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रायपुर आश्रम में दीपावली पर समाग्री वितरण

रायपुर आश्रम में दीपावली पर समाग्री वितरण

19 अक्टूबर  2017 को प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी पूज्य बापूजी की पावन प्रेरणा से संत श्री आशारामजी आश्रम रायपुर में दीपावली के सु-अवसर पर दरिद्रनारयानो (जरूरतमंदो) मे अनाज (चावल – दाल ) आलू , वस्त्र (शर्ट ,पैंट, टीशर्ट ,जींस ,साड़ी, तौलिया ) चप्पल ,दिया – बत्ती – तेल, मिठाई (लड्डू – सोनपापड़ी ) नववर्ष कैलेंडर, सतसाहित्य के साथ नगद दक्षिणा वितरण कर ” नर सेवा – नारायण सेवा ” मंत्र को चरितार्थ किया गया |

बेलोदी आश्रम में दीपावली भंडारा

बेलोदी आश्रम में दीपावली भंडारा

8 अक्टूबर 2017 को श्री योग वेदांत सेवा समिति द्वारा संत श्री आशारामजी बापू आश्रम बेलोदी , दुर्ग (छ.ग.) में दीपावली पर्व के उपलक्ष्य पर गरीबो में भंडारा एवं जीवन उपयोगी सामग्री का वितरण किया गया |

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भीष्मपञ्चक व्रत – (१० नवम्बर से १४ नवम्बर २०१६)

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||श्रीहरि:||
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
अग्निपुराण
अध्याय – २०५
भीष्मपञ्चक-व्रत

अग्निदेव कहते है – अब मैं सब कुछ देनेवाले व्रतराज ‘भीष्मपञ्चक’ विषय में कहता हूँ | कार्तिक के शुक्ल पक्ष की एकादशी को यह व्रत ग्रहण करें | पाँच दिनोंतक तीनों समय स्नान करके पाँच तिल और यवों के द्वारा देवता तथा पितरों का तर्पण करे | फिर मौन रहकर भगवान् श्रीहरि का पूजन करे | देवाधिदेव श्रीविष्णु को पंचगव्य और पंचामृत से स्नान करावे और उनके श्री अंगों में चंदन आदि सुंगधित द्रव्यों का आलेपन करके उनके सम्मुख घृतयुक्त गुग्गुल जलावे ||१-३||

प्रात:काल और रात्रि के समय भगवान् श्रीविष्णु को दीपदान करे और उत्तम भोज्य-पदार्थ का नैवेद्ध समर्पित करे | व्रती पुरुष ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादशाक्षर मन्त्र का एक सौ आठ बार (१०८) जप करे | तदनंतर घृतसिक्त तिल और जौ का अंत में ‘स्वाहा’ से संयुक्त ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’इस द्वादशाक्षर मन्त्र से हवन करे | पहले दिन भगवान् के चरणों का कमल के पुष्पों से, दुसरे दिन घुटनों और सक्थिभाग (दोनों ऊराओं) का बिल्वपत्रों से, तीसरे दिन नाभिका भृंगराज से, चौथे दिन बाणपुष्प, बिल्बपत्र और जपापुष्पोंद्वारा एवं पाँचवे दिन मालती पुष्पों से सर्वांग का पूजन करे | व्रत करनेवाले को भूमिपर शयन करना चाहिये |

एकादशी को गोमय, द्वादशी को गोमूत्र, त्रयोदशी को दधि, चतुर्दशी को दुग्ध और अंतिम दिन पंचगव्य आहार करे | पौर्णमासी को ‘नक्तव्रत’ करना चाहिये | इसप्रकार व्रत करनेवाला भोग और मोक्ष – दोनों का प्राप्त कर लेता है |

भीष्मपितामह इसी व्रत का अनुष्ठान करके भगवान् श्रीहरि को प्राप्त हुए थे, इसीसे यह ‘भीष्मपञ्चक’ के नाम से प्रसिद्ध है |

ब्रह्माजी ने भी इस व्रत का अनुष्ठान करके श्रीहरि का पूजन किया था | इसलिये यह व्रत पाँच उपवास आदिसे युक्त हैं ||४-९||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘भीष्मपञ्चक-व्रत का कथन’ नामक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ||२०५||

-ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ –

और भी सुनिये –
परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी का सत्संग

आँवला (अक्षय ) नवमी है फलदायी… (९ नबम्बर २०१६ )

aanvalaआँवला (अक्षय)  नवमी है फलदायी

भारतीय सनातन पद्धति में पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए महिलाओं द्वारा आँवला नवमी की पूजा को महत्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि यह पूजा व्यक्ति के समस्त पापों को दूर कर पुण्य फलदायी होती है। जिसके चलते कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को महिलाएं आँवले के पेड़ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करती हैं।

vishnu_24आँवला नवमी को अक्षय नवमी के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था। कहा जाता है कि आंवला भगवान विष्णु का पसंदीदा फल है। आंवले के वृक्ष में समस्त देवी-देवताओं का निवास होता है। इसलिए इस की पूजा करने का विशेष महत्व होता है।

व्रत की पूजा का विधान :-

अक्षय नवमी पूजा मुहूर्त – सुबह ६: ४२ से  दोपहर १२ : २२ तक 

* नवमी के दिन महिलाएं सुबह से ही स्नान ध्यान कर आँवलाके वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में मुंह करके बैठती हैं।
* इसके बाद वृक्ष की जड़ों को दूध से सींच कर उसके तने पर कच्चे सूत का धागा लपेटा जाता है।
* तत्पश्चात रोली, चावल, धूप दीप से वृक्ष की पूजा की जाती है।
* महिलाएं आँवले के वृक्ष की १०८ परिक्रमाएं करके ही भोजन करती हैं

आँवला नवमी की कथा :-
वहीं पुत्र रत्न प्राप्ति के लिए आँवला पूजा के महत्व के विषय में प्रचलित कथा के अनुसार एक युग में किसी वैश्य की पत्नी को पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हो रही थी। अपनी पड़ोसन के कहे अनुसार उसने एक बच्चे की बलि भैरव देव को दे दी। इसका फल उसे उल्टा मिला। महिला कुष्ट की रोगी हो गई।

इसका वह पश्चाताप करने लगे और रोग मुक्त होने के लिए गंगा की शरण में गई। तब गंगा ने उसे कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आँवला के वृक्ष की पूजा कर आँवले के सेवन करने की सलाह दी थी।

जिस पर महिला ने गंगा के बताए अनुसार इस तिथि को आँवला की पूजा कर आँवला ग्रहण किया था, और वह रोगमुक्त हो गई थी। इस व्रत व पूजन के प्रभाव से कुछ दिनों बाद उसे दिव्य शरीर व पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तभी से हिंदुओं में इस व्रत को करने का प्रचलन बढ़ा। तब से लेकर आज तक यह परंपरा चली आ रही है।