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सर्व फलदायक जन्माष्टमी व्रत-उपवास (जन्माष्टमी व्रत : २५ अगस्त)

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सर्व फलदायक जन्माष्टमी व्रत-उपवास (जन्माष्टमी व्रत : २५ अगस्त)

जन्माष्टमी व्रत अति पुण्यदायी है | ‘स्कंद पुराण’ में आता है कि ‘जो लोग जन्माष्टमी व्रत करते हैं या करवाते हैं, उनके समीप सदा लक्ष्मी स्थिर रहती है | व्रत करनेवाले के सारे कार्य सिद्ध होते हैं | जो इसकी महिमा जानकर भी जन्माष्टमी व्रत नहीं करते, वे मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होते हैं |’

बीमार, बालक, अति कमजोर तथा बूढ़े लोग अनुकूलता के अनुसार थोडा फल आदि ले सकते हैं |

प्रेमावतार का प्रागट्य – दिवस : जन्माष्टमी

kirshan1प्रेमावतार का प्रागट्य दिवस : जन्माष्टमी 

 चित् की विश्रांति से सामर्थ्य का प्राकट्य होता है. सामर्थ्य क्या है . बिना व्यक्ति , बिना वस्तु के भी सुखी रहना – ये बड़ा सामर्थ्य है. अपना ह्रदय वस्तुओं के बिना , व्यक्तियों के बिना  परम सुख का अनुभव करें – यह स्वतंत्र सुख सामर्थ्य बढ़ाने वाला है .

श्रीकृष्ण के जीवन में सामर्थ्य है, माधुर्य है, प्रेम है. जितना सामर्थ्य उतना ही अधिक माधुर्य, उतना ही अधिक शुद्ध प्रेम है श्रीकृष्ण के पास |

 पैसे से प्रेम करोगे तो लोभी बनायेगा, पद से प्रेम करोगे तो अहंकारी बनायेगा, परिवार से प्रेम करोगे तो मोही बनायेगा लेकिन प्राणिमात्र के प्रति समभाववाला प्रेम रहेगा, शुद्ध प्रेम रहेगा तो वह परमात्मा का दीदार करवा देगा.

प्रेम सब कर सकते है ,शांत सब रह सकते हैं और माधुर्य सब पा सकते है . जितना शांत रहने का अभ्यास होगा उतना ही माधुर्य विकसित होता है . जितना माधुर्य विकसित है उतना ही शुद्ध प्रेम विकसित होता है  और ऐसे प्रेमी भक्त  किसी चीज की कमी नहीं रहती | प्रेमी सबका हो जाता है , सब प्रेमी के हो जाते हैं .पशु भी प्रेम से वश में हो जाते हैं , मनुष्य भी प्रेम से वश हो जाते हैं और भगवान भी प्रेम से वश हो जाते हैं |

श्रीकृष्ण जेल में जन्मे हैं , वे आनंदकंद सचिदानंद जेल में प्रगटे है . आनंद जेल में प्रगट तो हो सकता है लेकिन आनंद का विस्तार जेल में नहीं हो सकता , जब तक यशोदा के घर नहीं जाता , आनंद प्रेममय नहीं हो पता | योगी समाधि करते हैं एकांत में , जेल जैसी जगह में आनंद प्रगट तो होता है लेकिन समाधि टूटी तो आनंद गया ,आनंद प्रेम से बढता है , माधुर्य से विकसित होता है |  

प्रेम किसीका अहित नहीं करता. जो स्तनों में जहर लगाकर आयी उस पूतना को भी श्री कृष्ण ने स्वधाम पहुँच दिया. पूतना कौन थी ? पूतना कोई साधरण नहीं थी. पूर्वकाल में राजा बलि की बेटी थी , राजकन्या थी | भगवान वामन आये तो उनका रूप सोंदर्य देखकर उस राजकन्या को हुआ कि : ‘ मेरी सगाई हो गयी है , मुझे ऐसा बेटा हो तो में गले लगाऊं और उसको दूध पिलाऊ.’ लेकिन जब नन्हा – मुन्ना वामन विराट हो गया और बलि राजा का सर्वस्व छीन लिया तो उसने सोचा कि : ‘ मैं इसको दूध पिलाऊ ? इसको तो जहर पिलाऊ, जहर.’

वही राजकन्या पूतना हुई , दूध भी पिलाया और जहर भी. उसे भी भगवान ने अपना स्वधाम दे दिया. प्रेमास्पद जो ठहरे ……!

 प्रेम कभी फरियाद नहीं करता , उलाहना देता है. गोपियाँ उलाहना देती है यशोदा को :

“ यशोदा ! हम तुम्हारा गाँव छोडकर जा रही हैं .”

“ क्यों “

“ तुम्हारा कन्हैया मटकी फोड़ देता है ”

“ एक के बदले दस-दस मटकियाँ ले लो ”

“ऊं हूँ …तुम्हरा ही लाला है क्या ! हमारा नहीं है क्या ?“ मटकी फोडी तो क्या हुआ ?”

” अभी तो फरयाद कर रही थी , गाँव छोड़ने की बात कर रही थी” 

” वह तो ऐसे ही कर दी . तुम्हारा लाला कहाँ है ? दिखा दो तो जरा |”

उलाहना देने के बहाने भी दीदार करने आयी हैं , गोपियाँ ! प्रेम में परेशानी नहीं , झंझट नहीं केवल त्याग होता है , सेवा होती है . प्रेम की दुनिया ही निराली है |

        प्रेम न खेतों ऊपजे , प्रेम न हाट बिकाए .
       
राजा चहों प्रजा चहों शीश दिये ले जाय ..

प्रेम खेत में पैदा नहीं होता , बाजार में भी नहीं मिलता . जो प्रेम चाहे वह अपना शीश , अपना अभिमान दे दे ईश्वर के चरणों में , गुरु चरणों में ….

 एक बार यशोदा मैया मटकी फोड़नेवाले लाला के पीछे पड़ी कि : “ कभी प्रभावती, कभी कोई, कभी कोई… रोज – रोज तेरी फरियाद सुनकर में तो थक गयी तू खडा रह ”,  यशोदा ने उठाई लकड़ी. यशोदा के हाथ में लकड़ी देख कर श्रीकृष्ण भागे. श्रीकृष्ण आगे, यशोदा पीछे… श्रीकृष्ण ऐसी चाल से चलते कि माँ को तकलीफ भी न हो और माँ वापस भी न जाये ! थोड़ा दोड़ते, थोडा रुकते. ऐसा करते – करते देखा कि : ‘ अब माँ थक गयी है और माँ हार जाये तो उसको आनंद नहीं आयेगा.’ प्रेमदाता श्रीकृष्ण ने अपने को पकडवा दिया. पकडवा लिया तो माँ रस्सी लायी बांधने के लिए | रस्सी है माया, मायातीत श्रीकृष्ण को कैसे बाँधे ? हर बार रस्सी छोटी पड़ जाये. थोड़ी देर बाद देखा कि : ‘माँ कहीं निराश न हो जाये तो प्रेम के वशीभूत मायातीत भी बंध गये.’ माँ बांधकर चली गयी और इधर ओखली को घसीटते – घसीटते ये तो पहुँचे यमलार्जुन ( नल – कूबर ) का उदार करने … नल – कूबर को शाप से मुक्ति दिलाने … धडाकधूम वृक्ष गिरे , नल – कूबर प्रणाम करके चले गये… अपने को बंधवाया भी तो किसी पर करुणा करने हेतु बाकी, उस मायातीत को कौन बाँधे ?

 एक बार किसी गोपी ने कहा : “ देख, तू ऐसा मत कर. माँ ने ओखली से बांधा तो रस्सी छोटी पड़ गयी लेकिन मेरी रस्सी देख. चार – चार गायें बंध सके इतनी बड़ी रस्सी है. तुझे तो ऐसा बांधूगी कि तू भी क्या याद रखेगा, हाँ.”

कृष्ण : “ अच्छा बांध.”

वह गोपी ‘कोमल – कोमल हाथों में रस्सी बांधना है, यह सोचकर धीरे – धीरे बांधने लगी.

कृष्ण : “तुझे रस्सी बांधना आता ही नहीं है.”

गोपी : “मेरे बाप ! केसे रस्सी बांधी जाती है.”

कृष्ण : “ ला ,मैं तुझे बताता हूँ .” ऐसा करके गोपी के दोनों हाथ पीछे करके रस्सी से बांधकर फिर खंबे से बांध दिया और दूर जाकर बोले :

“ ले ले , बांधने वाली खुद बंध गयी… तू मुझे बांधने आयी थी लेकिन तू ही बंध गयी. ऐसे ही माया जीव को बांधने आये उसकी जगह जीव ही माया को बांध दे में यही सिखाने आया हूँ .

केसा रहा होगा वह नटखटइया ! केसा रहा होगा उसका दिव्य प्रेम ! अपनी एक – एक लीला से जीव की उन्नति का संदेश देता है वह प्रेमस्वरूप परमात्मा !

आनंद प्रगट तो हो जाता है जेल में लेकिन बढ़ता है यशोदा के यँहा, प्रेम से.

यशोदा विश्रांति करती है तो शक्ति आती है ऐसे ही चित् की विश्रांति सामर्थ्य को जन्म देती है लेकिन शक्ति जब कंस के यँहा जाती है तो हाथ में से छटक जाती हे, ऐसे ही सामर्थ्य अहंकारी के पास आता है तो छटक जाता है. जेसे , शक्ति अहंकार रहित के पास टिकती है ऐसे ही प्रेम भी निरभिमानी के पास ही टिकता है.

प्रेम में कोई चाह नहीं होती. एक बार देवतों के राजा इन्द्र प्रसन्न हो गये एवं श्रीकृष्ण से बोले : “ कुछ मांग लो. “

श्रीकृष्ण : “ अगर आप कुछ देना ही चाहते है तो यही दीजिये कि अर्जुन के प्रति मेरा प्रेम बढ़ता रहे.”

अर्जुन अहोभाव से भर गया कि : ‘मेरे लिए मेरे स्वामी ने क्या माँगा ?’

प्रेम में अपनत्व होता है , निःस्वार्थता होती है, विश्वास होता है, विनम्रता होती है और त्याग होता है. सच पूछो तो प्रेम ही परमात्मा है और ऐसे परम प्रेमास्पद श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव ही है – जन्माष्टमी.

आप सबके जीवन में भी उस परम प्रेमास्पद के लिए दिव्य प्रेम निरंतर बढ़ता रहे. आप उसी में खोये रहें उसी के होते रहें ऊं माधुर्य…. ऊं शांति… मधुमय मधुर्यदाता , प्रेमावतार , नित्य नवीन रस , नवीन सूझबूझ देनेवाले. गीता जो प्रेमावतार का ह्रदय है – गीता मं ह्रदय पार्थ. “ गीता मेरा ह्रदय है.”

प्रेमाव्तार श्रीकृष्ण के ह्रदय को समझने के लिए गीता ही तो है आप – हम प्रतिदिन गीता ज्ञान में परमेश्वरीय प्रेम में खोते जायं , उसमय होते जायं… खोते जायं…होते जायं.

श्री कृष्ण चालीसा

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श्री कृष्ण चालीसा

॥दोहा॥
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बा फल, नयन कमल अभिराम॥
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पिताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥
॥चौपाई॥
जय यदुनन्दन जय जगवन्दन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नट-नागर नाग नथैया। कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरी तेरी। होवे पूर्ण मनोरथ मेरो॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
रंजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजयंती माला॥
कुण्डल श्रवण पीतपट आछे। कटि किंकणी काछन काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छवि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
मस्तक तिलक, अलक घुंघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पय पान, पुतनहि तारयो। अका बका कागासुर मारयो॥
मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला। भै शीतल, लखितहिं नन्दलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई। मसूर धार वारि वर्षाई॥
लगत-लगत ब्रज चहन बहायो। गोवर्धन नखधारि बचायो॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख महं चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो। कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरणचिन्ह दै निर्भय किन्हें॥
करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
केतिक महा असुर संहारयो। कंसहि केस पकड़ि दै मारयो॥
मात-पिता की बन्दि छुड़ाई। उग्रसेन कहं राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥
दै भिन्हीं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहं मारा॥
असुर बकासुर आदिक मारयो। भक्तन के तब कष्ट निवारियो॥
दीन सुदामा के दुःख टारयो। तंदुल तीन मूंठ मुख डारयो॥
प्रेम के साग विदुर घर मांगे। दुर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखि प्रेम की महिमा भारी। ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत के पारथ रथ हांके। लिए चक्र कर नहिं बल ताके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाये। भक्तन ह्रदय सुधा वर्षाये॥
मीरा थी ऐसी मतवाली। विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा सांप पिटारी। शालिग्राम बने बनवारी॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो। उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत निन्दा करी तत्काला। जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई। दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरतहिं वसन बने ननन्दलाला। बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
अस नाथ के नाथ कन्हैया। डूबत भंवर बचावत नैया॥
सुन्दरदास आस उर धारी। दयादृष्टि कीजै बनवारी॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो। क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै। बोलो कृष्ण कन्हैया की जै॥
॥दोहा॥
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

श्री कृष्ण के १०८ नाम और मंत्र

sri-krishna1अ.नं.    संस्कृत नाम                                            मंत्र
१       कृष्ण                                                 ॐ कृष्णाय नमः।
२       कमलनाथ                                           ॐ कमलनाथाय नमः।
३       वासुदेव                                               ॐ वासुदेवाय नमः।
४       सनातन                                              ॐ सनातनाय नमः।
५       वसुदेवात्मज                                        ॐ वसुदेवात्मजाय नमः।
६       पुण्य                                                  ॐ पुण्याय नमः।
७       लीलामानुष विग्रह                                 ॐ लीलामानुष विग्रहाय नमः।
८       श्रीवत्स कौस्तुभधराय                            ॐ श्रीवत्सकौस्तुभधराय नमः।
९       यशोदावत्सल                                       ॐ यशोदावत्सलाय नमः।
१०      हरि                                                   ॐ हरिये नमः।
११      चतुर्भुजात्त चक्रासिगदा                         ॐ चतुर्भुजात्तचक्रासिगदा नमः।
१२      सङ्खाम्बुजा युदायुजाय                         ॐ सङ्खाम्बुजायुदायुजाय नमः।
१३      देवाकीनन्दन                                       ॐ देवाकीनन्दनाय नमः।
१४      श्रीशाय                                               ॐ श्रीशाय नमः।
१५      नन्दगोप प्रियात्मज                               ॐ नन्दगोपप्रियात्मजाय नमः।
१६      यमुनावेगा संहार                                   ॐ यमुनावेगासंहारिणे नमः।
१७      बलभद्र प्रियनुज                                    ॐ बलभद्रप्रियनुजाय नमः।
१८      पूतना जीवित हर                                  ॐ पूतनाजीवितहराय नमः।
१९      शकटासुर भञ्जन                                 ॐ शकटासुरभञ्जनाय नमः।
२०      नन्दव्रज जनानन्दिन                             ॐ नन्दव्रजजनानन्दिने नमः।
२१      सच्चिदानन्दविग्रह                                ॐ सच्चिदानन्दविग्रहाय नमः।
२२      नवनीत विलिप्ताङ्ग                              ॐ नवनीतविलिप्ताङ्गाय नमः।
२३      नवनीतनटन                                        ॐ नवनीतनटनाय नमः।
२४      मुचुकुन्द प्रसादक                                  ॐ मुचुकुन्दप्रसादकाय नमः।
२५      षोडशस्त्री सहस्रेश                                 ॐ षोडशस्त्रीसहस्रेशाय नमः।
२६      त्रिभङ्गी                                             ॐ त्रिभङ्गिने नमः।
२७      मधुराकृत                                           ॐ मधुराकृतये नमः।
२८      शुकवागमृताब्दीन्दवे                             ॐ शुकवागमृताब्दीन्दवे नमः।
२९      गोविन्द                                              ॐ गोविन्दाय नमः।
३०      योगीपति                                            ॐ योगिनांपतये नमः।
३१      वत्सवाटि चराय                                   ॐ वत्सवाटिचराय नमः।
३२      अनन्त                                               ॐ अनन्ताय नमः।
३३      धेनुकासुरभञ्जनाय                              ॐ धेनुकासुरभञ्जनाय नमः।
३४      तृणी-कृत-तृणावर्ताय                             ॐ तृणीकृत तृणावर्ताय नमः।
३५      यमलार्जुन भञ्जन                                ॐ यमलार्जुनभञ्जनाय नमः।
३६      उत्तलोत्तालभेत्रे                                   ॐ उत्तलोत्तालभेत्रे नमः।
३७      तमाल श्यामल कृता                              ॐ तमालश्यामलाकृतिये नमः।
३८      गोप गोपीश्वर                                     ॐ गोपगोपीश्वराय नमः।
३९      योगी                                                 ॐ योगिने नमः।
४०      कोटिसूर्य समप्रभा                                 ॐ कोटिसूर्यसमप्रभाय नमः।
४१      इलापति                                             ॐ इलापतये नमः।
४२      परंज्योतिष                                          ॐ परंज्योतिषे नमः।
४३      यादवेंद्र                                               ॐ यादवेंद्राय नमः।
४४      यदूद्वहाय                                          ॐ यदूद्वहाय नमः।
४५      वनमालिने                                          ॐ वनमालिने नमः।
४६      पीतवससे                                            ॐ पीतवसने नमः।
४७      पारिजातापहारकाय                              ॐ पारिजातापहारकाय नमः।
४८      गोवर्थनाचलोद्धर्त्रे                                  ॐ गोवर्थनाचलोद्धर्त्रे नमः।
४९      गोपाल                                               ॐ गोपालाय नमः।
५०      सर्वपालकाय                                       ॐ सर्वपालकाय नमः।
५१      अजाय                                              ॐ अजाय नमः।
५२      निरञ्जन                                           ॐ निरञ्जनाय नमः।
५३      कामजनक                                         ॐ कामजनकाय नमः।
५४      कञ्जलोचनाय                                    ॐ कञ्जलोचनाय नमः।
५५      मधुघ्ने                                              ॐ मधुघ्ने नमः।
५६      मथुरानाथ                                         ॐ मथुरानाथाय नमः।
५७      द्वारकानायक                                    ॐ द्वारकानायकाय नमः।
५८      बलि                                                 ॐ बलिने नमः।
५९      बृन्दावनान्त सञ्चारिणे                        ॐ बृन्दावनान्त सञ्चारिणे नमः।
६०      तुलसीदाम भूषनाय                              ॐ तुलसीदाम भूषनाय नमः।
६१      स्यमन्तकमणेर्हर्त्रे                                ॐ स्यमन्तकमणेर्हर्त्रे नमः।
६२      नरनारयणात्मकाय                              ॐ नरनारयणात्मकाय नमः।
६३      कुब्जा कृष्णाम्बरधराय                        ॐ कुज्ज कृष्णाम्बरधराय नमः।
६४      मायिने                                             ॐ मायिने नमः।
६५      परमपुरुष                                          ॐ परमपुरुषाय नमः।
६६      मुष्टिकासुर चाणूर मल्लयुद्धविशारदाय    ॐ मुष्टिकासुर चाणूर मल्लयुद्धविशारदाय नमः।
६७      संसारवैरी                                          ॐ संसारवैरिणॆ नमः।
६८      कंसारिर                                            ॐ कंसारयॆ नमः।
६९      मुरारी                                               ॐ मुरारयॆ नमः।
७०      नाराकान्तक                                      ॐ नाराकान्तकाय नमः।
७१      अनादि ब्रह्मचारिक                             ॐ अनादि ब्रह्मचारिणॆ नमः।
७२      कृष्णाव्यसन कर्शक                             ॐ कृष्णाव्यसन कर्शकाय नमः।
७३      शिशुपालशिरश्छेत्त                              ॐ शिशुपालशिरश्छेत्रे नमः।
७४      दुर्यॊधनकुलान्तकृत                              ॐ दुर्यॊधनकुलान्तकाय नमः।
७५      विदुराक्रूर वरद                                    ॐ विदुराक्रूर वरदाय नमः।
७६      विश्वरूपप्रदर्शक                                   ॐ विश्वरूपप्रदर्शकाय नमः।
७७      सत्यवाचॆ                                           ॐ सत्यवाचॆ नमः।
७८      सत्य सङ्कल्प                                    ॐ सत्य सङ्कल्पाय नमः।
७९      सत्यभामारता                                    ॐ सत्यभामारताय नमः।
८०      जयी                                                 ॐ जयिनॆ नमः।
८१      सुभद्रा पूर्वज                                       ॐ सुभद्रा पूर्वजाय नमः।
८२      विष्णु                                               ॐ विष्णवॆ नमः।
८३      भीष्ममुक्ति प्रदायक                            ॐ भीष्ममुक्ति प्रदायकाय नमः।
८४      जगद्गुरू                                          ॐ जगद्गुरवॆ नमः।
८५      जगन्नाथ                                         ॐ जगन्नाथाय नमः।
८६      वॆणुनाद विशारद                                 ॐ वॆणुनाद विशारदाय नमः।
८७      वृषभासुर विध्वंसि                               ॐ वृषभासुर विध्वंसिने नमः।
८८      बाणासुर करान्तकृत                            ॐ बाणासुर करान्तकाय नमः।
८९      युधिष्ठिर प्रतिष्ठात्रे                             ॐ युधिष्ठिर प्रतिष्ठात्रे नमः।
९०      बर्हिबर्हावतंसक                                   ॐ बर्हिबर्हावतंसकाय नमः।
९१      पार्थसारथी                                        ॐ पार्थसारथये नमः।
९२     अव्यक्त                                            ॐ अव्यक्ताय नमः।
९३     गीतामृत महोदधी                                ॐ गीतामृत महोदधये नमः।
९४     कालीयफणिमाणिक्य रञ्जितश्रीपदाम्बुज  ॐ कालीय फणिमाणिक्य रञ्जित श्रीपदाम्बुजाय  नमः।
९५     दामॊदर                                             ॐ दामॊदराय नमः।
९६     यज्ञभोक्त                                          ॐ यज्ञभोक्त्रे नमः।
९७     दानवॆन्द्र विनाशक                                ॐ दानवॆन्द्र विनाशकाय नमः।
९८     नारायण                                            ॐ नारायणाय नमः।
९९     परब्रह्म                                             ॐ परब्रह्मणॆ नमः।
१००   पन्नगाशन वाहन                                 ॐ पन्नगाशन वाहनाय नमः।
१०१   जलक्रीडा समासक्त गॊपीवस्त्रापहाराक    ॐ जलक्रीडा समासक्त गॊपीवस्त्रापहाराकाय नमः।
१०२   पुण्य श्लॊक                                        ॐ पुण्य श्लॊकाय नमः।
१०३   तीर्थकरा                                            ॐ तीर्धकृते नमः।
१०४   वॆदवॆद्या                                            ॐ वॆदवॆद्याय नमः।
१०५   दयानिधि                                           ॐ दयानिधयॆ नमः।
१०६   सर्वभूतात्मका                                     ॐ सर्वभूतात्मकाय नमः।
१०७   सर्वग्रहरुपी                                         ॐ सर्वग्रह रुपिणॆ नमः।
१०८   परात्पराय                                          ॐ परात्पराय नमः।

श्रीकृष्ण से सृष्टि का आरंभ

kjanmaभगवान ने देखा कि संपूर्ण विश्व शून्यमय है। कहीं कोई जीव-जन्तु नहीं है। जल का भी कहीं पता नहीं है। संपूर्णआकाश वायु से रहित और अंधकार से आवृत्त हो घोर प्रतीत हो रहा है। वृक्ष, पर्वत और समुद्र आदि शून्य होने के कारण विकृताकार जान पड़ता है। मूर्ति, धातु, शस्य तथा तृण का सर्वथा अभाव हो गया है। इस प्रकार जगत्‌ को शून्य अवस्था में देख अपने हृदय में सभी बातों की आलोचना करके दूसरे किसी सहायक से रहित एकमात्र स्वेच्छामय प्रभु ने स्वेच्छा से ही इस सृष्टि की रचना प्रारंभ की।

kanha-krishna-websiteसर्वप्रथम उन परम पुरुष श्रीकृष्ण के दक्षिण पार्श्व से जगत के कारण रूप तीन मूर्तिमान गुण प्रकट हुए। उन गुणों से महत्तत्त्व अहंकार पांच तन्मात्राएं रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द ये पांच विषय क्रमशः प्रकट हुए। इसके उपरान्त ही श्रीकृष्ण से साक्षात भगवान नारायण का प्रादुर्भाव हुआ। जिनकी अंगकान्ति श्याम थी, वे नित्य तरुण पीताम्बरधारी और विभिन्न वनमालाओं से विभूषित थे। उनकी चार भुजाएं थीं, उन भुजाओं में क्रमशः शंख, चक्र, गदा और पद्म विराजमान थे। उनके मुखारबिन्द पर मंद-मंद मुस्कान की छटा छा रही थी। वे रत्नमय आभूषणों से विभूषित थे। शांर्गधनुष धारण किए हुए थे।

कौस्तुभ मणि उनके वक्षस्थल की शोभा बढ़ा रही थी। श्रीवत्सभूषित वक्ष में साक्षात लक्ष्मी का निवास था। वे श्रीनिधि अपूर्व शोभा को प्रस्तुत कर रहे थे। शरत्‌काल की पूर्णिमा के चंद्रमा की प्रभा से सेवित मुखचन्द्र के कारण वे मनोहर जान पड़ते थे। कामदेव की कान्ति से युक्त रूप-लावण्य उनके सौंदर्य को और भी बढ़ा रहा था। नारायण श्रीकृष्ण के समक्ष खड़े होकर दोनों हाथों को जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे। गीताजी में भी भगवान ने अर्जुन को बताया की ” मयाध्यक्षेण प्रकृतिम सूयते स चराचरम | “, अर्थात मेरी अध्यक्षता में प्रकृति समस्त चराचर जगत अर्थात सृष्टि की रचना करती है | कृष्ण ने ही अर्जुन को भगवद्गीता का सन्देश सुनाया था । उनकी कथा कृष्णावतार में मिलती है।

श्रीकृष्ण-अवतार का उद्देश्य

krishajanmashtmiश्रीकृष्ण-अवतार का उद्देश्य

मनुष्य को दुःख तीन बातों से होता है – एक कंस से दुःख होता है, दूसरा काल से और तीसरा अज्ञान से दुःख होता है। मथुरा के लोग कंस से दुःखी थे, यह संसार ही मथुरा है। कंस के दो रूप हैं – एक तो खपे-खपे (और चाहिए, और चाहिए…) में खप जाय और दूसरे का चाहे कुछ भी हो जाय, उधर ध्यान न दे। यह कंस का स्थूल रूप है। दूसरा है कंस का सूक्ष्म रूप – ईश्वर की चीजों में अपनी मालिकी करके अपने अहं की विशेषता मानना कि ‘मैं धनवान हूँ, मैं सत्तावान हूँ…।’ यह अंदर में भाव होता है।

दुसरा है काल का दुःख। यह कलियुग का काल है; इस काल में अमुक-अमुक समय में, अमुक-अमुक वस्तु से, अमुक-अमुक स्थान में व्यक्ति दुःख पाता है। दूषित काल है, प्रदोषकाल है तो उस काल में व्यक्ति पीड़ा पाता है, दुःख पाता है। यह काल का दुःख है कि अभी तो कर लिया लेकिन समय पाकर दुःख होगा। अभी तो निंदा कर ली, सुन ली लेकिन समय पाकर अशांति होगी, दुःख होगा, नरकों में पड़ेंगे, आपस में लड़ेंगे, उपद्रव होगा।

तीसरा होता है अज्ञानजन्य दुःख। अज्ञान क्या है? हम जो हैं उसको हम नहीं जानते और हम जो नहीं हैं उसको हम मैं मानते हैं तो

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।

‘अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है उसीसे सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं।’ (गीता – 5.15)
krishnaकितने बचपन आये, कितनी बार मृत्यु आयी, कितने जन्म आये और गये फिर भी हम हैं… तो हम नित्य हैं, चैतन्य हैं, शाश्वत हैं, अमर हैं। इस बात को न जानना यह अज्ञान है।
तो कंस से, काल से और अज्ञान से छुटकारा – यह है श्रीकृष्ण-अवतार का उद्देश्य। श्रीकृष्ण कंस को तो मारते हैं, काल से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और ज्ञान से अज्ञान हर के भक्तों को ब्रह्मज्ञान देते हैं। यह श्रीकृष्ण-अवतार है।

तो अब क्या करना है? अपना उद्देश्य बना लें कि हमारे अंतःकरण में श्रीकृष्ण-अवतार हो, भगवदावतार हो, भगवद्ज्ञान का प्रकाश हो, भगवत्सुख का प्रकाश हो तो भगवदाकार वृत्ति पैदा होगी। जैसे घटाकार वृत्ति से घट दिखता है, ऐसे ही भगवदाकार वृत्ति बनेगी, ब्रह्माकार वृत्ति बनेगी तब ब्रह्म-परमात्मा का साक्षात्कार होगा। तो भगवद्ज्ञान, भगवत्प्रेम और भगवद्विश्रांति सारे दुःखों को सदा के लिए उखाड़ के रख देगी। इसलिए ब्रह्मज्ञान का सत्संग सुनना चाहिए, उसका निदिध्यासन करके विश्रांति पानी चाहिए।