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रायपुर में माला पूजन व अनुष्ठान

2 जून वट पूर्णिमा पर रायपुर आश्रम (छ.ग.) में सामूहिक माला पूजन के  साथ  अनुष्ठान का प्रारंभ किया गया   |अपनी सुशुप्त शक्तियों को जगाने के लिए साधको के लिए प्रत्येक वर्ष की भाती इस वर्ष भी बड़ो के लिए गुरु मंत्र व विद्यार्थियों के लिए  सरसत्य मंत्र सामूहिक अनुष्ठान का प्रारंभ कबीर जयंती देवस्नान  पूर्णिमा को प्रारंभ किया गया |DSCN6457 DSCN6479DSCN6469 DSCN6432

कबीरजी की मंत्रदीक्षा

kabirji3कबीरजी की मंत्रदीक्षा 

कबीरजी रामानंद स्वामी के शिष्य होना चाहते थे | उन दिनों में काशी में रामानंद स्वामी अपने राम को सर्वत्र देखनेवाले महापुरुष के रूप में विख्यात थे |

सियाराम माय सब जग जानी |
करहुं प्रणाम जोरि जुग पानि ||

ऐसा ज्ञान उन महापुरुष का था | ऐसे महापुरुष का शिष्य होना बड़े सौभाग्य की बात है | जिसे आत्मा-परमात्मा के एकत्व का ज्ञान है ऐसे सदगुरु की प्राप्ति सहज संभव नहीं है | कबीरजी ऐसे महापुरुष का शिष्य होने का सौभाग्य प्राप्त करना चाहते थे | परंतु उन दिनों जात-पात छूआ -छूत का प्रभाव अधिक था | कबीरजी ने सोचा कि नीरू जुलाहा के यहाँ पला होने के कारण मैं आसानी से तो रामानंदजी के श्रीचरणों तक नहीं पहुँच सकता हूँ | पर दीक्षा तो मुझे इन्ही महापुरुष से लेनी है |

कबीरजी ने युक्ति सोची | जिस घाट पर रामानंद स्वामी प्रात: स्नान के लिए जाते थे, उस घाट पर कबीरजी ने एक रात को घास – फूस की दीवार खड़ी कर दी और आने-जाने के लिए थोडा दरवाजे जैसा स्थान छोड़ दिया | रात में उसी स्थान से सटकर घाट की सीढ़ी पर कबीरजी लेट गये | ब्रम्हमुहूर्त के समय रामानंद स्वामी लकड़े की खडाऊ पहने घाट की सीढियाँ उतरते हुए स्नान के लिए आने लगे | ज्यों ही उन्होंने दरवाजा पार किया, सीढ़ी पर लेटे हुए कबीरजी की छाती पर चरण जा पड़ा और रामानंदजी चौंक कर …, ‘राम ….राम ‘ बोल उठे |

कबीरजी को तो चरण-स्पर्श भी हो गया और राम-नाम की दीक्षा भी मिल गई | कबीरजी जुट गये राम-राम जपने में | मंत्र-जाप से उनकी सुषुप्त शक्तियाँ जागृत हुई और कबीरजी की वाणी माधुर्ययुक्त प्रभावशाली होकर ज्ञान से प्रकाशित हो गई | होनी भी थी क्योंकि सिद्ध पुरुष द्वारा प्रदत्त मंत्र का जप कबीरजी ने लोभ व विकार छोडकर किया था |

कबीरजी की वाणी सुनकर कई लोग आकर्षित हुये | एक दिन काशी के पंडितों ने उन्हें घेर ही लिया की : “तू निगुरा है | उपदेश करने लायक नहीं है, फिर सत्संग क्यों करता है ? हमारे पास कोई नहीं आता और तेरे पास भीड़ बनी रहती है | हमने चार-चार वेद रटे, ४८ वर्ष हो गये रटते -रटते, कौन-सा मंत्र, मंडल, ब्राम्हण व ऋषि का उल्लेख किस पेज पर है तथा कौन-सी ऋचा कहाँ की है यह सब हम बता सकते है, लेकिन हमारे पास कोई श्रोता बैठता ही नहीं है | हमारी तो यह हालत हो रही है की ग्यारह आदमी बोलनेवाले और बारह श्रोता होते है | तू सफ़द कपड़ोवाला, ताना-बुनी करनेवाला, बेटा-बेटीवाला गृहस्थ आदमी और तेरे पास इतने लोग सत्संग सुनने आते है | तू निगुरा आदमी ! कथा बंद कर ताकि हमारी ग्राहकी चले |”

कबीरजी कहते है : “मैं निगुरा नहीं, सगुरा हूँ | मेरे गुरुदेव है | गुरुदेव की कृपा बिना ज्ञान भला कैसे मिल सकता है ?”

पंडितों ने पूछा : “कौन है तेरे गुरु ?”

“प्रात: स्मरणीय पूज्यपाद रामानंद भगवान मेरे गुरुदेव है |”

“झूठ बोलते हो ! रामानंद स्वामी तो वैष्णव संप्रदाय के संत है और तेरा तो पता भी नहीं कि तू हिन्दू की औलाद है कि मुसलमान की | तू जुलाहे को कहीं से मिला था | फिर रामानंद स्वामी तुझे कैसे दीक्षा दे सकते है ?”

कबीर :”कैसे भी हो, मैं तो उनसे दीक्षा प्राप्त कर चूका हूँ और वे ही मेरे गुरुदेव है |”

पंडित लोग ‘ऐसा नहीं हो सकता’ कहकर रामानंद स्वामी के पास पहुँचे और कहने लगे : ‘गुरु महाराज ! आपने तो धर्म का नाश कर दिया | एक यवन को, कबीर जैसे फालतू आदमी को मंत्रदीक्षा दे आये !’

रामानन्दजी को तो पता भी नहीं था | वह तो अकस्मात घटना घट गई थी | रामानन्दजी बोले : “भाई ! कौन कबीर और कैसी दीक्षा ? मैंने तो उसे दीक्षा नहीं दी ?”
अब तो पुरे काशी नगर में ढिंढोरा पिट गया कि गुरु सच्चा कि चेला सच्चा ?

रामानन्दजी ने कहा : “बुलाओ कबीर को | मेरे सामने लाओ |”

तिथि तय हुई | न्यायालय में जैसी व्यवस्था होती है, उसी प्रकार एक कटघरा रखा गया, एक ऊँचा सिंहासन बनाया गया | काशी के मर्धुन्य विद्वान पंडित तथा तमाशाबीन लोग वहाँ एकत्रित हुए | न जाने कितनी आँखे यह देखने को उत्सुक थी कि गुरु सच्चा है या चेला |

कबीरजी को कठघरे में खड़ा कर दिया गया | मर्धुन्य पंडितों ने कहा : “यह जलील आदमी, जो मुसलमान है कि कौन है यह भी पता नहीं | इसका कहना है कि मेरे गुरु रामानंद स्वामी है और रामानन्दजी कहते है कि मैंने इसे दीक्षा दी ही नहीं है | अब गुरु शिष्य आपस में ही अपने सत्य की व्याख्या करें |”

कबीरजी से पूछा गया : “तुम्हारे गुरु कौन है ?”

कबीरजी ने कहा : “सामने जो सिंहासन पर विराजमान हैं, प्रात:स्मरणीय पूज्यपाद रामानंद भगवान, ये ही मेरे गुरुदेव हैं |

रामानंदजी पूछते हैं : “क्यों रे ! मैंने तुझे दीक्षा दी है ?”
कबीर : “जी हाँ, गुरुदेव ! “

रामानंदजी कुछ रुष्ट होकर बोले : “अच्छा ! इधर तो आ तनिक |”

मैंने सुना है कि कबीरजी नजदीक आये तो रामानंदजी ने खडाऊ उठाकर उनके सर पर तीन बार मृदुस्पर्श करा दी और कहने लगे : “राम …राम…..राम… मुझे झूठा बनाता है ? कब दी मैंने तुझे दीक्षा ? राम…राम… राम…” (रामानंदी संतों का स्वभाव होता है बात – बात में राम-राम कहने का |)

कबीरजी रामानंदजी के चरणों में बैठ गए और बोले : “गुरुदेव ! अनजाने में गंगा किनारे की दीक्षा कच्ची थी, अब यह तो पक्की ? अब तो हाथ से सर पर खडाऊ पड़ रही है और राम…राम… वचन भी मिल रहा है | वह दीक्षा कच्ची थी अब यह तो पक्की हुई ?”

रामानंदजी बड़े प्रसन्न हुए | उन्होंने कहा : “पंडितों ! तुम मुझे चाहे कैसा भी मानों लेकिन कबीर मेरा ही शिष्य है और मैं ही उसका गुरु हूँ | तुम चाहे मेरे पास आओ, चाहे न आओ |”

सुपात्र मिला तो कुपात्र को दान दिया न दिया |
सुशिष्य मिला तो कुशिष्य को ज्ञान दिया न दिया |
सूरज उदय हुआ तो और दिया किया न किया ||
कहे कवि गंग सुन शाह अकबर !
पूर्ण गुरु मिला तो और को नमस्कार किया न किया ||

“अब मेरा और कबीर का पक्का नाता हो गया है |” कबीरजी पंडितों की ओर देखकर मुस्कुराये | मार खाकर भी सिद्ध पुरुषों की मंत्र-दीक्षा मिले तब भी बेडा पार हो जाए ऐसा मैंने सुना है | कबीरजी की यह कथा कहीं-कहीं पाठ भेद से भी आती है किंतु दोनों कथाओं का सारांश सम रहता है |

संत कबीरजी जयंती – २ जून २०१५

kabirjayantiसंत कबीरजी की वाणी

कबीरजी कहते है :
माया का सुख चार दिन, कहें तू गहे गँवार |
सपने पायो राज धन, जात न लागै बार ||

माया का सुख चार दिन का है | जैसे सपने में राज्य-धन आदि मिला… आँख खुली तो चला गया|  ऐसे ही यहाँ आँख बंद ( मृत्यु ) हुई तो माया का सुख चला गया | हे गँवार ! तू कब तक इसमें उलझेगा ? –
इस प्रकार का विवेक साथ रहता है तब मनुष्य इन पाँचो वैरियों से बाहर निकलता है |
इन पाँचो से बन्धिया, फिर फिर धरै शरीर |
जो यह पाँचो बसि करै, सोई लागै तीर ||

काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार – इन पाँचो से सभी बँधे है | कोई काम से बँधा है तो कोई क्रोध से, कोई लोभ से बँधा है तो कोई मोह से तो कोई अहंकार से बँधा है | इन पाँचो को वश करने की कला जिसको आ जाती है, वही मुक्त होता है | ये पाँचो बुरे नहीं है, उपयोगी हैं किंतु हम इनका सदुपयोग नहीं करते तो ये हमारा ही उपभोग कर लेते है | काम बुरा होता तो भगवान पैदा ही क्यों करते ?  क्रोध बुरा होता तो भगवान पैदा ही क्यों करते ? लोभ बुरा होता तो भगवान पैदा ही क्यों करते ? ‘काम’ नही होता तो सृष्टि की प्रवृति कैसे होती ?
भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है :
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ||
‘हे भरतश्रेष्ठ ! सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात् शास्त्र के अनुकूल काम मैं हूँ |’ (गीता: ७.११)

धर्म के अनुकूल होकर कामना पूर्ति करने की मना नहीं है, आवश्यकताओं की पूर्ति करने की मना नहीं है लेकिन जब हम धर्म के विरुद्ध कामनाओं की पूर्ति में लग जाते है तो कामनाएँ हमें अपना दास बना लेती है |
आप अहंकार करें तो इस बात का करें कि ‘मैं अमर आत्मा हूँ, चैतन्य हूँ, शरीर नहीं हूँ | शरीर की मौत के बाद भी रहता हूँ | मैं परमात्मा का सनातन अंश हूँ |’ – यह अहंकार तारने वाला है | परंतु ‘मैं सेठ हूँ …. मैं नौकर हूँ…मैं काला हूँ… मैं गोरा हूँ…’ – यह देह को ‘मैं’ मानने वाला अहंकार दुःखदायी है | ऐसे ही धन, पद, सत्ता, सौंदर्य आदि का अहंकार भी देह को ‘मैं’ मानने से ही होता है |
अहंकार है तो एक छोटा-सा शब्द पर न जाने कितने-कितने विस्तारों में हमको भटकाता रहता है | जैसे – बेटे या बेटी की शादी करनी है | व्यवस्था है ५० हजार रूपये की किंतु अहंकार बोलेगा कि रूपये उधार लाओ और शादी करो | कर्ज लेकर भी आदमी अच्छा दिखना चाहता है, इसको दंभ बोलते है |

घर में अपने ढंग से पूजा-पाठ करे रहे है और कोई भक्त मिलने आ गया तो पूजा-पाठ लंबा हो गया, यह दंभ है | दान कर रहे है और कोई देख रहा है तो उसके सामने ज्यादा दान किया – यह दंभ है | कोई संयमी है चाय नहीं पीता, प्याज नहीं खाता पर जहाज में ऐसा खाने-पीने वालों के बीच बैठा है तो कोई उसको बुद्धू न माने इसलिए न चाहते हुये भी वह ऐसा खा–पी लेता है तो यह भी दंभ है | है तो साधक परंतु अभक्तों के बीच रहते है, इसलिए ऐसा-वैसा खा-पी लेते है – यह भी दंभ है |

काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार – इन पाँचो का उपयोग नहीं सदुपयोग करो | कामना करनी है तो ईश्वर से मिलने की, अपने आत्मदेव को जानने की कामना करो| क्रोध करना है तो अपने दोषों पर क्रोध करो| लोभ करना है तो ध्यान–भजन का लोभ करो| मोह करना है तो आत्मा से करो|  अहंकार करना है तो ‘मैं अमर आत्मा हूँ’ या ‘मैं ईश्वर का शाश्वत, सनातन वंशज हूँ’ – ऐसा अहंकार करो |

जो पाँच विकार संसार की तरफ घसीट ले जाते है, इन्हें संसार के स्वामी के विषय में लगा दो तो वे पाँचो विकार निर्विकार नारायण से मिला देंगे |जब–जब मन में निषेधात्मक, नकारात्मक विचार आयें, संसार के व्यक्तियों और वस्तुओं से सुख लेने के विचार आये, तब-तब मन को परमात्म-चिंतन में लगा दो |

कोई पूछता है : ‘बाबाजी ! क्या हम खाएं-पीयें नहीं ?’

खाने-पीने, पहनने-ओढने की मनाही नहीं है पर ये सब सुख बुद्धि से नहीं वरन निर्वाह बुद्धि से करो | वासनापूर्ति के लिए नहीं वरन वासना निवृति के लिए करें | अनेक जन्मों से पति-पत्नी, नर–मादा के सम्पर्क से जीव भटकता आया है, इसलिए उसमें कामवासना होना स्वाभाविक है | यदि विवेक-वैराग्य का बल हो तो आजीवन ब्रम्हचर्य-व्रत पाले, नहीं तो विवाह करके भी संयम से रहे | काम को राम में बदल दे |
मन गोरख मन गोविन्द, मन ही औधड सोय |
जो मन राखै जतन करि, आपै करता होय ||

मन की दृढ़ता से ही लोग गोरखनाथ जी जैसे योगी बन जाते है | मन के पुरुषार्थ से ही मनुष्य भगवान कहलाता है | मन को बिगाड़ कर लोग औघड़ बन जाते है | जो मन को यत्नपूर्वक अपने वश में रखता है, वह स्वयं ईश्वर है |

‘हम औघड़ बने है… हम गोरखनाथ सम्प्रदाय के है… हम भगवान के सम्प्रदाय के है….’ तो मन जिससे मिलता है आपको वैसा बना देता है | इसलिए मन के साथ आत्मविचार रूपी मित्र जोड़ दो ताकि परमात्मा का साक्षात्कार करा दे |
मन पाँच विकारों में से कभी किसी के साथ तो कभी किसी के साथ जुड़ता रहेगा तो हमे खपा देगा किंतु मन अपने आत्म-परमात्म स्वरुप से जुड़ा तो हमारा कल्याण कर देगा |
मन दाता मन लालची, मन राजा मन रंक |
जो यह मन गुरु सों मिलै निसंक ||

मन ही दाता बनता है | मन ही लालची बनता है | मन ही राजा बनता है और मन ही रंक बनता है |यदि यह मन गुरु से मिले, गुरु के ज्ञान से मिले तो नि:संदेह गुरु बन जायेगा |
धन रहै न जीवन रहै, रहै न गाम न ठाम |
कबीर जग में जस रहै, करि दे किसी का काम ||

अंत में धन, जवानी, घर और गाँव कुछ नहीं रहेगा, जगत में केवल यश रहेगा | अत: किसी के काम आ जा | अपनी कामना मिटाने के लिए, अपनी वासना मिटाने के लिए सत्कर्म करने से चित्त में शांति आयेगी| मन में औदार्य सुख आयेगा, सात्त्विक गुण आयेंगे | उन सात्त्विक गुणों को सत्यस्वरूप परमातम को जानने में लगा देना चाहिए |
प्रीति रीति सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं |
कहै कबीर परमारथी, बिरला कोइ कलि माहिं ||

संसार के सारे प्रेम-व्यवहार स्वार्थ के लिए है, परमार्थ के लिए नहीं | कबीरजी कहते है कि कलियुग में कोई विरला ही परमार्थी होता है |
बात बनाई जग ठग्यो, मन परमोधा नाहिं |
कहै कबीर मन लै गया, लाख चौराशी माहिं ||

जो ज्ञान की चिकनी-चुपड़ी बात बनाकर जगत को ठगते रहते है परंतु अपने मन को ज्ञानोपदेश कर शांत नहीं करते,
ऐसे लोगों को मन उन्हें चौरासी लाख योनियों में ले जाता है | किसी को डराकर, किसी को बहकाकर अथवा
बात बनाकर ठगना – यह भी तुम्हारा मन करता है और किसीका ज्ञान-ध्यान बढ़ाकर उसका कल्याण करना –
यह भी मन करता है | अत: मन को अपना मित्र बनाओ |

शीतल शब्द उचारिये, अहं आनिये नाहिं |
तेरा प्रीतम तुझहि में, दुसमन भी तुम माहिं ||

सदैव शीतल वाणी बोलो | अहंकार युक्त वचन न बोलो | अगर मन को सँवार दिया तो तेरा प्रीतम तुझमें ही है और अगर मन को बिगाड़ दिया तो तेरा दुश्मन भी तुझमें ही है | इसीलिए कहा गया है :

मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत |
कहै कबीर गुरु पाइये, मन ही के परतीत ||

मन के हार जाने से हार हो जाती है और मन के विजयी होने से विजय होती है | मन के दृढ़ श्रद्धा-विश्वास से ही समर्थ सद्गुरु मिलते है, जो जीवन-नैया के खिवैया है |

संत कबीर के उपदेशों में जीवन की दार्शनिकता

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कबीर घुमक्ङ संत थे अतः उनकी भाषा सधुक्कङी कहलाती है। कबीर की वांणी बहुरंगी है। कबीर ने किसी ग्रन्थ की रचना नही की। अपने को कवि घोषित करना उनका उद्देश्य भी न था। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके शिष्यों ने उनके उपदेशों का संकलन किया जो ‘बीजक’ नाम से जाना जाता है। इस ग्रन्थ के तीन भाग हैं, ‘साखी’, ‘सबद’ और ‘रमैनी’। कबीर के उपदेशों में जीवन की दार्शनिकता की झलक दिखती है। गुरू-महिमा, ईश्वर महिमा, सतसंग महिमा और माया का फेर आदि का सुन्दर वर्णन मिलता है। उनके काव्य में यमक, उत्प्रेक्षा, रूपक, अनुप्रास आदि अलंकारों का सुन्दर समावेश दिखता है। भाषा में सभी आवश्यक सूत्र होने के कारण हजारी प्रसाद दिव्वेदी कबीर को “भाषा का डिक्टेटर” कहते हैं। कबीर का मूल मंत्र था,

“मैं कहता आँखन देखी, तू कहता कागद की लेखिन”।