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अक्षय-तृतीया व्रत के प्रसंग में धर्म वणिक् का चरित्र

Akshaya-Tritiya11अक्षय-तृतीया व्रत के प्रसंग में धर्म वणिक् का चरित्र

(भविष्यपुराण उत्तरपर्व-अध्याय – १९)

भगवान् श्रीकृष्ण बोले – महाराज ! अब आप वैशाख मासके शुक्ल पक्ष की अक्षय-तृतीया की कथा सुने | इस दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, तर्पण आदि जो भी कर्म किये जाते हैं, वे सब अक्षय हो जाते हैं | सत्ययुग का आरम्भ भी इसी तिथि को हुआ था, इसलिये उसे कृतयुगादि तृतीया भी कहते हैं | यह सम्पूर्ण पापों का नाश करनेवाली एवं सभी सुखों को प्रदान करनेवाली हैं | इस सम्बन्ध में एक आख्यान प्रसिद्ध है, आप उसे सुने –

शाकल नगर में प्रिय और सत्यवादी, देवता उअर ब्राह्मणों का पूजक धर्म नामक एक धर्मात्मा वणिक रहता था | उसने एक दिन कथाप्रसंग में सुना कि यदि वैशाख शुक्ल की तृतीया रोहिणी नक्षत्र एवं बुधवार से युक्त हो तो उस दिन का दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है | यह सुनकर उसने अक्षय तृतीया के दिन गंगा में अपने पितरों का तर्पण किया और घर आकर जल और अन्नसे पूर्ण घट, सत्तू, दही, चना, गेहूँ, गुड़, ईख, खांड और सुवर्ण श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दान दिया | कुटुम्ब में आसक्त रहनेवाली उसकी स्त्री उसे बार-बार रोकती थी, किंतु वह अक्षय तृतीया को अवश्य ही दान करता था | कुछ समय के बाद उसका देहांत हो गया | अगले जन्म में उसका जन्म कुशावती (द्वारका) नगरी में हुआ और वह वहाँ का राजा बना | दान के प्रभाव से उसके ऐश्वर्य और धन की कोई सीमा न थी | उसने पुन: बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ किये | वह ब्राह्मणों को गौ, भूमि, सुवर्ण आदि देता रहता और दीन-दुखियों को भी संतुष्ट करता, किन्तु, उसके धनका कभी ह्रास नहीं होता | यह उसके पूर्वजन्म में अक्षय तृतीया के दिन दान देने का फल था | महाराज ! इस तृतीया का फल अक्षय है | अब इस व्रत का विधान सुने – सभी रस, अन्न, शहद, जल से भरे घड़े, तरह-तरह के फल, जूता आदि तथा ग्रीष्म ऋतू में उपयुक्त सामग्री, अन्न, गौ, भूमि, सुवर्ण, वस्त्र जो पदार्थ अपने को प्रिय और उत्तम लगे, उन्हें ब्राह्मणों को देना चाहिये |यह अतिशय रहस्य की बात मैंने आपको बतलायी | इस तिथि में किये गये कर्म का क्षय नहीं होता, इसीलिये मुनियों ने इसका नाम अक्षय-तृतिया रखा हैं |

अक्षय फलदायी “अक्षय तृतीया”

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वैशाख शुक्ल तृतीया की महिमा मत्स्य, स्कंद, भविष्य, नारद पुराणों व महाभारत आदि ग्रंथो में है । स दिन किये गये पुण्यकर्म अक्षय (जिसका क्षय न हो) व अनंत फलदायी होते है, अत: इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहते है । यह सर्व सौभाग्यप्रद है । 

यह युगादि तिथि यानी सतयुग व त्रेतायुग की प्रारम्भ तिथि है । श्रीविष्णु का नर-नारायण, हयग्रीव और परशुरामजी के रूप में अवतरण व महाभारत युद्ध का अंत इसी तिथि को हुआ था ।

इस दिन बिना कोई शुभ मुहूर्त देखे कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ या सम्पन्न किया जा सकता है । जैसे – विवाह, गृह – प्रवेश या वस्त्र -आभूषण, घर, वाहन, भूखंड आदि की खरीददारी, कृषिकार्य का प्रारम्भ आदि सुख-समृद्धि प्रदायक है ।

प्रात:स्नान, पूजन, हवन का महत्त्व 
इस दिन गंगा-स्नान करने से सारे तीर्थ करने का फल मिलता है । गंगाजी का सुमिरन एवं जल में आवाहन करके ब्राम्हमुहूर्त में पुण्यस्नान तो सभी कर सकते है । स्नान के पश्चात् प्रार्थना करें :

माधवे मेषगे भानौं मुरारे मधुसुदन ।
प्रात: स्नानेन में नाथ फलद: पापहा भव ॥

‘हे मुरारे ! हे मधुसुदन ! वैशाख मास में मेष के सूर्य में हे नाथ ! इस प्रात: स्नान से मुझे फल देनेवाले हो जाओ और पापों का नाश करों ।’
सप्तधान्य उबटन व गोझरण मिश्रित जल से स्नान पुण्यदायी है । पुष्प, धुप-दीप, चंदनम अक्षत (साबुत चावल) आदि से लक्ष्मी-नारायण का पूजन व अक्षत से हवन अक्षय फलदायी है । 

जप, उपवास व दान का महत्त्व –
इस दिन किया गया उपवास, जप, ध्यान, स्वाध्याय भी अक्षय फलदायी होता है । एक बार हलका भोजन करके भी उपवास कर सकते है । ‘भविष्य पुराण’ में आता है कि इस दिन दिया गया दान अक्षय हो जाता है । इस दिन पानी के घड़े, पंखे, ओले (खांड के लड्डू), पादत्राण (जूते-चप्पल), छाता, जौ, गेहूँ, चावल, गौ, वस्त्र आदि का दान पुण्यदायी है । परंतु दान सुपात्र को ही देना चाहिए । पूज्य बापूजी के शिष्य पूज्यश्री के अवतरण दिवस से समाज सेवा के अभियानों में नए वर्ष का नया संकल्प लेते है । अक्षय तृतीया के दिन तक ये अभियान बहार में आ जाते है, जिससे उन्हें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है ।

पितृ-तर्पण का महत्त्व व विधि – 
इस दिन पितृ-तर्पण करना अक्षय फलदायी है । पितरों के तृप्त होने पर घर ने सुख-शांति-समृद्धि व दिव्य संताने आती है ।

विधि : इस दिन तिल एवं अक्षत में श्रीविष्णु एवं ब्रम्हाजी को तत्त्वरूप से पधारने की प्रार्थना करें । फिर पूर्वजों का मानसिक आवाहन कर उनके चरणों में तिल, अक्षत व जल अर्पित करने की भावना करते हुए धीरे से सामग्री किसी पात्र में छोड़ दें तथा भगवान दत्तात्रेय, ब्रम्हाजी व विष्णुजी से पूर्वजों की सदगति हेतु प्रार्थना करें ।

आशीर्वाद पाने का दिन –
इस दिन माता-पिता, गुरुजनों की सेवा कर उनकी विशेष प्रसन्नता, संतुष्टि व आशीर्वाद प्राप्त करें । इसका फल भी अक्षय होता है ।

अक्षय तृतीया का तात्त्विक संदेश-  
‘अक्षय’ यानी जिसका कभी नाश न हो । शरीर एवं संसार की समस्त वस्तुएँ नाशवान है, अविनाशी तो केवल परमात्मा ही है । यह दिन हमें आत्म विवेचन की प्रेरणा देता है । अक्षय आत्मतत्त्व पर दृष्टी रखने का दृष्टिकोण देता है । महापुरुषों व धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा और परमात्म प्राप्ति का हमारा संकल्प अटूट व अक्षय हो – यही अक्षय तृतीया का संदेश मान सकते हो ।

स्त्रोत ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०१३ से