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आप क्या चाहते है ? – पूज्य आशाराम बापूजी

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आप क्या चाहते है ? – पूज्य बापूजी 
आवश्यकताएँ कम करो | कम आवश्यकता में आप बादशाह बन जाओगे | जो बचा हुआ समय है, वह ईश्वर में लगा दो तो महान बन जाओगे | ॐ …. ॐ…. ॐ…
हर आदमी एक शक्तिपुंज है | हर आदमी से उसके विचारों के आंदोलन फैलाते हैं | भूमि में तमाम प्रकार के रस छुपे हैं | इन बाह्य आँखों से वह नहीं दीखता | एक ही जमीन लेकिन जैसा बीज होता है वैसा सर्जन होता है, जैसे – गन्ना, बाजरा, गेंहूँ इत्यादि | ऐसे ही हममें भी अनंत-अनंत रस भरा है, अनंत-अनंत क्षमताएँ भरी हैं | हमको जैसा बाहर से वातावरण मिलता है, उसी प्रकार की अंदर सिंचाई होती है |
आपके पास बाह्य जगत का कितना ज्ञान या धन है, यह मूल्यवान नहीं है | परमात्मा यह पूछता है कि आप क्या चाहते है ? आपको किस चीज की प्यास है ? किसको चाहते हो, श्वाश्व्त सुख चाहते हो या नश्वर ? नश्वर से जन्म-मरण, नरक-स्वर्ग की प्राप्ति एवं शाश्वत सुख से परमात्मा की प्राप्ति होगी | अहं को विकसित करना चाहते हो या विसर्जित करना चाहते हो ? जन्म-मरण का सामान बढ़ाना चाहते हो ? आपके पास क्या है इसका मूल्य नहीं है लेकिन आप क्या है इसका मूल्य है | आप जिज्ञासु है, भक्त हैं, साधक हैं कि फिर संसार के मजदूर हैं ? सब इकट्ठा किया, बनाया, कुटुम्बियों-मित्रों को खुश रखा लेकिन मौत का झटका आया, सब चला गया – ये हैं संसार के मजदूर !
आप संसार के मजदुर हो या संसार को साधन बनाकर उपयोग करते हुए अपनी यात्रा तय करनेवाले पथिक हो ? आपमें भगवान को पाने की तडप हैं या हाड-मांस के मरनेवाले शरीर की प्रतिष्ठा चाहते हो ? संसार के मजदुर से जिज्ञासु बहुत ऊँचा होता है | रावण ने सोने की लंका पायी परंतु एक टोला भी सोना अपने साथ ले नहीं गया | संत कबीरजी कहते हैं :
क्या करिये क्या जोडीये थोड़े जीवन काज |
छोड़ी-छोड़ी सब जात हैं देह गेह धन राज ||
शरीर को, धन को, राज्य को सब छोड़-छोडकर जा रहें है | सब चला-चली का मेल है | छूटनेवाले, मरनेवाले शरीर से अमर आत्मा की यात्रा कर लो | शरीर ख़ाक में मिले उसके पहले अपनी वासना, अनात्म अज्ञान को खाक में मिला दो | यह अपने हाथ की बात है | कुटुम्बी अर्थी पर बाँधकर श्मशान में जला दें उसके पहले ही अपनी समझ से अपने-आपको भगवान के चरणों में सौंप दो | जिन्होंने शरीर, मन, बुद्धि का सदुपयोग किया वे सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रम्ह स्वरुप में रहे और जो असत, जड़, दुःख में ही भटकते रहेंगे | इसलिए आँखों की रौशनी कम होने लगे उसके पहले भीतर की आँख खोल दो | बेडा पार हो जायेगा ! बहुएँ मुँह मोड़ लें उसके पहले अभी से संसार से मुँह लो तो बुढ़ापे में पश्चाताप नहीं होगा |
चाहे हरिभजन कर चाहे विषय कमाय |
चाहो तो परमात्मा का भजन कर मुक्त हो जाओ, अपनी २१ पीढ़ियों का उद्धार करो और चाहो तो हाय-हाय करके जगत की चीजे सँभालो, बटोरो और अंत में मृत्यु का झटका लगते ही छोड़ दो |
नौकरी-धंधा करने की मना नहीं हैं | यह सब करके अपनी आवश्यकता है श्वास लेने की, बिना परिश्रम के पूरी होती है | पानी और भोजन की आवश्यकता भी थोड़े परिश्रम से पूरी हो जाती है | लेकिन इच्छाएँ बढ़ जाती है तो बंधन होता है | जिस शरीर को जलाना है उसीको लाड लड़ाते रहते है और जो लाड लड़ाते है उन्हींकी हम नकल की जाय तो हमारा कल्याण हो जाय ! शुकदेवजी, संत कबीरजी, संत तुकारामजी, एकनाथजी महाराज, ज्ञानेश्वरजी महाराज, मीराबाई, स्वयंप्रभा, सुलभा, साँई लीलाशाहजी महाराज आदि की ऊँचाई को देखकर हम अपनी सच्ची आवश्यकता व स्वभाव बनाये तो आसानी से मुक्त हो सकते है |

अलख पुरुष की आरसी – पूज्य आशाराम बापूजी

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अलख पुरुष की आरसी – पूज्य बापूजी
संत कबीरजी से किसीने कहा : “हम निर्गुण, निराकार परमात्मा को देख नहीं पाते, फिर भी देखे विना रह न जायें ऐसा कोई उपाय बताइये |”
कबीरजी ने कहा : “परमात्मा को देखने के लिए ये चमड़े की आँखे काम नहीं आतीं | इन आखों से तो परमात्मा नहीं दिखेगा परंतु यदि तुम देखना ही चाहते हो तो जिनके ह्रदय में आत्मस्वरुपाकार वृत्ति प्रकट हुई है, जिनके ह्रदय में समतारूपी परमात्मा प्रगट हुआ है, अद्वैत ज्ञानरुपी परमात्मा प्रकट हुआ हाउ ऐसे किन्ही महापुरुष को तुम देख सकते हो | जिन्हे देखकर तुम्हें परमात्मा याद आ जायें, जिस दिल में ईश्वर निरावरण हुआ है, उन संत-महापुरुष को देख सकते हो |
अलख पुरुष की आरसी साधू का ही देह | लखा जो चाहे अलख को इन्हीं में तू लख लेह ||
साधू की देह एक ऐसा दर्पण है जिसमें तुम उस अलख पुरुष परमात्मा के दर्शन कर सकते हो | इसलिए अलख पुरुष को देखना चाहते हो तो ऐसे किन्हीं परमात्मा के प्यारे आत्मसाक्षात्कारी परमत्मास्वरुप संत का बार-बार सत्संग व सान्निध्य पाना चाहिए |
शुद्ध ह्रदय से, ईमानदारी से उन महापुरुष के गुणों का चिंतन करके ह्रदय को धन्यवाद से भरते जाओगे तो तुम्हारे ह्रदय में उस परमात्मा को प्रकट होने में देर न लगेगी | परमात्मा को पाना इतना सरल होते हुए भी लोग इसका फायदा तो ले नहीं पाते वरन अपनी क्षुद्र मति से उनको नापते रहते हैं और अपना ही नुकसान करते हैं |
वशिष्ठजी महाराज कहते हैं : “ हे रामजी !  अज्ञानी जो कुछ मेरे लिए कहते और हँसते हैं, सो सब मैं जानता हूँ परंतु मेरा दया को स्वभाव है, इससे मैं चाहता हूँ कि किसी प्रकार वे नरकरूप संसार से निकलें | इसी कारण मैं उपदेश करता हूँ |”
अयोध्या नरेश दशरथ जिनले चरणों में अपना सिर झुकाकर अपने को सौभाग्यशाली मानते है और श्रीराम जिनके शिष्य हैं, ऐसे गुरु वसिष्ठजी को भी उन निंदकों ने क्या-क्या नहीं कहा होगा ? तो तुम्हारे लिए भी कोई कुछ कह दे तो चिंता मत करना |
अपनी महिमा में मस्त रहनेवाले संतों-महापुरुषों पर लोगों की अच्छी-बुरी बातों का कोई असर नहीं पड़ता है परंतु जो संतों का आदर, पूजन, सेवा करता है वह अपना भाग्य उज्ज्वल बनाता है, उसका ह्रदय आत्मसुख से सम्पन्न होने लगता है और जो उनकी निंदा करता है वह अपने भाग्य को अंधकार में डालता है | संतों की नजर में कोई अच्छा-बुरा नही होता है | संतों की नजर में तो बस, केवल वही होता है – एक्मेवाद्वितीयोsहम |   
जिसकी जैसी भावना, जिसकी जैसी दृष्टी और जिसका जैसा प्रेम, वैसा ही उसको लाभ या हानि होती है |
करमी आपो आपनी के नेडै के दूरि |
अपनी ही करनी से, अपने ही भावों से आप स्वयं को अपने गुरु के, संत के नजदीक अनुभव करते हो और अपने ही भावों से दुरी का अनुभव करते हो | संत के ह्रदय में अपना-पराया कुछ नहीं होता है लेकिन कलियुगी अल्प मतिवाले गलत बात तो बहुत जल्दी स्वीकार कर लेंगे, अच्छी बात को स्वीकार नहीं करेंगे | सच्चाई फ़ैलाने में तो जीवन पूरा हो जाता है परंतु कुछ अफवाह फैलानी है तो फटाफट फ़ैल जाती है | जो लोग तुरंत कुप्रचार के शिकार बन जाते हैं वे अल्प मतिवाले हैं, उनकी विचारशक्ति कुंठित हो गयी है |
गुजरात में नरसिंह मेहता नाम के प्रसिद्द संत हो गये | उनके लिए भी ईर्ष्यालु लोगों ने कई बार अफवाहें फैलायी थी, गलत बातों का खूब प्रचार किया था लेकिन अफवाहें फैलानेवाले कौन-से नरक में गये होंगे, किस माता के गर्भ में लटकते होंगे यह हम और तुम नहीं जानते परंतु नरसिंह मेहता को तो आज भी करोड़ों लोग जानते-मानते हैं, आदर से उनका नाम लेते हैं |
नरसिंह मेहता के बारे में जब अफवाहें गलत साबित हुई, जब लोगों को पता चला कि नरसिंह मेहता की दृढ़ भक्ति के कारण चमत्कार होते हैं तो चमत्कार के प्यारे उनके आस-पास इकट्टे होते रहते थे | वे चमत्कार के भक्त थे, नरसिंह मेहता के भक्त नहीं थे |
ऐसा कई संतो के साथ होता है | जब तक सब ठीक लगता है तब तक तो लोग संत के साथ होते है, अपने को संत का भक्त कहलाते हैं किंतु जरा-सी कुछ दिक्कत लगी कि खिसक जाते है | ऐसे लीग सुबिधा के भक्त होते है, संत के भक्त नहीं होते | संत का भक्त वही है कि कितनी भी विपरीत परिस्थिति आ जाय किंतु उसका भक्तिभाव नहीं छूटता | सुविधा के भक्त तो कब उलझ जायें, कब भाग जायें पता नहीं | जो नि:स्वार्थ भक्त होते हैं वे अडिंग रहते हैं, कभी फरियाद नहीं करते | वे तो संत के दर्शन, सत्संग से और उनकी महिमा का गुणगान करके आनंदित, उल्लसित, रोमांचित होते है | किसीकी निंदा या विरोध से संत को कोई हानि नहीं होती और किसीके द्वारा प्रशंसा करने से वे बड़े नहीं हो जाते |
सच्चे संतों का आदर-पूजन जिनसे नहीं सहा गया, ऐसे ईर्ष्यालु लोगों ने ही जोर-शोर से कुप्रचार किया है | संतो के व्यवहार को पाखंड बताकर मानो उन्होंने ही धर्म के प्रचार का ठेका उठाया है | ऐसे लोगों को पता ही नहीं कि वे क्या कर रहे हैं | जब कबीरजी आये तब निंदकों ने कहा : ‘हम धर्म की जजय कर रहें हैं |’ तब सुकरात आये तब राजा तथा अन्य कुछ लोगों ने कहा “ ‘हम धर्म की जय कर रहे हैं |’ इस प्रकार संतों पर जुल्म किये गये |
पिछले दो हजार वर्षों में जो धर्म-पंथ हुए हैं, उन्होंने हिन्दू धर्म की गरिमा को न जानकर ऐसी-ऐसी साजिशे की कि हिन्दू हाथे बन गये साजिश के और आपस में लड़ –भिड़े | अपने ही लोग संतों की निंदा करके हिन्दू संकृति को क्षीण करने का जघन्य अपराध करते आ रहे हैं | लेकिन चाहे कैसी भी मुसीबतें आयी  तो भी जो सच्चे भक्त थे, श्रद्धालु थे, उन लोगों ने सच्चे संतों की शरण नहीं छोड़ी और दैवी कार्य नहीं छोड़ा | निंदा की दलदल में फँसे नहीं, कुप्रचार के आँधी – तूफानों में पतझड़ की नाई गिरे नहीं; डटे रहे, धनभागी हुए | संत कबीरजी के साथ सलूका-मलूका, गुरु नानकजी के साथ बाला-मरदाना ऐसे श्रद्धालु शिष्य थे, जिनके नाम इतिहास में अमर हो गये |इसी प्रकार तुकारामजी महाराज, ज्ञानेश्वरजी महाराज, संत एकनाथजी, रामसुखदासजी महाराज, सांई टेऊँरामजी, सांई लीलाशाहजी महाराज )और संत आशारामजी बापू ) आदि सभी संतों के प्रति निंदकों ने अपने लक्षण दिखाये व सज्जनों ने अपनी सज्जनता से फायदा उठाया | वे सौभाग्यशाली सज्जन यहाँ भी सुख-शांति व परमात्म-ध्यान की प्राप्ति में सफल हुए व परलोक में भी सफल हुए और होते रहेंगे |
शिवजी कहते हैं : धन्या माता ….
धन्य हैं वे शिष्य, जो अलख पुरुष की आरसी स्वरुप ब्र्म्हवेत्ता संतो को श्रद्धा-भक्ति से देखते हैं और उनसे आखिरी डीएम तक निभा पाते हैं | जो निंदा या कुप्रचार के शिकार बनाकर अपनी शांति का घात नहीं करते वे बडभागी है |    
             

आत्मज्ञान – पूज्य बापूजी की ज्ञानमयी अमृतवाणी

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आत्मज्ञान के प्रकाश से अँधेरी अविद्या को मिटाओ – पूज्य बापूजी की ज्ञानमयी अमृतवाणी

मिथ्या प्रपंच देख दुःख जिन आन जीय ।
देवन को देव तू तो सब सुखराशि है ॥
अपने अज्ञान ते जगत सारो तू ही रचा ।
सबको संहार कर आप अविनाशी है ॥
यह संसार मिथ्या व भ्रममात्र है लेकिन अविद्या के कारण सत्य भासता है । नश्वर शरीर में अहंबुद्धि तथा परिवर्तनशील परिस्थितियों में सत्यबुद्धि हो गयी है इसीलिये दुःख एवं क्लेश होता है । वास्तव में देखा जाये तो परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं लेकिन परिस्थितियों का जो आधार है, अधिष्ठान है वह नहीं बदलता ।
‘बचपन बदल गया । किशोरावस्था बदल गयी । जवानी बदल गयी । अब बुढ़ापे ने घेर रखा है… लेकिन यह भी एक दिन बदल जायेगा । इन सबके बदलने पर भी जो नहीं बदलता, वह अबदल चेतन आत्मा ‘मैं’ हूँ और जो बदलता है वह माया है…’ सदाचार व आदर के साथ ऐसा चिंतन करने से बुद्धि स्वच्छ होती है और बुद्धि के स्वच्छ होने से ज्ञान का प्रकाश चमकने लगता है ।
जिनके भाल के भाग्य बड़े, अस दीपक ता उर लसके ।
‘यह ज्ञान का दीपक उन्हीं के उर-आँगन में जगमगाता है, जिनके भाल के भाग्य-सौभाग्य ऊँचे होते हैं ।’ उन्हीं भाग्यशालियों के हृदय में ज्ञान की प्यास होती है और सद्गुरु के दिव्य ज्ञान व पावन संस्कारों का दीपक जगमगाता है । पातकी स्वभाव के लोग सद्गुरु के सान्निध्य की महिमा क्या जानें ? पापी आदमी ब्रह्मविद्या की महिमा क्या जाने ? संसार को सत्य मानकर अविद्या का ग्रास बना हुआ, देह के अभिमान में डूबा हुआ यह जीव आत्मज्ञान की महिमा बतानेवाले संतों की महिमा क्या जाने ?
पहले के जमाने में ऐसे आत्मज्ञान में रमण करनेवाले महापुरुषों की खोज में राजा-महाराजा अपना राज-पाट तक छोड़कर निकल जाते थे और जब ऐसे महापुरुष को पाते थे तब उन्हें सदा के लिये अपने हृदय-सिंहासन पर स्थापित करके उनके द्वार पर ही पड़े रहते थे । गुरुद्वार पर रहकर सेवा करते, झाड़ू-बुहारी लगाते, भिक्षा माँगकर लाते और गुरुदेव को अर्पण करते । गुरु उसमें से प्रसाद के रूप में जो उन्हें देते, उसीको वे ग्रहण करके रहते थे । थोड़ा-बहुत समय बचता तो गुरु कभी-कभार आत्मविद्या के दो वचन सुना देते । इस प्रकार वर्षों की सेवा-साधना से उनकी अविद्या शनैः-शनैः मिटती और उनके अंतर में आत्मविद्या का प्रकाश जगमगाने लगता ।
आत्मविद्या सब विद्याओं में सर्वोपरि विद्या है । अन्य विद्याओं में अष्टसिद्धियाँ एवं नवनिधियाँ बड़ी ऊँची चीजें हैं । पूरी पृथ्वी के एकछत्र सम्राट से भी अष्टसिद्धि-नवनिधि का स्वामी बड़ा होता है लेकिन वह भी आत्मविद्या पाने के लिये ब्रह्मज्ञानी महापुरुष की शरण में रहता है ।
हनुमानजी के पास अष्टसिद्धियाँ एवं नवनिधियाँ थीं फिर भी आत्मविद्या पाने के लिये वे श्रीरामजी की सेवा में तत्परता से जुटे रहे और अंत में भगवान श्रीराम द्वारा आत्मविद्या पाने में सफल भी हुए । इससे बड़ा दृष्टांत और क्या हो सकता है ? हनुमानजी बुद्धिमानों में अग्रगण्य थे, संयमियों में शिरोमणि थे, विचारवानों में सुप्रसिद्ध थे, व्यक्तियों को परखने में बड़े कुशल थे, छोटे-बड़े बन जाना, आकाश में उड़ना आदि सिद्धियाँ उनके पास थीं, फिर भी आत्म-साक्षात्कार के लिये उन्होंने श्रीरामजी की जी-जान से सेवा की । हनुमानजी कहते हैं : 
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम…
हनुमानजी की सारी सेवाएँ तब सफल हो गयीं जब श्रीरामजी का हृदय छलका और उन्होंने ब्रह्मविद्या देकर हनुमानजी की अविद्या को सदा-सदा के लिये दूर कर दिया ।
मानव संसार को सत्य मानकर उसीमें उलझा हुआ है और अपना कीमती जीवन बरबाद कर रहा है । जो वास्तव में सत्य है उसकी उसे खबर नहीं है और जो मिथ्या है उसीको सत्य मानकर, उसीमें आसक्ति रखकर फँस गया है ।
जो विद्यमान न हो किन्तु विद्यमान की नाईं भासित हो, उसको अविद्या कहते हैं । इस अविद्या से ही अस्मिता, राग-द्वेष एवं अभिनिवेश पैदा होते हैं । अविद्या ही सब दुःखों की जननी है ।
अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष और अभिनिवेश – इनको ‘पंच क्लेश’ भी कहते हैं । पंच क्लेश आने से षड्-विकार भी आ जाते हैं । उत्पत्ति (जन्मना), स्थिति (दिखना), वृद्धि (बढ़ना), रुग्णता (बीमार होना), क्षय (वृद्ध होना) और नष्ट होना- ये षड्विकार अविद्या के कारण ही अपने में भासते हैं । इन षड्-विकारों के आते ही अनेक कष्ट भी आ जाते हैं और उन कष्टों को झेलने में ही जीवन पूरा हो जाता है । फिर जन्म होता है एवं वही क्रम शुरू हो जाता है । इस प्रकार एक नहीं, अनेकों जन्मों से जीव इसी शृंखला में, जन्म-मरण के दुष्चक्र में फँसा है । 
गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक गंगा नदी में जितने रेत के कण होंगे उसे कोई भले ही गिन ले लेकिन इस अविद्या के कारण यह जीव कितने जन्म भोगकर आया है, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता ।
इस जन्म-मरण के दुःखों से सदा के लिये छूटने का एकमात्र उपाय यही है कि अविद्या को आत्मविद्या से हटानेवाले सत्पुरुषों के अनुभव को अपना अनुभव बनाने के लिए लग जाना चाहिए । जैसे, भूख को भोजन से तथा प्यास को पानी से मिटाया जाता है, ऐसे ही अज्ञान को, अँधेरी अविद्या को आत्मज्ञान के प्रकाश से मिटाया जा सकता है । 
ब्रह्मविद्या के द्वारा अविद्या को हटानेमात्र से आप ईश्वर में लीन हो जाओगे । फिर हवाएँ आपके पक्ष में बहेंगी, ग्रह और नक्षत्रों का झुकाव आपकी ओर होगा, पवित्र लोकमानस आपकी प्रशंसा करेगा एवं आपके दैवी कार्य में मददगार होगा । बस, आप केवल उस अविद्या को मिटाकर आत्मविद्या में जाग जाओ । फिर लोग आपके दैवी कार्य में भागीदार होकर अपना भाग्य सँवार लेंगे, आपका यशोगान करके अपना चित्त पावन कर लेंगे । अगर अविद्या हटाकर उस परब्रह्म परमात्मा में दो क्षण के लिये भी बैठोगे तो बड़ी-से-बड़ी आपदा टल जायेगी ।
जो परमात्मदेव का अनुभव नहीं करने देती उसीका नाम अविद्या है । ज्यों-ज्यों आप बुराइयों को त्यागकर उन्हें दुबारा न करने का हृदयपूर्वक संकल्प करके ब्रह्मविद्या का आश्रय लेते हैं, ईश्वर के रास्ते पर चलते हैं त्यों-त्यों आपके ऊपर आनेवाली मुसीबतें ऐसे टल जाती हैं जैसे कि सूर्य को देखकर रात्रि भाग जाती है । 
वसिष्ठजी महाराज कहते हैं : ‘‘हे रामजी ! जिनको संसार में रहकर ही ईश्वर की प्राप्ति करनी हो, उन्हें चाहिए कि वे अपने समय के तीन भाग कर दें : आठ घंटे खाने-पीने, सोने, नहाने-धोने आदि में लगायें, आठ घंटे आजीविका के लिये लगायें एवं बाकी के आठ घंटे साधना में लगायें… सत्संग, सत्शास्त्र-विचार, संतों की संगति एवं सेवा में लगायें । जब शनैः शनैः अविद्या मिटने लगे तब पूरा समय अविद्या मिटाने के अभ्यास में लगा दें ।’’ 
इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी सद्गुरु के कृपा-प्रसाद को पचाकर तथा आत्मविद्या को पाकर अविद्या के अंधकार से, जगत के मिथ्या प्रपंच से सदा के लिये छूट सकते हैं ।

गुरु का आदर – परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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Mantra data Guru Ka Aadar (मंत्र दाता गुरु का आदर ) – Sant Shri Asaram ji Bapu

मंत्र दाता गुरु का आदर ( भगवान वेदव्यास जी जीवन प्रसंग )

व्यासजी का भील के पुत्र से मंत्र का दान लेना ….और गुरुपद को सम्मान देना ….

नमस्ते व्यास विशाल बुद्धि ….

* नैमिषारन्य में वेद व्यास जी एकांत वास, शास्त्र लेखन व ८८००० ऋषियों को सत्संग सुनाते थे | व्यास जी सुबह सूर्योदय से पहले घूमने निकले, तो देखा कि एक शबर जाति का भील होठों से कुछ मंत्र बडबडा रहा है, उसके मन्त्र के प्रभाव से वह पेड़ झुक रहा है |

* उस बूढ़े ने खजूर के झुके हुए पेड़ से खजूर का रस निकाला | व्यास जी को आश्चर्य हुआ कि इसके पास इस मन्त्र की सिद्धि है | व्यास जी उसकी ओर तेजी से बढ़े तो वो बूढ़ा भी भांप गया कि ये मेरे से मन्त्र दीक्षा लेने आ रहे हैं, वो भी तेज़ी से भागा | वो भागते भागते घर पहुंचा और घर वालों को बोला कि भगवान वेद व्यास जी आ रहे हैं, मैं पीछे के दरवाज़े से निकल जाता हूँ, तुम उनको बहाना बनाके रवाना कर देना, तो मै आऊंगा | कुटुम्बियों ने ऐसा ही किया | व्यास जी वापिस चले गए |

* वेद व्यास जी बीसों बार गए | और बूढ़ा छटक जाये | उस बूढ़े का एक बेटा था कृपालु उसे दया आई कि आप इतने महान पुरुष, आप मेरे पिता जी से क्या लेना चाहते हैं ? व्यास जी बोले कि मैं तुम्हारे पिता से वो पेड़ झुकाने की विद्या सीखना चाहता हूँ, कृपालु बोला वो तो मुझे भी आती है मैं आपको देता हूँ |

* व्यास जी ने उससे श्रद्धा-पूर्वक मन्त्र लिया | आश्रम लौटते वक़्त व्यास जी ने मन्त्र के प्रभाव से नारियल का पेड़ झुकाया और दो नारियल ले लिए | जब वो बूढ़ा घर वापिस आया तो उसने पुछा कि तूने व्यास जी को क्या सिखाया | तो वो बोला कि मैंने उन्हें मन्त्र दे दिया | बूढ़े ने कहा उन्हें मन्त्र न देने के लिए तो मैं भागता था |

Lakshman Vs Meghnaath

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Lakshman kyu jeete or Meghnaath kyu hara? Ramji ne Meghnath ki patni ko diya uttar… asaramji bapu satsang

भगवान के लिये रोना भी एक साधन है -आसारामजी बापू

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Bhagwan ke liye rona bhi ek Sadhan hai -Pujya Asaram ji Bapu

भगवान के लिये रोना भी एक साधन है -आसारामजी बापू
१२० माला रोज जप करें और नीच कर्म का त्याग करे तो एक साल में साक्षात्कार.… 
हरी बाबा ने भक्तों को झूठ -मुठ भगवान के लिए रोने को कहाँ और फिर सचमुच सभी लोग भगवान के लिए रोने लगे.… 
अब कि बिछड़ी कब मिलेगी जाय पड़ेगी दूर …

 

 

 

ब्रह्म सिध्धांत – पुराना दुर्लभ सत्संग – आशारामजी बापू

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मुख्य अंश ;

  • ब्रह्मज्ञानी ही परब्रह्म परमात्मा
  • सन्यासईश्वार प्राप्ति की और
  • संसार एक झूठा सपना, यहाँ कोई अपना
  • समय पर जाग जाओ
  • शांतमान ही आत्मज्ञान का अधिकारी
  • ध्यान- एक रास्ता ईश्वर प्राप्ति की और
  • संत सतायें तीनों जायें, तेज बल और वंश
  • वसंत ऋतूविकास का ऋतु
  • आप अमर थे, है और रहेंगे
  • ब्रह्मज्ञानी का निवास स्थानपरंतीरथ

कौन ? – प.पू. संत श्री आशारामजी बापू

bhagwat

 

ऐसा कोई कण नहीं जिसमे भगवत सत्ता नहीं – प.पू. संत श्री आशारामजी बापू

सबसे से जादा सुखी कौन? सबसे से जादा उदार कौन? सबसे से जादा हितेषी कौन ? सबसे से जादा शाश्वत कौन ? सबसे से जादा निकट कौन ? सबसे से जादा दूर कौन ? इस प्रकार के प्रश्न बुद्धि में उठ जाये और मनमानी श्रद्धा होती है तो मनमाना फल मिलता है और मन थोडीसी इमानी होता है | मन की अपनी सीमा है |  श्रद्धा, सात्विक, राजस, तामस ऐसा ही फल होता है  | आप देवता किसी देवता को ले जाते तो फल चाहते है ……… देवता लोक ब्रम्हाजी के एक दिनमे चौदा इंद्र बदलते है |तो देवता की उपासना करोगे तो वो बदल जाते है | नये इंद्र का नया कानून हो जाता है | तो सवाल है की सबसे अधिक सहनशील कौन ? उससे अधिक निकट कौन ? सबसे अधिक भगवान भगवान …….. उड़िया बाबा को इस्पितल में ले गया था बाबा हमारे इस्पिताल में थे | बड़ी से बड़ी ईलाज इस्पिताल में होती | इसप्रकार से लौटे तो बाबा बड़े गुस्सायेर हुए थे | हाथोसे ईशारे रखते थे, हाथ पैर पटकते और कुछ खरी-खोटी सुनाई जाती है भगवान को | ऐसी खरी-खोटी सुनाई जाती | कुत्ता मनुष्य की भाषा बोल रहा है ये भी लीला कर देखा है ? पत्थर की मूर्ति दूध पिने लग जाये तो वो भी लीला है | हेलीकाप्टर चूर-चूर हो जाय और खरोज भी नहीं आये वो भी लीला करके देखा है | ह्रदय में न जाने  कितनी होती जाती रहती है कितना सहनशील उडीयाबाबा सुनाये जा रहे है ऐसा नही की वो सुनता नहीं है |  आखिर आखंडनंद ने पूछा क्या … आप भगवान को नहीं मानते क्या ? बोले नहीं मानता तो गाली क्यू देता है? मानता हूँ ! तभी तो ले आऊ, कुछ सुनाऊ | तुम मेरे बोल रहे मेरे से जीभ दूर है लेकिन तुम हाजरा हाजिर है | जितने लोग दुखी है तो गुस्सा आ गया…. लेकिन वो सुनाई तो सही…… लेकिन बाबा को क्या किया ? ईश्वर के पाच भुत भी है सेवदार पृथ्वी देखो खड्डा खोदो वो मुर्दे गाडो, सौच करो, गंदगी करो, सब सह जा रही है | धन, धान्य, अन्न, फुल, फल इत्यादि समुद्र में गंधा करो, डालो वो लहराते है बस | सबसे बाधिक–जोधिक शक्ति है तो परमात्मा है | छोटी बुद्धि होती है तो ग्राम देवता को मानते है | किसी स्थान देवता को मानते है, कोई कुलदेवता को मानते है, कोई किसी देवता को मानते है | छोटी-छोटी मती है छोटी-छोटी देव में अटक जाती है और फटक कोई ग्रामदेवता मर जाये, कोई कुलदेवता मर जाये | ये पता नही है की कुलदेवता के द्वारा और ग्रामदेवता के द्वारा कुछ भी कृपा होगी तो उसीकी होगी | सत्ता होगी तो उसकी होगी, संकल्प-सामर्थ्य होगा तो उसकी का होगा | देवतार्म यज्ञं तत् सारं सर्व लोकं महेश्वरं सुहृदम र्व भुतामं ज्ञातामं शांतम मृछ्ते | सारे यज्ञं और तापोंका फल का भोक्ता मै हूँ | मातृपिंड करो पितृपिंड करी सब के अंदर वो ब्रह्म है वो | छोटे छोटे आकृतियों छोटे छोटे खतम हुआ तुम्हारा उपलब्धी ही खतम हुई उन सबमे मै हूँ | ईश्वर तो बहोत है एक-एक सृष्टि के अलग-अलग ईश्वर है | सृष्टि कितने भी है वो पार नहीं लेकिन ये सब सृष्टियों का ईश्वर अंतर्मयी आत्मा मै महेश्वर ही हूँ | और कैसा हूँ  सुहृदम सर्व भुतामं ज्ञातामं   प्राणिमात्र का सुहृद हूँ | आकारण – हित करने वाला हूँ |  सुहृदम सर्व भुतामं ज्ञातामं शांतम मृछ्ते … प्राणिमात्र का सुहृद हूँ  ऐसा मुझे जानता है  उसे शांति प्राप्त होती है | बस इतना पक्का करो की सारे भगवान, सारे देवता, सारे यक्ष, राक्षस, किन्नर की नजरो में परमेश्वर है | तो आपकी नजरो ये बड़ी हो जाय. बुद्धि विशाल हो जाय, खंड में अखंड में चली जाय, परीक्षण से व्यापक हो जाय, बिंदु में सिंधु बन जाय | ऐसा कोई बिंदु नहीं है की सिंधु से अलग है | ऐसा कोई बढे का आकाश नहीं महाकाश से बढे हो | ऐसा कोई जिव नहीं उस परमेश्वर की सत्ता, स्फूर्ति, चेतना, ज्ञान के बिना उसका अस्तित्व नहीं | गीता का ज्ञान, उपनिषदों का ज्ञान है तो भी मकड़ी के जालों में भगवान का ज्ञान आता है | जिधर देखता हूँ खुदा ही खुदा है, खुदासे न कोई चीज जुदा है | जब अवल और आखिर खुदा ही खुदा है, तो अब भी वही है क्या उसके सिवा है  |

गोरखनाथ ने कहा कि कौन है आज्ञाकारी शिष्य पेड पे चढ जाय ? त्रिशूल भोंक दिया बोले इसे आ के जंप मारे | गुरूजी का चेला हूँ … गुरूजी …गुरूजी.. बस गुरूजी… गुरूजी त्रिशूल भोंक दिया, गस्ती में गाड दिया, ऊँचे पेड पे चढ के उसी डाले पर खड़ा रहकर सीधा त्रिशूल के आगे गिरे, जवान है तो चढ़ जावो | ऐसा करके गोरखनाथ चढ गए थोडा आगे | एक दूसरा के मुहँ तारते थोडा आगे वो कोई खास शिष्य आ गए बोले क्या बात है? बोले गुरुजीने ऐसा कहा है ? अरे बोले जो मेरा शिष्य है वो करेगा, मै तो हूँ ही… वो चढ़ गया | तो त्रिशूल और शिष्य के बीच गोरखनाथ के अदृश्य हाथ अपने हाथो में डाल दिया | बोले त्रिशूल में कैसे गायब हो गया? तेरे बाप के हाथ तेरे को दीखते नहीं क्या ? अब गोरखनाथ के द्वारा वही तो करना है | मूर्तियों को दूध पिलाने का सामर्थ्य वास्तव मे है, वही बात तुमने सर्व भुत हितेरता इसे बह्मज्ञानी महापुरुष को देखो उड़िया बाबा का स्वभाव मरीजो को देख आये बिगड़े भगवान थे | भगवान कुछ नहीं बोलते ये तो अखंडनंद कहा….. आपको भगवान नहीं मानते तो नहीं मानते, तो सुना रखे, अगर नहीं होते तो क्यू सुना रखे | आकाश के फूलों को क्या सुनाई जाता है क्या? वंध्या पुत्रों को क्या सुनाई जाता है क्या ? कितनी सारी सहनशक्ति, सबसे बड़ी में बड़ी सहनशक्ति है तो प्रभु तुम्हारी और तुम्हारी सहनशक्ति का अंश मेरी माँ है, ईश्वर का सहनशक्ति का अंश तेरे में है, हम दूध पीते-पीते काटते थे, तुम्हने बर्दास किया, नाख़ून लगा तुम्हने बर्दास किया, सोते -सोते गीला कर दिया, ये सहनशक्तिया है माँ तुम्हारे में , ईश्वर का स्वभाव तेरे में छुपा है | ऐसी मेरी पृथ्वी माँ…. कोई चाहे कुछ भी करो, भला ही भला करो |खाली सहनशक्ति ये बात नहीं है सूह्रुद भी है | हाँ हाँ – सुहृदम सर्व भुतामं ज्ञातामं शांतम मृछ्ते … एक दूसरे की बुराई करके मैनेजमेंट करना चाहते है वो दो कवडी के अक्कल नहीं रखते | राग, द्वेष, निंदा, बुद्धि मारी गई हाँ | क्या आनंदमय ब्रम्ह बरसा, क्या पत्ते-पत्ते में उसका कला-कौशल्य है, क्या करोजमें ने मकड़ी जाले बनाने में उसकी कला-कुशलता है वो देख-देख के आनंद ले जब से सहृद से जगाता उसके सुहृद जगा | जो भगवान का स्वभाव है, उसका अंश तुम्हारे में छुपा है | उससे छू कर तामसी, राजस्वी अंश में क्यों उलछ्ते हो | हिजाडा, लढाई, निंदा ये राजस्वी, तामसी दुर्गुण है, प्रकृति का परमात्मा का तो अपना स्वभाव है | अब ब्रह्मवेताओ को ये सारा जगत ब्रह्ममय  ही दिखेगा | वासुदेव सर्व मिति – सब वासुदेव है और विद्यार्थिओं को भगवान की लीला देखे और जो राजद्वेशी है उनको ये संसार काटता, दंगता, राग द्वेषी आग में तपता हुआ नेत्रोंसे आकर्षण से ढूस करता हुआ , वा वा…. आकर्षण से ढूस करता हुआ उसके लिए ये संसार नरकालय हो जाता है | नरकालय भी हो जाता है और भगवान की लीला कली भी हो जाता है | सब भगवान ही भगवान है | ऐसा कोई कण नहीं जिसमे भगवत सत्ता नहीं और ऐसा कोई क्षण नहीं जिसमे भगवत अंश न हो | आप सो जाते है.. इंद्रिय, मन सो जाता है. भगवत कण और भगवत क्षण तो रक्तसंचार करते है | अरे क्यों भ्रमित हो रहे भोंदू , नाली के कीड़े बन रहे हो. हे नाथ तू सुख दे अर्जुन के द्वारा, हे मूत्र इंद्रिय पति-पत्नी के द्वारा तबा हो जाते बिचारे | भक्ति सब साधन मूल जो मिले तो हुई संत अनकूल |

भक्ति सारी सुखोंकी खान है, सब साधनों की मूल है और तब मिले सब संत अनकूल – ईश्वर की भक्ति मिल जाय सत्संग मिल जाय | संतो के पास जायेंगे तो धीरे-धीरे उस माहोल से मन इंद्रिय बदलेगी लेकिन चाहे उधर रहे आदत पुरानी अपनी नहीं छोड़े तो क्या फायदा | बड़ी विलक्षण माया, बड़ी विलक्षण लीला है | बोले भगवान पाना बड़ा कठिन है और भगवान का पाना इतना सरल है की | खाली आप इरादा बना लो ईश्वर को पाना है तो सारी जिम्मेदारी वो अपने आप पर लेता है | उसकी प्राप्ति की इच्छा कर लो बस इमानदारी से | जितना हित हराम से उतना हरि से होये कहे कबीर वा दास का पला न पकड़े कोई |  हे प्रभु, हे हरि ……..

चरित्र की पवित्रता, बुद्धि में सत्य का प्रकाश, सत्य ज्ञान स्वरुप है, सत्य सर्वत्र है, सत्य सदा है, और सत्य सबका हितेशी, साक्षी है | बुद्धि वो ज्ञान भर लो, मन में सदभाव भर लो, इंद्रिय में चरित्र निर्माण कर लो | बस हो गया……. ये तीन भी पढ़ लिया आपके ऊपर बड़ा उपकार किया . ऐसे हमने तीन पढ़ दिया वैसे प्रभु तुम्हारे परे कृपा कर दिई | प्रभु के साथ रहो वास्तव में रहो लेकिन ये पता नहीं इसलिए दुःख भोग रहे हो | वास्तव में हो लेकिन जो तुच्छ है उसको तो मै और मेरा मन और जो शाश्वत है उसको समजते है वो दूर है, दुर्लभ है, पराये है  तो जो स्वास्वत है उसको समजते है वो दूर नहीं है, दुर्लभ नहीं है, पराये नहीं है | वो कभी बिछड़ता नहीं उसके लिए जरा खोज कर ले | उसको जरा अपना मान लो | इसके लिए जरासा जिज्ञासा जगा ले मंगल हो जायेगा मंगल | जयराथ भगवान ने भागवत में पंच विषयोंको मनुष्य के लिए बडे दुर्गम विषय में उनको पार कर लिया | देखेने की आसक्ति सुनने की चखने की वा वा सुनने की काम विकार, एक एक विकार को जितने के लिए बारा – बारा वर्ष का साधन भी बताया तब मन उसे विकार से विकलांग होता है | फिर क्या वेदव्यासजी बोले दिखते है भगवान पराशर के सदगुरु लेकिन वही है बोले – येतत सर्वम गुरु भक्त्या | ये सब गुरु भक्तिसे हो जाता है |

ब्राम्हिस्थिति प्राप्त कर कार्य नहीं ना शेष मोह कभी ना ठग सके | ऐसा नहीं की मोह सुबहें ना ठग सके, मोह रात को ना ठग सके, मोह अमावश्या को ना ठक सके, कभी ना ठक सके | मोह कभी ना ठग सके पिच्छा नहीं आवेश पूर्ण गुरु के पामिनी पूर्ण गुरु कहलावे |  ये प्रभु, ये मेरे भगवान, ये मेरे लीलाशाहजी  भगवान मागने तो आये कुछ और ले गए कुछ | मागने तो आये थे तो शिवजी का दर्शन घड़ा दिया लेकिन शिवजी जैसे शिवजी तो है | दाता तो तू सहृद भी है, उदार भी है राजा को क्या दान करेगा ? शेठ्जी तो क्या दान करेगा? कर्ण भी तो क्या दान करेगा ? चीज वस्तु का दान करेगा | अपने कवच का दान करेगा कर्ण लेकिन भगवान तो आपने आप सबसे बड़ा दाता तू ही है भगवान | दाताओं दान करते है वो भी तेरी सत्ता है | हे हरि ….. हे हरि ……

आपकी  तपस्यों का मै खुप – खुप धन्यवाद करता हूँ | संसारी के लिए संसार दुःख का विलास कभी बेटी का दुःख, कभी प्रसूति का दुःख, कभी पति का दुःख, कभी किसी पत्नी का दुःख | संसार के सुखा लेने का सुख चाहता है उस लिए संसार दुःख विलास है | जिज्ञासु के लिए, व्यर्थ के लिए माया का विलास है | और जिसको परमात्मा के लिए अपनी परम भक्ति देते तो ओके लिए ब्रम्ह का विलास है | अभी ब्रम्ह विलास है | श्रद्दा शास्त्र विलास से होती है तो ब्रम्ह विलास तक पहुँच जाती है | श्रद्दा मनमानी होती तो भुत, पिशाच बड़े पेट में रुकाकर जीवन भटका देती | कर्म का फल कर्म नहीं देता है, कर्म तो कृत है (किया जाता है) और जड है | कर्म फल देनेवाला चैतन्य ईश्वर है और वही ईश्वर जिसमे स्थापना करो देवता मेरा कर्म का फल देगा, देवता के द्वारा ही वो ईश्वर अपना कर्म का फल देगा | यहाँ तो साक्षात् परमात्मा निर्गुण निराकार है, मेरे से तो लीलाशाहजी बापू ही भगवान है, वो मेरे से कभी भी अलग नहीं हो सकते | हे हरि हे प्रभु …………

मालूम पडने से ही भोग होता है और रोख से सुख होता है | तो ज्ञान से मालूम पड़ेगा, ज्ञान से ही भोग होगा, ज्ञान से ही सुख होगा | अभी तुम लोग जो सुन रहे हो लेकिन अंधा और बहिरा हो उसे माहोल से भरा हो लेकिन उसको कभी वो सुख नहीं मिलेगा | तुम्हारे से ज्ञान से सुख मिलता है | फालूत वस्तु से, व्यक्ति से नहीं होता खुर्ची मिल गयी उससे ये फल नहीं है लेकिन खुर्ची का सुख ह्रदय में वही फल है | चीज, वस्तु पड़ी है वो फल नही है लेकिन उसे में ह्रदय में जो  होता है सुख वही फल है अथवा दुःख वही फल है | तो जब हृदय से सुख और दुःख फल ऐहसास तो हृदय में ऐसा बनो की भगवानमय हो जाये | विष्णुपुराण में आता है – समतुम आराधनां अच्युतंस्य | सारी आराधना अच्युतस्य की कैसे हो समता ही भगवान की आराधना है कोई भी परिस्तिती आ जाए | वर्षाम न निन्देत तद व्रतं …वर्षा की निंदा न करो , ग्रीष्म ना निन्देत — ऋतुम न निन्देत, लोकांन ना निन्देत पशुं न निन्देत तद व्रतं | बुद्धि में सत्य का ज्ञान, सत्य का प्रकाश, इंद्रिय में सत्य का प्रकाश, मन में सदभाव और ईश्वर को अपना मानो सौप दो उसको बस हो गया |

हरि ॐ … हरि ॐ