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सब दुःखों से सदा के लिए मुक्ति -आत्मनिष्ठ बापूजी के मुखारविंद से निःसृत ज्ञानगंगा

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सब दुःखों से सदा के लिए मुक्ति  -आत्मनिष्ठ बापूजी के मुखारविंद से निःसृत ज्ञानगंगा

असंभव को संभव करने की बेवकूफी छोड़ देना चाहिये और जो संभव है उसको करने में लग जाना चाहिए । शरीर एवं संसार की वस्तुओं को सदा सँभाले रखना असंभव है अतःउसमें से प्रीति हटा लो । मित्रों को, कुटुम्बियों को, गहने-गाँठों को साथ ले जाना असंभव है अतः उसमें से आसक्ति हटा लो । संसार को अपने कहने में चलाना असंभव है लेकिन मन को अपने कहने में चलाना संभव है । दुनिया को बदलना असंभव है लेकिन अपने विचारों को बदलना संभव है । कभी दुःख न आये ऐसा बनना असंभव है लेकिन दुःख कभी चोट न करे ऐसा बनना संभव है । कभी सुख चला न जाए ऐसी अवस्था आना असंभव है लेकिन सुख चले जाने पर भी दुःख की चोट न लगे, ऐसा चित्त बनाना संभव है । अतः जो संभव है उसे कर लेना चाहिए और जो असंभव है उससे टक्कर लेने की जरूरत क्या है ?
एक बालक परीक्षा में लिखकर आ गया कि ‘मध्य प्रदेश की राजधानी इन्दौर है ।’ घर आकर उसे ध्यान आया कि, ‘हाय रे हाय ! मैं तो गलत लिखकर आ गया । मध्य प्रदेश की राजधानी तो भोपाल है ।’
वह नारियल, तेल व सिंदूर लेकर हनुमानजी के पास गया एवं कहने लगा : ‘‘हे हनुमानजी ! एक दिन के लिए ही सही, मध्य प्रदेश की राजधानी इन्दौर बना दो  ।’’
अब उसके सिंदूर, तेल व एक नारियल से मध्य प्रदेश की राजधानी इन्दौर हो जायेगी क्या ? एक नारियल तो क्या, पूरी एक ट्रक भरकर नारियल रख दे लेकिन यह असंभव बात है कि एक दिन के लिए राजधानी इन्दौर हो जाये । अतः जो असंभव है उसका आग्रह छोड़ दो एवं जो संभव है उस कार्य को प्रेम से करो ।
बाहर के मित्र को सदा साथ रखना संभव नहीं है लेकिन अंदर के मित्र (परमात्मा) का सदा स्मरण करना एवं उसे पहचानना संभव है । बाहर के पति-पत्नी, परिवार, शरीर को साथ ले जाना संभव नहीं है लेकिन मृत्यु के बाद भी जिस साथी का साथ नहीं छूटता उस साथी के साथ का ज्ञान हो जाना, उस साथी से प्रीति हो जाना – यह संभव है ।
एक होती है वासना, जो हमें असंभव को संभव करने में लगाती है । संसार में सदा सुखी रहना असंभव है लेकिन आदमी संसार में सदा सुखी रहने के लिए मेहनत करता रहता है । संसार में सदा संयोग बनाये रखना असंभव है लेकिन आदमी सदा संबंध बनाये रखना चाहता है कि रूपये चले न जायें, मित्र रूठ न जायें, देह मर न जाये… लेकिन देह मरती है, मित्र रूठते हैं, पैसे जाते हैं या पैसे को छोड़कर पैसेवाला चला जाता है । जो असंभव को संभव करने में लगे वह है वासना का वेग । उस वासना को भगवत्प्रीति में बदल दो ।
एक होती है वासना, दूसरी होती है प्रीति एवं तीसरी होती है जिज्ञासा । ये तीनों चीजें जिसमें रहती हैं उसे बोलते हैं जीव । यदि जीव को अच्छा संग मिल जाये, अच्छी दिशा मिल जाये, नियम और व्रत मिल जायें तो धीरे-धीरे असंभव में से वासना मिटती जायेगी । रोग मिटता जाता है तो स्वास्थ्य अपने आप आता है, अँधेरा मिटता है तो प्रकाश अपने आप आता है । नासमझी मिटती है तो समझ अपने आप आ जाती है । ज्यों-ज्यों जप करेगा त्यों-त्यों मन पवित्र और सात्त्विक होगा, प्राणायाम करेगा तो बुद्धि शुद्ध होगी एवं शरीर स्वस्थ रहेगा और सत्संग सुनेगा तो दिव्य ज्ञान प्राप्त होगा । इस प्रकार जप, प्राणायाम, सत्संग, साधन-भजन आदि करते रहने से धीरे-धीरे वासना क्षीण होने लगेगी एवं वह जीव सुखी होता जायेगा । जितनी वासना तेज उतना तेज वह दुःखी, जितनी वासना कम उतना कम दुःखी और वासना अगर बाधित हो गयी तो वह निर्दुःख नारायण का स्वरूप हो जायेगा ।
नियम-व्रत के पालन से, धर्मानुकूल चेष्टा करने से वासना नियंत्रित होती है । धारणा-ध्यान से वासना शुद्ध होती है, समाधि से वासना शांत होती है और परमात्मज्ञान से वासना बाधित हो जाती है ।
ज्यों-ज्यों वासना कम होती जायेगी और भगवद्प्रीति बढ़ती जायेगी त्यों-त्यों जिज्ञासा उभरती जायेगी । जानने की इच्छा जागृत होगी कि ‘वह कौन है जो सुख को भी देखता है और दुःख को भी देखता है ? वह कौन है जिसको मौत नहीं मार सकती ? वह कौन है कि सृष्टि के प्रलय के बाद भी जिसका बाल तक बाँका नहीं होता ? आत्मा क्या है ? परमात्मा क्या है ? जगत की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय का हेतु क्या है ? बन्धनों से मुक्ति कैसे हो ? जीव क्या है ? ब्रह्म को कैसे जानें ? जिससे जीव और ईश्वर की सत्ता है उस ब्रह्म को कैसे जानें ?’ इस प्रकार के विचार उत्पन्न होने लगेंगे । इसीको ‘जिज्ञासा’ बोलते हैं ।
‘जहाँ चाह वहाँ राह ।’ मनुष्य का जिस प्रकार का विचार और निर्णय होता है वह उसी प्रकार का कार्य करता है । अतः वासनापूर्ति के लिए जीवन को खपाना उचित नहीं, वासना को निवृत्त करें ।
एक बार श्रीरामकृष्ण परमहंस को बोस्की का कुर्त्ता एवं हीरे की अँगूठी पहनने की इच्छा हुई, साथ ही हुक्का पीने की भी । उन्होंने अपने एक शिष्य से ये तीनों चीजें मँगवायीं । चीजें आ गयीं तब गंगा किनारे एक झाड़ी की आड़ में उन्होंने कुर्त्ता पहना, अँगूठी पहनी एवं हुक्के की कुछ फूँकें लीं और जोर से खिलखिलाकर हँस पड़े कि : ‘ले,क्या मिला ? अँगूठी पहनने से कितना सुख मिला ? हुक्का पीने से क्या मिला ? भोग भोगने से पहले जो स्थिति होती है, भोग भोगने के बाद वैसी ही या उससे भी बदतर हो जाती है…’
इस प्रकार उन्होंने अपने मन को समझाया । वासना से मन उपराम हुआ । रामकृष्ण परमहंस प्रसन्न हुए । अँगूठी गंगा में फेंक दी, हुक्का लुढ़का दिया और कुर्त्ता फाड़कर फेंक दिया ।
शिष्य छुपकर यह सब देख रहा था । बोला :
‘‘गुरुजी ! यह क्या ?’’
रामकृष्ण : ‘‘रात्रि को स्वप्न आया था कि मैंने ऐसा-ऐसा पहना है । अवचेतन मन में छुपी हुई वासना थी । वह वासना कहीं दूसरे जन्म में न ले जाये इसलिए वासना से निवृत्त होने के लिए सावधानी से मैंने यह उपक्रम कर लिया ।’’
वासना से बचते हैं तो प्रीति उत्पन्न होती है और प्रीति से हम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जायेंगे, त्यों-त्यों भगवत्स्वरूप तत्त्व की जिज्ञासा उभरती जायेगी । भगवान का सच्चा भक्त अज्ञानी कैसे रह सकता है ? भगवान में प्रीति होगी तो भगवद्-चिंतन, भगवद्ध्यान, भगवद्स्मरण होने लगेगा । भगवान ज्ञानस्वरूप हैं अतः अंतःकरण में ज्ञान की जिज्ञासा उत्पन्न होगी और उस जिज्ञासा की पूर्ति भी होगी ।
इसीलिए गुरुपूनम आदि पर्व मनाये जाते हैं ताकि गुरुओं का सान्निध्य मिले, वासना से बचकर भगवत्प्रीति, भगवद्ज्ञान में आयें एवं भगवद्ज्ञान पाकर सदा के लिये सब दुःखों से छूट जायें ।
वासना की चीजें अनेक हो सकती हैं लेकिन माँग सबकी एक ही होती है और वह माँग है सब दुःखों से सदा के लिए मुक्ति एवं परमानंद की प्राप्ति । कोई रूपये चाहता है तो कोई गहने-गाँठें… लेकिन सबका उद्देश्य यही होता है कि दुःख मिटे और सुख सदा टिका रहे । सुख के साधन अनेक हो सकते हैं लेकिन सुखी रहने का उद्देश्य सबका एक है । दुःख मिटाने के उपाय अनेक हो सकते हैं लेकिन दुःख मिटाने का उद्देश्य सबका एक है, चाहे चोर हो या साहूकार । साहूकार दान-पुण्य क्यों करता है कि यश मिले । यश से क्या होगा ? सुख मिलेगा । भक्त दान-पुण्य क्यों करता है कि भगवान रीझें । भगवान के रीझने से क्या होगा ? आत्म-संतोष मिलेगा । व्यापारी दान-पुण्य क्यों करता है कि धन की शुद्धि होगी । धन की शुद्धि से मन शुद्ध होगा, सुखी होंगे । दान लेनेवाला दान क्यों लेता है कि दान से घर का गुजारा चलेगा, मेरा काम बनेगा अथवा इस दान को सेवाकार्य में लगायेंगे । इस प्रकार मनुष्य जो-जो चेष्टाएँ करता है वह सब दुःखों को मिटाने के लिए एवं सुख को टिकाने के लिए ही करता है ।
वासनापूर्ति से सुख टिकता नहीं और दुःख मिटता नहीं । अतः वासना को विवेक से निवृत्त करो । जैसे, पहले के जमाने में लोग तीर्थों में जाते थे तो जिस वस्तु के लिए ज्यादा वासना होती थी वही छोड़कर आते थे । ब्राह्मण पूछते थे कि : ‘तुम्हारा प्रिय पदार्थ क्या है ?’ कोई कहता कि : ‘सेब है ।’ …तो ब्राह्मण कहता : ‘‘सेब का तीर्थ में त्याग कर दो, भगवान के चरणों में अर्पण कर दो कि अब साल-दो साल तक सेब नहीं खाऊँगा ।’’
जो अधिक प्रिय होगा उसमें वासना प्रगाढ़ होगी और जीव दुःख के रास्ते जायेगा । अगर उस प्रिय वस्तु का त्याग कर दिया तो वासना कम होती जायेगी एवं भगवत्प्रीति बढ़ती जायेगी ।
कोई कहे कि : ‘महाराज ! हमको सत्संग में मजा आता है ।’ सत्संग में तो वासना निवृत्त होती है और प्रीति का सुख मिलता है । मजा अलग बात है और शांति, आनंद अलग बात है । ‘सत्संग से मजा आता है’ यह नासमझी है । सत्संग से तो शांति मिलती है, भगवत्प्रीति का सुख होता है । विषय-विकारों को भोगने से जो मजा आता है वैसा मजा सत्संग में नहीं आता । सत्संग का सुख तो दिव्य प्रीति का सुख होता है । इसीलिए कहा गया है :
तीरथ नहाये एक फल, संत मिले फल चार ।
सद्गुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार ॥

अनंत फल देनेवाली भगवत्प्रीति है । अतः जिज्ञासुओं को, साधकों को, भक्तों को वासनाओं से धीरे-धीरे अपना पिण्ड छुड़ाने का अभ्यास करना चाहिए ।
 

लक्ष्य सबका एक है… पूज्य बापूजी की परम हितकारी अमृतवाणी

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लक्ष्य सबका एक है… पूज्य बापूजी की परम हितकारी अमृतवाणी

जन्म का कारण है अज्ञान, वासना । संसार में सुख तो मिलता है क्षण भर का, लेकिन भविष्य अंधकारमय हो जाता है । जबकि भगवान के रास्ते चलने में शुरूआत में कष्ट तो होता है, संयम रखना पड़ता है, सादगी से रहना पड़ता है, ध्यान-भजन में चित्त लगाना पड़ता है, लेकिन बाद में अनंत ब्रह्माण्डनायक, परब्रह्म परमात्मा के साथ अपनी जो सदा एकता थी, उसका अनुभव हो जाता है ।
संसार का सुख भोगने के लिए पहले तो परिश्रम करो, बाद में स्वास्थ्य अनुकूल हो और वस्तु अनुकूल हो तो सुख होगा लेकिन क्रियाजन्य सुख में पराधीनता, शक्तिहीनता और जड़ता है । इससे बढ़िया सुख है धर्मजन्य सुख । धर्म करने में तो कष्ट सहना पड़ता है लेकिन उसका सुख परलोक तक मदद करता है । अतल, वितल, तलातल, रसातल, पाताल, भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, जनलोक, तपलोक आदि के सुख प्राप्त होते हैं ।
योग में भी यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि… इस प्रकार परिश्रम करना पड़ता है जिससे चित्त की शांतिरूपी फल यहीं मिलता है और परलोक में भी सद्गति होती है लेकिन परिश्रम तो करना ही पड़ता है ।
ज्ञानमार्ग में भी श्रवण-मनन-निदिध्यासन का सुखद परिश्रम तो करना ही पड़ता है । एक भगवद्भक्ति ही है कि जिसमें परिश्रम की जगह पर भगवान से प्रेम है और भगवान से प्रेम होता है भगवान को अपना मानने से । भगवान में प्रीति होने से भक्तिरस शुरू होता है । भक्ति करने में भी रस और भोगने में भी रस । इसमें कभी कमी नहीं होती वरन् यह नित्य नवीन एवं बढ़ता रहता है ।
भजनस्य किं लक्षणम् ? भजनस्य लक्षणं रसनम् । जिससे अंतरात्मा का रस उत्पन्न हो, उसका नाम है भजन । भक्त्याः किं लक्षणम् ? भागो ही भक्तिः । उपनिषदों में यह विचार आया है । भक्ति का लक्षण क्या है ? जो भाग कर दे, विभाग कर दे कि यह नित्य है, यह अनित्य है… यह अंतरंग है, यह बहिरंग है… यह (शरीर) छूटनेवाला है, यह (आत्मा) सदा रहनेवाला है… वह भक्ति है । शरीर व संसार नश्वर है, जीवात्मा-परमात्मा शाश्वत् है ।
जो सदा रहता है, उससे प्रीति कर लें, बस । ऐसा न सोचें कि दुनिया कब हुई ? कैसे हुई ? वरन् दुनिया के सार में मन लगायें । दुनिया का सार है परमात्मा । उसी परमात्मा के विषय में सोचें, उसीके विषय में सुनें तो भगवत्प्रीति बढ़ने लगेगी । भगवत्संबंधी बातें सुनें, बार-बार उन्हीं का मनन करें ।
‘मुझमें काम है… मुझमें क्रोध है…’ इन विघ्नों से, दुर्गुणों से लड़ो मत और न ही अपने सद्गुणों का चिंतन करके अहंकार करो, वरन् मन को भगवान में लगाओ तो दुर्गुण की वासना और सद्गुण का अहंकार दोनों ढीले हो जायेंगे और अपना मन अपने परमेश्वर में लग जायेगा । यही तो जीवन की कमाई है !
संसारतापतप्तानां योगो परम औषधः ।
संसार के ताप में तपे हुए जीवों के लिये योग परम औषध है । योग तीन प्रकार का होता है :पहला है ज्ञानयोग । तीव्र विवेक हो, वैराग्य हो । ‘मैं देह नहीं… मन नहीं… इन्द्रियाँ नहीं… बुद्धि नहीं…’ ऐसा विचार करते-करते सबसे अलग निर्विचार अपने नारायणस्वरूप में टिक जायें । भले, पहले दस सेकण्ड तक ही टिकें, फिर बीस, पच्चीस, तीस सेकण्ड… ऐसा करते-करते तीन मिनट तक निर्विचार अपने नारायणस्वरूप में टिक जायें तो हो जायेगा कल्याण । यह एक दिन… दो दिन… एक महीने… दो महीने का काम नहीं है । इसके लिए तो दीर्घकाल तक दृढ़ अभ्यास चाहिए । चिरकाल की वासनाएँ एवं चिरकाल की चंचलता चिरकाल के अभ्यास से ही मिटेंगी ।
दूसरा है ध्यानयोग । देशबंधस्य चित्तस्य धारणा । एक देश में अपनी वृत्ति को बाँधना, एकाग्र करना… इसका नाम है धारणा । भगवान, स्वस्तिक, दीपक की लौ अथवा गुरु-गोविंद को देखते-देखते एकाग्र होते जायें । मन इधर-उधर जाये तो उसे पुनः एकाग्र करें । इसको ‘धारणा’ बोलते हैं । 12 निमेष तक मन एक जगह पर रहे तो धारणा बनने लगती है ।
आँख की पलकें एक निमेष में गिरती हैं ।
12 निमेष = 1 धारणा । ऐसी 12 धारणाएँ हो जायें तो ध्यान लगता है । ध्यानयोगी अपने आपका मार्गदर्शक बन जाता है । 12 ध्यान = 1 सविकल्प समाधि और 12 सविकल्प समाधि = निर्विकल्प नारायण में स्थिति ।
तीसरा है भक्तियोग । भगवान को अपना मानना एवं अपनेको भगवान का मानना । जो तिद्भावे सो भलिकार… परमात्मा की इच्छा में अपनी इच्छा मिला देना, पूर्ण रूप से उसीकी शरण ग्रहण करना… यही भक्तियोग है ।
जैसे बिल्ली अपने मुँह से चूहे को पकड़ती है, उसी मुँह से अपने बच्चों को पकड़कर ले जाती है । उसके मुँह में आकर उसका बच्चा तो सुरक्षित हो जाता है लेकिन चूहे की क्या दशा होती है ? ऐसे ही जो भगवान का हो जाता है, वह संसारमाया से पूर्णतया सुरक्षित हो जाता है । उसकी पूरी सँभाल भगवान स्वयं करते हैं । फिर उसके पास अपना कहने को कुछ नहीं बचता तो उसमें वासना टिक कैसे सकती है ?
अतः किसी भी योग का आश्रय लो… ज्ञानयोग, ध्यानयोग या भक्तियोग का, सबका उद्देश्य तो एक ही है : सब दुःखों से सदा के लिए निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति । ईश्वरप्रीत्यर्थ निष्काम भाव से किये गये कर्म कर्मयोग है । दुर्वासना ही जीव को चौरासी के चक्कर में भटकाती है एवं वासनानिवृत्ति से ही जीव चौरासी के चक्कर से छूटकर नित्य शुद्ध-बुद्ध चैतन्यस्वरूप, आनंदस्वरूप, सत्यस्वरूप परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है ।

साधक सिद्ध कैसे बने ? – पूज्य बापूजी की शिक्षाप्रद अमृतवाणी

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साधक सिद्ध कैसे बने ? – पूज्य बापूजी की शिक्षाप्रद अमृतवाणी

साधारण से दिखनेवाले मनुष्य में इतनी शक्तियाँ छुपी हुई हैं कि वह हजारों जन्मों के कर्मबंधनों और पाप-तापों को काटकर अपने अजन्मा, अमर आत्मा में प्रतिष्ठित हो सकता है । मनुष्य तो क्या, यक्ष, गंधर्व, किन्नर एवं देवता भी उसका दर्शन पाकर तथा यशोगान करके अपना भाग्य बनाने लगें – ऐसा खजाना मनुष्य के भीतर छुपा हुआ है । महान् होने की इतनी सम्भावनाओं के रहते हुए भी मानव बहिर्मुख होने के कारण पशु की नाईं जीवन जीता है, व्यर्थ के तुच्छ भोग-विलास में ही अपना अमूल्य जीवन बिता देता है और अंत में अतृप्ति के कारण निराश होकर मर जाता है । व्यर्थ की चर्चा करने, बोलने, विचारने तथा मनोरथ गढ़ने में ही भोला मनुष्य अपनी आन्तरिक शक्तियों का ह्रास कर डालता है ।
…किन्तु साधक का जीवन संसारियों के जीवन से भिन्न होता है । संसारी लोगों की बातों में लोभ-मोह-अहंकार का पुट होता है लेकिन साधक के चित्त में निर्मलता, निर्मोहिता, निर्भीकता एवं निरहंकारिता की सुवास होती है । संसारी मनुष्य नश्वर सुख-भोग की वस्तुओं का संग्रह करके इन्द्रियजन्य सुखों को भोगने को उत्सुक होता है जबकि साधक संसार के नश्वर सुख-भोग की वस्तुओं की अपेक्षा न करके अंतर्मुख होकर, आत्मानंद को पाने के महान् रास्ते पर चलता है । संसारी मनुष्य किसीकी निंदा-स्तुति करके तो किसीमें राग-द्वेष करके अपने चित्त को मलिनता की खाई में डालता है, जबकि साधक निंदा-स्तुति, मान-अपमान और राग-द्वेष को चित्त की वृत्तियों का खिलवाड़ समझकर अपने भीतर ही आत्मा में गोता मारने का प्रयास करता है । अपने स्वरूप को स्नेह करते-करते साधक निजानंद-स्वभाव में तृप्त होने को उत्सुक होता है जबकि निगुरा मनुष्य निजानंद-स्वभाव से बेखबर होकर विकारों के जाल में फँसा रहता है ।
इसीलिए उन्नति चाहनेवाले संयमी साधक को विकारी जीवन बितानेवाले संसारी लोगों से मिलने में घाटा-ही-घाटा है जबकि परमात्मप्राप्त महापुरुषों का सान्निध्य उसके जीवन में उत्साह और आनंद भरने में बड़ा सहायक सिद्ध होता है । सत्यस्वरूप परमात्मा में रमण करनेवाले उन आत्मारामी सत्पुरुषों के श्रीचरणों में जाकर साधक आत्मधन की संपत्ति हासिल कर सकता है लेकिन जब वह असावधानी से संसारियों एवं विकारियों के बीच में पड़ जाता है, उनके संपर्क में आने लगता है तो वह अपनी ध्यान और धारणा की शक्ति का ह्रास कर लेता है, आध्यात्मिक ऊँचाइयों से फिसल पड़ता है । अगर कोई साधक इस शक्ति का संचय करते हुए अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित होने तक उसे सावधानी से सँभालकर रखे तो वह साधक देर-सबेर एक दिन सिद्ध हो ही जाता है ।
साधक के लिए एकांतवास, धारणा-ध्यान का अभ्यास, ईश्वरप्रीति, शास्त्रविचार एवं महापुरुषों की संगति – ये सभी अनिवार्य शर्तें हैं । 
एकांत में विचरण करना, कुछ दिनों के लिए एक कमरे में अकेले ही मौन रहकर धारणा-ध्यान का अभ्यास करना साधना में सफलता पाने के लिये परम लाभकारी है । वेदांत की बातें सुनकर भी जो एकांतवास तथा ध्यान-धारणा की अवहेलना करता है उसके पास केवल कोरी बातें ही रह जाती हैं लेकिन जिन्होंने वेदांत के वचनों को सुनकर एकांत में उनका मनन करते हुए निदिध्यासन की भूमिका हासिल की है वे साधक सिद्धि को प्राप्त हो जाते हैं ।
व्यर्थ का बोलना, सुनना एवं देखना साधक पसंद नहीं करता क्योंकि व्यर्थ का बोलने एवं जोर से बोलने से प्राणशक्ति, मनःशक्ति तथा एकाग्रता की शक्ति क्षीण होती है । व्यर्थ का देखने से चित्त में कुसंस्कार घुस जाते हैं और व्यर्थ का सुनने से चित्त मलिन हो जाता है । अतः उन्नति के चाहक को चाहिए कि वह व्यर्थ का देख-सुनकर अपनी शक्ति को क्षीण होने से बचाये ।
साधक उचित आहार-विहार से अपना सत्त्वगुण संजोये रखता है । सत्त्वगुण की रक्षा करना उसका परम कर्त्तव्य बन जाता है । उसे फिर ज्ञान बढ़ाने के लिए किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं पड़ती वरन् सत्त्वगुण बढ़ते ही साधक में ज्ञान अपने-आप प्रगट होने लगता है ।
सत्त्वात्संजायते ज्ञानम्…
जैसे लोभी धन को सँभालता है, अहंकारी कुर्सी को सँभालता है, मोही कुटुम्बियों को सँभालता है ठीक ऐसे ही साधक अपने चित्त को चंचल, क्षीण एवं उग्र होने से बचाता है । जिन कारणों से चित्त में क्षोभ पैदा होता है, जिन कारणों से चिन्ता और भय बढ़ते हैं ऐसे क्रिया-कलापों से साधक सदैव सावधान रहता है । अगर इस प्रकार की परिस्थिति बलात् आ भी जाये तो साधक शांति से जप-ध्यान, शास्त्राध्ययन आदि का आश्रय लेकर विक्षेप उत्पन्न करनेवाले उन क्रिया-कलापों एवं विचारों से अपने को मुक्त कर लेता है ।
साधक को चाहिए कि वह अपने-आपका मित्र बन जाये । अगर साधक परमात्मप्राप्ति के लिए सजग रहकर आध्यात्मिक यात्रा करता रहता है तो वह अपने-आपका मित्र है और अगर वह अनात्म पदार्थों में, संसार के क्षणभंगुर भोगों में ही अपना समय बरबाद कर देता है तो वह अपने-आपका शत्रु हो जाता है ।
उच्च कोटि का साधक जानता है कि :
चातक मीन पतंग जब, पिया बिन ना रह पाय  ।
साध्य को पाये बिना, साधक क्यों रह जाय ?
बुद्धिमान् साधक समझता है कि उसका लक्ष्य आत्मज्ञान पाना है और इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए जीवन में थोड़ी-बहुत दृढ़ता जरूरी है । जो लोग दूसरों को खुश करने में, मित्रों को रिझाने में या वाहवाही में अपने लक्ष्य को ठोकर मार देते हैं, अपने परम कर्त्तव्य को भूल जाते हैं वे फिर कहीं के नहीं रहते । मित्र या कुटुम्बीजन हमारा जितना समय खराब करते हैं, उतना शत्रु भी नहीं करते । अतः बुद्धिमान् साधक इस विषय में बड़ा सावधान रहता है ताकि उसका अमूल्य समय कहीं व्यर्थ की बातों में ही नष्ट न हो जाये ।
इसलिये वह कभी-कभी मौनव्रत का अवलंबन ले लेता है जिससे उसकी जीवनशक्ति बिखरने से बच जाये । साधक मौन एवं एकांत-सेवन का जितना अधिक अवलंबन लेता है, उतनी ही उसकी दृढ़ता में बढ़ोतरी होती जाती है । 
हे साधक ! तू अपनी दृढ़ता बढ़ा, धारणा-शक्ति बढ़ा । तुझमें ईश्वर का असीम बल छुपा है । परमात्मा तुझमें ज्ञानरूप से प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रहा है । तेरे भीतर विश्वनियंता अपने पूर्ण बल, तेज, ओज, आनंद और प्रेमसहित प्रकट होना चाहता है । अतः हे साधक ! तू सावधान रहना । कहीं संसार के कँटीले मार्गों में उलझ न जाना । जीवनदाता से मुलाकात किये बिना ही कहीं जीवन की शाम न ढल जाये । अतः सावधान रहना, भैया ! 
जब संसार स्वप्न जैसा लगे, तब आंतरिक सुख की शुरूआत होती है । जब संसार मिथ्या भासित होने लगे, उसका चिंतन न हो, तब अंतःकरण में शांति व आराम प्रगट होने लगते हैं । जब चित्त अपने चैतन्यस्वरूप परम स्वभाव में तल्लीन होने लगे, तब आंतरिक आनंद प्रगट होने लगता है ।
सारी मुसीबतें संसार को सत्य मानने एवं बहिर्मुख होने से ही आती हैं । अगर साधक अन्तर्मुख हो जाय तो उसे संसार स्वप्नवत् लगने लगे । अतः साधक को सदैव अन्तर्मुख होने का अभ्यास करना चाहिए । ऐसा करने से उसकी सारी व्याकुलताएँ, दुःख, शोक एवं चिन्ताएँ अपने आप गायब हो जायेंगी ।
जो समय हमें परमात्मा को जानने में लगाना चाहिए, ज्ञान पाने में लगाना चाहिए, अंतर्मुख होने में लगाना चाहिए वही समय हम संसार की तुच्छ वस्तुओं, भोगों एवं बहिर्मुखता में लगा देते हैं, इसीलिए ईश्वरप्राप्ति में विफल हो जाते हैं ।
संसार के प्रति आकर्षण का कारण है ईश्वर में श्रद्धा का अभाव एवं अंतर्मुख होने में लापरवाही । अगर साधक अंतर्मुख होता जाये तो उसका आत्मबल उत्तरोत्तर बढ़ता जाये और एक दिन उसके सारे दुःखों का अंत हो जाये । चाहे कैसा भी अपराध हो, बहुत बड़ा पाप हो, महापाप हो, यदि आत्मज्ञान की कुंजी मिल जाये, अंतर्मुख होने की कला आ जाये तो पाप में इतनी ताकत ही नहीं कि उसके आगे टिक सके ।
मौन, जप, उचित आहार-विहार, एकांत-सेवन एवं आत्मविचार अन्तर्मुखता लाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होते हैं । जिन्होंने भी लोकसंपर्क से दूर रहकर अज्ञात स्थान में एकांतसेवन किया तथा अल्पाहार का आश्रय लिया, एकांत में रहकर ध्यान और योग के बल से अपनी जीवनशक्ति को विकसित करके जीवनदाता को, नित्यज्ञान, नित्यप्रेम और नित्य आत्मसुख को पाने का प्रयत्न किया, वे ही महापुरुष हो गये । लेकिन जिन्होंने लोकसंपर्क का सतत सेवन किया और लोकेश्वर के लिये अंतर्मुख होना स्वीकार नहीं किया, उनके पास केवल कोरी बातें ही रह गयीं । जिन्होंने भी मन की वृत्तियों को बहिर्मुख करके उन्हें कल्पनाओं की धारा में बहाया, उन्होंने वास्तव में अपनी जीवनशक्ति को क्षीण करने में ही समय गँवाया, अतः उनके जीवन में अँधेरा ही छाया रहा ।
मदालसा, गार्गी, याज्ञवल्क्य आदि विभूतियाँ एकांतसेवन तथा मौन का अवलंबन लेकर ही महान् बनीं । भगवान बुद्ध ने लगातार छः वर्ष तक जंगलों में अज्ञात रहकर कठोर साधना की और ध्यान-समाधि में तल्लीन रहे । आद्यशंकराचार्य के गुरु गोविन्दपादाचार्यजी भी नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर में एक गुफा में सैकड़ों वर्षों तक समाधिस्थ रहे । आज तक जितने भी महापुरुष एवं महान् विभूतियाँ हुई हैं, उन्होंने अपने जीवन में मौन, एकांतसेवन, जप-ध्यान-धारणा एवं समाधि को ही महत्त्व दिया था । वे अपने निजस्वरूप में स्थित रहकर आत्ममस्ती में विचरते रहे ।
रमण महर्षि 53 वर्ष तक अरुणाचलम् में रहे । इस बीच उन्होंने अनेकों वर्ष एकांत में एवं योगाभ्यास में व्यतीत किये तथा समाधि में वे निमग्न रहे ।
उत्तरकाशी में कृष्णबोधआश्रम नामक महापुरुष ने अज्ञात व एकांतसेवन कर साधनामय जीवन बिताया और बड़े प्रसिद्ध हो गये ।
गंगोत्री में तपोवन स्वामी नामक एक विरक्त महात्मा ने गौमुख की बर्फीली पहाड़ियों पर जाकर एकांतसेवन करते हुए अपनी धारणाशक्ति को विकसित किया और आत्मचिंतन की धारा में मन की वृत्तियों को प्रवाहित कर ब्रह्माकार वृत्ति प्रगट की ।
श्रीरंग अवधूत महाराज ने लम्बे समय तक नर्मदा के किनारे अज्ञात रहकर एकांतसेवन किया तथा घास-फूस की कुटिया बनाकर वे ब्रह्माभ्यास को बढ़ाते रहे ।
श्री अरविंद घोष जैसे प्रसिद्ध व्यक्ति भी वर्षों तक एक कमरे में बंद रहे, अपने निवास से बाहर नहीं निकले । वे भी भारत के एक बड़े योगी के रूप में प्रसिद्ध हुए ।
निलेश स्वामी ने नेपाल के जंगलों में एकांतसेवन कर आत्ममस्ती का लाभ लिया ।
उत्तरकाशी और नैनीताल के भयानक अरण्यों में पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज भी वर्षों तक अज्ञात एकांत में आत्मयात्रा करते हुए, निजानंद की मस्ती लूटते हुए विचरते रहे । आत्ममस्ती से सराबोर वे दिव्य महापुरुष हजारों-लाखों लोगों के बिखरे हुए जीवन को सँवारने तथा साधकों के जीवन को जीवनदाता की ओर अग्रसर करने में समर्थ हुए ।
सभी संत महापुरुष एकांत के बड़े प्रेमी होते हैं । जिनको एकांत में परमात्मा का ध्यान करने की कला आ गयी, जिन्होंने एकाकी जीवन का मूल्य जाना है, वे व्यर्थ के सांसारिक झमेलों में पड़कर अपना आयुष्य बरबाद करना पसंद नहीं करते । ऐसे लोग व्यवहार में रहते हुए भी एकांत में जाने को उत्सुक रहते हैं । और तो सब देव हैं लेकिन शिवजी महादेव हैं । उन्हें भी जब देखो तब एकांत में समाधिस्थ रहते हैं ।
हम आये थे अकेले, जायेंगे अकेले । रात को भी तो अकेले ही रहते हैं । जब इन्द्रियाँ और मन शांत होकर निद्राधीन होते हैं तभी शरीर की थकान मिटती है । इसी प्रकार अगर समय रहते हुए आत्मध्यान में तल्लीन होना सीख लें तो सदियों की थकान मिट सकती है ।
उठो… कमर कसो । समय पल-पल करके बीता जा रहा है… मृत्यु नजदीक आ रही है । पुरुषार्थ करो । एकांतवास करो । धारणा-ध्यान का अभ्यास तथा शास्त्रविचार एवं महापुरुषों की संगति करो और उस परम सुखस्वरूप परमात्मा को पाकर मुक्त हो जाओ ।

व्यक्ति यदि ठान ले तो भगवान उसके दृढ संकल्प को पूरा करा ही देते हा – परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू 

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Vyakti yadi thaan le to Bhagwan uske dridh sankalp ko poora kara hi dete hai.. – P.P.Sant Asharamji Bapu
व्यक्ति यदि ठान ले तो भगवान उसके दृढ संकल्प को पूरा करा ही देते हा – परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू 

गुरु स्तवन

bapujiगुरु स्तवन

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः |
गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||
ध्यानमूलं गुरुर्मूर्ति पूजामूलं गुरोः पदम् |
मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ||
अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् |
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ||
त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव |
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव ||
ब्रह्मानंदं परम सुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं |
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्षयम् ||
एकं नित्यं विमलं अचलं सर्वधीसाक्षीभूतम् |
भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि ||

ऐसे महिमावान श्री सदगुरुदेव के पावन चरणकमलों का षोड़शोपचार से पूजन करने से साधक-शिष्य का हृदय शीघ्र शुद्ध और उन्नत बन जाता है | मानसपूजा इस प्रकार कर सकते हैं |

मन ही मन भावना करो कि हम गुरुदेव के श्री चरण धो रहे हैं … सर्वतीर्थों के जल से उनके पादारविन्द को स्नान करा रहे हैं | खूब आदर एवं कृतज्ञतापूर्वक उनके श्रीचरणों में दृष्टि रखकर … श्रीचरणों को प्यार करते हुए उनको नहला रहे हैं … उनके तेजोमय ललाट में शुद्ध चन्दन से तिलक कर रहे हैं … अक्षत चढ़ा रहे हैं … अपने हाथों से बनाई हुई गुलाब के सुन्दर फूलों की सुहावनी माला अर्पित करके अपने हाथ पवित्र कर रहे हैं … पाँच कर्मेन्द्रियों की, पाँच ज्ञानेन्द्रियों की एवं ग्यारवें मन की चेष्टाएँ गुरुदेव के श्री चरणों में अर्पित कर रहे हैं …

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैवा
बुध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् |
करोमि यद् यद् सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयामि ||

शरीर से, वाणी से, मन से, इन्द्रियों से, बुद्धि से अथवा प्रकृति के स्वभाव से जो जो करते करते हैं वह सब समर्पित करते हैं | हमारे जो कुछ कर्म हैं, हे गुरुदेव, वे सब आपके श्री चरणों में समर्पित हैं … हमारा कर्त्तापन का भाव, हमारा भोक्तापन का भाव आपके श्रीचरणों में समर्पित है |

इस प्रकार ब्रह्मवेत्ता सदगुरु की कृपा को, ज्ञान को, आत्मशान्ति को, हृयद में भरते हुए, उनके अमृत वचनों पर अडिग बनते हुए अन्तर्मुख हो जाओ … आनन्दमय बनते जाओ …

ॐ आनंद ! ॐ आनंद ! ॐ आनंद !

श्री सुरेशानन्दजी के सत्संग से:

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः
ॐ श्री परम गुरुभ्यो नमः
ॐ श्री परात्पर गुरुभ्यो नमः
ॐ श्री परमेष्टी गुरुभ्यो नमः

अन्यथा शरणं नास्ति, त्वमेव शरणं मम ।
तस्मात कारुण्य भावेन, रक्षस्व परमेश्वर ॥

ये जो मंत्र है, शास्त्रों में गुरु की स्तुति में कहे गए है :-

ॐ ज्ञान मूर्तये नमः
ॐ ज्ञान योगिने नमः
ॐ तीर्थ स्वरूपाय नमः
ॐ जितेन्द्रियाय नमः
ॐ उदारहृदयाय नमः
ॐ भारत गौरवाय नमः
ॐ पावकाय नमः
ॐ पावनाय नमः
ॐ परमेश्वराय नमः
ॐ महर्षये नमः

शास्त्रों मे ज्ञानदाता, भक्ति दाता गुरु की स्तुति मे बड़े सुन्दर मंत्र है,मंत्र इस प्रकार है :-

ॐ अविनाशिने नमः
ॐ सच्चिदानंदाय नमः
ॐ सत्यसंकल्पाय नमः
ॐ संयासिने नमः
ॐ श्रोत्रियाए नमःश्रोत्रियाए – माने जो सारे शास्त्रों का रहस्य जानते हैं,
ऐसे गुरु को हम प्रणाम करते हैं ।
ॐ समबुद्धये नमःवे सम बुद्धिवाले हैं, पक्षपात नहीं हैं जहाँ ।
ॐ सुमनसे नमः –उनका मन कैसा, बोले मन सुमन हैं, खिले हुए फूल की तरह; खिला हुआ फूल जैसे सब को सुगंध देता हैं, ऐसे वे सबको सुगंध , दिव्य जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं, इसलिये गुरु की यह मन्त्र बोलकर स्तुति की- ॐ सुमनसे नमः – उनके संपर्क में आते रहने से हमारा मन भी सुमन हो जाता हैं । फूल की तरह खिला हुआ रहता हैं; उदास, बेचैन, उद्विग्न, परेशान नहीं रहता ।
ॐ स्वयं ज्योतिषे नमःमाने साधक का भविष्य कैसे सुखद होगा, वो बता देते हैं ।
ॐ शान्तिप्रदाय नमःवो सबको शान्ति का दान करते हैं, मन की शान्ति ।
ॐ श्रुतिपारगाये नमःश्रुति माने वेद-उपनिषद ।
ॐ सर्वहितचिन्ताकाय नमःसबके हित का ख्याल करने वाले और सबके हित की बात करनेवाले गुरु को प्रणाम हैं ।
ॐ साधवे नमःजो सच्चे साधु हैं, सच्चे संत हैं वास्तव में, उन्हे हमारा प्रणाम हैं ।
ॐ सुहृदे नमःजो सबके सुहृद हैं, जैसे भगवान सबके सुहृद हैं, ऐसे सद्गुरु भी सबके सुहृद हैं ।
ॐ क्षमाशीलाय नमःजो क्षमाशील हैं, हमारे दोषों को माफ कर देते हैं, ऐसे गुरु को हमारा प्रणाम हैं ।
ॐ स्थितप्रज्ञयाय नमः
ॐ कृतात्माने नमः
ॐ अद्वितीयाये नमःअद्वितीय हैं, माने उनसे श्रेष्ट कोई नहीं हैं, ऐसे गुरु को हमारा प्रणाम हैं ।
ॐ करुणासागराये नमःजो करुणा के सागर हैं, ऐसे गुरु को हमारा प्रणाम हैं ।
ॐ उत्साहवर्धकाय नमः
ॐ उदारहृदयाय नमःजिनका हृदय उदार हैं, ऐसे गुरु को प्रणाम हैं ।
ॐ आनंदाय नमःआनंद और शांति का दान करनेवाले गुरु को प्रणाम हो ।
ॐ तापनाशनाय नमःआदिदैविक ताप, आदिभौतिक ताप, आध्यात्मिक ताप – इन तीन तापों को दूर करनेवाले गुरु को प्रणाम हैं ।{गुरु की वाणी वाणी-गुर, वाणी विच अमॄत सारा}
ॐ दृद निश्चयाय नमः ——दृद निश्चय होने की प्रेरणा देने वाले गुरु को प्रणाम हैं ।
ॐ जनप्रियाय नमःजो सबके प्रिय हैं, ऐसे गुरु को प्रणाम हैं ।
ॐ छिन्नसंषयाय नमः
ॐ जितेन्द्रियाय नमःजो जितेन्द्रिय हैं, जिनके सुमिरन से हम भी जितेन्द्रिय हो सकते हैं । इन्द्रियों को जीतनेवाले ऐसे गुरु को प्रणाम हैं ।
ॐ द्वन्द्वातीताय नमःजो द्वन्द्वों से परे हैं, ऐसे गुरु को प्रणाम हैं ।
ॐ धर्मसंस्थापकाय नमःधर्म का रहस्य बताने वाले और जन-जन के हृदय में धर्म की स्थापना करनेवाले गुरु को प्रणाम हैं ।
ॐ नारायणाय नमःगंगाजी कोई साधारण नदी नहीं हैं, हनुमानजी कोई साधारण वानर नहीं हैं, उसी प्रकार गुरु भी कोई साधारण नर नहीं हैं, वो साक्षात नारायण हैं ।
ॐ प्रसन्नात्मने नमःजो सदैव प्रसन्न रहते हैं और सबको प्रसन्नता बाँटते हैं, ऐसे गुरु को प्रणाम हैं ।
ॐ धैर्यप्रदाय नमःजिनके दर्शन से, अपने आप धैर्य और शान्ति आ जाती हैं ।
ॐ मधुरस्वाभावये नमःजिनका मधुर स्वभाव हैं, ऐसे गुरु को हमारा प्रणाम हैं ।
ॐ बंधमोक्षकाय नमःबंधनों से मुक्ति दिलानेवाले गुरु को प्रणाम हैं ।
ॐ मनोहराय नमःहमारे मन का हरण करने वाले गुरु को प्रणाम हैं । व्यक्ति के अन्तर मन में से संसार का आकर्षण हठ जाता हैं, गुरु के प्रति , ईश्वर के प्रति, ईश्वर के नाम के प्रति स्वभाविक ही रुचि होने लगति हैं ।