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रायपुर में चातुर्मास श्री आशारामायण पाठ प्रारंभ

रायपुर में चातुर्मास श्री आशारामायण पाठ प्रारंभ

     पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद से रायपुर आश्रम के तत्वधान में प्रत्येक वर्ष चातुर्मास में पूज्यश्री के जीवन लीला पर आधारित श्री आशारामायण पाठ व भजन कीर्तन कार्यक्रम  का आयोजन साधको के निवास स्थान पर किया जाता है जिसका प्रारंभ आज देवशयनी एकादशी को फाफाडीह, रायपुर से किया गया |

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Importance of Chaturmas and Spiritual Rules needs to be followed

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चतुर्मास का महत्व एवं पालने योग्य नियम

संत श्री आशारामजी बापू की अमृतवाणी

सत्संग के मुख्य अंश :

* चतुर्मास में धरती पर शयन करें, चतुर्मास में किया हुआ जप, ध्यान, दान, मौन, तीर्थ स्नान, ब्रह्मचर्य का पालन, सत्संग कई गुना फल देता है |

* सावन में साग नहीं, भादो में दही नहीं, कुवार में ढूध नहीं, कार्तिक में करेला नहीं खाये अन्यथा शरीर को बीमारी पकड़ेगी

* चतुर्मास में जल में तिल, आंवला या बिल्व डाल कर स्नान करना पुण्यदायी माना जाता है

* परनिंदा चतुर्मास में महा पाप और महा भय को देने वाली है

* चतुर्मास में शादी और सकाम कर्म वर्जित है

चतुर्मास एवं पुरुष सूक्त

Vishnu-cosmic-ketan-astrologerचतुर्मास एवं पुरुष सूक्त

चतुर्मास में भगवान श्रीविष्णु के योगनिद्रा में शयन करने पर जिस किसी नियम का पालन किया जाता है, वह अनंत फल देनेवाला होता है – ऐसा ब्रह्माजी का कथन है |

जो मानव भगवान वासुदेव के उद्देश्य से केवल शाकाहार करके चतुर्मास व्यतीत करता है वह धनी होता है | जो प्रतिदिन नक्षत्रों का दर्शन करके केवल एक बार ही भोजन करता हैं वह धनवान, रूपवान और माननीय होता है | जो मानव ब्रह्मचर्य – पालनपूर्वक चौमासा व्यतीत करता हैं वह श्रेष्ठ विमान पर बैठकर स्वेच्छा से स्वर्गलोक जाता है |जो चौमासेभर नमक को छोड़ देता है उसके सभी पुर्तकर्म ( परोपकार एवं धर्मसम्बन्धी कार्य ) सफल होते है | जिसने कुछ उपयोगी वस्तुओं को चौमासेभर त्यागने का नियम लिया हो, उसे वे वस्तुएँ ब्राह्मण को दान करनी चाहिए | ऐसा करने से वह त्याग सफल होता है | जो मनुष्य नियम, व्रत अथवा जप के बिना चौमासा बिताता है वह मुर्ख है |

जो चतुर्मास में भगवान विष्णु के आगे खड़ा होकर ‘पुरुष सूक्त’ का जप करता है, उसकी बुद्धि बढती है | -(स्कंदपुराण, नागर खंड, उत्तरार्ध )

बुद्धि बढाने के इच्छुक पाठक और ‘बाल संस्कार केंद्र’ के बच्चे ‘पुरुष सूक्त’ से फायदा उठायें | आनेवाले दिनों में ‘बाल संस्कार केंद्र’ के बुद्धिमान बच्चे ही देश के कर्णधार होंगे |

पुरुष सूक्त
(ऋग्वेद : १०-९०, यजुर्वेद : अध्याय – ३१ )

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुष: सहस्त्राक्ष: सहस्त्रपात् |
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम् || १||

‘आदिपुरुष असंख्य सिर, असंख्य नेत्र और असंख्य पाद से युक्त था | वह पृथ्वी को सब ओर से घेरकर भी दस अंगुल अधिक ही था |’

पुरुष एवेदं सर्वं यदभूतं यच्च भाव्यम् |
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति || २ ||

‘यह जो वर्तमान जगत है, वह सब पुरुष ही है | जो पहले था और आगे होगा, वह भी पुरुष ही है, क्योंकि वह अमृतत्व का, देवत्व का स्वामी है | वह प्राणियों के कर्मानुसार भोग देने के लिए अपनी कारणावस्था का अतिक्रम करके दृश्यमान जगतअवस्था को स्वीकार करता है, इसलिए यह जगत उसका वास्तविक स्वरूप नहीं है |’

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पुरुष : |
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपाद्स्यामृतं दिवि || ३ ||

‘अतीत, अनागत एवं वर्तमान रूप जितना जगत है उतना सब इस पुरुष की महिमा अर्थात एक प्रकार का विशेष सामर्थ्य है, वैभव है, वास्तवस्वरूप नहीं | वास्तव पुरुष तो इस महिमा से भी बहुत बड़ा है | सम्पूर्ण त्रिकालवर्ती भूत इसके चतुर्थ पाद में हैं | इसके अवशिष्ट सच्चिदानन्दस्वरुप तीन पाद अमृतस्वरूप हैं और अपने स्वयंप्रकाश द्योतनात्मक रूप में निवास करते हैं |’

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुष: पादोऽस्येहाभवत् पुन: |
ततो विष्वं व्यक्रामत्साशनानशने अभि ||४ ||

‘त्रिपाद पुरुष संसाररहित ब्रह्मस्वरूप है | वह अज्ञानकार्य संसार से विलक्षण और इसके गुण-दोषों से अस्पृष्ट है | इसका जो किंचित मात्र अंश माया में हैं वही पुन: -पुन: सृष्टि – संहार के रूप में आता – जाता रहता है | यह मायिक अंश ही देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि विविध रूपों में व्याप्त है | वही सभोजन प्राणी है और निर्भोजन जड़ है | सारी विविधता इस चतुर्थाश की ही है |’

तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पुरुष: |
स जातो अत्यरिच्यत पश्चादभूमिमथो पुर: ||५ ||

‘उस आदिपुरुष से विराट ब्रह्माण्ड देह की उत्पत्ति हुई | विराट देह को ही अधिकरण बनाकर उसका अभिमानी एक और पुरुष प्रकट हुआ | वह पुरुष प्रकट होकर विराट से पृथक देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के रूप में हो गया | उसके बाद पृथ्वी की सृष्टि हुई और जीवों के निवास योग्य सप्त धातुओं के शरीर बने |’

ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत |
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्म: शरद्धवि: ||६ ||

‘देवताओं ने उसी उत्पन्न द्वितीय पुरुष को हविष्य मानकर उसी के द्वारा मानस यज्ञ का अनुष्ठान किया | इस यज्ञ में वसंत ऋतू आज्य (घृत) के रूप में, ग्रीष्म ऋतू ईंधन के रूप में और शरद ऋतू हविष्य के रूप में संकल्पित की गयी |’

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षण पुरुषं जातमग्रत: |
तेन देवा अजयन्त साध्या ऋषयश्च ये || ७ ||

‘वही द्वितीय पुरुष यज्ञ का साधन हुआ | मानस यज्ञ में उसीको पशु-भावना से युप (यज्ञ का खंभा) में बाँधकर प्रोक्षण किया गया, क्योंकि सारी सृष्टि के पूर्व वही पुरुषरूप से उत्पन्न हुआ था | इसी पुरुष के द्वारा देवताओं ने मानस याग किया | वे देवता कौन थे ? वे थे सृष्टि – साधन योग्य प्रजापति आदि साध्य देवता एवं तदनुकूल मंत्रद्रष्टा ऋषि | अभिप्राय यह है कि उसी पुरुष से सभीने यज्ञ किया |’

तस्माद्यज्ञात सर्वंहुत: संभृतं पृषदाज्यम् |
पशून ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये || ८ ||

‘इस यज्ञ में सर्वात्मक पुरुष का हवन किया जाता है | इसी मानस यज्ञ से दधिमिश्रित आज्य-सम्पादन किया गया अर्थात सभी भोग्य पदार्थों का निर्माण हुआ | इसी यज्ञ से वायुदेवताक आरण्य (जंगली) पशुओं का निर्माण हुआ | जो ग्राम्य पशु हैं, उनका भी |’

तस्माद्यज्ञात सर्वहुत ऋच: सामानि जज्ञिरे |
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत || ९ ||

‘पूर्वोक्त सर्वहवनात्मक यज्ञ से ऋचाएँ और साम उत्पन्न हुए | उस यज्ञ से ही गायत्री आदि छन्दों का जन्म हुआ | उसी यज्ञ से यजुष (यजुर्वेद) की भी उत्पत्ति हुई |’

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादत: |
गावो ह जज्ञिरे तस्मात तस्माज्जाता अजावय: ||१० ||

‘उस पूर्वोक्त यज्ञ से यज्ञोपयोगी अश्वों का जन्म हुआ | जीके दोनों ओर दाँत होते हैं, उनका भी जन्म हुआ | उसीसे गायों का भी जन्म हुआ और उसीसे बकरी – भेड़ें भी पैदा हुई |’

ॐ यत्पुरुषं व्यदधु: कतिधा व्यकल्पयन् |
मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते ||११ ||

‘जब द्वितीय पुरुष ब्रह्मा की ही यज्ञ – पशु के रूप में कल्पना की गयी, तब उसमें किस – किस रूप से, किस – किस स्थान से, किस – किस प्रकार विशेष से उसके अंग- उपांगों की भावना की गयी ? उसका मुख क्या बना ? उसके बाहू क्या बने ? तथा उसके ऊरू (जंघा) और पाद क्या कहे गये ?’

ब्राह्मणोंऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत: |
ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पदभ्यां शूद्रों अजायत || १२ ||

‘इस पुरुष का मुख ही ब्राह्मण के रूप में कल्पित हैं | बाहू राजन्य माना गया हैं | ऊरू वैश्य है और चरण शुद्र हैं |’

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षो: सूर्यो अजायत |
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणादवायुरजायत || १३ ||

‘मन से चन्द्रमा, चक्षु से सूर्य, मुख से इंद्र तथा अग्नि और प्राण से वायु की कल्पना की गयी |’

नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीष्णॉ द्यौ: समवर्तत |
पदभ्यां भूमिर्दिश: श्रोत्रात्तथा लोकों अकल्पयन || १४ ||

‘नाभि से अंतरिक्ष लोक, सिर से द्युलोक, चरणों से भूमि और श्रोत्र से दिशाएँ – इस प्रकार लोकों की कल्पना की गयी |’

सप्तास्यासन् परिधयस्त्रि: सप्त समिध: कृता: |
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् || १५ ||

‘जब देवताओं ने अपने मानस यज्ञ का विस्तार करते हुए वैराज पुरुष (परमात्मा) को पशु के रूप में कल्पित किया, तब इस यज्ञ की सात परिधियाँ हुई और इक्कीस समिधाएँ |’

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् |
ते ह नाकं महिमान: सचन्त यत्र पूर्व साध्या: सन्ति देवा: ||१६||

‘प्रजापति के प्राणरूप विद्वान देवताओं ने अपने मानस संकल्परूप यज्ञ के द्वारा यज्ञस्वरूप पुरुषोत्तम का यजन (आराधन, याग) किया | वही धर्म है सर्वश्रेष्ठ एवं सनातन, क्योंकि सम्पूर्ण विकारों को धारण करता हैं | वे धर्मात्मा भगवान के माहात्म्य, वैभव आदि से सम्पन्न होकर परमानंद-लोक में समा गये | वहीँ प्राचीन उपासक देवता विराजमान रहते हैं |’

– स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – अगस्त २००३ अंक -१२८ से

चातुर्मास्य व्रत की महिमा

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( चतुर्मास : १५ जुलाई से ११ नवम्बर २०१६ तक)

आषाढ़ के शुक्लपक्ष में एकादशी के दिन उपवास करके मनुष्य भक्तिपूर्वक चातुर्मास्य व्रत प्रारम्भ करे | एक हजार अश्वमेध यज्ञ करके मनुष्य जिस फल को पाटा है, वही चातुर्मास्य व्रत के अनुष्ठान से प्राप्त कर लेता है |

इन चार महीनों में ब्रह्मचर्य का पालन, त्याग, पत्तल पर भोजन, उपवास, मौन, जप, ध्यान, स्नान, दान, पुण्य आदि विशेष लाभप्रद होते हैं |

व्रतों में सबसे उत्तम व्रत हैं – ब्रह्मचर्य का पालन | ब्रह्मचर्य तपस्या का सार है और महान फल देनेवाला है | ब्रह्मचर्य से बढकर धर्म का उत्तम साधन दूसरा नहीं हैं | विसेषत: चतुर्मास में यह व्रत संसार में अधिक गुणकारक है |

मनुष्य सदा प्रिय वस्तु की इच्छा करता हैं | जो चतुर्मास में अपने प्रिय भोगों का श्रद्धा एवं प्रयत्नपूर्वक त्याग करता हैं, उसकी त्यागी हुई वे वस्तुएँ उसे अक्षय रूप में प्राप्त होती है | चतुर्मास में गुड़ का त्याग करने से मनुष्य को मधुरता की प्राप्ति होती है | ताम्बूल का त्याग करने से मनुष्य भोग-सामग्री से सम्पन्न होता है और उसका कंठ सुरीला होता है | दही छोड़नेवाले मनुष्य को गोलोक मिलता है | नमक छोड़नेवाले के सभी पुर्तकर्म सफल होते है | जो मौनव्रत धारण करता है उसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन नहीं करता |

चतुर्मास में काले एवं नीले रंग के वस्त्र त्याग देने चाहिए | नीले वस्त्र को देखने से जो दोष लगता है, उसकी शुद्धि भगवान सूर्यनारायण के दर्शन से होती है | कुसुम्भ (लाल) रंग व केसर का भी त्याग कर देना चाहिए |

आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को श्रीहरि के योगनिद्रा में प्रवृत्त हो जाने पर मनुष्य चार मास अर्थात कार्तिक की पूर्णिमा तक भूमि पर शयन करे | ऐसा करनेवाला मनुष्य बहुत-से धन से युक्त होता है और विमान प्राप्त करता है, बिना माँगे स्वत: प्राप्त हुए अन्न का भोजन करने से बावली और कुआँ बनवाने का फल प्राप्त होता है | जो भगवान जनार्दन के शयन करने पर शहद का सेवन करता है, उसे महान पाप लगता है | चतुर्मास में अनार, नीबूं, नारियल तथा मिर्च, उड़द और चने का भी त्याग करे | जो प्राणियों की हिंसा त्यागकर द्रोह छोड़ देता है, वह भी पूर्वोक्त पुण्य का भागी होता है |

चातुर्मास्य में परनिंदा का विशेष रूप से त्याग करे | परनिंदा को सुननेवाला भी पापी होता है |

परनिन्दा महापापं परनिन्दा महाभयम् |
परनिन्दा महद्दु:खं न तस्या: पातकं परम् || (स्कंद पुराण ब्रा,चा.मा. : ४.२५)

‘परनिंदा महान पाप हैं, परनिंदा महान भय है, परनिंदा महान दुःख हैं और परनिंदा से बढकर दूसरा कोई पातक नहीं है |’

चतुर्मास में ताँबे के पात्र में भोजन विशेष रूप से त्याज्य है | काँसे के भी बर्तनों का त्याग करके मनुष्य अन्यान्य धातुओं के पात्रों का उपयोग करें | अगर कोई धातुपात्रों का भी त्याग करके पलाशपत्र, मदारपत्र या वटपत्र की पत्तल में भोजन करे तो इसका अनुपम फल बताया गया है | अन्य किसी प्रकार का पात्र न मिलने पर मिट्टी का पात्र ही उत्तम है अथवा स्वयं ही पलाश के पत्ते लाकर उनकी पत्तल बनायें और उससे भोजन – पात्र का कार्य ले | पलाश के पत्तों से बनी पत्तल में किया गया भोजन चान्द्रायण व्रत एवं एकादशी व्रत के समान पुण्य प्रदान करनेवाला माना गया है | इतना ही नहीं, पलाश के पत्तों में किया गया एक – एक बार का भोजन त्रिरात्र व्रत के समान पुण्यदायक और बड़े – बड़े पातकों का नाश करनेवाला बताया गया है |

प्रतिदिन एक समय भोजन करनेवाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञ के फल का भागी होता है | पंचगव्य सेवन करनेवाले मनुष्य को चान्द्रायण व्रत का फल मिलता है | यदि धीर पुरुष चतुर्मास में नित्य परिमित अन्न का भोजन करता है तो उसके सब पातकों का नाश हो जाता है और वह वैकुण्ठ धाम को पाता है | चतुर्मास में केवल एक ही अन्न का भोजन करनेवाला मनुष्य रोगी नहीं होता |

जो मनुष्य चतुर्मास में केवल दूध पीकर अथवा फल खाकर रहता है, उसके शस्त्रों पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं |

पंद्रह दिन में एक दिन सम्पूर्ण उपवास करने से शरीर के दोष जल जाते हैं और चौदह दिनों में तैयार हुए भोजन का रस ओज में बदल जाता है | इसलिए एकादशी के उपवास की महिमा है | वैसे तो गृहस्थ को महीने में केवल शुक्लपक्ष की एकादशी रखनी चाहिए, किन्तु चतुर्मास की तो दोनों पक्षों की एकाद्शियाँ रखनी चाहिए |

जो बात करते हुए भोजन करता है, उसके वार्तालाप से अन्न अशुद्ध हो जाता है | वह केवल पाप का भोजन करता है | जो मौन होकर भोजन करता है, वह कभी दुःख में नहीं पड़ता | मौन होकर भोजन करनेवाले राक्षस भी स्वर्गलोक में चले गये है | यदि पके हुए अन्न में कीड़े – मकोड़े पद जायें तो वह अशुद्ध हो जाता है | यदि मानव उस अपवित्र अन्न को खा ले तो वह दोष का भागी होता है | जो नरश्रेष्ठ प्रतिदिन ‘ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा’ – इस प्रकार प्राणवायु को पाँच आहुतियाँ देकर मौन हो भोजन करता है, उसके पाँच पातक निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं |

चतुर्मास में जैसे भगवान विष्णु आराधनीय हैं, वैसे ही ब्राह्मण भी | भाद्रपद मास आने पर उनकी महापूजा होती है | जो चतुर्मास में भगवान विष्णु के आगे खड़ा होकर ‘पुरुष सूक्त’ का पाठ करता हैं, उसकी बुद्धि बढती है |

चतुर्मास सब गुणों से युक्त समय है | इसमें धर्मयुक्त श्रद्धा से शुभ कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए |

सत्संगे द्विजभक्तिश्च गुरुदेवाग्नितर्पणम् |
गोप्रदानं वेदपाठ: सत्क्रिया सत्यभाषणम् ||
गोभक्तिर्दानभक्तिश्च सदा धर्मस्य साधनम् | ( स्कंद पुराण ब्रा. : २.५-६)

‘सत्संग, भक्ति, गुरु, देवता और अग्नि का तर्पण, गोदान, वेदपाठ, सत्कर्म, सत्यभाषण, गोभक्ति और दान में प्रीति – ये सब सदा धर्म के साधन है |’

देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक उक्त धर्मों का साधन एवं नियम महान फल देनेवाला है | चतुर्मास में भगवान नारायण योगनिद्रा में शयन करते हैं, इसलिए चार मास शादी – विवाह और सकाम यज्ञ नहीं होते | ये मास तपस्या करने के हैं |

चतुर्मास में योगाभ्यास करनेवाला मनुष्य ब्रह्मपद को प्राप्त होता है | ‘नमो नारायणाय’ का जप करने से सौ गुने फल की प्राप्ति होती है | यदि मनुष्य चतुर्मास में भक्तिपूर्वक योग के अभ्यास में तत्पर न हुआ तो नि:संदेह उसके हाथ से अमृत का कलश गिर गया | जो मनुष्य नियम, व्रत अथवा जप के बिना चौमासा बिताता है वह मूर्ख है |

बुद्धिमान मनुष्य को सदैव मन को संयम से रखने का प्रयत्न करना चाहिए | मन के भलिभाँति वश में होने से ही पूर्णत: ज्ञान की प्राप्ति होती है |

सत्यमेकं परो धर्म: सत्यमेकं परं तप: |
सत्यमेकं परं ज्ञानं सत्ये धर्म: प्रतिष्ठित: ||
धर्ममूलमहिंसा च मनसा तां च चिन्तयन् |
कर्मणा च तथा वाचा तत एतां समाचरेत् || (स्कंद पुराण ब्रा.:२.१८-१९)

‘एकमात्र सत्य ही परम धर्म है | एक सत्य ही परम तप है | केवल सत्य ही परमं ज्ञान है और सत्य में ही धर्म की प्रतिष्ठा है | अहिंसा धर्म का मूल है | इसलिए उस अहिंसा को मन, वाणी और क्रिया के द्वारा आचरण में लाना चाहिए |’

चतुर्मास में विशेष रूप से जल की शुद्धि होती है | उस समय तीर्थ और नदी आदि में स्नान करने का विशेष महत्त्व है | नदियों के संगम में स्नान के पश्चात पितरों एवं देवताओं का तर्पण करके जप, हों आदि करने से अनंत फल की प्राप्ति होती है | ग्रहण के समय को छोडकर रात को और संध्याकाल में स्नान न करे | गर्म जल से भी स्नान नहीं करना चाहिए | गर्म जल का त्याग कर देने से पुष्कर तीर्थ में स्नान करने का फल मिलता है |

जो मनुष्य जल में तिल और आँवले का मिश्रण अथवा बिल्वपत्र डालकर ‘ॐ नम:शिवाय’ का चार – पाँच बार जप करके उस जल से स्नान करता है, उसे नित्य महान पुण्य प्राप्त होता है | बिल्वपत्र से वायुप्रकोप दूर होता है और स्वास्थ्य की रक्षा होती है |

चतुर्मास में जीव – दया विशेष धर्म है | प्राणियों से द्रोह करना कभी भी धर्म नहीं माना गया है | इसलिए मनुष्यों को सर्वथा प्रयत्न करके प्राणियों के प्रति दया करनी चाहिए | जिस धर्म में दया नहीं है वह दूषित माना गया है | सब प्राणियों के प्रति आत्मभाव रखकर सबके ऊपर दया करना सनातन धर्म है, जो सब पुरुषों के द्वारा सदा सेवन करने योग्य है |

सब धर्मो में दान – धर्म की विद्वान लोग सदा प्रशंसा करते हैं | चतुर्मास में अन्न, जल, गौ का दान, प्रतिदिन वेदपाठ और हवन – ये सब महान फल देनेवाले है |

सदधर्म , सत्कथा, सत्पुरुषों की सेवा, संतों के दर्शन, भगवान विष्णु का पूजन आदि सत्कर्मों में संलग्न रहना और दान में अनुराग होना – ये सब बातें चतुर्मास में दुर्लभ बतायी गयी हैं | चतुर्मास में दूध, दही, घी एवं मट्ठे का दान महाफल देनेवाला होता है | जो चतुर्मास में भगवान की प्रीति के लिए विद्या, गौ व भूमि का दान करता है, वह अपने पूर्वजों का उद्धार कर देता है | विशेषत: चतुर्मास में अग्नि में आहुति, भगवदभक्त एवं पवित्र ब्राह्मणों को दान और गौओं की भलिभाँति सेवा, पूजा करनी चाहिए |

पितृकर्म (श्राद्ध) में सिला हुआ वस्त्र नही पहनना चाहिए | जिसने असत्य भाषण, क्रोध तथा पर्व के अवसर पर मैथुन का त्याग कर दिया है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है | असत्य भाषण के त्याग से मोक्ष का दरवाजा खुल जाता है | किसी पदार्थ को उपयोग में लाने से पहले उसमें से कुछ भाग सत्पात्र ब्राह्मण को दान करना चाहिए | जो धन सत्पात्र ब्राह्मण को दिया जाता है, वह अक्षय होता है | इसी प्रकार जिसने कुछ उपयोगी वस्तुओं को चतुर्मास में त्यागने का नियम लिया हो, उसे भी वे वस्तुएँ सत्पात्र ब्राह्मण को दान करनी चाहिए | ऐसा करने से वह त्याग सफल होता है |

चतुर्मास में जो स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय और देवपूजन किया जाता है, वह सब अक्षय हो जाता है | जो एक अथवा दोनों समय पुराण सुनता है, वह पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के धाम को जाता है | जो भगवान के शयन करने पर विशेषत: उनके नाम का कीर्तन और जप करता है, उसे कोटि गुना फल मिलता है |

देवशयनी एकादशी के बाद प्रतिज्ञा करना कि “हे भगवन ! मैं आपकी प्रसन्नता के लिए अमुक सत्कर्म करूँगा |” और उसका पालन करना इसीको व्रत कहते है | यह व्रत अधिक गुणोंवाला होता है | अग्निहोत्र, भक्ति, धर्मविषयक श्रद्धा, उत्तम बुद्धि, सत्संग, सत्यभाषण, ह्रदय में दया, सरलता एवं कोमलता, मधुर वाणी, उत्तम चरित्र में अनुराग, वेदपाठ, चोरी का त्याग, अहिंसा, लज्जा, क्षमा, मन एवं इन्द्रियों का संयम, लोभ, क्रोध और मोक्ष का अभाव, वैदिक कर्मों का उत्तम ज्ञान तथा भगवान को अपने चित्त का समर्पण – इन नियमों को मनुष्य अंगीकार करे और व्रत का यत्नपूर्वक पालन करे | (‘पद्मपुराण’ के उत्तरखंड, ‘स्कंद पुराण’ के ब्राह्म खंड एवं नागर खंड – उत्तरार्ध से संकलित )
[youtube:https://www.youtube.com/watch?v=nFaKGLqXB3Q]

– स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – जुलाई २००४, अंक १३९ पृष्ठ -१४ से १६ )

चतुर्मास में बिल्वपत्र की महत्ता

beal-leafचतुर्मास में बिल्वपत्र की महत्ता

  • चतुर्मास में शीत जलवायु के कारण वातदोष प्रकुपित हो जाता है। अम्लीय जल से पित्त भी धीरे-धीरे संचित होने लगता है। हवा की आर्द्रता (नमी) जठराग्नि को मंद कर देती है। सूर्यकिरणों की कमी से जलवायु दूषित हो जाते हैं। यह परिस्थिति अनेक व्याधियों को आमंत्रित करती है। इसलिए इन दिनों में व्रत उपवास व होम-हवनादि को हिन्दू संस्कृति ने विशेष महत्त्व दिया है। इन दिनों में भगवान शिवजी की पूजा में प्रयुक्त होने वाले बिल्वपत्र धार्मिक लाभ के साथ साथ स्वास्थ्य लाभ भी प्रदान करते हैं।

  • बिल्वपत्र उत्तम वायुनाशक, कफ-निस्सारक व जठराग्निवर्धक है। ये कृमि व दुर्गन्ध का नाश करते हैं। इनमें निहित उड़नशील तैल व इगेलिन, इगेलेनिन नामक क्षार-तत्त्व आदि औषधीय गुणों से भरपूर हैं। चतुर्मास में उत्पन्न होने वाले रोगों का प्रतिकार करने की क्षमता बिल्वपत्र में है।

  • बिल्वपत्र ज्वरनाशक, वेदनाहर, कृमिनाशक, संग्राही (मल को बाँधकर लाने वाले) व सूजन उतारने वाले हैं। ये मूत्र के प्रमाण व मूत्रगत शर्करा को कम करते हैं। शरीर के सूक्ष्म मल का शोषण कर उसे मूत्र के द्वारा बाहर निकाल देते हैं। इससे शरीर की आभ्यंतर शुद्धि हो जाती है। बिल्वपत्र हृदय व मस्तिष्क को बल प्रदान करते हैं। शरीर को पुष्ट व सुडौल बनाते हैं। इनके सेवन से मन में सात्त्विकता आती है।

बिल्वपत्र के प्रयोगः

  1. बेल के पत्ते पीसकर गुड़ मिला के गोलियाँ बनाकर खाने से विषमज्वर से रक्षा होती है।

  2. पत्तों के रस में शहद मिलाकर पीने से इन दिनों में होने वाली सर्दी, खाँसी, बुखार आदि कफजन्य रोगों में लाभ होता है।

  3. बारिश में दमे के मरीजों की साँस फूलने लगती है। बेल के पत्तों का काढ़ा इसके लिए लाभदायी है।

  4. बरसात में आँख आने की बीमारी (Conjuctivitis) होने लगती है। बेल के पत्ते पीसकर आँखों पर लेप करने से एवं पत्तों का रस आँखों में डालने से आँखें ठीक हो जाती है।

  5. कृमि नष्ट करने के लिए पत्तों का रस पीना पर्याप्त है।

  6. एक चम्मच रस पिलाने से बच्चों के दस्त तुरंत रुक जाते हैं।

  7. संधिवात में पत्ते गर्म करके बाँधने से सूजन व दर्द में राहत मिलती है।

  8. बेलपत्र पानी में डालकर स्नान करने से वायु का शमन होता है, सात्त्विकता बढ़ती है।

  9. बेलपत्र का रस लगाकर आधे घंटे बाद नहाने से शरीर की दुर्गन्ध दूर होती है।

  10. पत्तों के रस में मिश्री मिलाकर पीने से अम्लपित्त (Acidity) में आराम मिलता है।

  11. स्त्रियों के अधिक मासिक स्राव व श्वेतस्राव (Leucorrhoea) में बेलपत्र एवं जीरा पीसकर दूध में मिलाकर पीना खूब लाभदायी है। यह प्रयोग पुरुषों में होने वाले धातुस्राव को भी रोकता है।

  12. तीन बिल्वपत्र व एक काली मिर्च सुबह चबाकर खाने से और साथ में ताड़ासन व पुल-अप्स करने से कद बढ़ता है। नाटे ठिंगने बच्चों के लिए यह प्रयोग आशीर्वादरूप है।

  13. मधुमेह (डायबिटीज) में ताजे बिल्वपत्र अथवा सूखे पत्तों का चूर्ण खाने से मूत्रशर्करा व मूत्रवेग नियंत्रित होता है।

बिल्वपत्र की रस की मात्राः 10 से 20 मि.ली.

स्रोतः लोक कल्याण सेतु, जुलाई-अगस्त 2009

चतुर्मास विशेष : १५ जुलाई से ११ नवम्बर २०१६ तक

 

Satsang Pratap_2

चतुर्मास विशेष

१५ जुलाई से लेकर ११ नवम्बर तक भगवान विष्णु गुरुतत्व में गुरु जहाँ विश्रांति पाते हैं, ऐसे आत्मदेव में भगवान विष्णु ४ महीने समाधिस्त रहेंगे | उन दिनों में शादी विवाह वर्जित है, सकाम कर्म वर्जित है|
ये करना –

  • जलाशयों में स्नान करना तिल और जौं को पीसकर मिक्सी में रख दिया थोड़ा तिल जौं मिलाकर बाल्टी में बेलपत्र डाल सको तो डालो उसका स्नान करने से पापनाशक स्नान होगा प्रसन्नतादायक स्नान होगा तन के दोष मन के दोष मिटने लगेंगे | अगर  ॐ नमःशिवाय”  ५ बार मन में जप करके फिर लोटा सिर पे डाला पानी का, तो पित्त की बीमारी,कंठ का सूखना ये तो कम हो जायेगा, चिडचिडा स्वभाव भी कम हो जायेगा और स्वभाव में जलीय अंश रस आने लगेगा | भगवान नारायण शेष शैय्या पर शयन करते हैं इसलिए ४ महीने सभी जलाशयों में तीर्थत्व का प्रभाव आ जाता है |

  • गद्दे-वद्दे हटा कर सादे बिस्तर पर शयन करें संत दर्शन और संत के जो वचन वाले जो सत्शास्त्र हैं, सत्संग सुने संतों की सेवा करें ये ४ महीने दुर्लभ हैं |

  • स्टील के बर्तन में भोजन करने की अपेक्षा पलाश के पत्तों पर भोजन करें तो वो भोजनपापनाशक पुण्यदायी होता है, ब्रह्मभाव को प्राप्त कराने वाला होता है |

  • चतुर्मास में ये ४ महीनों में दोनों पक्षों की एकादशी का व्रत करना चाहिये |१५ दिन में १दिन उपवास १४ दिन का खाया हुआ जो तुम्हारा अन्न है वो ओज में बदल जायेगा ओज,तेज और बुद्धि को बलवान बनायेगा १ दिन उपवास एकादशी का |

  • चतुर्मास में भगवान विष्णु के आगे पुरुष सूक्त का पाठ करने वाले की बुद्धि का विकास होता है और सुबह या जब समय मिले भूमध्य में ओंकार का ध्यान करने से बुद्धि काविकास होता है |

  • दान, दया और इन्द्रिय संयम ये उत्तम धर्म करने वाले को उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है|

  • आंवला-मिश्री जल से स्नान महान पुण्य प्रदान करता है |

ये न करना

  • इन ४ महीनो में पराया धन हड़प करना, परस्त्री से समागम करना, निंदा करना, ब्रह्मचर्य तोड़ना तो मानो हाथ में आया हुआ अमृत कलश ढोल दिया निंदा न करे, ब्रह्मचर्य कापालन करे, परधन परस्त्री पर बुरी नज़र न करें |

  • ताम्बे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिये पानी नहीं पीना चाहिये |

  • चतुर्मास में काला और नीला वस्त्र पहनने से स्वास्थ्य हानि और पुण्य नाश होता है |

  • परनिंदा महा पापं शास्त्र वचन :- “परनिंदा महा पापं परनिंदा महा भयं परनिंदा महा दुखंतस्या पातकम न परम”

ये स्कन्द पुराण का श्लोक है परनिंदा महा पाप है, परनिंदा महा भय है, परनिंदा महा दुःख है तस्यापातकम न परम उस से बड़ा कोई पाप नही | इस चतुर्मास में पक्का व्रत ले लो कि हम किसी की निंदा न करेंगे |

  • असत्य भाषण का त्याग कर दें, क्रोध का त्याग कर दें,

  • बाजारू चीजें जो आइसक्रीम है, पेप्सी, कोका- कोला है अथवा शहद आदि है उन चीजों कात्याग कर दें चतुर्मास में, स्त्री-पुरुष के मैथुन संग का त्याग कर दें|

तो हे पार्वती ! वो जीव अपने दोषों से पार होकर मेरी भक्ति को और मुक्ति को पाता है, अश्वमेघ यज्ञ के फल को पाता है |

साधना हेतु अमृतोपम काल : चतुर्मास

gayatriसाधना हेतु अमृतोपम काल : चतुर्मास
( इस साल – चतुर्मास : १५ जुलाई से ११ नवम्बर २०१६ तक )

चतुर्मास के चार महीने भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते है | इसलिए यह काल साधकों, भक्तों, उपासकों के लिए सुवर्णकाल माना गया हैं | उस काल में जो कोई व्रत, नियम पाला जाता है वह अक्षय फल देता है, इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को यत्नपूर्वक चतुर्मास में कोई नियम लेना चाहिए | जिस प्रकार चींटियाँ आदि प्राणी वर्षाकाल हेतु अन्य दिनों में ही अपने लिए उपयोगी साधन – संचय कर लेते हैं, उसी प्रकार साधक – भक्त को भी इस अमृतोपम समय में भगवान के संतोष के लिए शास्त्रोक्त नियमों, जप, हों, स्वाध्याय एवं व्रतों का अनुष्ठान कर सत्त्व की अभिवृद्धि एवं परमात्म – सुख प्राप्त करना चाहिए |

जो व्यक्ति भगवान के उद्देश्य से केवल शाकाहार करके चतुर्मास के चार महीने व्यतीत करता हैं वह धनी होता है | जो भगवान विष्णु के योगनिद्रा काल में प्रतिदिन नक्षत्रों के दर्शन करके ही एक बार भोजन करता हैं वह धनवान, रूपवान और माननीय होता है |

जो श्रीहरि के योगनिद्रा काल में व्रतपरायण होकर चातुर्मास व्यतीत करता है वह अग्निष्टोम यज्ञ का फल पाता है | जो ईमानदारी के अन्न का भोजन करता है उसका अपने भाई-बंधुओं से कभी वियोग नहीं होता | जो ब्रह्मचर्य – पालन पूर्वक चतुर्मास व्यतीत करता है वह श्रेष्ठ विमान में बैठकर स्वेच्छा से स्वर्गलोक में जाता है | जो सम्पूर्ण चतुर्मास नमक का त्याग करता है उसके सभी पुर्तकर्म ( परोपकार एवं धर्मसंबंधी कार्य ) सफल होते हैं |

चतुर्मास में प्रतिदिन स्नान करके जो भगवान विष्णु के आगे खड़ा हो ‘पुरुष सूक्त’ का जप करता है उसकी बुद्धि बढती है |

जो मनुष्य चतुर्मास में श्रद्धा – भक्ति के साथ विष्णु – चरणामृत पान करता है उसे विष्णुलोक की प्राप्ति होती है | कटोरी में जल को देखने हुए सौ बार भगवन्नाम जपें वही बन गया भगवद चरणामृत | जो नित्य भगवान सूर्य या गणपतिजी को नमस्कार करता है उसे आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य और कांति की प्राप्ति होती है | चतुर्मास में पलाश के पत्तों की पत्तल पर भोजन करना पापनाशक है |

क्षीरसमुद्र में योगनिद्रा करनेवाले भगवान जिस दिन शयन करते ( शयनी एकादशी) और उठते (देवउठी एकादशी ) हैं, उन दिनों में अनन्य भक्तिपूर्वक उपवास करनेवाले मनुष्यों को भगवान शुभ गति प्रदान करते है |

किसी कारण से यदि चतुर्मास के चारों महीने में नियमों का पालन करना सम्भव न हो तो केवल कार्तिक मास में ही इन नियमों का पालन करें |

जिसने कुछ उपयोगी वस्तुओं को पुरे चतुर्मास में त्याग देने का नियम लिया हो, उसे वे वस्तुएँ सात्त्विक ब्राह्मण को दान करनी चाहिए | ऐसा करने से ही वह त्याग सफल होता है |
जो मनुष्य जप, नियम, व्रत आदि के बिना ही चतुर्मास व्यतीत करता है वह मुर्ख है और जो इन साधनों द्वारा इस अमूल्य काल का लाभ उठाता है वह मानों, अमृतकुंभ ही पा लेता है |

– स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – जुलाई २००७ से

चातुर्मास में प्रतिदिन पाठ करने हेतु – “पुरुष सूक्त”

6पुरुष सूक्त ( चातुर्मास विशेष )

चातुर्मास में जो भगवन विष्णु के समक्ष पुरुष सूक्त का पाठ करता है उसकी बुद्धि बढ़ेगी | कैसा भी दबू विद्यार्थी हो बुद्धिमान बनेगा |

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः
हरी ॐ
सहस्त्रशीर्षा पुरुष:सहस्राक्ष:सहस्रपात् |
स भूमि सर्वत: स्पृत्वाSत्यतिष्ठद्द्शाङ्गुलम् ||१||

जो सहस्रों सिरवाले, सहस्रों नेत्रवाले और सहस्रों चरणवाले विराट पुरुष हैं, वे सारे ब्रह्मांड को आवृत करके भी दस अंगुल शेष रहते हैं ||१||

पुरुषSएवेदं सर्व यद्भूतं यच्च भाव्यम् |
उतामृतत्यस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ||२||

जो सृष्टि बन चुकी, जो बननेवाली है, यह सब विराट पुरुष ही हैं | इस अमर जीव-जगत के भी वे ही स्वामी हैं और जो अन्न द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं, उनके भी वे ही स्वामी हैं ||२||

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः |
पादोSस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ||३||

विराट पुरुष की महत्ता अति विस्तृत है | इस श्रेष्ठ पुरुष के एक चरण में सभी प्राणी हैं और तीन भाग अनंत अंतरिक्ष में स्थित हैं ||३||

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुष:पादोSस्येहाभवत्पुनः |
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशनेSअभि ||४||

चार भागोंवाले विराट पुरुष के एक भाग में यह सारा संसार, जड़ और चेतन विविध रूपों में समाहित है | इसके तीन भाग अनंत अंतरिक्षमें समाये हुए हैं ||४||

ततो विराडजायत विराजोSअधि पूरुषः |
स जातोSअत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुर: ||५||

उस विराट पुरुष से यह ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ | उस विराट से समष्टि जीव उत्पन्न हुए |वही देहधारी रूप में सबसे श्रेष्ठ हुआ, जिसने सबसे पहले पृथ्वी को, फिर शरीरधारियों को उत्पन्न किया ||५||

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत: सम्भृतं पृषदाज्यम् |
पशूंस्न्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ||६||

उस सर्वश्रेष्ठ विराट प्रकृति यज्ञ से दधियुक्त घृत प्राप्त हुआ(जिससे विराट पुरुष की पूजा होती है) | वायुदेव से संबंधित पशु हरिण, गौ, अश्वादि की उत्पत्ति उस विराट पुरुष के द्वारा ही हुई ||६||

तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतSऋचः सामानि जज्ञिरे |
छन्दाँसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ||७||

उस विराट यज्ञ पुरुष से ऋग्वेद एवं सामवेद का प्रकटीकरण हुआ | उसी से यजुर्वेद एवं अथर्ववेद का प्रादुर्भाव हुआ अर्थात् वेद की ऋचाओं का प्रकटीकरण हुआ ||७||

तस्मादश्वाSअजायन्त ये के चोभयादतः |
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाताSअजावयः ||८||

उस विराट यज्ञ पुरुष से दोनों तरफ दाँतवाले घोड़े हुए और उसी विराट पुरुष से गौए, बकरिया और भेड़s आदि पशु भी उत्पन्न हुए ||८||

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पूरुषं जातमग्रत:|
तेन देवाSअयजन्त साध्याSऋषयश्च ये ||९||

मंत्रद्रष्टा ऋषियों एवं योगाभ्यासियों ने सर्वप्रथम प्रकट हुए पूजनीय विराट पुरुष को यज्ञ (सृष्टि के पूर्व विद्यमान महान ब्रह्मांड रूपयज्ञ अर्थात् सृष्टि यज्ञ) में अभिषिक्त करके उसी यज्ञरूप परम पुरुष से ही यज्ञ (आत्मयज्ञ ) का प्रादुर्भाव किया ||९||

यत्पुरुषं व्यदधु: कतिधा व्यकल्पयन् |
मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादाSउच्येते ||१०||

संकल्प द्वारा प्रकट हुए जिस विराट पुरुष का, ज्ञानीजन विविध प्रकार से वर्णन करते हैं, वे उसकी कितने प्रकार से कल्पना करते हैं ? उसका मुख क्या है ? भुजा, जाघें और पाँव कौन-से हैं ? शरीर-संरचना में वह पुरुष किस प्रकार पूर्ण बना ? ||१०||

ब्राह्मणोSस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत: |
ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्या शूद्रोSअजायत ||११||

विराट पुरुष का मुख ब्राह्मण अर्थात् ज्ञानी (विवेकवान) जन हुए | क्षत्रिय अर्थात पराक्रमी व्यक्ति, उसके शरीर में विद्यमान बाहुओं के समान हैं | वैश्य अर्थात् पोषणशक्ति-सम्पन्न व्यक्ति उसके जंघा एवं सेवाधर्मी व्यक्ति उसके पैर हुए ||११||

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षो: सूर्यो अजायत |
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ||१२||

विराट पुरुष परमात्मा के मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य, कर्ण से वायु एवं प्राण तथा मुख से अग्नि का प्रकटीकरण हुआ ||१२||

नाभ्याSआसीदन्तरिक्ष शीर्ष्णो द्यौः समवर्त्तत |
पद्भ्यां भूमिर्दिश: श्रोत्रात्तथा लोकांर्Sअकल्पयन् ||१३||

विराट पुरुष की नाभि से अंतरिक्ष, सिर से द्युलोक, पाँवों से भूमि तथा कानों से दिशाएँप्रकट हुईं | इसी प्रकार (अनेकानेक) लोकों को कल्पित किया गया है (रचा गया है) ||१३||

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत |
वसन्तोSस्यासीदाज्यं ग्रीष्मSइध्म: शरद्धवि: ||१४||

जब देवों ने विराट पुरुष रूप को हवि मानकर यज्ञ का शुभारम्भ किया, तब घृत वसंत ऋतु, ईंधन(समिधा) ग्रीष्म ऋतु एवं हवि शरद ऋतु हुई ||१४||

सप्तास्यासन् परिधयस्त्रि: सप्त: समिध: कृता:|
देवा यद्यज्ञं तन्वानाSअबध्नन् पुरुषं पशुम् ||१५||

देवों ने जिस यज्ञ का विस्तार किया, उसमें विराट पुरुष को ही पशु (हव्य) रूप की भावना से बाँधा (नियुक्त किया), उसमें यज्ञ की सात परिधियाँ (सात समुद्र) एवं इक्कीस(छंद) समिधाएँ हुईं ||१५||

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् |
ते ह नाकं महिमान: सचन्त यत्र पूर्वे साध्या: सन्ति देवा: ||१६||

आदिश्रेष्ठ धर्मपरायण देवों ने, यज्ञ से यज्ञरूप विराट सत्ता का यजन किया | यज्ञीय जीवन जीनेवाले धार्मिक महात्माजन पूर्वकाल के साध्य देवताओं के निवास, स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं ||१६||

ॐ शांति: ! शांति: !! शांति: !!!

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