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सदगुरु की याद में

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अपने गुरुदेव पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज के लिए मैं क्या कहूँ? सचमुच, मेरा हृदय भावविभोर हो उठता है। ऐसे पहुँचे हुए महापुरुष की महिमा का वर्णन किये बिना रहा भी कैसे जा सकता है?

मैं तीन वर्ष का था तभी से भगवान के भजन ऐसे ही गुनगुनाता था। पाँच वर्ष का हुआ तब झुलेलाल को रिझाता था क्योंकि मेरा जन्म सिंधी जाति में हुआ था। कुछ वर्ष तक ऐसा किया, फिर भी लगता था कि कोई पूजा बाकी रह जाती है।

फिर पहुँचा पीपल देवता के पास। ‘पीपल में भगवान हैं’ इस भाव से पीपल के आगे भोजन धरता, आलिंगन करता, उसकी जड़ को भगवान के चरण मानकर दबाता। यह सब किया… फिर माँ काली की आराधना की, श्री कृष्ण को रिझाया, शिवजी को रिझाया… न जाने कितनों-कितनों को रिझाया? 21 वर्ष तक ऐसा सब करता रहा। अनजाने में थोड़े चमत्कार भी होते। कई ऋद्धि-सिद्धियाँ भी हासिल कीं, फिर भी कुछ बाकी रहता था।

घूमते-घामते मैं वृंदावन गया। वहाँ भी श्रीकृष्ण की मूर्ति मिली, श्रीकृष्ण न मिले। रणछोड़राय के दर्शन करने गया तो पुजारियों की भीड़ मिली। केदारनाथ गया तो केदारनाथजी की मूर्ति एवं पुजारियों का झुंड मिला। काशी गया पर विश्वनाथ की मुलाकात न हुई। जो-जो मंदिर दिखते वहाँ-वहाँ जाता पर देखता कि मंदिर के देव तो हैं, मूर्ति तो विद्यमान है परंतु मंदिर के देव कुछ बोलते नहीं हैं।

उसके बाद मौत का सामना करना पड़े ऐसे दुर्गम स्थलों पर जाकर उग्र साधनाएँ की। सभी कष्टदायक तितिक्षाओं के बाद अंत में भटकता-भटकता जब नैनिताल के जंगलों में विद्यमान पूज्यपाद सदगुरुदेव श्री लीलाशाहजी महाराज के श्रीचरणों में पहुँचा तब मानो, सभी तितिक्षाओं का, सभी साधनाओं का अंत आया। पूज्यपाद गुरुदेव ने मुझे मेरे घर में ही घर बता दिया। दिल में ही दिलबर के दीदार करवा दिये, परम तत्त्व का ज्ञान करवा दिया।

हम न हँसकर सीखे हैं न रोकर सीखे हैं।

जो कुछ भी सीखे हैं, सदगुरु के होकर सीखे हैं।।

सदगुरु देव द्वारा प्राप्त हुए आध्यात्मिक खजाने के आगे त्रिलोकी का साम्राज्य भी तुच्छ है। सबसे पहले पूज्य सदगुरु देव के दर्शन मुझे नैनिताल के जंगलों में हुए। उस समय तीस दिन तक उनके श्रीचरणों में रहकर उनके निकट से दर्शन करने का मौका मिला। उसके बाद कभी-कभार उनके पास जाता तब अलग-अलग जगहों पर, अलग-अलग प्रसंगो पर उनका व्यवहार, उनकी ज्ञाननिष्ठा, उनकी समझ, उनकी उदारता, उनकी सूक्ष्म एवं दीर्घ दृष्टि, उनके विनोद वगैरह का अनुभव कराने वाले अनेक अवसर मिले।

उनके मधुर नेत्रों से हमेशा प्रेम-अमृत बरसता था। लोगों के साथ के उनके व्यवहार में मुझे अखंड धैर्य, प्रसन्नता, अथाह सामर्थ्य, निश्चयबल एवं आत्मीयता जैसे दैवी गुणों के दर्शन हुए।