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रायपुर आश्रम शरद पूर्णिमा महोत्सव

रायपुर आश्रम में शरद पूर्णिमा महोत्सव

                 15 – 16 अक्टूबर को संत श्री आशारामजी आश्रम रायपुर (छ.ग.) में पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की कृपा पात्र शिष्या साध्वी कृष्णा देवीजी के सानिध्य में सत्संग व शरद पूर्णिमा महोत्सव  धूमधाम से मनाया गया |जिसमे दीदी ने बताया  अपने भीतर के शत्रुओं – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्‍सर पर विजय प्राप्‍त कर ली वह सबसे बड़ा वीर है । सदगुरु की पूजा करने से सभी देवों की पूजा हो जाती है ।

              शरद पूर्णिमा के महत्व को बताते हुए साध्वी जी ने कहा कि इसे कोजागर पूर्णिमा भी कहते हैं । इस रात माता लक्ष्‍मी की उपासना भी की जाती है । जब शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्री कृष्ण ने अपने अधरों से बासुंरी बजाई उस बांसुरी की धुन को सुनकर भगवान शंकर की समाधि खुल गई,स्वर्ग के देवता स्वर्ग के सुख वैभव को भूल गए, जमुना जी स्थिर हो गई,गोपीया अपनी सुध बुध खो बैठी ।

रात्रि में साध्‍वी कृष्‍णा बहन ने श्रद्धालुओं को चन्द्रमा की ओर देखते हुए त्राटक करवाया, भगवन्‍नाम कीर्तन के साथ मध्‍यरात्रि 12 बजे मानस पूजन के साथ ध्‍यान कराया जिसमें सभी बहुत आनंदित हुए । इसके बाद भजन-कीर्तन के साथ सामूहिक नृत्‍य भी कराया गया । पूज्‍य की मंगल आरती के बाद चंद्रमा की किरणों में पुष्‍ट हुए खीर का वितरण किया गया । आश्रम परिसर में दमे के को विशेष बूटीयुक्‍त खीर का वितरण किया गया जिसका लाभ बड़ी संख्‍या में दमे के मरीजों ने लिया ।

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अनुकूलता भगवान की दया है, प्रतिकूलता भगवान की कृपा है |

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सत्संग के कुछ मुख्य अंश:

उतार और चढ़ाव तुम्हारे जीवन में विलक्षण लक्षण प्रकट हों, उसी परमात्मा की लीला है….

कभी ऐसा न सोचो कि मेरा कोई पाप कर्म है, मैं अभागा हूँ, ऐसा हो गया… बड़े से बड़े सुखी व्यक्ति के जीवन में भी विपरीत परिस्थितियाँ लाने की कृपा भी उसी की है…

और दुखी से दुखी व्यक्ति के जीवन में सुखद घटना लाने की दया उसी की है….

अनुकूलता भगवान की दया है, प्रतिकूलता भगवान की कृपा है – दोनों के द्वारा हमारा विकास ही छिपा है, ऐसा समझकर दोनों का फायदा लें…

प्रतिकूलता आई है तो सजाग होने के लिये आई है, अनुकूलता आई है तो उदार होने के लिये आई है…

अनुकूलता आ के चली जाती है, प्रतिकूलता आ के चली जाती है, लेकिन रहने वाला वह सनातन परमेश्वर सदा हमारे साथ है…

सो साहिब सद सदा हजूरे, अंधा जानत ताको दूरे….

उस सत स्वरूप ईश्वर को अपना मानो…

रात को सोने से पहले ईश्वर से बोलो:

प्रभु! मैं तुम्हारा हूँ…जैसा हूँ, तैसा हूँ, लेकिन तुम्हारा हूँ…

अच्छा काम हुआ तो आपकी सत्ता से, कृपा से हुआ,..

गलती हुई तो मेरा स्वार्थ और नादानी है…

लेकिन स्वार्थ और नादानी आप ही मिटाते रहियो मेरे देव!

हे गोविन्द, हे गोपाल, हे केशव!

प्रीतिपूर्वक भगवान को भजो…

सत्कर्म से सत्कर्म बढ़ते हैं, पाप से पाप बढ़ता है….

सुबह उठते समय थोड़ी देर शांत होकर बैठ जाओ…भले एक दो मिनट…

सुबह सुबह बुद्धि और मन शांत होता है…ज्ञान स्वरूप परमात्मा की नज़दीक होता है, अच्छी प्रेरणा मिलती है…

संध्या के बाद कोई बड़ा निर्णय नहीं करना चाहिये, शादी, विवाह, आदि बड़े काम का निर्णय नहीं लेना चाहिए…

मैं (पूज्य गुरुदेव) सत्संग की तारीक कभी भी रात्रि को नहीं देता…जब भी निर्णय करूँगा, सुबह को करूँगा, दोपहर को करूँगा…

तो भगवत प्रेरित कर्म करो…भगवान की प्रीति के लिये कर्म करो…

और भगवान का वचन है:

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत |
तत्प्रसादात परां शांतिम स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतं ||

शरीर से जो करे, मन से जो सोच विचार (संकल्प आदि) करे वो, उसमें भी भगवान प्रसन्न होंगे कि नहीं, यह उद्देश्य रख कर मन से काम लें..

और बुद्धि से भी ऐसे ही निर्णय लें, तो देर सवेर तुम काम करते करते भी मेरे प्रसाद से पावन हो जाओगे…

भगवत प्रसादजा मति बन जायेगी…

और प्रसादे सर्व दुखानाम हानिरस्योप्जायेते…

अष्टधा प्रकृति है (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश और मन, बुद्धि, अहंकार)…

इसीलिए, आम आदमी को समझाने के लिये (दुर्गा) माता जी का रूप बनाया और माँ की अष्ट भुजायें बना दी…

वास्तव में अष्टधा प्रकृति है – 5 भूत, और मन, बुद्धि और अहंकार…

जैसे भगवान की अष्टधा प्रकृति सृष्टि है, ऐसे ही हमारी (जीव) की अष्टधा प्रकृति शरीर है…

मुझसे अलग है अष्टधा प्रकृति…

भगवान बोलते हैं – मैं इनमें हूँ, पर ये मुझ में नहीं हैं…

जैसे फिल्म की प्लास्टिक की पट्टियों में दृश्य दिखते हैं, लेकिन दृश्य मर भी जायें तो भी लाइट और पट्टियाँ ज्यों की त्यों…

जैसे आकाश और सूर्य सब चीज़ों के साथ जुड़े हैं, और सब से अलग भी हैं…

कभी कभी सोचो कि इतना भोग लिया फिर क्या, इतना पा लिया फिर क्या, आखिर क्या?

शरीर तो सदा रहेगा नहीं, और यह धन भी यहाँ रह जायेगा….

साईं ते इतना मांगिये,
नौ कोटि सुख समाये |
मैं भी भूखा ना रहूँ,
साधु ना भूखा जाये ||

जैसे गाड़ी में बैठने से आप गाड़ी नहीं हो गए, ऐसे ही शरीर में आने से आप शरीर नहीं हो गए….

शरीर अष्टधा प्रकृति का है, और आप चैतन्य परमात्मा के हो…

तो आप परमात्मा की स्मृति करो…

परमात्मा का ज्ञान, परमात्मा की प्रीति, और परमात्मा में विश्रांति…

ज्यों ज्यों ये बढेंगे, त्यों त्यों जगत आपके लिये नंदनवन हो जायेगा…

काहे को डरते हो, भयभीत होते हो, चिंतित होते हो ?

हो हो के क्या होगा ?

ये भय दिखाने वाली परिस्थितियाँ दिखती हैं भयानक, लेकिन भीतर से अमृत से भरी होती हैं…

ऐसा नहीं है कि भगवान किसी जगह पर ही बैठे हैं…

हरि व्यापक सर्वत्र समाना,
प्रेम ते प्रगट होहिं मैं जाना |

जो सत्संग में पहुँचते हैं उनके पुण्य, उनकी कमाई, उनके भाग्य को तोलने वाली मानवी तराजू तो क्या, ब्रह्मा जी की तराजू भी बनी नहीं है….

अगर बनेगी तो टूट जायेगी…इतना पुण्य होता है कि ब्रह्मा जी भी उसको तोल नहीं सकते…

तुलसीदास जी ने थोड़ा संकेत कर दिया:

एक घड़ी, आधि घड़ी, आधि में पुनि आध..
तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध |

अमृतवर्षा की रात्रि : शरद पूर्णिमा

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कामदेव ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि “हे वासुदेव ! मैं बड़े-बड़े ऋषियों, मुनियों तपस्वियों और ब्रह्मचारियों को हरा चुका हूँ। मैंने ब्रह्माजी को भी आकर्षित कर दिया। शिवजी की भी समाधि विक्षिप्त कर दी। भगवान नारायण ! अब आपकी बारी है। आपके साथ भी मुझे खिलवाड़ करना है तो हो जाय दो-दो हाथ ?”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहाः “अच्छा बेटे ! मुझ पर तू अपनी शक्ति का जोर देखना चाहता है ! मेरे साथ युद्ध करना चाहता है !तो बता, मेरे साथ तू एकांत में आयेगा कि मैदान में आयेगा ?”

एकांत में काम की दाल नहीं गली तो भगवान ने कहाः “कोई बात नहीं। अब बता, तुझे किले में युद्ध करना है कि मैदान में? अर्थात् मैं अपनी घर-गृहस्थी में रहूँ, तब तुझे युद्ध करना है कि जब मैं मैदान में होऊँ तब युद्ध करना है ?”

बोलेः महाराज ! जब युद्ध होता है तो मैदान में होता है। किले में क्या करना !

भगवान बोलेः “ठीक है, मैं तुझे मैदान दूँगा। जब चन्द्रमा पूर्ण कलाओं से विकसित हो, शरद पूनम की रात हो, तब तुझे मौका मिलेगा। मैं ललनाएँ बुला लूँगा।”

शरद पूनम की रात आयी और श्रीकृष्ण ने बजायी बंसी। बंसी में श्रीकृष्ण ने ‘क्लीं’ बीजमंत्र फूँका। क्लीं बीजमंत्र फूँकने की कला तो भगवान श्रीकृष्ण ही जानते हैं। यह बीजमंत्र बड़ा प्रभावशाली होता है।

श्रीकृष्ण हैं तो सबके सार और अधिष्ठान लेकिन जब कुछ करना होता है न, तो राधा जी का सहारा ढूँढते हैं। राधा भगवान की आह्लादिनी शक्ति माया है।

भगवान बोलेः “राधे देवी ! तू आगे-आगे चल। कहीं तुझे ऐसा न लगे कि ये गोपिकाओं में उलझ गये, फँस गये। राधे ! तुम भी साथ में रहो। अब युद्ध करना है। काम बेटे को जरा अपनी विजय का अभिमान हो गया है। तो आज उसके साथ दो दो हाथ होने हैं। चल राधे तू भी।”

भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी बजायी, क्लीं बीजमंत्र फूँका। 32 राग, 64 रागिनियाँ… शरद पूनम की रात… मंद-मंद पवन बह रहा है। राधा रानी के साथ हजारों सुंदरियों के बीच भगवान बंसी बजा रहे हैं। कामदेव ने अपने सारे दाँव आजमा लिये। सब विफल हो गया।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहाः

“काम ! आखिर तो तू मेरा बेटा ही है !”

वही काम भगवान श्रीकृष्ण का बेटा प्रद्युम्न होकर आया।

कालों के काल, अधिष्ठानों के अधिष्ठान तथा काम-क्रोध, लोभ मोह सबको सत्ता-स्फूर्ति दने वाले और सबसे न्यारे रहने वाले भगवान श्रीकृष्ण को जो अपनी जितनी विशाल समझ और विशाल दृष्टि से देखता है, उतनी ही उसके जीवन में रस पैदा होता है।

मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन के विध्वंसकारी, विकारी हिस्से को शांति, सर्जन और सत्कर्म में बदल के, सत्यस्वरूप का ध्यान् और ज्ञान पाकर परम पद पाने के रास्ते सजग होकर लग जाये तो उसके जीवन में भी भगवान श्रीकृष्ण की नाईं रासलीला होने लगेगी।

रासलीला किसको कहते हैं ? नर्तक तो एक हो और नाचने वाली अनेक हों, उसे रासलीला कहते हैं। नर्तक एक परमात्मा है और नाचने वाली वृत्तियाँ बहुत हैं। आपके जीवन में भी रासलीला आ जाय लेकिन श्रीकृष्ण की नाईं नर्तक अपने स्वरूप में, अपनी महिमा में रहे और नाचने वाली नाचते-नाचते नर्तक में खो जायें और नर्तक को खोजने लग जायें और नर्तक उन्हीं के बीच में, उन्हीं के वेश में छुप जाय-यह बड़ा आध्यात्मिक रहस्य है।

ऐसा नहीं है कि दो हाथ-पैरवाले किसी बालक का नाम कृष्ण है। यहाँ कृष्ण अर्थात् कर्षति आकर्षति इति कृष्णः। जो कर्षित कर दे, आकर्षित कर दे, आह्लादित कर दे, उस परमेश्वर ब्रह्म का नाम ‘कृष्ण’ है। ऐसा नहीं सोचना कि कोई दो हाथ-पैरवाला नंदबाबा का लाला आयेगा और बंसी बजायेगा तब हमारा कल्याण होगा, ऐसा नहीं है। उसकी तो नित्य बंसी बजती रहती है और नित्य गोपिकाएँ विचरण करती रहती हैं। वही कृष्ण आत्मा है, वृत्तियाँ गोपिकाएँ हैं। वही कृष्ण आत्मा है और जो सुरता है वह राधा है। ‘राधा’….. उलटा दो तो ‘धारा’। उसको संवित्, फुरना और चित्तकला भी बोलते हैं।

काम आता है तो आप काममय हो जाते हो, क्रोध आता है तो क्रोधमय हो जाते हो, चिंता आती है तो चिंतामय हो जाते हो, खिन्नता आती है तो खिन्नतामय हो जाते हो। नहीं,नहीं। आप चित्त को भगवदमय बनाने में कुशल हो जाइये। जब भी चिंता आये तुरंत भगवदमय। जब भी काम, क्रोध आये तुरंत भगवदमय। यही तो पुरुषार्थ है। पानी का रंग कैसा ? जैसा मिलाओ वैसा। चित्त जिसका चिंतन करता है, जैसा चिंतन करता है, चिदघन चैतन्य की वह लीला वैसा ही प्रतीत कराती है। दुश्मन की दुआ से डर लगता है और सज्जन की गालियाँ भी मीठी लगती हैं। चित्त का ही तो खेल है ! भगवदभाव से प्रतिकूलताएँ भी दुःख नहीं देतीं और विकारी दृष्टि से अनुकूलता भी तबाह कर देती है। विकारी दृष्टि विकार और विषाद में गिरा देती है। 

रायपुर आश्रम शरद पूर्णिमा महोत्सव 2015

रायपुर आश्रम शरद पूर्णिमा महोत्सव 2015

25-26 अक्टूबर को रायपुर आश्रम में साध्वी कृष्णा देवीजी के सानिध्य में शरद पूर्णिमा महोत्सवव सत्संग कार्यक्रम रखा गया था ,25 अक्टूबर शाम 4 बजे से एवं 26 अक्टूबर को सुबह 10 बजे व रात्रि 9 बजे से |26 अक्टूबर को सुबह से ही पूनम दर्शनार्थियों का आना प्रारंभ हो गया 8 बजे से श्री आशारामायण पाठ ,पादुका ,गुरु पूजन के बाद 9 बजे मंत्रजाप माला पूजन  किया गया उसके बाद सत्संग हुवा  शाम 7 बजे से भजन -संध्या के बाद खुले मैदान में चन्द्रमा की उज्जवल किरणों में शाध्वी कृष्णा दीदीजी ने शरद पूनम का महत्व बताते हुए जप -ध्यान कराया अंत में आरती के बाद चांदनी में राखी पुष्ट खीर की प्रसाद वितरण किया गया ,दमे की रोगियों के लिए दवा भी उपलब्ध थी जो की विषेस तोर पर शरद पूनम को ही लिया जाता है  ,कार्यक्रम  भक्तो  की अपार भीड़ देखते ही बनती थी |

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