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संत तुलसीदासजी जयंती- २२ अगस्त २०१५

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संत तुलसीदासजी जयंती

संतों ने एक स्वर से घोषणा की है कि जीव का परम पुरुषार्थ एकमात्र भगवद्प्रेम ही है । शेष जो चार पुरुषार्थ हैं, उनमें किसी-न-किसी रूप में ‘स्व’ सर्वथा लगा ही रहता है । एक भगवद्प्रेम ही ऐसा है जिसमें ‘स्व’ भी सर्वथा समर्पित हो जाता है, विलीन हो जाता है ।

प्रारम्भ से ही संतों की यह प्रेरणा रही है कि ‘सभी जीव उसी अनन्त भगवद्प्रेम की प्राप्ति के लिये सचेष्ट हों और उसे प्राप्त कर लें…’ और वे अपनी अन्तरात्मा से पूर्ण शक्ति से इसके लिए प्रयत्न करते रहे हैं । योग, कर्म, ज्ञान, ध्यान, जप, तप, विद्या, व्रत सब का एकमात्र यही उद्देश्य है कि भगवान के चरणों में अनन्य अनुराग हो जाय । वेदों ने भगवान के निर्गुण-सगुण स्वरूप की महिमा गाकर यही प्रयत्न किया है कि सब लोग भगवान से प्रेम करें ।

शास्त्रों ने सांसारिक वस्तुओं का विश्लेषण करके उनकी अनित्यता, दुःखरूपता और असत्यता दिखलाकर उनसे प्रेम करने का निषेध किया है और केवल भगवान से ही प्रेम करने का विधान किया है । यह सब होने पर भी अनादि काल से माया-मोह के चक्कर में फँसे हुए जीव भगवान की ओर जैसा चाहिए उस रूप में अग्रसर नहीं हुए । कुछ आगे बढे भी तो साधनों से पार जाना कठिन हो गया । गन्तव्य तक विरले ही पहुँच सके । भगवान को स्वयं इस बात की चिन्ता हो गयी । उन्होंने सोचा कि :

‘यदि इस क्रम से इतने स्वल्प जीव मेरे प्रेम की उपलब्धि कर सकेंगे, तब तो कल्पों में भी प्रेम पानेवालों की संख्या अंगुली पर गिनने के बराबर ही रहेगी । इसलिये मुझे स्वयं जीवों के बीच चलना चाहिए, प्रकट होना चाहिए और ऐसी लीला करनी चाहिए कि मेरे अन्तर्धान होने पर भी वे मेरे गुणों और लीलाओं का कीर्तन, श्रवण एवं स्मरण करके मेरे सच्चे प्रेम को प्राप्त कर सकें ।’

भगवान आये और उनके गुण, लीला स्वरूप के कीर्तन, श्रवण, स्मरण की प्रेरणा भी आयी । अभी लीला-संवरण हो भी नहीं पाया था कि वाल्मीकिजी ने उन्हीं के पुत्र लव-कुश के द्वारा उनकी कीर्ति का गायन कराकर सुना दिया और भगवान से उनकी यथार्थता की स्वीकृति भी करवा ली । जगत में आदिकवि हुए वाल्मीकि, आदिकाव्य हुआ उनके द्वारा किया हुआ भगवान श्रीराम के गुण और लीला का कीर्तन । श्री हनुमानजी को वह कितना प्रिय लगा होगा, इसका अनुमान भी नहीं किया जा सकता । उन्होंने अपने मन में विचार किया कि : ‘यह काव्य-संगीत अमर रहे… परंतु यह तो संस्कृत वाणी में है न ! आगे चलकर जब साधारण लोग संस्कृत से अनभिज्ञ हो जायेंगे तब वे इस रस का आस्वादन कैसे कर सकेंगे ?’ उन्हें इस बात की चिन्ता हो गयी ।

श्री हनुमानजी ने वाल्मीकि महामुनि की योग्यता, उनका अधिकार हर तरह से निरख लिया, परख लिया । अन्त में उन्होंने वाल्मीकिजी से कहा कि : ‘‘आपके हृदय में भगवान का प्रेम है । आपको संसार का कोई भय नहीं है । आप कलियुग में एक बार फिर से प्रगट होना । उस समय भी भगवान श्रीराम के गुण और लीलाओं को आम जनता के लिए सुलभ कर देना । मैं आपकी रक्षा करूँगा ।”

श्री वाल्मीकिजी ने उनकी आज्ञा स्वीकार की । उन्होंने कलियुग में जन्म लेकर श्रीरामलीला का मधुमय संगीत, गायन करने का वचन दिया । वे ही तुलसीदासजी के रूप में प्रकट हुए ।
उन दिनों देश की परिस्थिति बडी विषम थी । विधर्मियों का बोल-बाला था । वेद, पुराण, शास्त्र आदि सद्ग्रन्थ जलाये जा रहे थे । एक भी हिन्दू अवशेष न रहे, इसके लिए गुप्त एवं प्रकट रूप से चेष्टाएँ की जा रही थीं । धर्मप्रेमी निराश हो गये थे । उन्हें अपने व्यक्तिगत सदाचारपालन की भी सुविधा प्राप्त नहीं थी ।

वे मन-ही-मन ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे कि : ‘हे भगवान ! अब आप ही धर्म की रक्षा करें, आप ही सदाचार की डूबती हुई नौका को बचायें । आप ही अपने श्रीचरणों में विशुद्ध प्रेम होने का मार्ग बतायें । अब हमारे पास कोई शक्ति नहीं है, कोई बल नहीं है । हम सर्वथा निराश हैं । आपकी ही आशा है, आपका ही भरोसा है ।’

देश की आवश्यकता, जनता की पुकार, धर्मप्रेमियों की प्रार्थना सर्वदा पूर्ण होती है । उनकी आवाज सुनी गयी । इस काम के लिये जो व्यक्ति त्रेता से ही सुरक्षित रख लिये गये थे, उन्हें प्रकट होने की आज्ञा दी गयी ।

प्रयाग के पास यमुना के दक्षिण राजापुर नाम का एक ग्राम है । उन दिनों वहाँ एक आत्माराम दूबे नाम के सरयूपारीण ब्राह्मण रहते थे । वे अपने गाँव में प्रतिष्ठित, बुद्धिमान्, सदाचारी और शास्त्रों में श्रद्धा रखनेवाले थे । उनका गोत्र पाराशर था । उनकी धर्मपत्नी का नाम हुलसी था । वह बडी पतिव्रता थी ।

बारह महीने तक गर्भ में रहने के पश्चात् संवत् १५५४, श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन उन्हीं दम्पती से श्री तुलसीदासजी का जन्म हुआ ।

पन्द्रह सै चौवन विषै कालिन्दी के तीर ।
श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी धरेउ शरीर ।।

उस समय अभुक्तमूल नक्षत्र चल रहा था । पिता को बडी प्रसन्नता हुई । पुत्र के जन्म का उत्सव मनाया जाने लगा । दासी ने आकर कहा :

‘‘महाराज ! चलिए, घर में आपकी बुलाहट है । बडी अदभुत घटना घटी है । नवजात शिशु तनिक भी रोया नहीं, उलटे उसके मुँह से ‘राम’ शब्द निकला । देखने पर मालूम हुआ कि इसके मुँह में बत्तीसों दाँत मौजूद हैं । पाँच वर्ष के बालक जैसे लगते हैं, वैसा ही वह मालूम प‹डता है । मैं बूढी हो गयी परंतु आज तक मैंने ऐसा बालक कहीं नहीं देखा । स्त्रियों में इस बात की बडी चर्चा चल रही है । कोई कुछ कहती है, कोई कुछ । आप चलकर समझाइये और बच्चे की माँ की चिन्ता मिटाइये ।”

दूबेजी घर में गये । प्रसूतिघर के दरवाजे पर खडे होकर उन्होंने नवजात शिशु को देखा । उनके मन में बडा खेद हुआ । उन्होंने सोचा कि यह मेरे पूर्वजन्म का पाप है, जिसके कारण ऐसा बालक हुआ है । भाई-बन्धु, ज्योतिषी सब इकठ्ठे हुए । विचार हुआ । अन्त में यह तय हुआ कि यदि यह बालक तीन दिन तक जीवित रह जाय तो इसके सम्बन्ध में फिर सोचा जायेगा । सब लोग चले गये । तीन दिन बीतने पर आये ।

श्रावण शुक्ल दशमी की रात में एकादशी लग गयी थी । एकादशी के साथ ही हुलसी के हृदय में यह सदबुद्धि आयी । उसने अपनी दासी से कहा कि : ‘‘प्यारी सखी ! अब मेरे प्राणपखेरू उडना चाहते हैं । तुम मेरे इस कलेजे के टुकडे को लेकर अपने सास-ससुर के गाँव हरिपुर चली जाओ । तुम मेरे लल्ला का पालन-पोषण करना । भगवान तुम्हारा भला करेंगे । नहीं तो मेरे घर के लोग इस नन्हें-से निरपराध शिशु को फेंक देंगे । सखी ! यह बात किसी को पता न होने पाये । तुम रातोंरात चली जाओ ।”

यह कहकर हुलसी ने अपने बच्चे को उसकी गोद में दे दिया और अपने सब गहने भी दे दिये । दासी बच्चे को लेकर चली गयी और एकादशी के प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में हुलसी ने अपना शरीर त्याग दिया ।

संत की करें जो निंदा, उन्हें होना पडे शर्मिंदा

tulsidas2संत की करें जो निंदा, उन्हें होना पडे शर्मिंदा
(संत तुलसीदासजी जयंती)

संत तुलसीदासजी काशी में प्रवचन करते थे । दूर-दूर तक उनकी ख्याति फैल चुकी थी । कहते हैं जहाँ गुलाब वहाँ काँटें, जहाँ चंदन वहाँ विषैले सर्प, ऐसे ही जहाँ सर्वसुहृद लोकसंत वहाँ निंदक -कुप्रचारकों का होना स्वाभाविक है । उसमें भी विधर्मियों की साजिश के तहत हमारे ही संतों के खिलाफ, संस्कृति व परम्पराओं के खिलाफ हमारे ही लोगों को भडकाने का कार्य अनेक सदियों से चलता आया है । काशी में तुलसीदासजी की बढती ख्याति देखकर साजिशों की शृंखला को बढाते हुए काशी के ही कुछ पंडितों को तुलसीदासजी के खिलाफ भडकाया गया । वहाँ कुप्रचारकों का एक टोला बन गया, जो नये-नये वाद-विवाद खडे करके गोस्वामीजी को नीचा दिखाने में लगा रहता था । परंतु जैसे-जैसे कुप्रचार बढता, अनजान लोग भी सच्चाई जानने के लिए सत्संग में आते और भक्ति के रस से पावन होकर जाते, जिससे संत का यश और बढता जाता था ।

tulsidas-sant-nindaअपनी सारी साजिशें विफल होती देख विधर्मियों ने कुप्रचारक पंडितों के उस टोले को ऐसा भडकाया कि उन दुर्बुद्धियों ने गोस्वामीजी को काशी छोडकर चले जाने के लिए विवश किया । प्रत्येक परिस्थिति में राम-तत्त्व का दर्शन व हरि-इच्छा की समीक्षा करनेवाले तुलसीदासजी काशी छोडकर चल दिये । जाते समय उन्होंने एक पत्र लिख के शिवमंदिर के अंदर रख दिया । उस पत्र में लिखा था कि ‘हे गौरीनाथ ! मैं आपके नगर में रहकर रामनाम जपता था और भिक्षा माँगकर खाता था । मेरा किसीसे कोई वैर-विरोध, राग-द्वेष नहीं है परंतु इस चल रहे वाद-विरोध में न पडकर मैं आपकी नगरी से जा रहा हूँ ।’

भगवान भोलेनाथ संत पर अत्याचार कैसे सह सकते थे ! संत के जाते ही शिवमंदिर के द्वार अपने-आप बंद हो गये । पंडितों ने एडी-चोटी का जोर लगा दिया पर द्वार न खुले । कुछ निंदक को के कारण पूरे समाज में बेचैनी-अशांति फैल गयी, सबके लिए संत-दर्शन व शिव-दर्शन दोनों दुर्लभ हो गये । आखिर लोगों ने भगवान शंकर से करुण प्रार्थना की । भोलेनाथ ने शिवमंदिर के प्रधान पुजारी को सपने में आदेश दिया : ‘‘पुजारी ! स्वरूपनिष्ठ संत मेरे ही प्रकट रूप होते हैं । तुलसीदासजी का अपमान कर निंदकों ने मेरा ही अपमान किया है । इसीलिए मंदिर के द्वार बंद हुए हैं । अगर मेरी प्रसन्नता चाहते हो तो उन्हें प्रसन्न कर काशी में वापस ले आओ वरना मंदिर के द्वार कभी नहीं खुलेंगे ।”

भगवान अपना अपमान तो सह लेते हैं परंतु संत का अपमान नहीं सह पाते । निंदक सुधर जायें तो ठीक वरना उन्हें प्रकृति के कोप का भाजन अवश्य बनना पडता है । अगले दिन प्रधान पुजारी ने सपने की बात पंडितों को कह सुनायी । समझदार पंडितों ने मिलकर संत की निंदा करनेवाले दुर्बुद्धियों को खूब लताडा और उन्हें साथ ले जाकर संत तुलसीदासजी से माफी मँगवायी । सभीने मिलकर गोस्वामीजी को काशी वापस लौटने की करुण प्रार्थना की । संतश्री के मन में तो पहले से ही कोई वैर न था, वे तो समता के ऊँचे सिंहासन पर आसीन थे । करुणहृदय तुलसीदासजी उन्हें क्षमा कर काशी वापस आ गये । शिवमंदिर के द्वार अपने-आप खुल गये । संत-दर्शन और भगवद्-दर्शन से सर्वत्र पुनः आनंद-उल्लास छा गया ।

नम्रता की मूर्तिः तुलसीदास जी

tulsidas1नम्रता की मूर्तिः तुलसीदास जी
(संत तुलसीदासजी जयंती)

संत विनोबाजी भावे कहते हैं – “मुझे एक दिन, रात को सपना आया। सात्त्विक मुद्रा का एक व्यक्ति मेरे सामने बैठकर मुझसे बात कर रहा था। विनय पत्रिका पर चर्चा चल रही थी। उसने दो भजनों के अर्थ पूछे, कुछ शंकाएँ थीं। मैं समझा रहा था। वह एकाग्रता से सुन रहा था। थोड़ी देर बाद मेरे ध्यान में आया कि ये तो साक्षात् संत तुलसीदास जी हैं, जो मुझसे बात कर रहे हैं और मेरी नींद टूट गयी। मैं सोचने लगा, ‘यह क्या हुआ ?’ तो ध्यान में आया कि आज तुलसीदासजी की जयंती है। हर साल तुलसी जयंती के दिन मैं तुलसी रामायण या विनय पत्रिका पढ़ता हूँ और तुलसीदासजी का स्मरण कर लेता हूँ, परंतु उस दिन तुलसी-जयंती का स्मरण मुझे नहीं रहा था। इसलिए रात को तुलसीदासजी मुझसे बात करके गये।

तुलसीदास जी ने जब रामायण लिखी, तब प्रचार का कोई साधन नहीं था। उनके हाथ में प्रेस नहीं थी। परंतु इसके बावजूद रामायण का घर-घर में प्रचार हुआ। आज प्रेस होते हुए भी हिंदुस्तान की किसी भी भाषा में कोई ऐसी किताब नहीं है, जो तुलसी रामायण के समान घर घर पहुँची हो। तुलसीदासजी ने पैंतालीस साल की उम्र में रामायण लिखी और फिर चालीस साल तक गाँव-गाँव जाकर अपनी मधुर वाणी में रामायण गान किया।

यह रामकथा ऐसी है कि छोटे बच्चों से लेकर औरतों और ग्रामीणों को भी, जिनको संस्कृत का ज्ञान नहीं है या कम पढ़े लिखे हैं, उनको भी सुनने में और गाने में आनंद आता है। जिनको गहराई में पैठने की आदत है, उनको वैसे पैठने का भी मौका मिलता है। यह बड़ा भारी उपकार तुलसीदासजी ने हम पर किया है।

सारे समाज का उत्थान करने के लिए, सब प्रकार के अहंकार को छोड़कर वे झुक गये और अत्यंत सरल भाषा में लिखा। विद्वत्-शिरोमणि होकर लिखा ‘जागबलिक’। कोई संस्कृत जानने वाला सहन करेगा ? कहेगा ‘याज्ञवल्क्य’ लिखना चाहिए। अब लोगों को व्याकरण सिखाना है कि धर्म सिखाना है ! जिन शब्दों का लोग उच्चारण भी नहीं कर सकते, उनके लिए उन्होंने सरल भाषा लिखी और वे कहते हैं कि ‘मैं बहुत बड़े ग्रन्थों का प्रमाण लेकर लिख रहा हूँ।’ अरथ न धरम न काम रूचि। ‘धर्म’ नहीं कहते ‘धरम’ कहते हैं, ‘अर्थ’ नहीं कहते ‘अरथ’ कहते हैं, ‘निर्वाण’ नहीं कहते ‘निरबान’ कहते हैं। युक्ताक्षर तोड़कर आम समाज समज सके, ऐसी भाषा लिखी।

इतनी नम्रता थी और ऐसे झुक गये समाज को ऊपर उठाने के लिए, जैसे माँ बच्चे को उठाने के लिये झुकती है।

तुलसीदासजी पहले काशी में ‘पंचगंगा घाट’ पर रहते थे। वहाँ लोगों ने उनको ईर्ष्यावश इतना सताया कि वे मणिकर्णिका घाट पर भाग गये। वहाँ भी अलग-अलग पंथों के लोगों ने बहुत सताया। वहाँ से भी भागे, तीसरे घाट पर गये। आखिर बहुत सताया तो सब छोड़कर काशी के आखिरी हिस्से में जहाँ एक टूटा-फूटा घाट था ‘अस्सी घाट’, वहाँ पर रहे। वहाँ ज्यादा बस्ती नहीं थी। आज उसके दक्षिण में हिन्दू विश्वविद्यालय बना है और कुछ बस्ती है, उस जमाने में बस्ती नहीं थी। इस तरह उन्हें बहुत तंग किया गया लेकिन आज सब उनका नाम लेकर आदर से, भक्ति से, प्यार से झुक जाते हैं। यही हाल संत कबीर जी, संत ज्ञानदेव, नानकजी, संत नामदेव जी का हुआ। आद्य शंकराचार्य जी इतने महान थे पर उनका भी यही हाल हुआ था उनके जमाने में।

अपनी भारतीय परम्परा सभ्यता रामायण की सभ्यता है। दुर्गुणों पर, पाप पर हमला करना यह रामायण का स्वरूप है। उसी के लिए घर-घर में रामायण पढ़ी जाती है। यह कथा कब तक चलेगी ? जब तक गंगा की धारा बहती रहेगी, हिमालय खड़ा रहेगा तब तक यह राम कथा बहती रहेगी।

तुलसी रामायण जैसा कोई ग्रंथ नहीं है, जिससे सामान्य किसान भी जो लेना है वह ले सकता है और महाज्ञानी भी जो लेना है वह ले सकता है।

बचपन में माँ ने हमको रामायण का सार सुनाया था कि ‘ये दिन भी बीत जायेंगे।’ रामचन्द्र जी पन्द्रह साल के हैं और विश्वामित्र जी उन्हें बुलाने आये हैं। सब लोग चिंतित हैं परंतु राम जी शांत हैं। कोई उनको पूछता है तो कहते हैं- ‘ये दिन भी बीत जायेंगे।’ राक्षसों का संहार कर, अनेक पराक्रम कर रामजी वापस आते हैं। उस समय सब आनंद मना रहे हैं लेकिन रामजी तो शांत ही बैठे हैं। उन्हें पूछा जाता है तो वे कहते हैं- ‘ये दिन भी बीत जायेंगे।’ जब आता है शादी का प्रसंग, उस समय भी रामजी के मुखारविंद पर शांति और वही जवाब। फिर आया राज्याभिषेक का आनंदमयी प्रसंग। तब भी रामजी शांत थे और वही जवाब, ‘ये दीन भी बीत जायेंगे।’ इतने में माँ की आज्ञा पर चौदह साल का वनवास मिलता है। फिर भी रामजी शांत ही थे। वही प्रश्न, वही उत्तर। इस प्रकार पूरी रामायण सुख-दुःख के प्रसंगों से भरी है परंतु राम जी के मुख पर सदा वही शांति, वही प्रसन्नता क्योंकि उनको पता था कि ये दिन भी बीत जायेंगे।’

पूज्य बापू जी कहते हैं- “वास्तव में जो बीत रहा है, वह अनित्य शरीर और संसार है और जो उसका साक्षी है वह नित्य अपना आत्मा शुद्ध-बुद्ध चैतन्य है। श्रीरामजी अपने शुद्ध-बुद्ध स्वरूप में जाग गये थे, वसिष्ठजी का सत्संग आत्मसात् किया था। आप भी सत्संग को आत्मसात् करें। जरा-जरा सी परिस्थितियों को सत्यबुद्धि से देखकर हर्ष और शोक में फिसलो मत।

हरख सोग जा कै नहीं बैरी मीत समान।
कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जान।।

यह बात मैंने पहले भी कही बार कही है। यह उत्तम साधन है। बीतने वाला बीत रहा है, आप सम सत्ता में रहो। उचित प्रयत्न करो पर परिणाम में सम रहो तो आपने श्रीरामजी की, गुरु वसिष्ठजी की और मेरे गुरुदेव श्रीलीलाशाहजी की एक साथ सेवा सम्पन्न कर ली, प्रसाद पचाया ऐसा मैं मानूँगा।”