ पत्र

दिनांक : 10 मार्च 1969
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प्रिय, प्रिय आशाराम !

विश्वरूप परिवार से खुश-प्रसन्न हो | तुम्हारा पत्र मिला | समाचार जाना |

जब तक शरीर है, तब तक सुख-दुःख, ठंडी-गर्मी, लाभ-हानि , मान-अपमान होते रहते हैं | सत्य वस्तु परमात्मा में जो संसार प्रतीत होता है वह आभास है | कठिनाईयां तो आती-जाती रहती हैं |

अपने सत्संग-प्रवचन में अत्यधिक सदाचार और वैराग्य की बातें बताना | सांसारिक वस्तुएं , शरीर इत्यादिक हकीकत में विचार दृष्टि से देखें तो सुन्दर नहीं है, आनंदमय नहीं है, प्रेम करने योग्य नहीं है और वे सत्य भी नहीं है – ऐसा दृष्टान्त देकर साबित करें | जैसे शरीर को देखें तो वह गंदगी और दुःख का थैला है | नाक से रेंट , मुंह से लार, त्वचा से पसीना, गुदा से मल, शिश्नेंद्रिय से मूत्र बहते रहते हैं | उसी प्रकार कान, आँख से भी गंदगी निकलती रहती है | वायु शरीर में जाते ही दूषित हो जाती है | अन्न-जल सब कफ-पित्त और दूसरी गंदगी में परिणत हो जाते हैं | बीमारी व बुड़ापे में शरीर को देखें | किसी की मौत हो जाए तो शरीर को देखें | उसी मृत शरीर को कोई कमरे में चार दिन रखकर बाहर निकाले तो कोई वहां खड़ा भी नहीं रह सकता | विचार करके देखने से शरीर की पोल खुल जाएगी | दूसरी वस्तुओं की भी ऐसी ही हालत समझनी चाहिए | आम कितना भी अच्छा हो , 3-4 हफ्ते उसे रखे रहोगे , तो सड़ जाएगा, बिगड़ जाएगा | इतनी बदबू आएगी कि हाथ लगाने में भी घृणा होगी | इस प्रकार के विचार लोगों को अधिक बताना ताकि उनके दिमाग में पड़ी मोह की परतें खुल जायें |

नर्मदा तट जाकर 10-15 दिन रहकर आना | दो बार स्नान करना | अपने आत्मविचार में, वेदांत ग्रंथ के विचारों में निमग्न रहना | विशेष जब रू-बरू मुलाक़ात होगी तब बतायेंगे |

बस अब बंद करता हूँ | शिव !

हे भगवान ! सबको सद्बुद्धि दो , शक्ति दो , निरोगता दो | सब अपने-अपने कर्त्तव्य का पालन करें और सुखी रहें |

हरी ॐ शांति, शांति |

लीलाशाह

सदगुरु की याद में

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अपने गुरुदेव पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज के लिए मैं क्या कहूँ? सचमुच, मेरा हृदय भावविभोर हो उठता है। ऐसे पहुँचे हुए महापुरुष की महिमा का वर्णन किये बिना रहा भी कैसे जा सकता है?

मैं तीन वर्ष का था तभी से भगवान के भजन ऐसे ही गुनगुनाता था। पाँच वर्ष का हुआ तब झुलेलाल को रिझाता था क्योंकि मेरा जन्म सिंधी जाति में हुआ था। कुछ वर्ष तक ऐसा किया, फिर भी लगता था कि कोई पूजा बाकी रह जाती है।

फिर पहुँचा पीपल देवता के पास। ‘पीपल में भगवान हैं’ इस भाव से पीपल के आगे भोजन धरता, आलिंगन करता, उसकी जड़ को भगवान के चरण मानकर दबाता। यह सब किया… फिर माँ काली की आराधना की, श्री कृष्ण को रिझाया, शिवजी को रिझाया… न जाने कितनों-कितनों को रिझाया? 21 वर्ष तक ऐसा सब करता रहा। अनजाने में थोड़े चमत्कार भी होते। कई ऋद्धि-सिद्धियाँ भी हासिल कीं, फिर भी कुछ बाकी रहता था।

घूमते-घामते मैं वृंदावन गया। वहाँ भी श्रीकृष्ण की मूर्ति मिली, श्रीकृष्ण न मिले। रणछोड़राय के दर्शन करने गया तो पुजारियों की भीड़ मिली। केदारनाथ गया तो केदारनाथजी की मूर्ति एवं पुजारियों का झुंड मिला। काशी गया पर विश्वनाथ की मुलाकात न हुई। जो-जो मंदिर दिखते वहाँ-वहाँ जाता पर देखता कि मंदिर के देव तो हैं, मूर्ति तो विद्यमान है परंतु मंदिर के देव कुछ बोलते नहीं हैं।

उसके बाद मौत का सामना करना पड़े ऐसे दुर्गम स्थलों पर जाकर उग्र साधनाएँ की। सभी कष्टदायक तितिक्षाओं के बाद अंत में भटकता-भटकता जब नैनिताल के जंगलों में विद्यमान पूज्यपाद सदगुरुदेव श्री लीलाशाहजी महाराज के श्रीचरणों में पहुँचा तब मानो, सभी तितिक्षाओं का, सभी साधनाओं का अंत आया। पूज्यपाद गुरुदेव ने मुझे मेरे घर में ही घर बता दिया। दिल में ही दिलबर के दीदार करवा दिये, परम तत्त्व का ज्ञान करवा दिया।

हम न हँसकर सीखे हैं न रोकर सीखे हैं।

जो कुछ भी सीखे हैं, सदगुरु के होकर सीखे हैं।।

सदगुरु देव द्वारा प्राप्त हुए आध्यात्मिक खजाने के आगे त्रिलोकी का साम्राज्य भी तुच्छ है। सबसे पहले पूज्य सदगुरु देव के दर्शन मुझे नैनिताल के जंगलों में हुए। उस समय तीस दिन तक उनके श्रीचरणों में रहकर उनके निकट से दर्शन करने का मौका मिला। उसके बाद कभी-कभार उनके पास जाता तब अलग-अलग जगहों पर, अलग-अलग प्रसंगो पर उनका व्यवहार, उनकी ज्ञाननिष्ठा, उनकी समझ, उनकी उदारता, उनकी सूक्ष्म एवं दीर्घ दृष्टि, उनके विनोद वगैरह का अनुभव कराने वाले अनेक अवसर मिले।

उनके मधुर नेत्रों से हमेशा प्रेम-अमृत बरसता था। लोगों के साथ के उनके व्यवहार में मुझे अखंड धैर्य, प्रसन्नता, अथाह सामर्थ्य, निश्चयबल एवं आत्मीयता जैसे दैवी गुणों के दर्शन हुए।