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रायपुर आश्रम में चातुर्मास श्रीआशारामायण पाठ का भव्य समापन

रायपुर आश्रम में चातुर्मास श्रीआशारामायण पाठ का भव्य समापन

पूज्य बापूजी के शुभ आशीष से वर्ष 2005 से रायपुर आश्रम द्वारा चातुर्मास के पावन दिनों में साधकों के निवास पर प्रतिदिन श्री आशारामायण पाठ व भजन कीर्तन का आयोजन किया जा रहा है।

इस वर्ष 2017 में देवशयनी एकादशी से मंगलदायी पाठ व भजन कीर्तन का प्रारंभ किया गया चातुर्मास श्री आशारामायण पाठ का भव्य समापन एवं पूज्य बापूजी व श्री नारायण साँई जी के ससम्मान रिहाई हेतु 27 कुंडीय सामूहिक महायज्ञ का आयोजन दिनांक 4 नवम्बर 2017 कार्तिक पूर्णिमा के दिन पूज्यश्री के श्रीचरणों में रायपुर आश्रम के आध्यात्मिक वातावरण में किया गया।

यज्ञ की मंगल आरती व पूर्णाहुति के पश्चात सभी ने भंडारे (भोजन प्रसादी ) का भी लाभ लिया ।

गोपाष्टमी महोत्सव  रायपुर

गोपाष्टमी महोत्सव  रायपुर

 संत श्री आशारामजी आश्रम रायपुर के तत्वधान में आश्रम के साथ साथ साधकों ने शहर के विभिन्न स्थानों पर भी (डुंडा, सरोरा, टेमरी, गोंदवारा, अमलीडीह में )  गौ – पूजन कार्यक्रम धूमधाम से किया गया |पूजन के साथ – साथ गौ माता की महिमा व उपयोगिया भी बताकर साहित्य व पाम्पलेट वितरण किया गया व लोगो को अपनी संस्कृति की रक्षा हेतु गौ माता की भूमिका व योगदान का महत्त्व बताया गया |

Dr. Subramanian Swami Aurangabad (MH) Interview – 4th July 2015

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💥मीडिया – सर सुधा पटेल का कोर्ट में न आना क्या ट्रायल को लम्बा करने की साजिश है ?
🌹स्वामीजी – वो मैं देखूँगा अगले बार भी वो जिद करेगी ,एक बार और दिया जायेगा तो मैं बोलूंगा,अभी नहीं बोल सकता ।
💥मीडिया – सर उसका वारंट नहीं निकल सकता क्या ?
🌹स्वामीजी – हाँ निकल सकता है ,समन्स को अमान्य करने से निकल सकता है ,वो कोर्ट को फैसला करना है भाई मैं कोर्ट के लिए कैसे फैसला करूँगा ? ऐसे केसों में कभी 3 महीने से ज्यादा किसी का देखा नहीं ,उनके लिए कटिबध्द व सुनिश्चित तरीके से ,उनको किसी तरीके से रोकने की प्रयास हुई ।
इस बार भी जब मेरी बहस हुई प्रतिपक्ष से कोई जवाब नहीं था ,आखिर में उन्होंने कहा विटनेस को एक ओर मौका दिया जाये ,जिस विटनेस के बारे में पुलिस ने लिख दिया कि वो आना नहीं चाहती उसके पास कुछ है नहीं मटेरियल तब भी डिले करने के लिए ऐसा किया ।
अब हमें आखिर में तो न्यायालय से ही निर्णय लेना है इसलिए देरी हो भले हो कुछ कारण से हुआ होगा । लेकिन हमे अपने लक्ष्य से हटना नहीं है ।
💥मीडिया – आपने रावण की बात की तो कौन सा रावण है ?
🌹स्वामीजी – इसमें रावण नहीं है ताड़का है वो है सोनिया गॉंधी ।

शिवपुराण – १६९

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १६९

विष्णुद्वारा तुलसी के शील-हरणका वर्णन, कुपित हुई तुलसीद्वारा विष्णु को शाप, शम्भुद्वारा तुलसी और शालग्राम – शिला के माहात्म्य का वर्णन

व्यासजी के पूछ्नेपर सनत्कुमारजी ने कहा – महर्षे ! रणभूमिमें आकाशवाणी को सुनकर जब देवेश्वर शम्भु ने श्रीहरि को प्रेरित किया, तब वे तुरंत ही अपनी माया से ब्राह्मण का वेष धारण करके शंखचूड के पास जा पहुँचे और उन्होंने उससे परमोत्कृष्ट कवच माँग लिया | फिर शंखचूड का रूप बनाकर वे तुलसी के घर की ओर चले | वहाँ पहुँचकर उन्होंने तुलसी के महल के द्वार के निकट नगारा बजाया और जय – जयकार से सुन्दरी तुलसी को अपने आगमन की सूचना दी | उसे सुनकर सती-साध्वी तुलसी ने बड़े आदर के साथ झरोखे के रास्ते राजमार्ग की ओर झाँका और अपने पति को आया हुआ जानकर वह परमानंद में निमग्न हो गयी | उसने तत्काल ही ब्राह्मणों को धन-दान करके उनसे मंगलाचार कराया और फिर अपना श्रुंगार किया | इधर देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये माया से शंखचूड का स्वरूप धारण करनेवाले भगवान विष्णु रथ से उतरकर देवी तुलसी के भवन में गये | तुलसी ने पतिरूप में आये हुए भगवान का पूजन किया, बहुत-सी बातें की, तदनन्तर उनके साथ रमण किया | तब उस साध्वी ने सुख, सामर्थ्य और आकर्षण में व्यतिरूप देखकर सबपर विचार किया और वह ‘तू कौन है ?’ यों डाँटती हुई बोली |

तुलसी ने कहा – दुष्ट ! मुझे शीघ्र बतला कि मायाद्वारा मेरा उपभोग करनेवाला तू कौन हैं ? तूने मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया है, अत: मैं अभी तुझे शाप देती हूँ |

सनत्कुमारजी कहते हैं – ब्रह्मन ! तुलसी का वचन सुनकर श्रीहरि ने लीलापूर्वक अपनी परम मनोहर मूर्ति धारण कर ली | तब उस रूप को देखकर तुलसी ने लक्षणों से पहचान लिया कि ये साक्षात विष्णु हैं | परन्तु उसका पातिव्रत्य नष्ट हो चूका था, इसलिये वह कुपित होकर विष्णु से कहने लगी |

तुलसी ने कहा – हे विष्णो ! तुम्हारा मन पत्थर के सदृश कठोर है | तुम में दया का लेशमात्र भी नहीं है | मेरे पतिधर्म के भंग हो जाने से निश्चय ही मेरे स्वामी मारे गये | चूँकि तुम पाषाण – सदृश कठोर, दयारहित और दुष्ट हो, इसलिये अब तुम मेरे शाप से पाषाण-स्वरूप ही हो जाओ |

सनत्कुमारजी कहते है – मुने ! यों कहकर शंखचूड की वह सती-साध्वी पत्नी तुलसी फूट-फूटकर रोने लगी और शोकार्त होकर बहुत तरह से विलाप करने लगी | इतने में वहाँ भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रकट हो गये और उन्होंने समझाकर कहा – ‘देवि ! अब तुम दुःख को दूर करनेवाली मेरी बात सुनो और श्रीहरि भी स्वस्थ मनसे उसे श्रवण करें; क्योंकि तुम दोनों के लिये जो सुखकारक होगा, वही मैं कहूँगा | भद्रे ! तुमने (जिस मनोरथ को लेकर ) तप किया था, यह उसी तपस्या का फल है | भला, वह अन्यथा कैसे हो सकता है ? इसीलिये तुम्हे उसके अनुरूप ही फल हुआ है | अब तुम इस शरिरको त्यागकर दिव्य देह धारण कर लो और लक्ष्मी के समान होकर नित्य श्रीहरि के साथ ( वैकुण्ठ में ) विहार करती रहो | तुम्हारा यह शरीर, जिसे तुम छोड़ दोगी, नदी के रूप में परिवर्तित हो जायगा | वह नदी भारतवर्ष में पुण्यरूपा गण्डकी के नामसे प्रसिद्ध होगी |

महादेवि ! कुछ काल के पश्चात मेरे वर के प्रभाव से देवपूजन – सामग्री में तुलसी का प्रधान स्थान हो जायगा | सुन्दरी ! तुम स्वर्गलोक में, मृत्युलोक में तथा पाताल में सदा श्रीहरि के निकट ही निवास करोगी और पुष्पों में श्रेष्ठ तुलसी का वृक्ष हो जाओगी |

तुम वैकुण्ठ में दिव्यरूपधारिणी वृक्षाधिष्ठात्री देवी बनकर सदा एकांत में श्रीहरि के साथ क्रीडा करोगी | उधर भारतवर्ष में जो नदियों की अधिष्ठात्री देवी होगी, वह परम पुण्य प्रदान करनेवाली होगी और श्रीहरि के अंशभूत लवणसागर की पत्नी बनेगी | तथा श्रीहरि भी तुम्हारे शापवश पत्थर का रूप धारण करके भारत में गण्डकी नदी के जल के निकट निवास करेंगे | वहाँ तीखी दाढ़ोंवाले करोड़ों भयंकर कीड़े उस पत्थर को काटकर उसके मध्य में चक्र का आकर बनायेंगे | उसके भेद से वह अत्यंत पुण्य प्रदान करनेवाली शालग्रामशिला कहलायेगी और चक्र के भेद से उसका लक्ष्मीनारायण आदि भी नाम होगा |

विष्णु की शालग्रामशिला और वृक्षस्वरूपिणी तुलसी का समागम सदा अनुकूल तथा बहुत प्रकार के पुण्यों की वृद्धि करनेवाला होगा | भद्रे ! जो शालग्रामशिला के ऊपरसे तुलसीपत्र को दूर करेगा, उसे जन्मान्तर में स्त्रीवियोग की प्राप्ति होगी तथा जो शंख को दूर करके तुलसीपत्र को हटायेगा, यह भी भार्याहीन होगा और  सात जन्मोंतक रोगी बना रहेगा | जो महाज्ञानी पुरुष शालग्रामशिला, तुलसी और शंख को एकत्र रखकर उनकी रक्षा करता है, वह श्रीहरि का प्यारा होता है |

सनत्कुमारजी कहते है – व्यासजी ! इस प्रकार कहकर शंकरजी ने उस समय शालग्रामशिला और तुलसी के परम पुण्यदायक माहात्म्यका वर्णन किया | तत्पश्चात वे श्रीहरि को तथा तुलसी को आनंदित करके अन्तर्धान हो गये | इस प्रकार सदा सत्पुरुषों का कल्याण करनेवाले शम्भु अपने स्थान को चले गये | इधर शम्भुका कथन सुनकर तुलसी को बड़ी प्रसन्नता हुई | उसने अपने उस शरीरका परित्याग करके दिव्य रूप धारण कर लिया | तब कमलापति विष्णु उसे साथ लेकर वैकुण्ठ को चले गये | उसके छोड़े हुए शरीर से गण्डकी नदी प्रकट हो गयी और भगवान अच्युत भी उसके तटपर मनुष्यों को पुण्यप्रदान करनेवाली शिला के रूप में परिणत हो गये | मुने ! उसमें कीड़े अनेक प्रकार के छिद्र बनाते रहते हैं | उनमें जो शिलाएँ गण्डकी के जल में गिरती है, वे परम पुण्यप्रद होती हैं और जो स्थलपर ही रह जाती है, उन्हें पिंगला कहा जाता है और वे प्राणियों के लिये संतापकारक होती है | व्यासजी ! इस प्रकार तुम्हारे प्रश्न के अनुसार मैंने शम्भु का सारा चरित, जो पुण्यप्रदान तथा मनुष्यों की सारी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है, तुम्हे सुना दिया | यह पुण्य आख्यान, जो विष्णु के माहात्म्य से संयुक्त तथा भोग और मोक्ष का प्रदाता है |

– ॐ नम: शिवाय –

रायपुर में माला पूजन व अनुष्ठान

2 जून वट पूर्णिमा पर रायपुर आश्रम (छ.ग.) में सामूहिक माला पूजन के  साथ  अनुष्ठान का प्रारंभ किया गया   |अपनी सुशुप्त शक्तियों को जगाने के लिए साधको के लिए प्रत्येक वर्ष की भाती इस वर्ष भी बड़ो के लिए गुरु मंत्र व विद्यार्थियों के लिए  सरसत्य मंत्र सामूहिक अनुष्ठान का प्रारंभ कबीर जयंती देवस्नान  पूर्णिमा को प्रारंभ किया गया |DSCN6457 DSCN6479DSCN6469 DSCN6432

वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मीबाईरानी लक्ष्मीबाई के अंतिम पल कैसे बीते? आगे पढिये…

मनु का विवाह सन् 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। 1851 में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई किन्तु विधाता ने तो उन्हे किसी खास प्रयोजन से धरती पर भेजा था। पुत्र की खुशी वो ज्यादा दिन तक न मना सकीं दुर्भाग्यवश शिशु तीन माह का होतो होते चल बसा। गंगाधर राव ये आघात सह न सके। लोगों के आग्रह पर उन्होने एक पुत्र गोद लिया जिसका नाम दामोदर राव रक्खा गया। गंगाधर की मृत्यु के पश्चात जनरल डलहौजी ने दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई ये कैसे सहन कर सकती थीं। उन्होने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बजा दिया और घोषणा कर दी कि मैं अपनी झांसी अंग्रेजों को नही दूंगी।tweet this,brahmacharya

जून १८५७ से मार्च १८५८ तक १० माह की अवधि में लक्ष्मीबाई ने झान्सी का प्रशासन ब्रिटिशों से अपने हाथों में लेने के बाद, उसमें काफी सुधार किया। खजाना भर गया। सेना सुव्यवस्थित हो गई। पुरुषों की सेना की बराबरी में महिलाओं की भी सेना थी। रानी ने अपनी कुछ तोपों के नाम रखे थे “गर्जना , “भवानीशंकर” और “चमकती बिजली”। ये तोपें महिलाओं एवं पुरुषों द्वारा बारी-बारी से दागी जाती थी। पुराने शस्त्र तेज किए गए। नए शस्त्र तैयार किए गए। उन दिनों झाँसी में प्रत्येक घर में युद्ध की तैयारियाँ हो रही थी और सब कुछ महारानी के मार्गदर्शन में किया जा रहा था। २३ मार्च १८५८ में सर हयूरोज की सेना ने युद्ध की घोषणा कर दी। १०-१२ दिनों में ही झासी का छोटा-सा राज्य विजय के प्रकाश और पराजय की छाया में डोलता रहा। एक सफलता पर जहाँ राहत मिलती थीं वहीं दूसरे क्षण पराजय का आघात लगता था। अनेक वफादार सरदार धाराशायी हो गए। दुर्भाग्य से बाहर से कोई सहायता नहीं मिली।

युद्ध की देवी

जब अंगेर्जों की शक्ति बढ़ी और हयूरोज की सेना ने झाँसी में प्रवेश किया तब रानी ने स्वय शस्त्र उठाया। उसने पुरुषों के वस्त्र पहिने और वह युद्ध की देवी के समान लड़ी। जब भी वह लड़ी उसने अंग्रेजों की सेना को झुका दिया। उसकी सेनाओं के संगठन और पुरुष के समान उसकी लड़ाई ने हयूरोज को चकित कर दिया। जब स्थिति नियंत्रण के बाहर हुई तब उसने राजदरबारियों को बुलाया और उनके समक्ष उसने अपने सुझाव रखे :”हमारे कमांडर और हमारे बहादुर सैनिक और तोप दागनेवाले सैनिक अब हमारे साथ नहीं है। किले में जो ४००० सैनिक थे उनमें से अब ४०० भी नहीं बचे हैं। किला अब मजबूत नहीं है। अतः हमें यथाशीघ्र यह स्थान छोड़ देना चाहिए। हमें एक सेना का गठन करना चाहिए और तब पुनः हमला करना चाहिए। ” सभी इस बात पर सहमत हो गए। कुछ योद्धाओं के साथ रानी शत्रुओ की पंक्तियों को चीरती हुई झाँसी से निकल गई। बोकर नामक एक ब्रिटिश अधिकारी एक सैनिक टुकड़ी के साथ उसके पीछे पीछे चला। लड़ाई में वह स्वयं घायल हो गया था और पीछे हट गया था। रानी के घोड़े की मुत्यु हो गई थी। उसके बाद भी वह हताश नहीं हुई और काल्पी जाकर तात्या टोपे और रावसाहेब से मिल गई।

ज्योति बुझने के पूर्व

काल्पी में भी रानी सेना जुटाने में लगी थी। हयूरोज ने काल्पी की घेराबँदी की। जब पराजय निश्चित दिखाई दी तब रावसाहेब, तात्या तथा अन्य लोग रानी के साथ, ग्वालियर की ओर चल पड़े। वे गोपालपुर पहुँचे। रात्रि में रावसाहेब, तात्या और बान्दा के नवाब की बैठक हुई। दूसरे दिन वे रानी से मिले। उनका इरादा युद्ध करने का नहीं था। रानी ने कहा,” हम जहाँ तक किले के अंदर रहे हमने अंग्रेजो का सामना किया। हमें लड़ाई जारी रखनी चाहिए। ग्वालियर का किला समीप है। यह सत्य है कि, वहाँ के राजा का झुकाव अंग्रेजो की ओर है, परंतु मैं जानती हूँ कि सेना और जनता अंग्रेजों के विरुद्ध है। इसके अलावा, वहाँ बँदूकों और गोला बारूदों का भारी भंडार है।” रानी का झुकाव स्वीकार हुआ। जब तात्या एक छोंटी सेना के साथ ग्वालियर पहुँचे तो वहाँ की अधिकांश सेना उनके साथ हो गई। ग्वालियर का राजा भाग खड़ा हुआ और उसने आगरा जाकर अंग्रेज़ो से संरक्षण माँगा।

युद्ध का अंत

हयूरोज प्रतीक्षा करने के लिए तैयार नहीं था। १७ जून,१८५८ को लड़ाई पुन: आरंभ हुई। रानी ने पुरुषों के वस्त्र पहने और तैयार हो गई। हयूरोज ने एक चाल चली। वह महाराजा जयाजीराव सिंधिया को, जोकि ग्वालियर से भाग गया था और आगरा में ब्रिटिश संरक्षण में रह रहा था, लेकर ग्वालियर आया।

अब पेशवाओं में कुछ विवेक जागा। वे रानी लक्ष्मीबाई के समक्ष आने में लज्जित थे। अंतत : उन्होने तात्या टोपे को भेजा। जब उन्होने क्षमा याचना की तब रानी ने उनके समक्ष युद्ध की अपनी योजना रखी। तात्या टोपे ने उसे स्वीकार कर लिया। यद्यपि रानी की सेना संख्या में कम थी, सरदारों का असाधारण साहस, युद्ध की व्यूह रचना और रानी के पराक्रम ने ब्रिटिश सेना को परास्त किया। इस दिन की विजय रानी के कारण ही हुई। दूसरे दिन ( १८ तारीख को ) सूर्योदय के पूर्व ही अंग्रेजों युद्ध का बिगुल बजाया। महाराजा जयाजीराव द्वारा घोषित क्षमादान से प्रभावित सैनिक अंग्रेजों के साथ सम्मिलित हो गए। यह भी सूचना मिली की रवासाहेब के अंतर्गत जो दो ब्रिगेड थीं उन्होने पुन: अग्रेजों के साथ अपनी निष्ठा प्रकट की।

रानी लक्ष्मीबाई ने रामचंद्र राव देशमुख को बुलाया और कहा: “आज युद्ध का अंतिम दिन दिखाई देता है। यदि मेरे मृत्यु हो जावे तो मेरे पुत्र दामोदर के जीवन को मेरे जीवन से अधिक मूल्यवान समझा जावे और इसकी देखभाल की जावे। ” एक और संदेश यह था : “यदि मेरी मृत्यु हो तो इस बात का ध्यान रहे कि मेरा शव उन लोगों के हाथ में न पड़े जो मेरे धर्म के नहीं।” हयूरोज की शक्ति अधिक थी क्रांतिकारियों की एक बड़ी सेना धराशायी हो गई। उनकी तोपें ब्रिटिश के हाथों में चली गई। ब्रिटिश सेना बाढ़ के समान किले में प्रविष्ट हो गई। रानी के समक्ष अब भागने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। घोड़े की लगाम अपने दांतों में दबाए हुए और दोनों हाथों से तलवार चलाती हुई रानी आगे बढ़ी कुछ पठान सरदार, रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख भी उसके साथ चल पड़े। ब्रिटिश सेना ने उन्हें घेर लिया था। खून की धार बह रही थी। पश्चिम दिशा में अस्त होता हुआ सूर्य उसी रंग का दिखाई दे रहा था। अंधकार होता जा रहा था। एक ब्रिटिश सैनिक रानी के बहुत निकट आया और उसने रानी के सीने को लक्ष्य कर छूरा फैका। रानी ने सैनिक को मार डाला … पर उसके शरीर से खून बह रहा था, किन्तु विश्राम के लिए समय नहीं था। ब्रिटिश सेना उसका पीछा कर रही थी जब रानी स्वर्ण रेखा नहर पार करने ही वाली थी कि एक ब्रिटिश सैनिक की बँदूक से निकली गोली उसकी दाहिनी जांघ में आकार लगी। रानी ने बाएँ हाथ से तलवार चलाते हुए उस सैनिक को मार डाला।

क्रूर आघात – अंत

रानी के घोड़े ने भी सहायता नहीं दी। उसकी एक जांघ शून्य हो गई थी। पेट से खून बह रहा था। एक ब्रिटिश सैनिक की तलवार से, जोकि तेजी से उसकी ओर बढ़ा था, उसका दाहिना गाल चिर गया था, उसकी आँखें सुर्ख थी। इसके बाद भी उसने बाएँ हाथ से उस सैनिक का हाथ काट दिया। गुल मुहम्मद, जोकि रानी का अंगरक्षक था, उसके दुख को सहन नहीं कर सका। बहदुरी से लड़नेवाले इस योद्धा ने भी रोना शुरू कर दिया। रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख ने रानी को घोड़े से उतारने में सहायता पहुँचाई। रघुनाथ सिंह ने कहा: “अब एक क्षण भी खोने का वक्त नहीं, हमें शीघ्र ही समीपवर्ती बाबा गंगादास के मठ पर पहुँचना चाहिए।”

झाँसी का भाग्य अस्त हो गया।

लक्ष्मीबाई ,lakshmi bai,रानी लक्ष्मीबाई १९ नवंबर १८३५ से १८ जून १८५८ तक २२ वर्ष ७ माह जीवित रही। वह काली रात में बिजली के समान प्रकट हुई और लुप्त हो गई। ब्रिटिश जनरल सर हयूरोज ने, जो रानी से कई बार लड़ा और बार-बार पराजित हुआ और अंत में जिसने रानी को पराजित किया, रानी की महानता के विषय में निम्नलिखिए विचार प्रकट किए “…सबसे बहादुर और सबसे महान सेनापति, रानी थी।tweet this,brahmacharya इस अमर शहीद को को सम्मानित करते हुए १९७७ में भारतीय डाक-तार विभाग ने डाक टिकट प्रकाशित किया जिसका चित्र दिया गया है।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
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Ravivari Saptami

Ravivari Saptami (24th May 2015 7.41 am to 25th May 2015 Sunrise)
रविवारी सप्तमी (२४ मई २०१५ सुबह ७.४१ से २५ मई २०१५ सूर्योदय तक)

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Ravivari Saptami

रविवार सप्तमी के दिन जप/ध्यान करने का वैसा ही हजारों गुना फल होता है जैसा की सूर्य/चन्द्र ग्रहण में जप/ध्यान करने से होता है |
रविवार सप्तमी के दिन अगर कोई नमक मिर्च बिना का भोजन करे और सूर्य भगवान की पूजा करे , तो उस घातक बीमारियाँ दूर हो सकती हैं , अगर बीमार व्यक्ति न कर सकता हो तो

कोई ओर बीमार व्यक्ति के लिए यह व्रत करे | इस दिन सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिये |

सूर्य पूजन विधि :

१) सूर्य भगवान को तिल के तेल का दिया जला कर दिखाएँ , आरती करें |

२) जल में थोड़े चावल ,शक्कर , गुड , लाल फूल या लाल कुमकुम मिला कर सूर्य भगवान को अर्घ्य दें |

सूर्य अर्घ्य मंत्र :

1. ॐ मित्राय नमः।

2. ॐ रवये नमः।

3. ॐ सूर्याय नमः।

4. ॐ भानवे नमः।

5. ॐ खगाय नमः।

6. ॐ पूष्णे नमः।

7. ॐ हिरण्यगर्भाय नमः।

8. ॐ मरीचये नमः।

9. ॐ आदित्याय नमः।

10. ॐ सवित्रे नमः।

11. ॐ अकीय नमः।

12. ॐ भास्कराय नमः।

13. ॐ श्रीसवितृ-सूर्यनारायणाय नमः।

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महाराजा छत्रसाल

अपने हौसले के बूते मुग़लों को नाकों चने चबाने वाले महाराजा छत्रसाल को हमारी श्रद्धांजलि…

महाराजा छत्रसाल

Maharaja Chhatrasal

बात उस समय की है, जब दिल्ली के सिंहासन पर औरंगजेब बैठ चुका था।

विंध्यवासिनी देवी के मंदिर में मेला लगा हुआ था, जहाँ उनके दर्शन हेतु लोगों की खूब भीड़ जमी थी। पन्नानरेश छत्रसाल उस वक्त 13-14 साल के किशोर थे। छत्रसाल ने सोचा कि ‘जंगल से फूल तोड़कर फिर माता के दर्शन के लिए जाऊँ।’ उनके साथ कम उम्र के दूसरे राजपूत बालक भी थे। जब वे जंगल में फूल तोड़ रहे थे, उसी समय छः मुसलमान सैनिक घोड़े पर सवार होकर वहाँ आये और उन्होंने पूछाः “ऐ लड़के ! विंध्यवासिनी का मंदिर कहाँ है?”

 

छत्रसालः “भाग्यशाली हो, माता का दर्शन करने के लिए जा रहे हो। सीधे… सामने जो टीला दिख रहा है, वहीं मंदिर है।”

सैनिकः “हम माता के दर्शन करने नहीं जा रहे, हम तो मंदिर को तोड़ने के लिए जा रहे हैं।”

छत्रसाल ने फूलों की डलिया एक दूसरे बालक को पकड़ायी और गरज उठाः “मेरे जीवित रहते हुए तुम लोग मेरी माता का मंदिर तोड़ोगे?”

सैनिकः “लड़के तू क्या कर लेगा? तेरी छोटी सी उम्र, छोटी-सी-तलवार…. तू क्या कर सकता है?”

छत्रसाल ने एक गहरा श्वास लिया और जैसे हाथियों के झुंड पर सिंह टूट पड़ता है, वैसे ही उन घुड़सवारों पर वह टूट पड़ा। छत्रसाल ने ऐसी वीरता दिखाई कि एक को मार गिराया, दूसरा बेहोश हो गया…. लोगों को पता चले उसके पहले ही आधा दर्जन सैनिकों को मार भगाया। धर्म की रक्षा के लिए अपनी जान तक की परवाह नहीं की वीर छत्रसाल ने।

भारत के ऐसे ही वीर सपूतों के लिए किसी ने कहा हैः

तुम अग्नि की भीषण लपटजलते हुए अंगार हो।

तुम चंचला की द्युति चपलतीखी प्रखर असिधार हो।

तुम खौलती जलनिधि-लहरगतिमय पवन उनचास हो।

तुम राष्ट्र के इतिहास होतुम क्रांति की आख्यायिका।

भैरव प्रलय के गान होतुम इन्द्र के दुर्दम्य पवि।

तुम चिर अमर बलिदान होतुम कालिका के कोप हो।

पशुपति रूद्र के भ्रूलास होतुम राष्ट्र के इतिहास हो।

ऐसे वीर धर्मरक्षकों की दिव्य गाथा यही याद दिलाती है कि दुष्ट बनो नहीं और दुष्टों से डरो भी नहीं। जो आततायी व्यक्ति बहू-बेटियों की इज्जत से खेलता है या देश के लिए खतरा पैदा करता है, ऐसे बदमाशों का सामना साहस के साथ करना चाहिए। अपनी शक्ति जगानी चाहिए। यदि तुम धर्म और देश की रक्षा के लिए कार्य करते हो तो ईश्वर भी तुम्हारी सहायता करता है।

विष्णु पुराण – १३

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

प्रथम अंश

अध्याय – तेरहवाँ

राजा वेन और पृथु का चरित्र

श्रीपराशरजी बोले – हे मैत्रेय ! ध्रुव से [उसकी पत्नी] शिष्टि और भव्य को उत्पन्न किया और भव्य से शम्भु का जन्म हुआ तथा शिष्टि के द्वारा उसकी पत्नी सुच्छाया ने रिपु, रिपुज्जय, विप्र, वृकल और वृकतेजा नामक पाँच निष्पाप पुत्र उतन्न किये | उनमे से रिपु के द्वारा बृहती के गर्भ से महातेजस्वी चाक्षुष का जन्म हुआ || १ – २ || चाक्षुष ने अपनी भार्या पुश्करणी से, जो वरुण-कुल में उत्पन्न और महात्मा वीरण प्रजापति की पुत्री थी, मनु को उत्पन्न किया [ जो छठे मन्वन्तर के अधिपति हुए ] || ३ || तपस्वियों में श्रेष्ठ मनुसे वैराज प्रजापति की पुत्री नडवला के कुरु, पुरु, शतध्युम्र, तपस्वी, सत्यवान, शुचि, अग्निष्टोम, अतिरात्र तथा नवाँ सुद्युम्र और दसवाँ अभिमन्यु इन महातेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ || ५ || कुरु के द्वारा उसकी पत्नी आग्रेयी ने अंग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अंगिरा और शिबि इन छ: परम तेजस्वी पुत्रों को उत्पन्न किया || ६ || अंग से सुनीथा के वेन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ | ऋषियों ने उस (वेन) जे दाहिने हाथ का सन्तान के लिये मंथन किया था || ७ || हे महामुने ! वेनके हाथ का मंथन करनेपर उससे वैन्य नामक महीपाल उत्पन्न हुए जो पृथु नामसे विख्यात है और जिन्होंने प्रजा के हित के लिये पूर्वकाल में पृथ्वी को दुहा था || ८ – ९ ||

श्रीमैत्रेयजी बोले – हे मुनिश्रेष्ठ ! परमर्षियोने वेन के हाथ को क्यों मथा जिससे महापराक्रमी पृथु का जन्म हुआ ? || १० ||

श्रीपराशरजी बोले – हे मुने ! मृत्यु की सुनीथा नामवाली जो प्रथम पुत्री थी वह अंग को पत्नीरूप से दी (व्याही) गयी थी | उसीसे वेन का जन्म हुआ || ११ || हे मैत्रेय ! वह मृत्यु की कन्याका पुत्र अपने मातामह (नाना) के दोष से स्वभाव से ही दुष्टप्रकृति हुआ || १२ || उस वेनका जिस समय महर्षियोंद्वारा राजपदपर अभिषेक हुआ उसी समय उस पृथ्वीपति ने संसारभर में यह घोषणा कर दी कि ‘भगवान, यज्ञपुरुष मैं ही हूँ, मुझसे अतिरिक्त यज्ञ का भोक्ता और स्वामी हो ही कौन सकता है ? इसलिये कभी कोई यज्ञ, दान और हवन आदि न करे ‘ || १३ – १४ || हे मैत्रेय ! तब ऋषियों ने उस पृथ्वीपति के पास उपस्थित हो पहले उसकी खूब प्रशंसा कर सांत्वनायुक्त मधुर वाणी से कहा || १५ ||

ऋषिगण बोले – हे राजन ! हे पृथ्वीपते ! तुम्हारे राज्य और देह के उपकार तथा प्रजा के हित के लिये हम जो बात कहते है, सुनो || १६ || तुम्हारा कल्याण हो; देखो, हम बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा जो सर्व-यज्ञेश्वर देवाधिपति भगवान हरि का पूजन करेंगे उसके फल में से तुमको भी भाग मिलेगा || १७ || हे नृप ! इस प्रकार यज्ञों के द्वारा यज्ञपुरुष भगवान विष्णु प्रसन्न होकर हमलोगों के साथ तुम्हारी भी सफल कामनाएँ पूर्ण करेंगे || १८ || हे राजन जिन राजाओं के राज्य में यज्ञेश्वर भगवान हरि का यज्ञोंद्वारा पूजन किया जाता है, वे उनकी सभी कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं || १९ ||

वेन बोलामुझसे भी बढकर ऐसा और कौन है जो मेरा भी पूजनीय है ? जिसे तुम यज्ञेश्वर मानते हो वह ‘हरि’ कहलानेवाला कौन है ? || २० || ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, इंद्र, वायु , यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, धाता, पूषा, पृथ्वी और चन्द्रमा तथा इनके अतिरिक्त और भी जितने देवता शाप और कृपा करने में समर्थ है वे सभी राजा के शरीर में निवास करते हैं, इसप्रकार राजा सर्वदेवमय है || २१ – २२ || हे ब्राह्मणों ! ऐसा जानकर मैंने जैसी जो कुछ आज्ञा की है वैसा ही करो | देखो, कोई भी दान, यज्ञ और हवन आदि न करे || २३ || हे द्विजगण ! स्त्री का परमधर्म जैसे अपने पति की सेवा करना ही माना गया है वैसे ही आपलोगों का धर्म भी मेरी आज्ञा का पालन करना ही है || २४ ||

ऋषिगण बोले – महाराज ! आप ऐसी आज्ञा दीजिये, जिससे धर्म का क्षय न हो | देखिये, यह सारा जगत हवि का ही परिणाम है || २५ ||

श्रीपराशरजी बोले – महर्षियों के इस प्रकार बारंबार समझाने और कहने-सुननेपर भी जब वेन ने ऐसी आज्ञा नहीं दी तो वे अत्यंत क्रुद्ध और अमर्षयुक्त होकर आपस में कहने लगे – ‘इस पापी को मारो, मारो ! || २६ – २७ || जो अनादि और अनंत यज्ञपुरुष प्रभु विष्णु की निंदा करता है वह अनाचारी किसी प्रकार पृथ्वीपति होने के योग्य नहीं है’ || २८ || ऐसा कह मुनिगणों ने, भगवान् की निंदा आदि करने के कारण पहले ही मरे हुए उस राजा को मन्त्र से पवित्र किये हुए कुशाओं से मार डाला || २९ ||

हे द्विज ! तदनन्तर उन मुनीश्वरों ने सब ओर बड़ी धूलि उठती देखी, उसे देखकर उन्होंने अपने निकटवर्ती लोगोसे पूछा – ‘ यह क्या है ? ‘ || ३० || उन परुषों ने कहा – ‘राष्ट्र के राजाहीन हो जाने से दीन-दु:खिया लोगों ने चोर बनकर दूसरों का धन लूटना आरम्भ कर दिया है || ३१ || हे मुनिवरो ! उन तीव्र वेगवाले परधनहारी चोरों के उत्पात से ही यह बड़ी भारी धूलि उडती दीख रही है’ || ३२ ||

तब उन सब मुनीश्वरों ने आपस में सलाह कर उस पुत्रहीन राजा की जंघा का पुत्र के लिये यत्नपूर्वक मंथन किया || ३३ || उसकी जंघा के मथनेपर उससे एक पुरुष उत्पन्न हुआ जो जले ठूँठ के समान काला, अत्यंत नाटा और छोटे मुखवाला था || ३४ || उसने अति आतुर होकर उन सब ब्राह्मणों से कहा – ‘मैं क्या करूँ ? ‘ उन्होंने कहा – ‘निषीद (बैठ) ‘ अत: वह ‘निषाद’ कहलाया ||३५ || इसलिये हे मुनिशार्दुल ! उससे उत्पन्न हुए लोग विंधाचलनिवासी पाप-परायण निषादगण हुए || ३६ || उस निषादरूप द्वार से राजा वेन का सम्पूर्ण पाप निकल गया | अत: निषादगण वेन के पापों का नाश करने वाले हुए || ३७ ||

फिर उन ब्राह्मणों ने उसके दायें हाथ का मंथन किया | उसका मंथन करने से परमप्रतापी वेनसुवन पृथु प्रकट हुए, जो अपने शरीर से प्रज्वलित अग्नि के समान देदीप्यमान थे || ३८ – ३९ || इसी समय आजगव नामक आद्य (सर्वप्रथम) शिव-धनुष और दिव्य वाण तथा कवच आकाश से गिरे || ४० || उनके उत्पन्न होने से सभी जीवों को अति आनंद हुआ और केवल सत्पुत्र के ही जन्म लेने से वेन भी स्वर्गलोक को चला गया | इसप्रकार महात्मा पुत्र के कारण ही उसकी पुम अर्थात नरक से रक्षा हुई || ४१ – ४२ ||

महाराज पृथु के अभिषेक के लिये सभी समुद्र और नदियाँ सब प्रकार के रत्न और जल लेकर उपस्थित हुए || ४३ || उस समय आंगिरस देवगणों के सहित पितामह ब्रह्माजी ने और समस्त स्थावर-जंगम प्राणियों ने वहाँ आकर महाराज वैन्य (वेनपुत्र ) का राज्याभिषेक किया || ४४ || उनके दाहिने हाथ में चक्र का चिन्ह देखकर उन्हें विष्णु का अंश जान पितामह ब्रह्माजी को परम आनंद हुआ || ४५ || यह श्रीविष्णुभगवान के चक्र का चिन्ह सभी चक्रवर्ती राजाओं के हाथ में हुआ करता है | उनका प्रभाव कभी देवताओं से भी कुंठित नही होता || ४६ ||

इसप्रकार महातेजस्वी और परम प्रतापी वेनपुत्र धर्मकुशल महानुभावोंद्वारा विधिपूर्वक अति महान राजराजेश्वरपद पर अभिषिक्त हुए || ४७ || जिस प्रजा को पिताने अपरक्त (अप्रसन्न) किया था उसीको उन्होंने अनुरंजित (प्रसन्न) किया, इसलिये अनुरंजन करने से उनका नाम ‘राजा’ हुआ || ४८ || जब वे समुद्र में चलते थे, तो जल बहने से रुक जाता था, पर्वत उन्हें मार्ग देते थे और उनकी ध्वजा कभी भंग नही हुई || ४९ || पृथ्वी बिना जोते-बोये धान्य पकानेवाली थी; केवल चिन्तनमात्र से ही अन्न सिद्ध हो जाता था, गौएँ कामधेनुरूपा थीं और पत्ते-पत्ते में मधु भरा रहता था || ५० ||

राजा पृथु ने उत्पन्न होते ही पैतामह यज्ञ किया; उससे सोमाभिषक के दिन सूति (सोमाभिषवभूमि) से महामति सूत की उत्पत्ति हुई || ५१ || उसी महायज्ञ में बुद्धिमान मागध का भी जन्म हुआ | तब मुनिवरों ने उन दोनों सूत और मागधों से कहा || ५२ || ‘तुम इन प्रतापवान वेनपुत्र महाराज पृथु की स्तुति करो | तुम्हारे योग्य यही कार्य है और राजा भी स्तुति के ही योग्य है’ || ५३ || तब उन्होंने हाथ जोडकर सब ब्राह्मणों से कहा – ‘ ये महाराज तो आज ही उत्पन्न हुए है, हम इनके कोई कर्म तो जानते ही नहीं है || ५४ || अभी इनके न तो कोई गुण प्रकट हुए है और न यश ही विख्यात हुआ है; फिर कहिये, हम किस आधारपर इनकी स्तुति करें’ || ५५ ||

ऋषिगण बोले – ये महाबली चक्रवर्ती महाराज भविष्य में जो- जो कर्म करेंगे और इनके जो – जो भावी गुण होंगे उन्हीं से तुम इनका स्तवन करो || ५६ ||

श्रीपराशरजी बोले – यह सुनकर राजा को भी परम संतोष हुआ, उन्होंने सोचा ‘ मनुष्य सद्गुणों के कारण ही प्रशंसा का पात्र होता है; अत: मुझ को भी गुण उपार्जन करने चाहिये || ५७ | इसलिये अब स्तुति के द्वारा ये जिन गुणों का वर्णन करेंगे मैं भी सावधानतापूर्वक वैसा ही करूँगा || ५८ || यदि यहाँपर वे कुछ त्याज्य अवगुणों को भी कहेंगे तो मैं उन्हें त्यागूँगा |’ इसप्रकार राजा ने अपने चित्त में निश्चय किया || ५९ || तदनन्तर उन (सूत और मागध ) दोनों ने परम बुद्धिमान वेननन्दन महाराज पृथुका, उनके भावी कर्मों के आश्रय से स्वरसहित भली प्रकार स्तवन किया || ६० || ‘ये महाराज सत्यवादी, दानशील, सत्यमर्यादावाले, लज्जाशील, सुह्रद, क्षमाशील, पराक्रमी और दुष्टों का दमन करनेवाले है || ६१ || ये धर्मज्ञ, कृतज्ञ, दयावान, प्रियभाषी, माननीयों को मान देनेवाले, यज्ञपरायण, ब्रह्मण्य, साधूसमाज में सम्मानित और शत्रु तथा मित्र के साथ समान व्यवहार करनेवाले हैं || ६२ – ६३ || इसप्रका सूत और मागध के कहे हुए गुणों को उन्हों अपने चित्त में धारण किया और उसी प्रकार के कार्य किये || ६४ || तब उन पृथ्वीपति ने पृथ्वी का पालन करते हुए बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले महान यज्ञ किये || ६५ || अराजकता के समय ओषधियों के नष्ट हो जानेसे भूख से व्याकुल हुई प्रजा पृथ्वीनाथ पृथु के पास आयी और उनके पूछनेपर प्रणाम करके उनसे अपने आनेका कारण निवेदन किया || ६६ ||

प्रजाने कहा – हे प्रजापति नृपश्रेष्ठ ! अराजकता के समय पृथ्वी ने समस्त ओषधियाँ अपने में लीन कर ली है, अत: आपकी सम्पूर्ण प्रजा क्षीण हो रही है || ६७ || विधाता ने आपको हमारा जीवनदायक प्रजापति बनाया है; अत: क्षुधारूप महारोग से पीड़ित हम प्रजाजनों को आप जीवनरूप ओषधि दीजिये || ६८ ||

श्रीपराशरजी बोले – यह सुनकर महाराज पृथु अपना आजगव नामक दिव्य धनुष और दिव्य बाण लेकर अत्यंत क्रोधपूर्वक पृथ्वी के पीछे दौड़े || ६९ || तब भय से अत्यंत व्याकुल हुई पृथ्वी गौ का रूप धारणकर भागी और ब्रह्मलोक आदि सभी लोकों में गयी || ७० || समस्त भूतों को धारण करनेवाली पृथ्वी जहाँ-जहाँ भी गयीं वहीँ – वहीँ उसने वेनपुत्र पृथु को शस्त्र-संधान किये अपने पीछे आते देखा || ७१ || तब इन प्रबल पराक्रमी महाराज पृथु से, उनके वाणप्रहार से बचने की कामना से काँपती हुई पृथ्वी इसप्रकार बोली || ७२ ||

पृथ्वी ने कहा – हे राजेन्द्र ! क्या आपको स्त्री-वधका महापाप नहीं दीख पड़ता, जो मुझे मारनेपर आप ऐसे उतारू हो रहे हैं ? || ७३ ||

पृथु बोले – वहाँ एक अनर्थकारी को मार देने से बहुतों को सुख प्राप्त हो उसे मार देना ही पुण्यप्रद है || ७४ ||

पृथ्वी बोलीहे नृपश्रेष्ठ ! यदि आप प्रजा के हित के लिये ही मुझे मारना चाहते है तो आपकी प्रजा का आधार क्या होगा ? || ७५ ||

पृथु ने कहाअरी वसुधे ! अपनी आज्ञा का उल्लंघन करनेवाली तुझे मारकर मैं अपने योगबल से ही इस प्रजा को धारण करूँगा || ७६ ||

श्रीपराशरजी बोले – तब अत्यंत भयभीत एवं काँपती हुई पृथ्वी ने उन पृथ्वीपति को पुन: प्रणाम करके कहा || ७७ ||

पृथ्वी बोलीहे राजन ! यत्नपूर्वक आरम्भ किये हुए सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं | अत: मैं भी आपको एक उपाय बताती हूँ; यदि आपकी हो तो वैसा ही करें || ७८ || हे नरनाथ ! मैंने जिन समस्त औषधियों को पचा लिया है उन्हें यदि आपकी इच्छा हो तो दुग्धरूप से मैं दे सकती हूँ || ७९ || अत: हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ महाराज ! आप प्रजा के हित के लिये कोई ऐसा वत्स (बछड़ा) बनाइये जिससे वात्सल्यवश मैं उन्हें दुग्धरूप से निकाल सकूँ || ८० || और मुझ को आप सर्वत्र समतल कर दीजिये जिससे मैं उत्तमोत्तम ओषधियों के बीजरूप दुग्ध को सर्वत्र उत्पन्न कर सकूँ || ८१ ||

श्रीपराशरजी बोले – तब महाराज पृथु ने अपने धनुष की कोटि से सैकड़ो हजारों पर्वतों को उखाड़ा और उन्हें एक स्थानपर इकठ्ठा कर दिया || ८२ || इससे पूर्व पृथ्वी के समतल न होने से पुर और ग्राम आदि का कोई नियमित विभाग नही था || ८३ || हे मैत्रेय ! उससमय अन्न, गोरक्षा, कृषि और व्यापार का भी कोई क्रम न था | यह सब तो वेनपुत्र पृथु के समय से ही आरम्भ हुआ है || ८४ || हे द्विजोत्तम ! जहाँ – जहाँ भूमि समतल थी वहीँ –वहीपर प्रजाने निवास करना पसंद किया || ८५ || उस समयतक प्रजाका आहार केवल फल मुलादि ही था; यह भी ओषधियों के नष्ट हो जाने से बड़ा दुर्लभ हो गया था || ८६ ||

तब पृथ्वीपति पृथु ने स्वायम्भुवमनु को बछड़ा बनाकर अपने हाथ में ही पृथ्वी से प्रजा के हित के लिये समस्त धान्यों को दुहा | हे तात ! उसी अन्न के आधार से अब भी सदा प्रजा जीवित रहती है || ८७ – ८८ || महाराज पृथु प्राणदान करने के कारण भूमि के पिता हुए, [ जन्म देनेवाला, यज्ञोपवीत करानेवाला, अन्नदाता, भय से रक्षा करनेवाला तथा जो विद्यादान करे – ये पाँचो पिता माने गये है | ] इसलिये उस सर्वभूतधारिणी को ‘पृथ्वी’ नाम मिला || ८९ ||

हे मुने ! फिर देवता, मुनि, दैत्य, राक्षस, पर्वत, गन्धर्व, सर्प, यक्ष और पितृगण आदि ने अपने-अपने पात्रों में अपना अभिमत दूध दुहा तथा दुहानेवालों के अनुसार उनके सजातीय ही दोग्धा और वत्स आदि हुए || ९० – ९१ || इसीलिये विष्णुभगवान के चरणों से प्रकट हुई यह पृथ्वी ही सबको जन्म देनेवाली, बनानेवाली तथा धारण और पोषण करनेवाली हैं || ९२ || इस प्रकार पूर्वकाल में वेन के पुत्र महाराज पृथु ऐसे प्रभावशाली और वीर्यवान हुए | प्रजा का रंजन करने के कारण वे ‘राजा’ कहलाये || ९३ ||

जो मनुष्य महाराज पृथु के इस चरित्र का कीर्तन करता हैं उसका कोई भी दुष्कर्म फलदायी नही होता || ९४ || पृथु का यह अत्युत्तम जन्म-वृतांत और उनका प्रभाव अपने सुननेवाले पुरुषों के दु:स्वप्नों को सर्वदा शांत कर देता हैं || ९५ ||

– इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेऽशे त्रयोदशोऽध्यायः –