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नृसिंह जयंती (२ मई ) : अहंकार व अत्याचार के नाश का पर्व

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भगवान नृसिंह ने आह्वान किया था, मेरी भक्ति करने वाला प्राणी किसी भी जाति या कुल का क्यों न हो, मैं बिना किसी भेदभाव के उसकी रक्षा करता हूं। अपने अनन्य भक्त प्रल्हाद की रक्षा करने हेतु प्रकट हो उन्होंने राक्षसराज हिरण्यकशिपु का वध किया था। इसी दिन को नृसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है।

वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाने वाली नृसिंह जयंती बुराई पर अच्छाई की जीत की अवधारणा को बल देती है। इस वर्ष यह नृसिंह जयंती 02 मई के दिन है। इसी दिन भगवान विष्णु ने आधे नर और आधे सिंह के रूप में नृसिंह अवतार लेकर अपने भक्त प्रल्हाद की रक्षा की थी।

अपने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए राक्षसराज हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या कर ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया था कि उसे न तो कोई मानव और न ही पशु मार सकेगा, न दिन में उसकी मृत्यु होगी न रात में, न घर के भीतर और न बाहर, न धरती पर और न आकाश में, न किसी अस्त्र से और न ही किसी शस्त्र से। यह वरदान प्राप्त कर वह अहंकारी हो गया और स्वयं को अपराजेय तथा अमर समझने लगा था। उसके अत्याचार से तीनों लोक त्रस्त हो उठे।

उधर हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रल्हाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। उसे इस भक्ति से विरक्त करने के लिए हिरण्यकशिपु ने भरसक यत्न किए मगर सफलता न पा सका। यहां तक कि उसने अपने ही पुत्र कस प्राण लेनेे के भी प्रयास किए मगर विष्णु भक्त प्रल्हाद का बाल भी बांका न हो सका।

एक दिन जब प्रल्हाद ने उससे कहा कि भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं, तो हिरण्यकशिपु ने उसे चुनौती देते हुए पूछ डाला कि अगर तुम्हारे भगवान सर्वत्र हैं, तो इस स्तंभ में क्यों नहीं दिखते?

यह कहते हुए उसने अपने राजमहल के उस स्तंभ पर प्रहार कर दिया। तभी स्तंभ में से भगवान विष्णु नृसिंह अवतार के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने हिरण्यकशिपु को उठा लिया और उसे महल की दहलीज पर ले आए।

उनकी विराट शक्ति के आगे हिरण्यकशिपु की एक न चली। भगवान ने उसे अपनी गोद में लिटाकर अपने नाखूनों से उसका सीना चीर डाला और उसका वध कर संसार को उसकी क्रूरता से मुक्ति दिलाई।

जिस स्थान पर उन्होंने हिरण्यकशिपु का वध किया, वह न घर के भीतर था, न बाहर। उस समय गोधुलि बेला थी, अत: न दिन था और न रात। नृसिंह न पूरी तरह मानव थे और न ही पशु।

हिरण्यकशिपु का वध करते समय उन्होंने उसे अपनी गोद में लिटाया था, अत: वह न ध्ारती पर था और न आकाश में। उन्होंने अपने नख से उसका वध किया, अत: न अस्त्र का उपयोग हुआ और न शस्त्र का। इसी दिन को नृसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है।

यह दिन इस बात का आह्वान करता है कि यदि ईश्वर की भक्ति के साथ विश्वास भी हो (जैसा कि विपरीत परिस्थितियों के बीच भी प्रल्हाद ने दिखाया), तो भगवान की कृपा अवश्य प्राप्त होती है। संकट की घड़ी में भगवान को पुकारना ही पर्याप्त नहीं है, मन में यह दृढ़ विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान आपकी रक्षा हेतु आएंगे।

इस कथा को गौर से देखें, तो जहां हिरण्यकशिपु बुराई एवं अहंकार का प्रतीक है, वहीं प्रल्हाद आस्था एवं भक्ति के प्रतीक के रूप में उभरते हैं। साथ ही स्वयं भगवान नृसिंह भक्त के प्रति प्रेम के प्रतीक हैं।

भगवान ने आह्वान किया था, मेरी भक्ति करने वाला प्राणी किसी भी जाति या कुल का क्यों न हो, मैं बिना किसी भेदभाव के उसकी रक्षा करता हूं।

नृसिंह जयंती के दिन भक्तगण प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, स्नानोपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। भक्तगण इस दिन व्रत रखते हैं। मान्यता है कि नृसिंह जयंती के दिन व्रत रखने से भक्त के सारे दुख दूर हो जाते हैं। साथ ही नृसिंह मंत्र का जाप भी किया जाता है।

मध्याह्नकाल में संकल्प लिया जाता है तथा सायंकाल नृसिंह पूजन किया जाता है। भगवान नृसिंह की मूर्ति के पास देवी लक्ष्मी की मूर्ति भी रखी जाती है और पूरे भक्ति भाव से दोनों की पूजा की जाती है।

भगवान नृसिंह की पूजा के लिए फल, पुष्प, कुमकुम, केसर, पंचमेवा, नारियल, अक्षत और पीताम्बर रखा जाता है। गंगाजल, काले तिल, पंचगव्य एवं हवन सामग्री का पूजन में उपयोग किया जाता है।