Category Archives: Asaramji Bapu

जयदेव महाराज की कथा – प.पू.संत श्री आशारामजी बापू

guru01

जयदेव महाराज की कथा – प.पू.संत श्री आशारामजी बापू  

संत श्री आसारामजी बापू की अमृतवाणी :

2 दिसंबर 200 9

जापानी पार्क,

रोहिणी, दिल्ली

सत्संग के मुख अंश:

* गृहस्थ संत जयदेव महाराज के हाथ काट कर कुआ में डाल दीया ……

* जयदेव के हाथ काटने वालो पर प्रकृति का प्रकोप ……

* कोई भी पपी पाप करता है, कोई देखे चहे ना देखे, पापी को उस्का पाप खुतर खुतर कर खाता है ….

* जयदेव महाराज कटे हुये हाथ वापस आ गयें …

 

“निंदा, अपमान, बदनामी की ऐसी तैसी” -प. पू. संत श्री आशारामजी बापू

 

प. पू. संत श्री आशारामजी बापू

निंदा, अपमान, बदनामी की ऐसी तैसी

 

“निंदा, अपमान, बदनामी की ऐसी तैसी” -प. पू. संत श्री आशारामजी बापू
संतो को क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये – हम पक्के गुरु के चेले है – झूठे मुक़द्दमे से किसी को भी छुड़ाने का अचूक उपाय – मै कोई छुईमुई का पौधा नहीं हूँ । हम है अपने आप सब परिस्थिति के बाप ।

Asaram Bapu – Documentary on Enlightenment of self-realized Guru Sant Shri Asharam Ji Bapu

bapuji

Asaram Bapu – Documentary on Enlightenment of self-realized Guru Sant Shri Asharam Ji Bapu 
The sacred land of India is the mother of the world’s oldest and most profound philosophy – Vedanta. She has given birth to innumerable great souls like Swami Vivekananda who have had a deep and lasting impact on all of humanity. In this era, Mother India has yet again given the world a Divine Soul bearing unconditional love and liberating Self Knowledge to lead the masses on the path to ultimate peace! Pujya Sant Shri Asaramji Bapu is that ideal role model of wisdom, compassion, razor sharp intellect and wit. The following passage tries to introduce Sant Shri Asaramji Bapu (endearingly called ‘Bapu’) and the associated Ashrams; as well as Shri Yoga Vedanta Seva Samiti, an organization founded by Pujya Bapuji.

“Great Souls have a sympathetic heart as magnanimous and forgiving as that of a Mother giving shelter and love to all regardless of race, religion, or financial stature.”

प्रार्थना कर जोड़ के, लीला अपनी छोड़ के आओ अब गुरुदेव

#Bail4Bapuji - Prarthna kar jod ke .... lila apni chhodke... aao na gurudev .....

प्रार्थना कर जोड़ के, लीला अपनी छोड़ के
आओ अब गुरुदेव ॥
प्रार्थना ………… गुरुदेव ॥
सब अधीर हैं हो रहे,
सारे साधक रो रहे, आओ अब गुरुदेव ॥
सब अधीर ………… अब गुरुदेव ॥
आप के दर्शन बिना कुछ भी ना अब भाता हमें ।
आप के ……………… हमें ।
याद करके आपकी मन बहुत तड़पाता हमें ।
याद …………… हमें ।
कष्ट इतना ना सहो, दूर हमसे ना रहो,
कष्ट इतना ………… ना रहो
आओ ना गुरुदेव ।
आओ ना गुरुदेव ।
सब अधीर ………………… गुरुदेव ।
हे प्रभु जो बन पड़ा वह सभी तो हमने ने किया
हे प्रभु ………… किया
पर सफलता ना मिली है, जल रहा सबका जिया ।
पर ………… जिया ।
आप ही कुछ कीजिये, शीघ दर्शन दीजिये, आओ अब गुरुदेव ।
आप ही ………………… गुरुदेव ।
सब अधीर ………………… गुरुदेव ॥
क्या करें हम सभी अब कुछ भी समझ ना आ रहा,
क्या करें ……………… आ रहा
अभी तक का हर प्रयास विफल ही होता जा रहा ॥
अभी …………………. रहा ॥
विपत्ति यह भारी हरो, प्रेरणा कुछ तो करो ।
आओ अब गुरुदेव ।
विपत्ति ………………… गुरुदेव ॥
सब अधीर ………………… गुरुदेव ॥
हैं सहारा हम सभी के आप तारणहार हैं ।
हैं सहारा …………… तारणहार हैं ।
पाके संबल आपका हम हो रहे भव पार हैं ।
पाके संबल ……………… भव पार हैं |
व्यासपीठ निहारते आपको ही पुकारते आओ अब गुरुदेव ।
व्यासपीठ …………………… गुरुदेव ।
सब अधीर ……………………… गुरुदेव ।
सुना आश्रम आप बिन है, सभी व्याकुल हो रहे
सुना आश्रम …………… हो रहे
आपके सानिध्य बिन सभी धैर्य अपना खो रहे
आपके ……………. खो रहे
कर कृपा अब आओ ना, विपत्ति दूर भगाओ ना, आओ ना गुरुदेव
कर कृपा ……………. गुरुदेव
सब ………………. गुरुदेव ॥
प्रार्थना कर …………………… गुरुदेव ॥
आओ ना गुरुदेव , आओ ना गुरुदेव, आओ अब गुरुदेव …………………

दुखों से निवृति का अचूक उपाय- प.पू.संत श्री आशाराम बापूजी

1058_THOUGHTS AND QUOTES GIVEN BY PUJYA ASHARAM JI BAPUॐकार मंत्र अन्तर्यामी परमात्मा का नाम है | इसकी शक्तियाँ खोजने वाले भगवान नारायण हैं | इसलिए भगवान नारायण इसके ऋषि माने जाते हैं | इसकी छंद गायत्री है | जो भी भगवान के नाम हैं उसकी छंद गायत्री बन जाती है | जैसे गायत्री मंत्र की छंद गायत्री है, उसके देवता भगवान सूर्य नारायण हैं और ऋषि विश्वामित्र हैं | ॐ नमह शिवाय के देवता शिवजी हैं | और ऋषि वशिष्टजी हैं | ऐसे ही ॐकार मंत्र के ऋषि भगवान नारायण हैं | ऋषि उसको बोलते है जो खोज करते हैं | ऋषि तू मंत्र दृष्टार ना करतार | मंत्र की शक्तियों के दर्शक हैं, मंत्र करने वाले नही है | ऋषि मंत्र बनाते नही, खोजते हैं | तो भगवान नारायण ने खोजा |
एक होता है निर्माण, जो पहले नही था उसका होता है निर्माण | और जो पहले होता है उसकी होती है खोज | ये श्रृष्टि के पहले ही ॐकार का अस्तित्व था | भगवान नारायण ने, ब्रह्माजी ने ॐकार मंत्र बनाया नही | जैसे श्रृष्टि बनाई ऐसे ॐकार मंत्र बनाया नही | लेकिन विष्णुजी ने खोजा ये ध्वनि क्या है ? इसी चैतन्य ध्वनि से नारायण का नारायण पना और ब्रह्मा का ब्रह्मपना है | ये सबका आत्मदेव होकर बस रहा है | ये ॐकार मंत्र, इसके ऋषि भगवान हैं, इसकी छंद गायत्री है | इस ॐकार मंत्र के ६ बार जप हो जाएँ, तो सतवी बार जप करते ही आप अनंत ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ एक हो जाते हैं | ये सूरज, चंदा, आकाश गंगा, इससे भी पार होती है ब्रह्मांडीय उर्जा | ऐसे अदभुद लाभ के अधिकारी बन जाते हैं |
ये ॐकार मंत्र ३ घंटे रोज जप करें, ३ घंटे परमात्म ध्यान, ३ घंटे शास्त्र और ३ घंटे सद्गुरु की सेवा | एक वर्ष में आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है |
१२० माला रोज ५० दिन तक जप करें, और खीर का भोग लगाये सूर्य देव को | ७ जन्मो की दरिद्रता मिट जायेगी और ७ पीढ़ियों में दरिद्रता नही आएगी | ॐकार मंत्र के जप से पेट की खराबियां भाग जाती हैं, लीवर, दिमाग की कमजोरी ठीक हो जाती है | और कितने सारे फायदे हैं, २२,००० श्लोक हैं ये ॐकार मंत्र की महिमा के | जितना वो खोज सके वो २२,००० श्लोक में है | ॐ तो एक शब्द है लेकिन उसके फायदे २२,००० श्लोक में | अब हो सकता है दूसरा ऋषि कुछ और भी खोज सके | भगवान नारायण तो इसकी महिमा खोज के इसके ऋषि हो गए |
गीता में भगवान ने कहा प्रणव सर्व वेदेषु, शब्द्खे पुरुषम मिशु || वेदों में ॐकार मैं हूँ | और ये शाश्वत भी है | बच्चा जन्म लेता है तभी उवा-उवा और बुढा होकर बिस्तर पर पड़ा होता है तभी उ-उ | उसे कुछ तसल्ली मिलती है | ये ॐकार मंत्र जप करते-करते जप में लीन हो गए, चलते-फिरते भी जप हो सकता है |
महिलओं को मासिक धर्म में जप नही करना चाहिए नही तो नुकसान होता है |
संसार में जितने भी दुःख, भय और क्लेश हैं उन सबके मूल में अविद्या है, नासमझी | अविद्या माना जो पहले नही था, बाद में नही रहेगा, अविद्यमान है, उसको सच्चा दिखाने की बेवकूफी उसको अविद्या बोलते हैं | ये पहले नही था, बाद में नही रहेगा, अभी भी नही की तरफ जा रहा है | ऐसे ही ये शरीर पहले नही था, बाद में नही रहेगा | लेकिन आत्मा पहले था, अभी है, बाद में रहेगा | तो सदा विद्यमान को ढक दे और अविद्यमान को सच्चा दिखाए | उस नासमझी को अविद्या बोलते हैं | अविद्या नही मिटाया और दुनिया की सब विद्या पा लिया तो भी धिक्कार है उसे | जिसने सत्संग में रूचि नही की उसको धिक्कार है और अपने आत्मा पर जो विद्यमान काई है, नासमझी है वो हटाते नही तो उसको धिक्कार है | सोने की लंका बना ली लेकिन अविद्या की काई नही हटाई, तो रावण हार गया | शबरी भिलन ने अविद्या मिटा दी, तो रामजी उसके झूठे बेर खाते हैं |
तो एक है अविद्या जैसे पानी के ही बल से काई बनती है और पानी को ही ढकती है | ऐसे ही अविद्या आत्मा को ढक रही है, आत्मा के बल से ही बनी है | तो अविद्या से ४ दूसरे दोष आ जाते हैं, अस्मिता, जो पहले नही था, बाद में नही रहेगा उस शरीर में मैं बुद्धि आ जाती है | शरीर को मैं मानना, ये है अस्मिता | अस्मिता हुई तो फिर आएगा राग | अपने पुत्र, पति-पत्नी, अपनी मान्यता, अपने मन की बात होगी तो अच्छा लगेगा, ये हो गया राग | और फिर विपरीत में लगेगा द्वेष | तो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, पाँचवा दोष आएगा अधिनिवेश, मृत्यु का भय घुस जायेगा | अब मृत्यु के भय से तो कोई अमर नही हुआ, मरेगा तो पक्का | लेकिन मृत्यु के भय में जिंदगी भयावर हो जाती है | तू कितना भी भजन कर ले, देवी-देवतओं को रीछा ले और भगवान को प्रत्यक्ष कर ले | लेकिन अविद्या नही मिटी तो दुखों की जड़ नही कटेगी | श्री कृष्ण अर्जुन के प्रत्यक्ष थे | लेकिन फिर भी अर्जुन को अविद्या थी तो दुःख नही मिटा | अस्मिता, राग नही मिटा | अविद्या जाती है विद्या से | जब श्री कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया, अँधेरा जाता है प्रकाश से | तो आत्म विद्या से अविद्या जाती है | तपस्या, पुण्य से अविद्या नही जाती | पुण्य से अविद्या मिटाने के लिए हृदय पवित्र बनता है | लेकिन सद्गुरु विद्या दाता से ही अविद्या जाती है | तो अविद्या नही मिटी, तो चाहे दुनिया के सारे मित्र आपके होगये और सारे शत्रु मिट गए, फिर भी दुःख नही मिटेगा | अविद्या है ना | मृत्यु का भय, राग, द्वेष, अधिनेवेश बना रहेगा | वे लोग बहुत नीच लोग होते हैं के मेरा नाम हो | मेरे गुरूजी का नाम हो | अरे ये तो बहुत नीच लोग होते हैं | जो शरीर पहले था नही, बाद में रहेगा नही उसका कपोल, कल्पित नाम है, उसी नाम के पीछे मरे जा रहे हैं | जो अपना नाम करना चाहता है वो गुरु, गुरु नही मुर्ख है | ये सब अविद्या है | जो शरीर था नही, रहेगा नही उसके कपोल-कल्पित नाम के पीछे मरे जा रहे हैं |
अविद्या, राग, द्वेष, अधिनिवेश, अस्मिता ये पाँच दुर्गुण आत्म-विद्या से जायेंगे | तो आत्मविद्या कठिन नही है, लेकिन उसकी रूचि नही है दुर्भाग्य से | अपने आदत, राग के अनुसार होता है तो मजा आ गया | जो राग से सुखी होता है वो द्वेष से दुखी भी हो जाता है | और सुखी-दुखी होना ये मूर्खो का काम है | कुत्ता भी सुखी-दुखी होता रहता है, मनुष्य भी सुखी-दुखी हुआ तो उसमे महत्ता क्या रही | सुखाकार-दुखाकार वृतियाँ होती हैं | और वृतियाँ तो आती-जाती रहती हैं | लेकिन कुछ सत्य ऐसा है जो सदा रहता है | वो सदा विद्यमान है | जो सदा विद्यमान है, ॐकार जपने से उसमें स्तिथि होती है | (लम्बा) ॐ…… ॐ कार का अ और आखिर का म, उसके बिच में अविद्या नही रहेगी | संकल्प-विकल्प नही रहेगा | तो अविद्या मिटाने के लिए ॐ कार का जप करता है तो अविद्या थोड़े से उपदेश से मिट जायेगी | शांत होने के लिए ॐ कार का जप करता है तो थोड़ी देर में अशांति चली जायेगी | क्योंकी ये ॐ कार मंत्र सारे तत्व का, सारी पृथ्वी का मूल तत्व है | जैसे धरती से सारे फल सत्ता पा लेते हैं, फल, फुल, बीज, विटामिन्स सब आ जाते हैं | ऐसे ही धरती, चंदा, सूरज को सबको सत्ता जहाँ से मिलती है वो ॐ स्वरूप है चैतन्य से || सारे वृक्षों का मूल धरती है | ऐसे ही धरती, सूरज, चंदा, आकाश, सबको मूल तत्व प्रकृति है | और प्रकृति का मूल स्वरूप ॐ आत्मा-परमात्मा है | तो इसमें भगवान ने कहा प्रणव सर्व वेदेषु | सब वेदों में जो ॐ कार है मेरा ही स्वरूप है | जिनको ॐ कार मंत्र जपने की आदत पड़ जाती है फिर दुर्गति का सवाल ही नही होता |
कभी ना छूटे पिंड दुखो से जिसे ब्रह्म का ज्ञान नही | ॐ कार ब्रह्म विद्या को पचाने की शक्ति दे देता है | आत्म ज्ञानम परम ज्ञानम न विद्यते, आत्म ज्ञान से बड़ा कोई ज्ञान नही है | आत्म लाभात परम लाभम न विद्यते , आत्म लाभ से बड़ा कोई लाभ नही है | आत्म-सुखात परम सुखम न विद्यते, आत्म सुख से बड़ा कोई सुख नही | आत्म ज्ञानी गुरु का एक क्षण का सत्संग करोडों तीर्थ करने का फल दे देता है | हजारों यज्ञ, सैकडों एकादशी का फल दे देता है | तीर्थ नहाये एक फल, संत मिले फल ४, सद्गुरु मिले अनंत फल | पुण्य-पाप का फल सुख-दुःख देकर नाश हो जायेगा | लेकिन सद्गुरु के सत्संग, दर्शन, कृपा का फल सुख-दुःख देकर नाश नही होता | अनंत है | क्योंकी अविद्या मिटी तो सद्गुरु अनंत से एक हो गए | अनंत से एक वाली दृष्टि, ज्ञान, सूझ-बुझ, शिष्य को भी अनंत की तरफ ले जाती है |
वेद धर्म एक संत थे | कई शिष्यों में से उनका एक विशेष शिष्य था संदीपक | उसको कुछ देना चाहा तो परीक्षा भी लेते | और वो सभी परीक्षाओं में पास हो गया | तो वेद धर्म ने अपने संकल्प से अपने शरीर में कोड पैदा कर दिया |
और आँखे देखती नही | अब मैं आश्रम में बोझा नही रहना चाहता | मैं काशी जाऊँगा | संदीपक कहता है गुरूजी मैं सेवा में रहूँगा | अरे तू वहाँ क्या करेगा | कोड़ी शरीर से बदबू आ रही है | गंदा शरीर | नही गुरुदेव, बहुत हाथा-जोड़ी करके सेवा में लग गया | अब भिक्षा माँगकर आवे, गुरूजी को अर्पण करे, बाकि का धो-धाके खट्टा-खारा हटा के दे देवे संदीपक को, बिना स्वाद का | ऐसा करते-करते महीनों की कतारे बीती | शिवजी को जच गया के कैसा साधक गुरु को शिव रूप मानता है | शिवजी प्रकट हुए और बोले तेरे को जो चाहिए वो ले ले मैं तेरे पर प्रसन्न हूँ | काशी का इष्ट-देव मैं हूँ | लोगो को मरने के बाद मुक्ति देता हूँ, जीतेजी तू मुझ से कुछ भी माँग ले | मैं आपसे क्यों मांगू, मेरे तो सद्गुरु हैं | जबतक सद्गुरु नही मिला तब तक इष्ट देव | और सद्गुरु की भक्ति का फल ही ऐसा है | तो तू सद्गुरु के लिए माँग लें | बोले मेरे गुरूजी की आँखे, कोड़ ठीक हो जाये | मैं तो तथास्तु कह दूँ लेकिन अपने गुरु से पूछो और भी कुछ चाहिए तो |
वो गया और कहा गुरूजी शिवजी आये हैं और मैंने आपके लिए नेत्र ज्योति और कोड़ की निवृति माँगी है | ओ दुर्बुद्धि, मैं अपना प्रारब्ध भोग रहा हूँ | ये भिखमंगा शिवजी से ये माँग रहा है मतलब शिवजी इतने प्यारे नही जितना कोड़ मिटाना है | शिवजी अपने आत्मरूप है ये महत्व का नही है जितनी नेत्र है | दुष्ट, दुर्बुद्धि, सेवा नही करनी तो चला जा | भिखारी, मेरे लिए शिवजी से ऐसा माँगता है | गुरूजी ने तो ऐसा डाटा के भागता हुआ शिवजी से आकर बोला के महाराज आप जहाँ से आये वहाँ पधारो | शिवजी भीतर से तो प्रसन्न हुए | बोले अच्छा लगे रहो इनके पीछे | अपने आप रोयेगा | भीतर से तो बड़े प्रसन्न होकर गए | शिवजी विष्णुजी के पास गए और उनको बताया ऐसा-ऐसा है लड़का | भगवान विष्णुजी आये | संदिपक शिवजी तेरी प्रशंसा कर रहे थे, पगले | और मैं तेरे को पहले वरदान नही दूँगा | मैं तेरी गुरु भक्ति पर प्रसन्न हूँ | लोग तो गिडगिडा के थक जाते हैं शिवजी के दर्शन नही होते | लेकिन सद्गुरु मिले अनंत फल ऐसे सद्गुरु की आज्ञा में तू रहता है और सद्गुरु ताड़न-मारन करते है तो भी तेरी श्रद्धा अटूट है | ऐसे सत्पात्र को देखकर हम लोग बहुत प्रसन्न होते हैं | तो मैं तुझसे मिलने आया हूँ | अब तू जैसा भी चाहता है वरदान माँग ले | लेकिन पहले माँगेगा तो गुरूजी नाराज हुए थे | गुरूजी की आज्ञा लेकर फिर माँग | जाओ गुरूजी को बोलो विष्णु आये हैं, तो आपकी क्या आज्ञा है | गुरूजी प्रसन्न होंगे | गुरूजी के पास गए बोले भगवान नारायण पधारे हैं | और उन्होंने ही कहा के आपकी क्या आज्ञा है | बोले अच्छा शिवजी ने तेरी सरहाना की इसलिए नारायण आये हैं | तो तेरे को क्या चाहिए ? बोले गुरूजी मेरी चाह तो अविद्या में भटकाएगी | अविद्या से ही चाह पैदा होती है | अविद्या से ही अधिनिवेश, राग, द्वेष,अस्मिता आती है | आपके ज्ञान से उस अविद्या का पर्दा धुंधला हो गया | अब मेरे को तो अपने लिए क्या चाहिए | गुरूजी जो आपकी आज्ञा होगी वही होगा | अच्छा जाओ देखो नारायण हैं के नही | देखा तो लगता है नारायण भी खड़े हैं, गुरूजी भी खड़े हैं | भागा कमरे में, तो देखा यहाँ भी गुरूजी और नारायण दोनों हैं | और गुरूजी की आँखे, कोड सब ठीक हो गया | नारायण ने कहा बेटा तेरी परीक्षा लेने के लिए तेरे गुरूजी ने ये लीला की थी और हम ने भी लीला की थी |
मेरे गुरूजी का नाम हो, ऐसे मुर्ख लोग क्या समझते हैं के गुरु इतना मुर्ख है के नाम के लिए भटकता है | मान पूड़ी है जहर की जो खाए सो मर जाये, चाह उसी की राखता वो भी अति दुःख पाए |
तो इश्वर तो पाना कठिन नही है लेकिन रूचि नही होती है इश्वर की तरफ | अपने राग-द्वेष के अनुसार ही आदमी खपते जाते हैं | वाह-वाही हो तो बाँछे खिल जाती हैं | और गुरूजी कुछ पात्रता बढाने के लिए कुछ भी बोले तो चल मेरे भैया | जैसे कीड़े-मकोड़े होते हैं जरा सी गर्मी आई तो भागो | जरा सी असुविधा आई तो भागो | चूहे, घोड़े, गधे, ऐसी मेंटेलिटी होती है | कहने भर को शिष्य होते हैं, शिष्यत्व का गुण नही होता | पूरा प्रभु आराधिए, पूरा जा का नाम, नानीक पूरा पाइए, पुरे के गुण-गान | गुरूजी पूर्ण हैं तो शिष्य को भी पूर्ण होना चाहिए | जरा-जरा बात में मन की चाही पूर्ण करे तो पूर्ण कैसे होगा | मन खुद ही अपूर्ण है | मन की चाही में ही रहे तो क्या | मन की चाही में ज्यादा खुश मत होओं | मन के विपरीत भी हो और समता रहे तब बहादुरी है |
तो श्री कृष्ण ने कहा सुखम वा यदि वा दुखम, मन के चाहे में सुख होता है, और विपरीत में दुःख | दुखहार वृति आई उसी में भागते रहते हैं, हिजड़े कहीं के | हिजड़े भी उनसे अच्छे होते हीं | जो गुरु के द्वार डट जाते हैं, सुख-दुःख सब नगण्य है, वो बाजी मार जाते हैं | जो उस सिंद्धांत पर डटे रहे | जरा-जरा बात में आकर्षित-विकर्षित होते तो तुच्छ हो जाते हैं |
महादेव गोविन्द राम के पास उनकी पत्नी २ आम, हापुस और केसर सवार के लाई | जरा टुकड़ा-टुकड़ा खा लिया बोले बाँट दो | आम तो आपको बहुत प्यारे लगते हैं और भूख भी लगी होगी | बोले भूख तो बहुत है, आम मीठे भी हैं और सुगन्धित भी हैं | बोले खाते क्यों नही | बोले जो चीज ज्यादा प्रिय होती है उसकी आसक्ति से बचो | इसलिए बाँट देते हैं | लोग क्या करते हैं जो प्रिय चेला हो उसी की गाड़ी में भागो | प्रिय के पीछे ही भागते हैं, नीच गति को जायेंगे | जीवन में कोई ना कोई सिद्धांत होना चाहिए नही तो ये इन्द्रियां, मन फसायेंगी, रुलायेंगी | वास्तविक प्रिय परमात्मा है | बोले ये करूं, ये ना करूं, ये ठीक है, ये बेठीक है, कभी शिष्य नही है | शिष्य वो है जो गुरु ने कहा वो ठीक है | गुरु जो करते हैं वो ठीक है |
छाती पे चढ़ के गुरु चाकू घुमा रहे हैं गर्दन पे | आँख खुली फिर आँख बंद कर दी | गुरूजी ने थोड़ी खून की बूंद निकाली, बड के पत्ते पर साँप को दे दिया, गया | बांध दिया | चेला राजकुमार था, चेला हो गया | शाम हुई चलने लगे | बोले मैं तेरी छाती पर बैठ गया था, तुने आँख खोली फिर बंद क्यों कर दी | मेरे हाथ में छुरा था | बोले छाती पर बैठे तो नींद खुल गयी | फिर देखा के गुरूजी के हाथ में छुरा है तो जो भी होगा भला होगा | बेटा तेरे अगले जन्म का कोई प्रारब्ध होगा | तो साँप आया था तुझे काँटने, तो मैंने उसको रोका | तो बोला मैं अभी तो चला जाऊँगा, लेकिन मैंने इसके गले का खून तो पीना है, फिर कभी आऊंगा | गुरु ने कहा किसी भी जन्म में काहेको | अभी मैं दे देता हूँ | शिष्य ने कहा गुरूजी मेरे समर्पण में कोई कमी है इसलिए आपको क्लेरिफिकेशन देना पड़ता है | नही तो जब मैं गुरु की शरण हो गया तो चाहे सर काटे, चाहे ऊँगली काटे की जन्मो में मुर्गे, बकरी होकर कट गए | कट-मर भी जाते तो भी गुरु के हाथो से | मेरे समर्थन की कमी है इसलिए आपको बताना पड़ता है के ऐसा-ऐसा | गुरु ने कहा शाबाश है |
तो ये सब जो खिचाव, तनाव, पलायनवादी, फिसलना है ये ५ दोषों में ही आ जाता है | तो अविद्या को मिटाना चाहिए | सत्संग से जितनी सहेज में अविद्या मिटती है, उतना ६०,००० वर्ष की तपस्या से भी नही मिटती है | ६०,००० वर्ष की तपस्या के बाद भी सोने की लंका बनाने की वासना लगी | रावण, हिरण्यकश्यप का क्या हुआ दुनिया जानती है | शबरी भिलन को मतंग गुरु का ज्ञान मिला तो ऐसा आत्म वैभव जगा के शबरी के झूठे बेर खाकर भगवान सरहाना करते हैं |
आत्मलाभ सर्वोपरी लाभ है | आत्मज्ञान सर्वोपरी ज्ञान है | आत्मसुख सर्वोपरी सुख है | इसके लिए गम्भीर होना चाहिए | हरि ॐ हरि ॐ   ………. |

सर्वश्रेष्ठ कौन ? -प.पू.संत श्री आशारामजी बापू

Image

 

सर्वश्रेष्ठ कौन ?

धन्य माता पिता धन्यो, गोत्रं धन्यं कुलोदभव,
धन्या च वसुधा दैवी, यत्रस्यात गुरुभकततः । ।
………. हरी ॐ हरी ॐ हरि ॐ (देव-हास्य प्रयोग)

        हरि सम  जग कछु वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ
सदगुरु  सम सज्जन नहीं गीता सम नहीं ग्रन्थ ।

हरि…….. जो हर देश में,  हर काल में, हर वस्तु में, हर व्यक्ति में प्राणरूप चैतन्य परमेश्वर है उसका नाम है हरि  ।  हरि के समान ये जगत कोई महत्वपूर्ण वस्तु नहीं है  । हरि को महत्व न देकर जगत को महत्व देते है इसीलिए जगत हावी हो जाता है, दुःख देता है, तनाव देता है -मानसिक तनाव, शारीरिक तनाव, बौधिक तनाव  । इनका कोई वैज्ञानिक उपाय नहीं है| नींद की गोलिया देते हैं| मनोवैज्ञानिक कभी कुछ घुमा फिर कर दवाइयों की तरफ ले जाते हैं| इन सभी तनावों से मुक्त होना हो तो सत्संग है और हरि का महत्त्व समझ में आ जाये तो मानसिक तनाव, शारीरिक तनाव और बौधिक तनाव की पोल खुल जाती है| अपने शरीर की योग्यता से अधिक श्रम करेंगे कि मुझे अधिक फल मिले और अधिक सुखी हो जाऊं अधिक सुख का दरिया अंतरात्मा में है.. हरि में है ।

हरि सम जग कछु वस्तु नहीं
महान सिकंदर यात्रा करते करते उस जगह पर पहुंचा जहाँ तीनो तनाव दूर से भाग जाएँ ऐसे हरि मे विश्रांति पाए हुए.. ऐसे डायोजनिस का क्षेत्र… संत को दया आ गयी संकरी गली से जहाँ से सिकंदर गुजरने वाला था उसने अपने पैर पसारे रास्ता रोक कार्यक्रम कर दिया| मंत्रियों ने बता दिया कि कोई है अलबेला संत.. पैर पसार के लेट गए हैं.. रास्ता रोक कर बंद कर दिया उन्होंने ।
” हूँ…… महान सिकंदर का रास्ता बंद… कौन है वो ?”
” पधारिये ”
आग बबूला होते हुए आया था वो, क्योंकि जगत और शरीर को सच्चा मानने का अज्ञान था लेकिन एक मध्यरात्री (अमावस्या की और पूनम की मुलाकात ) शरीर को ‘मै’ मानना और दूसरों की कत्ले-आम करके और मिल्कियत लूट कर बड़ा बनाना इस अन्धकार में.. समझ के अंध घोड़े पर रवाना हो चूका था अपने को ही बोलता था कि मैं महान सिकंदर हूँ ।
वो, जिसको “हरि सम जग कछु वस्तु नहीं” ऐसी समझ हो गयी थी, ऐसे महापुरुष की आँखों में झाँका । बड़ी मादकता छलक रही थी, बड़ा प्रेम प्रसारित हो रहा था । आया था आग बबूला लेकिन नजर पड़ते ही शीतल लहर दौड़ गयी शरीर में ।
“आप कौन हैं? इधर पैर पसार कर लेटे हुए ?”
महापुरुष ने चोट की| “तू कौन है ?” आप नहीं, तू कौन है । लेकिन हरि में स्थित थे डायोजनिस ।
“मैं महान सिकंदर हूँ, विश्व-विजेता ….. आगे से आगे बढ़ रहा हूँ ।”
मसखरी के लहजे में, हंस पड़े संत, “अच्छा! महान सिकंदर और विश्व-विजय ? पागल है, आज तक किसी ने विश्व विजय किया है क्या ? जिसने भी कोशिश किया,  विश्व विजय करते करते अधूरे मर गए| विश्व विजय कहाँ होती है ? सिकंदर! जब भी विजय होती है, अपने पर होती है । दुःख आये, सुख आये, विकार आये, चिंता आये, इनके आने जाने पर जो विजय पा लेता है, वही विजयी होता है । जैसा ख्याल आये, चल पड़े तो पतंगा भी जानता है, कुत्ता भी जानता है । जैसा विचार आया उधर पूंछ हिलाई, ऐसे लोग विजयी नहीं होते हैं| अपने पर जो विजय पा ले वही विश्व-विजयी माने जाते हैं । अपने पर विजय करना आसान है.. विश्व पर विजय करना असंभव है।
बुद्धिमान तो था लाखों लोगों की सेना को नियंत्रण करता था पर निरुतर हो गया । टुकुर टुकुर उस महापुरुष को देख रहा है कि बात तो तुम्हारी ठीक लगती है । बोले, “अपने पर विजय पा ले तू।“
बोले- “मेरा एक सवाल है| तुम्हारे पास सेना नहीं है, राजमहल नहीं है, दासियाँ और रानियाँ नहीं है । जिनके पास ये सब कुछ होता है वो उतने खुश नहीं होते जितने तुम खुश नजर आ रहे हो । इसका क्या रहस्य है ?” बोले- “यही रहस्य है अपने पर विजय….. तुम्हारा सूत्रधार कौन है ? अहंकार सूत्रधार है तो नचाएगा, मार-काट कराएगा । काम तुम्हारा सूत्रधार है तो कमर तोड़ेगा, लोभ सूत्रधार है तो संग्रह-संग्रह कराएगा । तुम्हारे सूत्रधार तुमको नचाने वाले काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद-मत्स्य, अहंकार अगर ये तुमको नचा रहे है तो विशव-विजय नहीं ये बड़ी विश्व-पराजय है । लेकिन तुम इनके अधीन नहीं होते और तुम्हारा सूत्रधार हरि है तो सिकंदर, बेशक विश्व विजयी हो जाओगे । तुम्हारे रथ का संचालक कौन है? लोफर, बदमाश, लफंगे हैं कि श्री हरि हैं ? “
ध्यान से सुनना, एक तो अपना संकल्प ऊंचा होना चाहिए, नीचा नहीं होना चाहिए । नीच संकल्प तुमको देर सवेर नीचा गिरा देगा । संकल्प ऊंचा होना चाहिए । दूसरी बात कि संकल्प दृढ होना चाहिए और तीसरी बात संकल्प जहाँ से उठता है वहां आराम पाने की कला आ जाये, निसंकल्प हो जाये वो आदमी विश्व-विजयी हो जायेगा । इसके अलावा विश्व-विजयी होने का कोई दूसरा उपाय नहीं है ।
श्रीकृष्ण कहते हैं – आत्मन: आत्मनो बंधू वो आदमी अपने आप का बंधू है जो अपने अन्तर आत्मा में विश्रांति पाता है । शुभ संकल्प, दृढ संकल्प और नि-संकल्प ये तीन बात आ गयी तो खाली हाथ व्यक्ति, अनपढ़ व्यक्ति लेकिन दुनिया उसके पीछे चलेगी और हथियार हैं, गाड़ियाँ है , मोटरें है, सोने की लंका है, लेकिन रावण तीरों का निशाना बन गया विश्व-विजयी नहीं हुआ । हिरन्यकश्यप ने सोने की हिरान्यपूर नगरी बनाई लेकिन नरसिंह के कोप का निशाना बन गया मारा गया । प्रहलाद निहत्थे थे और सन्मान मिला शाबरी भीलन निहत्थी थी, गुरु के द्वार गयी तो श्री राम जी शबरी के झूठे बेर खा रहे हैं । मीरा का तो जेठ विरोधी था, राज्य विरोधी, सिपाही विरोधी । निंदा करने वालों की संख्या का कोई अंत नहीं फिर भी मीरा विश्व-विजयी हो गयी । विष अमृत हो गया, सांप नौलखा हार हो गया । मुसीबत देनो वालो से मीरा के हृदय में मुसीबत नहीं आयी ।

डायोजनिस बोलते है कि विश्व-विजय – शुभ संकल्प, दृढ-संकल्प और नि-संकल्प से होती है । किसी को मार के, काट के, छीन के,  ढेर बना के ऊपर बैठ गए तो विश्व-विजय नहीं है तुम्हारी । शैतान का तू बंदी है । अहंकार शैतान है । मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा हूँ …I shout you shout. Who will carry dirt out? “मैं भी रानी, तू भी रानी, कौन भरेगा घर का पानी” जहां दो महिलायें घर में महत्वाकांक्षी होती है उस घर में तो तौबा हो जाती है । जहाँ दो भाई विपरीत इरादे के हैं तो वो घर नरक बन जाता है लेकिन जहाँ दसियों आदमी संवादित है तो वो घर वैकुण्ठ हो जाता है ।
हरि सम जग कछु वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ
परमात्मा प्रेम का पंथ ऐसा सुंदर है.. ऐसा सुहाना है कि आप नरक में जाओ तो नरक भी स्वर्ग में बदल जाये, अपने अन्दर में छुपे हुए प्रेम को उभारो, बांटो, चमकाओ । एम् छे.. एम् छे… फलाना छे…. ऐसा करके फ़रियाद और नकारात्मक विचारों के गंदगीमय ढक्कन मत खोलो ।

सर्वश्रेष्ठ कौन ?
देवलोक में सभा हुई कि इस समय इस युग में धरती पर सब से श्रेष्ठ महापुरुष कौन है, जो हर परिस्थति में, हर वस्तु में, हर व्यक्ति में, हर प्राणी में, हर जीव-जानवर में कितनी भी बुराई हो फिर भी अच्छाई खोज कर खुश रहता है और खुश रख सकता है, ऐसा विश्व-विजयी धरती पर कौन है ? कई संतो के, महापुरुषों के नाम आये लेकिन उसमें सर्वोपरि नाम, महापुरुषों के महापुरुष श्रीकृष्ण का नाम आया कि श्रीकृष्ण विश्व-विजयी हैं । विश्व की कोई परिस्थति श्रीकृष्ण को दुख नहीं दे सकती और  विश्व की कोई परिस्थिति श्रीकृष्ण को आकर्षित नहीं कर सकती । गंदे से गन्दी वस्तु हो, परिस्थिति हो , उसमे अच्छे को देखकर अपने हृदय में से अच्छाई को छलका दें, वो श्रीकृष्ण हैं । भूरी भूरी प्रशंसा की । दुसरे देवों को लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है? गंदे में गन्दा प्राणी हो जीव हो, जानवर हो उसमें से  श्रीकृष्ण अच्छाई निकाल लेते हैं । “मैं श्रीकृष्ण की परीक्षा लूँगा|” जैसे सिकंदर की संकरी गली में डायोजनिस ने पैर पसार लिए, ऐसे ही उस देवता ने, जहाँ श्रीकृष्ण वृन्दावन की कुञ्ज गलियों से गुजर रहे थे, संकरी गली में उस देवता ने कुत्ते का रूप धारण कर लेट गया । कुत्ता भी ऐसा कि पूंछ कटी है , शरीर पर घाव पड़े हैं, चर्म रोग ऐसा कि कुत्ते के सारे बाल ही जिस्म में चले गए हैं, देवता ने संकल्प करके ऐसा भद्दा, ऐसा भद्दा रूप बनाया कि श्रीकृष्ण ऐसे गंदे शरीर मे क्या अच्छा देखते । बोले-“परीक्षा करनी है|” मख्खियां भिनभिना रही हैं, सफेद कीड़े घावों पर छटपटा रहे हैं, शरीर से बदबू आ रही है जो निकले, नाक दबोच कर निकले । छी… छी….छी.. कितना पापी, कितना गन्दा, कितना अभागा| सब अपना दिल गन्दा करके जा रहे हैं ।
श्रीकृष्ण कहते हैं – “तुम्हारा चेहरा क्यों ख़राब करते हो ?” बोले – “ देखो श्रीकृष्ण! ये कितना पापी जीव है? कितना गन्दा है? कितना अभागा है ?” श्रीकृष्ण कहते है, “अरे पागल! देखो, उसके दांत कितने चमक रहे है,  उन्हें देख कर आनंदित नहीं हो सकते हो ? दांत तो चमक रहे है, ऐसी अवस्था में भी उसके दांत चमक रहे है, ये भी तो उसके किसी पुण्य का फल है न ? इसलिए प्रसन्न रहो । “
श्रीकृष्ण ने अपने पर विजय पायी थी, अपने दिल को बुरा नहीं होने देते थे । महाभारत का युद्ध होता है, बंसी बजाई, घोड़ों की मालिश कर रहे हैं, घावों को भर रहे हैं, तीर निकाल रहे हैं और प्रसन्न हो रहे हैं कि ये भी कर्मयोग हो रहा हैं । कुब्जा जा रही है धुल उडाती जा रही है कुब्जा, उसके सुंदर सुहावने बाल मटमैले हो रहे है और श्री कृष्ण कहते हैं – “ सुन्दरी..” उसने देखा कि मैं तो कुब्जा हूँ, कुरूप हूँ । ये तो छोरे छोरे आ रहे है कोई सुन्दरी तो दिखती नहीं…. अपना क्या ? फिर चली तो श्रीकृष्ण कहते हैं “ ऐ सुन्दरी!”  फिर से झाँका तो  ‘सुन्दरी …सुन्दरी ।“ –श्रीकृष्ण ने कहा, “सुना अनसुना करती है क्या ?”  वह बोली- “बोलो सुंदर …” बोले- “कंस को अंगराज लगाती हो, मालिश कराती हो, स्नान कराती हो , हमें भी लगा दो जरा अंगराज|” बोली – “ लो सुंदर” श्रीकृष्ण ने तो तिलक किया अपने ग्वाल मित्रों को भी किया । कुब्जा तो कुबड़ी थी कुबड़ी| श्रीकृष्ण ने कुब्जा के पैर पर अपना पैर रखा और उसकी ठोड़ी, मुंडी पकड़ के यूं झटका दिया तो कुब्जा सीधी और सुंदर हो गई । किसी भी शास्त्र और पुराण में ये नहीं आता कि कुब्जा ने किसी जन्म में कोई तपस्या की थी और उसका फल श्रीकृष्ण का स्पर्श और सौन्दर्य मिल गया ।
नहीं, जो अपने पर विजयी है जिसने
हरि सम जग कछु वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ
सदगुरु सम सज्जन नहीं, गीता सम नहीं ग्रन्थ

ये समझ लिया । जैसे चंद्रमा अनायास शीतलता बरसाता है, सर्दियों में अनायास ठंडी हवायें चलती हैं, दरिया मे अनायास लहरे उठती हैं, ऐसे ही जिसने आत्मविश्रांति पायी है, अपना सौन्दर्य पाया है उस पुरुष की आँखों से, उस पुरुष को छू कर आने वाली हवा भी दो काम करती है एक तो उसका स्पर्श गुण है और दूसरा जहाँ से गुजरेगी वहां की गंध बांटती हुई जाएगी । गुलाब से गुजरेगी तो गुलाब बांटेगी| डीजल से गुजरेगी तो डीजल बांटेगी| पेट्रोल से गुजरेगी तो पेट्रोल बांटती जाती है । तो केवल बाहर का स्पर्श और गंध नहीं, उसके श्वासोश्वास से आपके विचारों का कुप्रभाव सुप्रभाव भी बांटती हुई जाती है । तो जितने कुप्रभाव वाले लोग हैं उनके दर्शन सानिध्य से भी सुप्रभाव वाला भी विचलित हो जाता है और जितने सुंदर प्रभाव वाले संत महात्मा उनके संपर्क से जो हवा गुजरती है वो वातावरण को खुशनुमा कर देती है । इसी बात को कबीर जी ने कहा –
“कबीरा दर्शन संत के, साहिब आवे याद ।
लेखे में वही घड़ी, बाकी के दिन बाद||”

फिर से चलते हैं डायोजनिस के पास, सिकंदर कहता है – “तुम्हारी बाते तो अच्छी लगती हैं लेकिन एक बार मुझे विजयी तो होना है|” बोले – “विजय करके तू वापिस नहीं लौट सकता है|”
“मुझे तुम्हारी बात अच्छी लगती है जो तुमने पाया वो मैं पाना चाहता हूँ सत्संग के द्वारा आत्मविजय  । बड़ा सुखी जीवन है तुम्हारा, तुम को छू कर आ रही हवायें भी सुख फैलाती हैं तुम्हारी आँखों से भी सुख की तरंगे फैल रही हैं तुम्हारे श्वासोश्वास से भी सुख फैलता है । मैं मानता हूँ लेकिन ….क्या मैं अब जा सकता हूँ ?”
“ हाँ , जाओ, पर वापिस नहीं लौटोगे”
और फिर वापिस नहीं लौटा रास्ते में ही मर गया । बाहर विजय करके कोई वापिस लौटा हो, संभव नहीं । मौत की खाई में ही गया  । सोने की लंका मिल गयी, सोने की हिरान्यपूरी मिल गयी लेकिन सत्संग नहीं मिला तो धिक्कार है उस मिले हुए पर ।
शबरी भीलन को मतंग गुरु का सत्संग मिला है, मीराबाई को रैदास गुरु का सत्संग मिला है, रजा जनक को अष्टावक्र गुरु का सत्संग मिला है, राजा परीक्षत को शुकदेवजी का सत्संग मिला है, देव ऋषि नारद को संतो का सत्संग मिला है । देव ऋषि नारद कहते है कि अगले जनम में मैं दासी-पुत्र था | बाल्यकाल में पिताजी मर गए मैं तब पांच साल का था । माँ गुलामी करती थी पक्की नौकरी नहीं थी कोई भी बुला लेवे एक दिन, दो दिन, चार दिन नौकरी करने हेतु । कहीं संत पधारे थे । उनके सत्संग में पानी छांटना, बुहारी लगाना, मेरी माँ की वहां सेवा थी । पांच साल के बच्चे को घर पे क्या छोड़ जाये तो साथ में ले जाती थी । माँ तो पैसे के कारण चाकरी में व्यस्त थी और मैं वहां बैठा रहता था संत के दर्शन करने हेतू । जाति छोटी थी, उम्र छोटी थी, अक्ल छोटी थी, विद्या तो थी नहीं लेकिन बड़े में बड़े हरि में शांत हुए, हरि को छू कर आने वाले सत्संग की वाणी से मेरे कान पवित्र हुए, मेरे नेत्र पवित्र हुए और जब संत सामूहिक कीर्तन कराते तो सत्संग के तुमुल ध्वनी के प्रभाव से मेरा तन पवित्र, मन पवित्र हो गया| जब संत जा रहे थे तो मैनें कहा “बापजी मने साथ ले चलो, थारी सेवा करने”  बोले- “अभी छोटा है, घर में रह कर भजन करना|” मैंने कहा – “घर में मेरी माँ| माला करने बैठूंगा तो बोलेगी ये क्या करता है ? सत्संग में जाऊँगा तो रोकेगी|” बोले- “नहीं, रोकेगी नहीं, रोके तो भी तुम करते रहना । भगवान की भक्ति का रास्ता मिला है तो छोड़ना नहीं और तेरे को विघ्न करे तो माँ का स्वभाव या तो भगवान बदल देंगे नहीं तो भगवान उसका शरीर बदल देंगे । भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, आज से तेरा नाम हरिदास रखते हैं । ले प्रसाद|” संत के हाथ की चीज मिल गयी । अब वो हरिदास “हरि….हरि…हरि..हरि” जपता है । थोड़े दिन में माँ ने रोकना-टोकना चालू किया । भैंस को चारा डालने गई| उसमे बैठा था गोप महाराज! गोप महाराज मतलब नाग महाराज| ज्योंही चारा लेने गई तो नाग देवता दबे और काटा । मैं तो कुछ जानता नहीं था| पंचो को बुलाकर कहा – जैसे आपको ठीक लगे करो । पंचों ने उसकी अन्त्येष्टी की, जो चीज घर पर थी, बेची, करी । दिशाओं का पता नहीं था लेकिन मैं उत्तर दिशा की तरफ चल पड़ा । हरि…हरि…हरि…हरि .. हरि सम जग कछु वस्तु नहीं । जगत में तो सब मरने वाले आते हैं| ऐसा कोई संयोग नहीं जिसमे वियोग न हो| ऐसा कोई शरीर नहीं जिसकी मौत न हो | ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं जिसका वियोग न हो| ऐसा कोई सुख नहीं जो दुःख में न बदले| ये संसार सपना है| सत्संग की बात याद आती थी सब सपना है और उसको देखने वाला हरि मेरा अपना है । शरीर मरने के बाद भी जीवात्मा में साथ हरि का सम्बन्ध रहता है । कुटुम्बियों का सम्बन्ध तो अग्नि-संस्कार होते ही कट जाता है लेकिन आत्मा और परमात्मा.. हरि का सम्बन्ध रहता है । हरि सम जग कछु वस्तु नहीं –जगत तो बनता बिगड़ता रहता है, दुःख देता है, कर्म बंधन देता है लेकिन हरि बनते नहीं, बिगड़ते नहीं, कर्म-बंधन नहीं देते । भक्ति का रस देते है, सत्संग देते हैं और अपने से मिलाते हैं| हरि सम जग कछु वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ|| हरि मेरे अपने हैं । अगले जन्म के पिता नहीं है| अगले जन्म की माता नहीं है| अगले जन्म के रिश्तेदार नहीं है लेकिन अगले जन्म का मेरा आत्मा परमात्मा अभी भी है । बचपन के खिलौने और मित्र अभी नहीं है लेकिन बचपन को जानने वाला हरि अभी भी है ।
उसी समय पता लगा कि अरे! धीन्गला धीन्गली बाहर से सुंदर लगते है.. कपडे हटाओ तो ऐ छी छी छी गंदगी । सड़े गले फटे कपडे| ऐसे ही ये चमड़ा हटाओ तो ये क्या है मांस है, मल है, मूत्र है हड्डियाँ है| ऐ छी …छी…छी । उस हरि के कारण ये हाड मांस का पिंजर भी प्यारा लगता है । आँखों में चमक है तो ये हरि कि चेतना है| जीभ में स्वाद है तो उस प्यारे की सत्ता है । कहने सुनने का सामर्थ्य हरि का है| मन में सोचने की शक्ति मेरे हरि की है । सब कुछ बदल जाता है लेकिन मेरा हरि ज्यों का त्यों है, म्हारा वालूड़ा ….. अखिल ब्रह्मांड में एक तू श्रीहरी, जुजवे रूपे अनंत भासे । अनेक-अनेक रूपों में तू अनंत है । जीरो का बल्ब हो, सौ का हो, पचास का हो, हजार का हो इस का बल्ब.. उसका बल्ब हो लेकिन रौशनी एक है|
“कबीरा कुआँ एक है, पनिहारी अनेक ।
न्यारे न्यारे बर्तनों में पानी एक का एक||”
सभी का ह्रदय उसी की सत्ता से चलता है| सभी की आँख उसी की सत्ता से देखती है । गीजर अलग, फ्रीज अलग, पंखा अलग, ट्यूब लाईट अलग, माइक अलग, कपडे प्रेस करने वाला साधन अलग लेकिन बिजली सब में एक|
“कबीरा कुआँ एक है, पनिहारी अनेक ।
न्यारे न्यारे बर्तनों में पानी एक का एक ||”
न्यारे न्यारे हृदयों में चैतन्य एक का एक । न्यारे न्यारे घड़ों में, न्यारे-न्यारे बर्तनों में आकाश एक का एक, न्यारे-न्यारे तरंगो, बुलबुलों झाग भंवरों में पानी एक का एक….. वाह प्रभु वाह ।

रात्री-शयन कैसा हो ?
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय: । रात को सोते समय आप लोफरों से हाथ मिलाकर नहीं सोओ| वो तुम्हे नोच लेंगे.. सतायेंगे अथवा थकान से हाथ मिलाकर खाई में मत गिरो| मैं थका हूँ.. ऐसा करके पलंग पर मत गिरो । मै दुखी हूँ, मैं चिंतित हूँ, मैं माई हूँ, मैं भाई हूँ| तुच्छ लोगों से हाथ मिलाकर नींद में मत जाओ । मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं| मैं अब तुम्हारी शरण आ रहा हूँ । भगवान् बोलते हैं – “त्वमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत: ।
तत्प्रसादात परमशान्ति स्थानम प्राप्ति शाश्वतं”
हे अर्जुन तुम सर्वभाव से मेरी शरण में आओ । हम प्रभु के प्रभु हमारा । प्रभु! तुम सत्य स्वरूप हो| प्रभु! तुम चैतन्य स्वरूप हो| प्रभु! तुम आनंद स्वरूप हो| प्रभु! आप हर जगह हमेशा हो इसीलिए आप का नाम हरि है । आप ही ब्रह्मा का आत्मा, विष्णु का आत्मा, शिव का आत्मा हो इसीलिए आप का नाम केशव है – क माना ब्रह्मा, श माना शिव, व् माना विष्णु । आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु की आत्मा हो । आपका नाम गोविन्द भी है – गो माना इन्द्रियों के द्वारा आप ही की चेतना का विस्तार होता है । इन्द्रियाँ थकती हैं, मन में आती हैं, मन थकता है तो बुद्धी में और बुद्धी थकती है तो आप में आती है| आप उनका पालन-पोषण करते है इसलिए आप गोपाल हैं । गोविन्द बोलो हरि गोपाल बोलो, राधारमण हरि गोविन्द बोलो ।
अच्युतम केशवम । राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सब के पद च्युत हो जाते हैं । इन्द्रदेव का भी पद च्युत हो जाता है लेकिन आप अच्युत हो| आप केशव हो ।
अच्युतम केशवम रामनारायणं कृष्ण दामोदरं वासुदेवम हरि,
श्रीधरं माधवम गोपिकावल्लभम जानकीनायकम रामचन्द्रमहरि ।
हे म्हारा वालूड़ा, हे प्रभु …..

हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिये,
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये …..

सत्संग की बात पकड़ के आप थोड़े दिन लग जाओ । रात्री को सोते समय मैं भगवान में शयन करूंगा जैसे बच्चा माँ की गोद में ऐसे ही जीवात्मा परमात्मा की गोद में शयन करूंगा| मैं भगवान की शरण में जा रहा हूँ| भगवान् मेरे हैं मैं भगवान का हूँ । दुःख मेरा नहीं है दुख तो नासमझी का है, पाप का है| सुख मेरा नहीं है पुण्य का है लेकिन दोनों को जानने वाला चैतन्य प्रभु मेरा अपना है ॐ ॐ ॐ । श्रीकृष्ण कहते हैं –
सुखम यदि वा दुखम सयोगी परमोमता: |
सुखद अवस्था को भी सच्चा न मानो| दुखद अवस्था भी सच्ची नहीं.. आती है, चली जाती है । दोनों अवस्था आती-जाती है| फिर भी जो नहीं आता-जाता है वो आत्मदेव सच्चा है । हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ प्रभुजी ॐ ॐ ॐ ( देव-हास्य प्रयोग)

देव-ऋषि नारद कहते हैं – माँ को तो सांप ने काटा, उसकी तो अंत्येष्टि की| मैं तो चलता गया जहाँ भी भूख लगे और गाँव देखूं तो “नारायण हरि……. नारायण हरि …..नारायण हरि । मिल जाए खाने को” ।  यात्रा करते-करते एक सूखा प्रदेश, शुष्क प्रदेश आया जैसे उत्तर-प्रदेश, राजस्थान । कहीं पर्वत देखे, कहीं धूल देखी, कही नदियाँ देखी, कहीं खाइयाँ देखी । कहीं लाल मिट्टी तो कहीं काली मिट्टी । सब लांघते-लांघते गंगा तट पर पहुंचा । भूख लगी.. थक भी गया था । गंगाजी का सत्संग में सुना था, सब तीर्थों में गंगाजी श्रेष्ठ है । पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ पुकारने लगा  “भगवान दर्शन दो, दर्शन दो, दर्शन दो” तड़प लगी थी – “हे प्रभु, हे म्हारा वालूड़ा, हे म्हारा प्रभु अपना साकार दर्शन दो” ।  खूब-खूब प्रार्थना करता-करता बेसुध हो गया| बाहर का जगत भूल गया । प्रकाश दिखा और हृदय मे आवाज आई कि “पुत्र … अभी तू मेरे स्वभाव को नहीं समझ सकेगा, नहीं देख सकेगा । थोडा समय और कोशिश करो| अगले जन्म में मैं तुम्हे अपना ख़ास सत्संग करने वाला देव-ऋषि नारद बना दूंगा” । व्यासजी जिनका स्वागत करते हैं श्रीकृष्ण जिनका स्वागत करते है, वो दासीपुत्र में से देव-ऋषि नारद बन गए| सत्संग कहाँ से कहाँ पहुंचा देता है ।

आप लोगो ने आणंद का नाम तो सुना होगा| आणंद से थोड़ी दूरी पर संगीसर है.. मैं वहां गया था प्रीतमदास महाराज की समाधी देखने । ये प्रीतमदास महाराज कंवरभाई के लाल थे । पिता का नाम प्रताप सिंह था । अमदावाद से २५ कि०मी० दूर बावला में जन्म हुआ था । सूरदास बालक, पांच साल की उम्र में तो माँ बाप भी चले गए| वो डफली बजाते और भीख मांगते । संगीसर वाले माई-बापजी ऐसे ही थे । ऐसे करते करते किसी दयालू सत्संगियों ने कहा कि तू हमारे साथ ही चल । जो जन्म-जन्म का पाप-ताप उतारे वो हरि कथा कहते..
हरि कथा ही कथा बाकी तो व्यथा ही व्यथा ।
हरि के नाम में अद्भुत शक्ति है| प्रीतमदास भी हरिकथा कहते । सत्संग करते-करते वो समझ गए हरिनाम की शक्ति| साथ ही गुरु से गुरुमंत्र मिल जाए तो गुरुमंत्र सिद्ध हो जाए ….
गुरुदीक्षा, गुरुमंत्र मुखे यस्य, तस्य सिद्धि न अन्यथा ।
गुरुलाभात सर्वलाभो गुरु हि नस्तुभालीषा”,

शिवजी का वचन है – जिसके जीवन में गुरुदीक्षा है उसे सर्वलाभ प्राप्त है और जिसके जीवन में गुरुदीक्षा.. गुरुमंत्र नहीं है उसका जीवन व्यर्थ है । राजा नृग मरने के बाद गिरगिट हो गया, सूखे कूएं मे छटपटा रहा था| राजा अज मरने के बाद अजगर के योनी में भटक रहा है । इटली का राजा मुसोलीन मरने के बाद भूत होकर तालाब किनारे भटकता है ।  अब्राह्म लिंकन, प्रेसिडेंट ऑफ अमेरिका , मै अमेरिका कई बार गया तो उसकी यश गाथा गाने वाली कई संस्थाओ को देखा लेकिन वो बेचारा प्रेत होकर भटक रहा है व्हाइट हाउस मे । जिसको भी जीवन में गुरुदीक्षा नहीं मिली कितना भी राजाधिराज हो.. महाराज हो.. लंकेश हो.. हिरन्यकश्यप हो.. हिटलर हो.. सिकंदर हो लेकिन
हरि सम जग कछु वस्तु नहीं ।

गुरु ने कहा कि बेटा! मैं संत नहीं हूँ, कथाकार हूँ और कथा कहके मैं अपनी आजीविका चलाता हूँ । मेरे पास मन्त्र-शक्ति विज्ञान नहीं है । सुना सुनाया मन्त्र तेरे को पकड़ा दू तो तेरे को फायदा नहीं होगा । केबल से लाईट नहीं जलेगी.. पावर हॉउस से जुडी हुई वायर से लाईट जलेगी । जिसने आत्मा परमात्मा का  साक्षात्कार किया है ऐसा गुरु मिल जाए ।  घुमते-घुमते महंत भाई रामजी से गुरुदीक्षा मिली| गोविन्द रामजी से तो हरि कथा सुने| भाई रामजी ने गुरुदीक्षा दी और भाई रामजी ने बताया कि एसे प्राणायाम करना| ऐसे श्वास अन्दर जाए तो भगवान का नाम, श्वास बाहर जाए तो गिनती । रात को सोते समय भगवान में शयन करना आदि आ जाए तो जल्दी उसकी यात्रा होवे । जो भीख मांग रहा था रेलवे स्टेशन पर.. वो प्रीतम सूरदास में से संत प्रीतम दास हो गए ।
“आनन्द मंगल करूं आरती हरि गुरु संतनि सेवा,
कहे प्रीतम औखो अरसारी हरि राजहन हरि देवा,
आनन्द मंगल करूं आरती हरि गुरु संतन सेवा”
५२ आश्रम बनाये, सूरदास थे पर मंत्रजाप किया था| उद्देश्य में शुद्धि, उद्देश्य में दृढ़ता और नि:संकल्पता होनी चाहिए ।

मनमुख का नहीं कोई ठिकाना

मन मे जो आये ऐसा करते गये तो जीवन बर्बाद हो जाता है । कुछ साधुओं ने अनुष्ठान किया| मन्त्र जपा । जपते-जपते मन्त्र १२००० बार जपा । एकादशी के दिन कोई फलाहार दे गया वटाटा ओरैया| साधू के मन में हुआ कि वटाटा तो रोज खाते हैं.. कोई सेठ आता और काजू किशमिश दे जाता तो कितना अच्छा होता । जब काजू-किशमिश का संकल्प हुआ तो किसी अनजान व्यक्ति को प्रभु ने प्रेरित किया कि जाओ साधुओं में काजू किशमिश बांटो । उसने काजू-किशमिश दिया| साधू बड़े खुश हुये कि हमारा संकल्प फला लेकिन ये तुच्छ चीजों का संकल्प है । तुम्हारा प्रेरक स्वाद है न, जीभ का स्वाद, आँख का स्वाद, नाक का स्वाद, मूत्रेन्द्रिय का स्वाद, स्पर्श-इंद्री का स्वाद, ये तुम्हारे प्रेरक लोफर हैं । लोफर तुम को वापिस गिरा देंगे जन्म मरण के चक्कर में । तुम्हारा प्रेरक सूत्रधार सद्गुरु है, वेद है, शास्त्र है कि तुम्हारी कल्पना तुम्हारी सूत्रधार है ? संकल्प ऊंचा होना चाहिए तो लोफरों से बच जायेगे| दूसरा ऊंचा संकल्प हो और दृढ संकल्प हो इससे तुम्हारी शक्ती का विकास होगा । मैं कभी कोई संकल्प करता तो उसको छोड़ता नहीं था.. पूरा करता था| अभी मैं भोजन करता हूँ न तो कोई मिश्री पाउडर की डब्बी देते हैं लड़के घी से भर कर, मैं खोलता हूँ तो मेरे चिकने हाथ होने के कारण नहीं खुलती । लड़के खोलने को बोलते है तो कहता हूँ नहीं जो तुम कर सकते हो.. मैं भी कर सकता हूँ| ऐसा वैसा करके मैं खुद खोलूँगा… काहे को…| हमारे से नहीं हुआ तो दुसरे का संकल्प काम करे.. नहीं, अपना संकल्प दृढ होना चाहिए ।

भजन्तेमाम दृढवृता – जो मुझे दृढ़ता से भजता है, जिधर मन आया उधर चल पड़ा तो तुम्हारे में, कुत्ते में और पतंगे में क्या फर्क है? शास्त्रोचित कदम उठाओ| भविष्य का विचार करके, परिणाम का विचार करके निर्णय लो । गंगा गये तो गंगादास, यमुना गए तो यमुनादास, नर्मदा गए तो नर्बदा शंकर, जटाधारियों में गए तो जटाशंकर… तो पतन हो जायेगा । दृढ इरादा –ये हम नहीं खायेंगे, ये गलत काम हम नहीं कर सकते, क्यूंकि ये कर्म तो लोफरों को उचित हैं । हम साधक हैं, तो शुद्ध संकल्प और दृढ संकल्प, ऐसे करते करते एक अवस्था ऐसी आएगी कि संकल्प जहाँ से उठता है उसमे एकाकार हो जाओगे ।

बोले- सब भगवान है.. ये मानना अच्छा है कि मैं भगवान का हूँ ये मानना अच्छा है ? वासुदेव: सर्वमिति – वेद-शास्त्र बोलते हैं और हम भगवान् के वंशज है तो भगवान हमारे – ऐसा मानने में लाभ है कि “सब वासुदेव है”| अरे! पहले तुम मैं भगवान् का हूँ, भगवान मेरा है, ये मानना शुरू करो । तुम भगवान के हो तो तुम लोफरों के नहीं रहोगे, मन-मुखता के नहीं रहोगे । जब मन में आया, थोडा अहम का अपमान हुआ तो चल फिर एकांतवास में । तुम लोफरों के हवाले हो, जैसा मन में आया वैसा करा तो मन में आएगा काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार| अरे! तुम एक बूँद से तो चले थे और अब तुम्हारी इज्जत और बे-इज्जती| तो भैया! जरा ईश्वर के हवाले हो के जीओ । तो एक तो शुभ संकल्प, दूसरा दृढ संकल्प । हम गुरूजी के आश्रम में गए तो दूसरे पुराने लोगों को लगा कि गुरूजी हम पर ज्यादा प्रसन्न हैं तो सब पुराने लोग मिलकर मुझको भगाने में लग गये । मैं जूनियर था और बाकि सब सीनियर । कुछ का कुछ कहें, कुछ का कुछ साजिश रचें, कुछ का कुछ बनावें – षडयंत्र रचें । लेकिन मैंने भागने का तो सोचा ही नहीं । आखिर मे गुरुदेव ने मेरी गोद में ही महायात्रा की और जो ख़ास था, उसको डबल लगा तो डेढ़ घंटा डबल में ही बैठा रहा, गुरूजी चल बसे । करनी आपो आपनी….| तो एक तो शुभ संकल्प, दूसरा दृढ संकल्प और तीसरा  निसंकल्प… तो नारायण के साथ एकाकारता हो जाती है । आमी बोलते, वेद बोलतो | हम जो बोलते हैं वेद की वाणी है । नानक बोले सहज स्वभाव । फिर आपके दर्शन हरि दर्शन हो जायेंगे । आपकी वाणी हरि की वाणी हो जायेगी । आपका हिलना डुलना लोगों के लिए मंगलमय हो जायेगा । हरि तो निर्गुण निराकार है लेकिन साकार रूप हरि का संत ही तो है ।

अभी एक संत बाई हो गई । थोड़े दिन पहले उसका शरीर शांत हुआ, कानपुर में रहती थी बाई । सत्संग सुना गुरुदीक्षा ली । स्वामी राम की एक संस्था है, उसके गुरु उस बाई के भी गुरु थे । बाई का बेटा था डाक्टर चन्दन साहब, बड़ा मशहूर । ७८-८० साल की बाई ने आवाज लगाई-“चंदू , ऐ चंदू”  वो तो चन्दन साहब थे.. डाक्टर चन्दन साहब.. लेकिन माँ के आगे तो चंदू ही थे । “चंदू, बेटा चंदू”
“हाँ, माँ जी”
“तेरी पत्नी को बुला, तेरे जमाई को बुला और बेटी भी आई है, सबको बुलाओ । अब हम जा रहे हैं अपने देश”
“माँ, ये क्या बोलती है|”
“अब बाते लम्बी मत करो, बैठो । आ जाओ बैठो सब| देखो, ये शरीर मरण-धरमा है|”
“माँ, माँ तुम माफ़ करो । मैं डाक्टर हो कर भी तुम को ठीक नहीं कर सका|”
“ अरे, बेटे, ये एलोपैथी की दवाई है । बिल्ली निकालने गए तो ऊँट घुस गया|”
“माँ, माँ तू ये क्या बोलती है ?”
“सुनो, एक बिल्ली मर गयी थी| ब्राह्मणी ने देखा कि मरी बिल्ली को कौन उठाये । वो गयी गाँव में कि कोई बिल्ली को उठा के बाहर छोड़ जावे । गई तो सही, लेकिन जाते-जाते दरवाजा बंद नहीं किया  और पीछे से बीमार ऊँट अन्दर घुस गया । ऊँट ने भी वहीं दम छोड़ा । बिल्ली मरी को उठाने के लिए गई थी किसी को बुलाने, देखा तो ऊँट मरा पड़ा है|”
ऐसे ही छोटे मोटे दुःख और चिता को निकलने के लिए  “मैं बुद्धिमान हूँ, मैं विद्वान हूँ, मैं प्रसिद्ध हूँ, मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ” – ये ऊँट बड़ा भारी है । इसको बाहर निकालना हरेक के बस की बात नहीं है । छोटी मोटी तकलीफ को निकालने के लिए “मैं विद्वान हूँ, मैं ग्रेजुएट हूँ, मैं एम०ए० हूँ, मैं बी०ए० बी०एड० हूँ, मैं डी० लिट् हूँ ।“………….
“ बाबा जी दुनिया के पांच देशों ने मिलकर मुझको सर्वोपरि विद्वान बताया, लेकिन आपकी दीक्षा के बिना मेरा जीवन व्यर्थ था बापूजी!!! अभी मेरे को ऐसा लगता है, ऐसा लगता है ….”-ये कहने वाला आदमी अभी भी जीवित है । रूप-नारायण उनका नाम है, मेरठ में रहते है । पांच देशों में सर्वोपरि विद्वान… बापू से दीक्षा लिया था ।

हरि सम जग कुछ वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ

भगवान् में प्रेम कैसे हो ? जब आवश्यकता से अधिक भूख लगती है तो रोटी बड़ी प्यारी लगती है । प्यास में पानी प्यारा,  गर्मी में ठंडी हवा प्यारी, और चारों तरफ से मुसीबतों में घिर गए तो वहां सांत्वना और साथ देने वाला प्यारा पर इन सब प्यारों से भी प्यारा भगवान हमारी आवश्यकता है । आवश्यकता प्यारी हो जाती है तो भगवान की आवश्यकता मानो और भगवान को अपना मानो । भगवान की आवश्यकता और भगवान को अपना मानने से भगवान में प्यार उत्पन्न हो जाता है और प्रेम से थोडा भी भजन करेंगे तो जल्दी फलेगा ।

चन्दन की माँ को सब शगुन मिल गए थे| “चंदू, देखो हम जा रहे है”  बाई बोलती हैं ।
“माँ, नहीं जाने दूंगी”, बहू बोलती है ।
“माँ, ये क्या बोलती हो ?
“दादी माँ “ बहू की बेटी बोलती है ।
“अरे बेटे, अब रोने धोने से मैं फँसने वाली नहीं हूँ कि पोती रो रही है, बहु रो रही है, बेटा रो रहा है, मेरे को बचाओ । मैं जानती हूँ कि मेरी तो कभी मौत ही नहीं होती । मेरे को तो भगवान भी नहीं मार सकते मैं तो अमर आत्मा हूँ और शरीर को तो भगवान ने भी नहीं रखा तो मेरे को क्या बख्शेंगे । भगवान के होते हुए कौशल्या चली गयी, सुमित्रा चली गयी, कैकेयी चली गयी तो तुम्हारे लिए मेरे को भगवान बचाये, मैं ऐसी गुहार भी नहीं लगाऊँगी । मेरी तो कभी मौत ही नहीं हो सकती ये शरीर तो टिकेगा नहीं” ।
अब ध्यान से सुनो, जन्म-मरण शरीर का होता है, दुःख-सुख मन को होता है, बीमारी-तंदरुस्ती शरीर की होती है, चिंता चित्त करता है । “मैं चिंतित हूँ, मैं बीमार हूँ, मैं दुखी हूँ” ये अज्ञानी लोग  मानते हैं । जब दुःख आये तो समझ लेना कि मन में दुःख आया, दुःख नहीं होगा । मन के दुःख को देखोगे तो मैं दुखी नहीं हूँ । दुख नहीं होगा, दुःख भी जल्दी भागेगा । सुखी होकर दुःख मिटाने वाले के दुःख दब जाते हैं, तो क्या करें – मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं …हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ …ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ….(देव-हास्य प्रयोग)

जब सुख पैदा होगा तो दुःख नहीं टिकेगा, मन में ये योग्यता है कि जब सुख होगा तो दुःख नहीं होगा, जब दुख का चिंतन करोगे तो सुख नहीं टिकेगा । काहे को दुख का चिंतन करना| तो पहले शुभ चिंतन, फिर दृढ चिंतन, फिर चिंतन जहाँ से होकर विलय हो जाता है उसमे विश्रांती – ये जीवन का सार है ।
“अब तुमने तो उपाय किया लेकिन ये शरीर है, जाने वाला है । अब तुम दरवाजा बंद करके चले जाओ मैं अन्दर से कड़ा नहीं लगाऊँगी, नहीं तो तुम को तुडवाना पड़ेगा । एक घंटे बाद दरवाजा खोलना”. माई बोलती है ।
“माँ, मैं नहीं जाने दूंगी”
“चंदू, इन को समझा”
चंदू जानते थे कि माँ आध्यात्मिक गुरु कि पक्की सत्संगी है और सत्संग पचाया है । मेरी माँ दिखती तो माँ है लेकिन गुरु के सत्संग को पचाया है ।
“जैसी गुरु की आज्ञा” कह कर आ गया । पीठ देकर नहीं निकले शिवजी की आज्ञा है, पीछे पैर करके निकल गए । चौखट को प्रणाम किया ।
गुरु महाराज और आत्मवेत्ता पुरुषों के यहाँ जब सिर झुकता है और उनकी चौखट को अथवा चरण-रज को नमस्कार करते हैं तो जितने रज-कण लगते हैं उतने जन्मों के पाप-ताप मिटते हैं, उतने अश्वमेघ यज्ञ होते हैं । वशिष्ठ जी महाराज के चरणों में जाते थे राजा दशरथ तो आश्रम की चौखट पे मत्था टेकते थे वहां । गुरु की महिमा तो साधक जाने दशरथ जाने, निगुरा क्या जाने ।
“तीरथ नहाये एक फल, संत मिले फल चार| सदगुरु मिले अनंत फल,…” जिस फल का अंत न हो अनंत फल … । वैशाख मास की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा इन तीन दिनों को पुष्कर्णी दिवस कहते है.. अथाह पुण्य देते हैं । जल में तिल डालकर ठंडा जल पहले सिर पर चढ़ावे| सिर की गर्मी पैरों से निकल जावे । जो लोग पहले पैर पर पानी डालते है गर्मी सिर पर चढती है । एक तो पैर की गर्मी सिर पर चढ़ने से सिरदर्द होता है और दूसरा अभागे मोबाईल भी सिरदर्द की खान हैं ।
अब मोबाईल के सिरदर्द को टक्कर मारने वाला भजन गायेंगे सुरेश “ जोगी रे” । इससे मोबाईल से होने वाले सिरदर्द को टक्कर मारने वाली ऊर्जा पैदा होती है तो ये वैशाख मास की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा – जो वैशाख मास का स्नान… एक मास न कर पाए तो ये तीन दिन स्नान कर ले, तीन दिन न कर पाए तो दो दिन, दो दिन न कर पाए तो कल का दिन तो है और आज शाम को भी तुम स्नान करना कैसे स्नान करोगे – “ मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं” चार प्रकार के स्नान होते हैं –भस्म स्नान होता है, वायु स्नान होता है, जल स्नान होता है और भगवद-चिंतन स्नान भी होता है । भगवद-चिंतन स्नान करके सोना । ॐ ॐ ॐ हरि ॐ ॐ ॐ ..

मेरे साथ मिलकर करना – ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ —-( दीर्घ ॐ गुंजन उच्चारण प्रयोग ) ।

माई ने सुना था सत्संग और अब तुमने भी सुना है| देखो, सत्संग से कैसी-कैसी युक्तियाँ मिल जाती हैं । सात बार ये प्रयोग करने से जीव अनत ब्रह्मांडो के पार उस परमात्मा से एकाकार हो जाता है । मरने से पहले अगर सात बार ये गुंजन हो गया तो फिर चिंता की बात नहीं है और फिर तुलसी की कंठी है तो सदगति में संदेह नहीं है । मृतक व्यक्ति को तुलसी की लकड़ी से अग्नि-दाह कर दें, तुलसी की लकड़ी और छोटी मोटी घास मिलाकर – कैसा भी पापी हो दुर्गति नहीं होगी । मृतक व्यक्ति के लिए और कुछ नहीं कर सकते तो खाली तुलसी की लकड़ी से संस्कार कर दें । उस की हड्डियाँ गंगा जी में, नर्मदा जी में डालो.. अच्छा है अगर नहीं भी डाल सकते तो आवले के रस में धो डालो, सद्गति हो जायेगी|

माई तो ॐ कार का चिंतन करके निसंकल्प हो गयी । पहले शुभ संकल्प था फिर दृढ संकल्प और फिर नि-संकल्प का अभ्यास तो था ही, ईश्वर में शांत हो गई| जैसे सांप केंचुली छोड़ता है अथवा आप वस्त्र बदलते हैं । घड़ा टूटता है तो घड़े का आकाश महाकाश में, आत्मा शरीर से निकल कर पारब्रह्म परमात्म में एकाकार हो गयी । एक घंटे बाद चंदू ने और उसकी पत्नी ने दरवाजा खोला, देखा तो माँ तो बैठी है ।
“माँ, माँ ..”
डाक्टर तो डाक्टर था, हाथ लगाया तो बोला कि माँ ने तो अपनी लीला समेट ली, माँ तो गई । लेकिन माँ कैसी लग रही है, आँखे खुली हैं, हंसती दिख रही है । नीचे के लोकों से प्राण निकलते हैं तो नीच गति होती है ऊपर के लोको से प्राण निकलते है तो सदगति होती है । अभी भी माँ के कमरे में जाते है तो लगता है मानो ॐ ॐ ॐ …… याद आती है तो मन शांत हो जाता है । वो हवा स्पर्श भी करती है और वो हवा जहाँ से गुजरती है वो सुगंध स्वभाव, संस्कार लेकर बांटती जाती है । पेट्रोल की, डीजल की केरोसिन की या तरबूज की, आम की सुगंध तो थोड़ी देर रहती है लेकिन विचारों का प्रभाव बहुत लम्बा रहता है । वर्षों के वर्ष,  सैंकड़ों वर्ष बीत जाते है फिर भी वो विचारों का प्रभाव रहता है ।

श्रीरामजी और लक्ष्मणजी यात्रा कर रहे थे| एकाएक लक्ष्मण के मन में स्वार्थ के विचार आ गये  “बनवास मिला है तो आपको मिला है| मैं आपके पीछे इतनी सेवा करू, मेरे को क्या मिलेगा? मेरा अपना हक मुझे मिलना चाहिये”
रामजी सुनकर चकित हो गये लेकिन रामजी को जानने में देर नहीं लगी कि…. बोले- “अच्छा, लखन, जरा स्नान करके फिर बात करो तो..” स्नान करने गए नदी में तो “प्रभू, यह मैं क्या बोल रहा हूँ ? आप तो मुझे छोड़ कर आना चाहते थे| मैंने सेवा की प्रार्थना की और मै अब ऐसा कैसे बोला, मुझे माफ़ कर दो”

बोले – “चलो लखन, आओ, उसी धरती की जगह खड़े रहो”
वहां खड़े रहे तो फिर लक्ष्मण के मन में गड़बड़ ।
रामजी ने बताया कि शुम्भ व निशुम्भ दो भाई थे । उन्होंने खूब तपस्या की थी| दोनों भाइयों का आपस में स्नेह था । तपस्या के बल से ब्रह्मा जी ने वरदान दिया कि तुम अमर हो ऐसा तो नहीं बोल सकते और कोई शर्त रखो तो बोले कि हम एक-दुसरे भाई को मारे तब मरें और हमारा तो आपस में प्रेम है हम लड़ेंगे नहीं और अमर हो जायेंगे । तामसी व्यक्तियों को ताकत आती है तो दूसरों को सता कर बड़ा बनना चाहते है । फिर महान सिकंदर बनना चाहते हैं और सत्संगी दूसरों को नष्ट करके बड़ा नहीं बनते, दूसरों में जो बडापन छिपा है.. उसी का ज्ञान, आनंद, प्रेम लेकर सर्व-व्यापी बड़े को पा लेते हैं । ब्रह्मा जी को प्रार्थना किया तो ब्रह्मा जी ने तिलोत्तमा नाम की अप्सरा भेजी, बड़ी सुंदर थी । बड़े भाई को बोले – मैं तो तुम को वर चुकी हूँ, पर छोटा मुझ पर बुरी नजर रखता है । छोटे को बोले कि मैं उस बूढ़े से क्यों शादी करू, मैं सुन्दरी तुम सुंदर, मैं युवती तुम युवक.. लेकिन तुम्हारा भाई मेरे को अपनी पत्नी बनाना चाहता है । धीरे धीरे दोनों के मन मे जहर भरा| दोनों के अंदर एक दुसरे के लिए नफरत हुई और फिर “तू अपने को क्या समझता है” “तू अपने को क्या समझता है” और दे धडाधड… दोनों आपस में लड़ कर मरे जहाँ, तू अब वहीं पर खड़ा है लक्ष्मण, इसलिए तेरे मन में ऐसे विचार आये । कितने साल बीत गए फिर वो वायु – देवता का उस जगह पर कितना गहरा प्रभाव है ।
कथा-कीर्तन जा घर नहीं, संत नहीं मेहमान
वा घर जमडा डेरा बिना, सांझ पड़े शमशान ।।
कथा कीर्तन जा घर भयो संत भये मेहमान
वा घर प्रभु वासा कीनो, वा घर वैकुण्ठ समान ।।

एक बात मानो, बेल के फल की बहुत भारी महिमा है । बेल के फल का शरबत बनायें और दूसरा पलाश के फूलों का शरबत, अथवा दोनों का मिश्रण करें तो बैठे बैठे ये शरबत खाना है, ग्लास मुंह से नहीं लगाना ऊपर से घूँट ले के जैसे खाना, पीना नही  । बेल और पलाश दोनों का बहुत फायदा है । बेलफल का बड़ा भारी गुण है और शिवजी का प्रिय है । पेट की खराबी ठीक हो जावे, गर्मी ठीक हो जावे आँखों की जलन ठीक हो जाये ।  पलाश और बेल, अकेला पलाश भी बहुत अच्छा है, पलाश के शर्बत की  बोतल मिले तो लेना चाहिए इसके बड़े भारी गुण हैं ।
योगी यान्चिद सततं आत्मा । सतत उस आत्मा का चिंतन करो । दिन भर तो लोफर तुमको सताते हैं लेकिन सुबह दोपहर शाम रात को सोते समय अपने हितैषी नारायण में बैठो । उनकी प्रेरणा से जीवन की नैया चलने दो । ॐ शान्ति … योगी यान्चिद सततं आत्मा रशिचिता एकाकियतचित्तात्मा निराश्रिय परिग्रह । एकांत में रहो.. परिग्रह करो । ऐसा करना है वैसा करना है….. हरि ॐ तत्सत, अभी तो ध्यान करो मन तू राम भजन कर.. जग मरवा दे, नर्क पड़े तो पद्व दे, तू राम भजन कर । भगवान का चिंतन, उच्चारण करके फिर शांत हो जाओ । श्वास अन्दर जाए तो भगवान का नाम बाहर आये तो गिनती । मन इधर उधर जाए तो थोडा भगवान का नाम ले, और देव-हास्य प्रयोग अथवा कीर्तन करें – ॐ ॐ ॐ ॐॐ..हरि ॐ  ॐ ॐ….. मेरे ॐ ॐ ॐ … ॐॐ प्यारे ॐ ॐ ….प्रभु ॐ ॐ ॐ ….ॐ ॐ ॐ ॐ( हरि ॐ संकीर्तन ) ।

Family Of Sant Shri Asaram Bapu Expressing Their Faith Towards Asaram Bapuji

laxmidevi

Family Of Sant Shri Asaram Bapu Expressing their Faith Towards Bapuji.

Media Has Spread False News Against Sant Shri Asharamji Bapu and His Family . They Have Shown The Conflict Between All Of Them . This Is The Truth Which Shows the Emotion Of A Wife , Son And Daughter Towards A Spirtual Saint H.H Sant Shri Asharamji Bapu .

साँच को आँच नहीं – प. पू. संत श्री आशारामजी बापू

sanch ko aanch nahi

Sant Asaram ji Bapu – साँच को आँच नहीं ( Pure gold does not fear the flame )

सत को आँच नहीं होती और झूठ को पैर नहीं होते | हम किसीका बुरा सोचे नहीं, चाहे नहीं, करें नहींफिर कोई कुछ भी करें तो सब का मंगल सब का भला !