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ऋषि पंचमी रायपुर आश्रम

ऋषि पंचमी  रायपुर आश्रम 

संत श्री आशारामजी बापू आश्रम रायपुर  में  6 अगस्त को  महिला उत्थान मण्डल की बहनों ने ऋषि पंचमी पर  पूजन कार्यक्रम किया |DSCN9983

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ऋषिपंचमी – ६ सितम्बर

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ऋषि पंचमी का महत्त्व हिन्दू धर्म में बहुत अधिक माना जाता है | दोषों से मुक्त होने के लिए इस व्रत का पालन किया जाता है | यह एक त्यौहार नहीं अपितु एक व्रत हैं जिसमें सप्त ऋषि की पूजा की जाती है | हिन्दू धर्म में माहवारी के समय बहुत से नियम कायदों को माना जाता है  | गलती वश इस समय में कोई भूल हो जाती है तो महिलाओं को दोष मुक्त करने के लिए इस व्रत का पालन किया जाता है |

यह व्रत भाद्रपद की शुक्ल पंचमी को किया जाता है | सामान्यत: यह व्रत अगस्त अथवा सितम्बर माह में आता है | यह व्रत एवं पूजा हरतालिका व्रत के दो दिन छोड़ कर एवं गणेश चतुर्थी के अगले दिन की जाती है |

इस वर्ष ६ सितम्बर २०१६ को सुबह ११.०४ से दोपहर  ०१.३३ तक ऋषि पंचमी का महूर्त है  |

ऋषि पंचमी का महत्त्व

हिन्दू धर्म में पवित्रता का बहुत अधिक महत्त्व होता है | महिलाओ के मासिक के समय  वे सबसे अधिक अपवित्र मानी जाती है | ऐसी उन्हें कई नियमों का पालन करने कहा जाता है लेकिन इसके बावजूद उनसे जाने अनजाने में चुक हो जाती है जिस कारण महिलाए सप्त ऋषि की पूजा कर अपने दोषों का निवारण करती है |

ऋषि पंचमी की कथा

एक समय राजा सिताश्व धर्म का अर्थ जानने की इच्छा से ब्रह्माजी के पास गए और उनके चरणों में शीश नवाकर बोले – हे आदिदेव ! आप समस्त धर्मों के प्रवर्तक और गूढ़ धर्मों के जाननेवाले हैं |

आपके श्रीमुख से धर्म चर्चा श्रवण कर मन को आत्मिक शान्ति मिलती है | भगवान के चरण कमलों में प्रीति बढ़ती है | वैसे तो अपने मुझे नाना प्रकार के व्रतों के बारें में उपदेश दिए है | अब मैं आपके मुखारविंद से उस श्रेष्ठ व्रत को सुनने की अभिलाषा रखता हूँ, जिसके करने से प्राणियों के समस्त पापों का नाश हो जाता है |

विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था | उसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी, जिसका नाम सुशीला था | उस ब्राह्मण के एक पुत्र तथा एक पुत्री दो सन्तान थी | विवाह योग्य होने पर उसने समान कुलशील वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया | देवयोग से कुछ दिनों बाद वह विधवा हो गई  | दु:खी ब्राह्मण दम्पति कन्या सहित गंगा तटपर कुटियाँ बनाकर रहने लगे |

एक दिन ब्राह्मण  कन्या सो रही थी कि उसका शरीर कीड़ों से भर गया | कन्या ने सारी बात माँ से कही | माँ ने पति से सब कहते हुए पूछा – प्राणनाथ ! मेरी साध्वी कन्या की यह गति होने का क्या कारण है ?

उत्तंक ने समाधि द्वारा इस घटना का पता लगाकर बताया – पूर्व जन्म में भी यह कन्या ब्राह्मणी थी | इसने रजस्वाला होते ही बर्तन छू दिए थे | इस जन्म में भी इसने लोगों की देखा-देखी ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया | इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़े है |

धर्म-शास्त्रों की मान्यता है कि रजस्वाला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है | वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है | यदि यह शुद्ध मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुःख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी |

पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषिपंचमी का व्रत एवं पूजन किया | व्रत के प्रभाव से वह सारे दु:खों से मुक्त हो गई | अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित अक्षय सुखों का भोग मिला |

ऋषि पंचमी सभी वर्ग की स्त्रियाँ को करना चाहिये | इस दिन स्नानादि कर अपने घर में स्वच्छ स्थान पर हल्दी, कुंकुम, रोली आदि से चौकोर मंडल बनाकर उस पर सप्तऋषियों की स्थापना करें |

गंध, पुष्प, धूप , दीप, नैवेद्यादि से पूजन कर इस मंत्र से  –

‘कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोथ गौतम: |

जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृता: ||

दहन्तु पापं सर्व गृहन्त्वर्ध्य नमो नम: ||

अर्घ्य दें | इसके पश्चात बिना बोया पृथ्वी में पैदा हुए शाकादिका आहार करके ब्रह्मचर्य का पालन करके व्रत करें |

इसप्रकार सात वर्ष करके आठवे वर्ष में सप्तर्षिकी पीतवर्ण सात मूर्ति युम्मक ब्राह्मण-भोजन कराके उनका विसर्जन करें |