Category Archives: Geeta Jayanti

बोरसी (भिलाई ) में गीता प्रचार रैली

बोरसी (भिलाई ) में गीता प्रचार रैली

संत श्री आशारामजी बापू आश्रम बेलोदी के तत्वधान में श्रीमद्भागवतगीता जयंती के उपलक्ष्य में बोरसी (भिलाई ) में विद्यार्थियों ने गीताप्रचार रैली निकालकर पूजन – पठान किया गया |

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धमतरी में गीता वितरण

धमतरी में गीता वितरण 

श्रीमद्भागवतगीता जयंती के उपलक्ष्य में श्री योग वेदांत सेवा समिति धमतरी के तत्वधान में युवा सेवा संघ द्वारा धमतरी के पोलिस लाइन में अधकारियों व पोलिस आरक्षक मेंश्रीमद्भागवतगीता बाँट कर उसकी महिमा को बताया गया |

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कोरबा में गीता जयंती

कोरबा में गीता जयंती

श्री योग वेदांत सेवा समिति – कोरबा ( छ. ग. ) द्वारा  गीता जयंती के पावन पर्व पर समिति के साधकों द्वारा निःशुल्क गीता व सत॒साहित्य वितरण कर लोगो को गीता की महिमा भी बताया गया |
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पाटन (दुर्ग ) में गीता प्रचार यात्रा

पाटन (दुर्ग ) में गीता प्रचार यात्रा

श्रीमद्भागवतगीता जयंती के उपलक्ष्य में पाटन (दुर्ग ) के साधको द्वारा गीता प्रचार यात्रा निकालकर लोगो को गीता की महिमा बताया गया |IMG-20161210-WA0018 IMG-20161210-WA0019 IMG-20161210-WA0021

राजनांदगाँव में गीता जयंती

राजनांदगाँव में गीता जयंती

श्री योग वेदांत सेवा समिति द्वारा राजनांदगाँव में श्रीमद्भागवतगीता जयंती के उपलक्ष्य में सामूहिक गीता पाठ कर कीर्तन यात्रा निकाला गया व साथ में सत॒साहित्य वितरण भी किया गया |

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गीता जयंती रायपुर

गीता जयंती रायपुर 

10 दिसम्बर 2016 को श्रीमद्भागवतगीता जयंती के उपलक्ष्य में संत आशाराम जी बापू प्रेरित युवा सेवा संघ द्वारा रायपुर शहर में बाईक रैली एवं शोभा यात्रा निकाला कर  गीता का दिव्य ज्ञान जन जन तक पहुँचाया सत॒साहित्य व पम्पलेट वितरण किया गया । शोभा यात्रा वीआईपी रोड स्थित राम मंदिर से प्रारंभ होकर तेलीबांधा, मरीन ड्राइव, घड़ी चौक होती हुई शास्त्री चौक पर संपन्न हुई। मार्ग में जगह जगह शोभायात्रा का स्वागत किया गया। शोभायात्रा में बड़ी संख्या में युवा दोपहिया वाहनों पर भगवा ध्वज के साथ आगे चल रहे थे । पीछे श्रीमद्भगवद्गीता गीता की भव्य झांकी थी ।लोगों को प्रसाद वितरण भी किया गया।

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लोक – परलोक सँवारनेवाली गीता की १२ विद्याएँ – पूज्य बापूजी

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 (श्रीमद् भगवद्गीता जयंती : १० दिसम्बर )

गीता का ज्ञान मनुष्यमात्र का मंगल करने की सत्प्रेरणा देता है, सद्ज्ञान देता है | गीता की १२ विद्याएँ हैं | गीता सिखाती है कि भोजन कैसा करना चाहिए जिससे आपका तन तंदुरुस्त रहे, व्यवहार कैसा करना चाहिए जिससे आपका मन तंदुरुस्त रहे और ज्ञान कैसा सुनना – समझना चाहिए जिससे आपकी बुद्धि में ज्ञान – ध्यान का प्रकाश हो जाय | जीवन कैसा जीना चाहिए कि मरने के पहले मौत के सिर पर पैर रख के आप अमर परमात्मा की यात्रा करने में सफल हो जायें, ऐसा गीता का दिव्य ज्ञान है | इसकी १२ विद्याएँ समझ लो :

१] शोक-निवृत्ति की विद्या : गीता आशा का ग्रंथ है, उत्साह का ग्रन्ध है | मरा कौन है ? जिसकी आशा, उत्साह मर गये वह जीते – जी मरा हुआ है | सफल कौन होता है ? जिसके पास बहुत लोग हैं, बहुत धन होता है, वही वास्तव में जिंदा है | गीता जिंदादिली देनेवाला सदग्रंथ है | गीता का सत्संग सुननेवाला बीते हुए का शोक नहीं करता है, भविष्य की कल्पनाओं से भयभीत नहीं होता, वर्तमान के व्यवहार को अपने सिर पर हावी नहीं होने देता और चिंता का शिकार नहीं बनता | गीता का सत्संग सुननेवाला कर्म – कौशल्य पा लेता है |

२] कर्तव्य – कर्म करने की विद्या : कर्तव्य – कर्म कुशलता से करें | लापरवाही, द्वेष, फल की लिप्सा से कर्मों को गंदा न होने दें | आप कर्तव्य – कर्म करें और फल ईश्वर के हवाले कर दें | फल की लोलुपता से कर्म करोगे तो आपकी योग्यता नपी – तुली हो जायेगी | कर्म को ‘कर्मयोग’ बना दें |

३] त्याग की विद्या : चित्त से तृष्णाओं का, कर्तापन का, बेवकूफी का त्याग करना |

    …. त्यागाच्छान्तिरनन्तरम | (गीता : १२.१२)

त्याग से आपके ह्रदय में निरंतर परमात्म – शान्ति रहेगी |

४] भोजन करने की विद्या : युद्ध के मैदान में भी भगवान स्वास्थ्य की बात नहीं भूलते हैं | भोजन ऐसा करें कि आपको बिमारी स्पर्श न करे और बीमारी आयी तो भोजन ऐसे बदल जाय कि बीमारी टिके नहीं |

युक्ताहारविहारस्य…. (गीता :६.१७)

५] पाप न लगने की विद्या : युद्ध जैसा घोर कर्म करते हुए अर्जुन को पाप नहीं लगे, ऐसी विद्या है गीता में | कर्तृत्वभाव से, फल की इच्छा से तुम कर्म करते हो तो पाप लगता है लेकिन कर्तृत्व के अहंकार से नहीं, फल की इच्छा से नहीं, मंगल भावना से भरकर करते हो तो आपको पाप नहीं लगता |

यस्य नाहंकृतो भावो…. (गीता:१८.१७)

यह सनातन धर्म की कैसी महान विद्या है ! जरा – जरा बात में झूठ बोलने का लाइसेंस (अनुज्ञापत्र ) नहीं मिल रहा है लेकिन जिससे सामनेवाले का हित होता हो और आपका स्वार्थ नहीं है तो आपको ऐसा कर्म बंधनकारी नहीं होता, पाप नहीं लगता |

६] विषय – सेवन की विद्या : आप ऐसे रहें, ऐसे खायें – पियें कि आप संसार का उपयोग करें, उपभोग करके संसार में डूब न मरें | जैसे मुर्ख मक्खी चाशनी में डूब मरती है, सयानी मक्खी किनारे से अपना काम निकालकर चली जाती है, ऐसे आप संसार में पहले थे नहीं, बाद में रहोगे नहीं तो संसार से अपनी जीविकाभर की गाडी चला के बाकी का समय बचाकर अपनी आत्मिक उन्नति करें | इस प्रकार संसार की वस्तु का उपयोग करने की, विषय – सेवन की विद्या भी गीता ने बतायी |

७] भगवद् – अर्पण करने की विद्या : शरीर, वाणी तथा मन से आप जो कुछ करें, उसे भगवान को अर्पित कर दें | आपका हाथ उठने में स्वतंत्र नहीं है | आपके मन, जीभ और बुद्धि कुछ भी करने में स्वतंत्र नहीं हैं | आप डॉक्टर या अधिकारी बन गये तो क्या आप अकेले अपने पुरुषार्थ से बने ? नहीं, कई पुस्तकों के लेखकों की, शिक्षकों की, माता – पिता की और समाज के न जाने कितने सारे अंगों की सहायता से आप कुछ बन पाये | और उसमें परम सहायता परमात्मा की चेतना की है तो इसमें आपके अहं का है क्या ? जब आपके अहं का नहीं है तो फिर जिस ईश्वर की सत्ता से अआप कर्म करते हो तो उसको भगवद् – अर्पण बुद्धि से कर्म अर्पण करोगे तो अहं रावण जैसा नहीं होगा, राम की नाई अहं अपने आत्मा में आराम पायेगा |

८] दान देने की विद्या : नजर चीजें छोड़कर ही मरना है तो इनका सदुपयोग, दान – पुण्य करते जाइये | दातव्यमिति यद्दानं ….. (गीता : १७.२०) आपके पास विशेष बुद्धि या बल है तो दूसरों के हित में उसका दान करो | धनवान हो तो आपके पास जो धन है उसका पाँचवाँ अथवा दसवाँ हिस्सा सत्कर्म में लगाना ही चाहिए |

९] यज्ञ – विद्या : गीता (१७.११ ) में आता है कि फलेच्छारहित होकर शास्त्र – विधि से नियत यज्ञ करना ही कर्तव्य है – ऐसा जान के जो यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक होता है | यज्ञ – याग आदि करने से बुद्धि पवित्र होती है और पवित्र बुद्धि में शोक, दुःख एवं व्यर्थ की चेष्टा नहीं होती |

आहुति डालने से वातावरण शुद्ध होता है एवं संकल्प दूर तक फैलता है लेकिन केवल यही यज्ञ नहीं है | भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी देना, अनजान व्यक्ति को रास्ता बताना भी यज्ञ हैं |

१०] पूजन – विद्या : देवता का पूजन, पितरों का पूजन, श्रेष्ठ जनों का पूजन करने की विद्या गीता में है | पूजन करनेवाले को यश, बल, आयु और विद्या प्राप्त होते हैं |

लेकिन जर्रे – जर्रे में रामजी हैं, ठाकुरजी हैं, प्रभुजी हैं – वासुदेव: सर्वम्…. यह व्यापक पूजन – विद्या भी ‘गीता’ में हैं |

११] समता लाने की विद्या : यह ईश्वर बनानेवाली विद्या है, जिसे कहा गया समत्वयोग | अपने जीवन में समता का सद्गुण लाइये | दुःख आये तो पक्का समझिये कि आया है तो जायेगा | इससे दबें नहीं | दुःख आने का रस लीजिये | सुख आये तो सुख आने का रस लीजिये कि ‘तू जानेवाला है | तेरे से चिपकेंगे नहीं जी सकते लेकिन विकारी रस में आप जियेंगे तो जन्म-मरण के चक्कर में जा गिरेंगे और यदि आप निर्विकारी रस की तरफ आते हैं तो आप शाश्वत, रसस्वरूप ईश्वर को पाते हैं |

१२] कर्मों को सत् बनाने की विद्या :  आप कर्मो को सत बना लीजिये | वे कर्म आपको सतस्वरूप की तरफ ले जायेंगे | आप कभी यह न सोचिये कि ‘मेरे १० मकान हैं, मेरे पास इतने रुपये हैं…..’ इनकी अहंता मत लाइये, आप अपना गला घोंटने का पाप न करिये | ‘मकान हमारे हैं, रूपये मेरे हैं …..’ तो आपने असत को मूल्य दिया, आप तुच्छ हो गये | आपने कर्मों को इतना महत्त्व दिया कि आपको असत् कर्म दबा रहे हैं |

आप कर्म करो, कर्म तो असत् हैं, नश्वर हैं लेकिन कर्म करने की कुशलता आ जाय तो आप सत में पहुँच जायेंगे | आप परमात्मा के लिए कर्म करें तो कर्मों के द्वारा आप सत् का संग कर लेंगे |

कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते |

‘उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्  – ऐसे कहा जाता है |’  (गीता : १७.२७)

स्त्रोत – ऋषि प्रसाद दिसम्बर २०१५ से (निरंतर अंक -२७६ )  

 

गीता जयंती भवरपुर

गीता जयंती भवरपुर

21 दिसम्बर को गीता जयंती के उपलक्ष्य पर श्री योग वेदांत सेवा समिति भवरपुर (जिला -महासमुंद) द्वारा विद्यालयों में जाकर श्री भगवत गीता की महिमा बताकर साहित्य वितरण किया गया |

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