Category Archives: Shraadh Mahima

श्राद्ध करने का विधि – श्राद्ध पक्ष ( १६ सितम्बर से ३० सितम्बर)

vidhi

पितृ पक्ष श्राद्ध की तिथियां निम्न हैं:

तिथि

दिन

श्राद्ध तिथियाँ

16 सितंबर

शुक्रवार

पूर्णिमा श्राद्ध

17 सितंबर

शनिवार 

प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध

18 सितंबर

रविवार

द्वितीया तिथि का श्राद्ध

19 सितंबर

सोमवार

तृतीया – चतुर्थी तिथि का श्राद्ध (एक साथ)

20 सितंबर

मंगलवार

पंचमी तिथि का श्राद्ध

21 सितंबर

बुधवार

षष्ठी  तिथि का श्राद्ध

22 सितंबर

गुरुवार

सप्तमी तिथि का श्राद्ध

23 सितंबर

शुक्रवार

अष्टमी तिथि का श्राद्ध

24 सितंबर

शनिवार

नवमी तिथि का श्राद्ध

25 सितंबर

रविवार

दशमी तिथि का श्राद्ध

26 सितंबर

सोमवार

एकादशी तिथि का श्राद्ध

27 सितंबर

मंगलवार

द्वादशी तिथि का श्राद्ध

28 सितंबर

बुधवार

त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध

29 सितंबर

गुरुवार

 चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध

30 सितंबर

शुक्रवार

अमावस्या व सर्वपितृ श्राद्ध 

वायुपुराण में श्राद्ध-परिचय एवं महिमा

Mahimaवायुपुराण में श्राद्ध-परिचय एवं महिमा ….

श्राद्धं चैवां मनुष्याणां श्राद्धमेव प्रवर्तते |(वायुपुराण: ३१.१७ )

मनुष्यों द्वारा श्रद्धापूर्वक दी गई वस्तुएँ ही श्राद्ध कही जाती है | श्राद्धकर्म में पितरों की पूजा बिना किये ही किसी अन्य क्रिया का जो अनुष्टान करता है उसकी उस क्रिया का फल राक्षसों तथा दानवों को प्राप्त होता है |

आत्मज्ञानी सूतजी ऋषियों से कहते है : ‘हे ऋषिवृन्द ! परमेष्टि ब्रह्म़ा ने पूर्वकाल में जिस प्रकार की आज्ञा दी है उसे तुम सुनो | ब्रह्माजी ने कहा है : ‘जो मनुष्य लोक के पोषण की दृष्टी से श्राद्ध आदि करेंगे, उन्हें पितृगण सर्वदा पुष्टि एवं संतति देंगे | श्राद्धकर्म में अपने प्रपितामह तक का नाम एवं गोत्र का उच्चारण कर जिन पितरों को कुछ दे दिया जायेगा वे पितृगण उस श्राद्धदान से अति संतुष्ट होकर देनेवाले की संततियों को संतुष्ट रखेंगे | हे ऋषियों ! उन्ही पितरों की कृपा से दान, अध्ययन, तपस्या, इन सबसे सिद्धि प्राप्त होती है | इसमें तनिक भी संदेह नही है कि वे पितृगण ही हम सबको ज्ञान प्रदान करनेवाले है |नित्यप्रति गुरुपूजा प्रभृति सत्क्रियाओं में निरत रह योगाभ्यासी पितर सबको तृप्त रखते है | योगबल से चन्द्रमा को भी तृप्त करते है जिससे त्रैलोक्य को जीवन प्राप्त होता है| इससे योग की मर्यादा जाननेवालों को सदैव श्राद्ध करना चाहिये |

श्राद्ध के अवसर पर सहस्रों ब्राह्मणों को भोजन कराने का जो फल मिलाता है, योग में निपुण एक ही ब्राह्मण संतुष्ट होकर उक्त फल देता है एवं महान भय (नरक)से छुटकारा दिलाता है | एक सहस्त्र गृहस्थ, सौ वानप्रस्थी अथवा एक ब्रह्मचारी – इन सबसे एक योगी (योगाभ्यासी ) बढ़कर है | वह चाहे नास्तिक हो, चाहे दुष्कर्मी हो, चाहे संकीर्ण विचारों वाला हो अथवा चोर ही क्यों न हो ? प्रजापति ने योगमार्ग में ऐसी व्यवस्था बतलाई है कि (योगी को छोड़कर) अन्यत्र दान नही करना चाहिये |

जिस व्यक्ति का पुत्र अथवा पौत्र ध्यान में निमग्न रहनेवाले किसी योगाभ्यासी को श्राद्ध के अस्वस्र पर भोजन करायेगा, उसके पितृगण अच्छी वृष्टि से किसानों की तरह परम संतुष्ट होंगे | यदि श्राद्ध के अवसर पर कोई योगाभ्यासी ध्यानपरायण भिक्षु न मिले तो किसी उदासीन ब्राह्मण को भोजन करा देना चाहिये | जो व्यक्ति सौ वर्षों तक केवल एक पैर पर खड़े होकर, वायु का आहार करके स्थित रहता है उससे भी बढ़कर ध्यानी एवं योगी है ऐसी ब्रह्माजी की आज्ञा है |

श्राद्ध में चाँदी का दान, चाँदी के आभाव में उसका दर्शन अथवा उसका नाम ले लेना भी पितरों को अनंत अक्षय एवं स्वर्ग देनेवाला दान कहा जाता है | योग्य पुत्रगण चाँदी के दान से अपने पितरों को तारते है | काले मृगचर्म का सानिध्य, दर्शन अथवा दान राक्षसों का विनाश करनेवाला एवं ब्रम्हतेज का वर्धक है | सुवर्णनिर्मित, चाँदीनिर्मित, ताम्रनिर्मित वास्तु, दौहित्र, तिल, वस्त्र, कुश का तृण, नेपाल का कम्बल, अन्यान्य पवित्र वस्तुएँ एवं मन, वचन, कर्म का योग, ये सब श्राद्ध में पवित्र वस्तुएँ कही गई है | उपरोक्त वस्तुओं द्वारा किया गया विधिपूर्वक श्राद्ध श्राद्धकर्ता को आयुष्य, आरोग्य, कीर्ति, प्रजा, बुद्धि, संतति आदि सब कुछ बढ़ानेवाला है | दक्षिण और पूर्व दिशा में,विशेषतया विदिक कोण में श्राद्धकर्म का विधान है | सर्वत्र अरत्नि (कनिष्ठिका अंगुली फैलाकर कोहनी तक की लम्बाई) परिमाण का चौकोर सुन्दर स्थान होना चाहिये | शास्त्रविधि के अनुसार पितरों के उपुयक्त श्राद्धस्थल में तीन गढ़े बनाने चाहिए जो परिमाण में रत्निमात्र (मुठ्ठी बाँधे हुए हाथ का परिमाण) लम्बे और चाँदी से विभूषित हो | इसके अतिरिक्त खदिर के डंडे भी होने चाहिये जो वित्ते भर लंबे हो | उनके चरों ओर चार अँगुल मान ले वेष्टन बने हो | पूर्व और दक्षिण के मुख भाग की ओर से पृथ्वी पर रखे गए, छिद्र रहित उन डंडोको परम पवित्र जल से नहलायें |बकरी के अथवा गाय के दूध अथवा जल से उनको पुन: शुद्ध करे |

इसप्रकार विधिपूर्वक तर्पण कराने से सर्वकालिक तृप्ति होती है | कर्ता ऐहिक – पारलौकिक विभूतियों से सुसमृद्ध तथा सर्व कर्म समन्वित होता है | इसी प्रकार तीन बार सवन स्नान कर जो विधिपूर्वक मंत्रादी का उच्चारण कर भलीभांति सर्वदा पितरों की पूजा करता है वह अश्वमेध यज्ञ का फलभागी होता है | अमावश्या तिथि को पृथ्वीतल पर चार अँगुल के गढ़ों में श्राद्धोपयोगी वस्तुओ की स्थापना करनी चाहिये | ये त्रि:सप्तयज्ञ के नाम से विख्यात है | इन्ही पर त्रैलोक्य की स्थिति है | जो व्यक्ति इसका अनुष्ठान करता है उसको पुष्टि, ऐश्वर्य, दीर्घायु, संतति, प्रचुर लक्ष्मी तथा मोक्ष की क्रमश: प्राप्ति होती है |

ब्राह्मणों से सत्कारित तथा पूजित यह एक मंत्र समस्त पापों को दूर करनेवाला, परम पवित्र तथा अश्वमेध यज्ञ की फलप्राप्ति करानेवाला है |
सूतजी कहते है : “हे ऋषियों ! इस मंत्र की रचना ब्रह्मा ने की थी | यह अमृत-मंत्र है |

देवताभ्य: पितृभ्यश्च महयोगिभ्य एव च |
नम: स्वधायै स्वहायै नित्यमेव भवन्तु ||

अर्थात – समस्त देवताओं, पितरों, महायोगियों , स्वधा एवं स्वाहा सबको हम नमस्कार करते है | ये सब स्वाश्वत फल प्रदान करनेवाले है |

सर्वदा श्राद्ध के प्रारम्भ, अवसान तथा पिंडदान के समय इस मंत्र को सावधान चित्त होकर तीन बार पाठ करना चाहिये जिससे पितृगण शीघ्र वहां आ जाते है और राक्षसगण भाग जाते है | राज्य प्राप्ति का अभिलाषी आलस्य रहित होकर इस मंत्र का सर्वदा पाठ करे | यह वीर्य, पवित्रता, धन, सात्विक बल, लक्ष्मी, दीर्घायु आदि को बढ़ानेवाला है | बुद्धिमान पुरुष कभी दीन, क्रुद्ध अथवा अन्यमनस्क होकर श्राद्ध न करे | एकाग्रचित्त होकर श्राद्ध करना चाहिये | मन में भावना करे कि जो कुछ भी अपवित्र तथा अनियमित वस्तुएँ है, मैं उन सबका निवारण कर रहा हूँ | सभी विघ्न डालनेवाले असुर एवं दानवों को मैं मार चूका | सब राक्षस, यक्ष, पिशाच एवं यातुधानो (राक्षस)के समूह मुझसे मारे जा चुके | समुद्र तथा समुद्र में गिरनेवाली नदियों के तट पर, गौओं की गौशाला में , नदी-संगम पर, उच्च गिरिशिखर पर , वनों में, स्वच्छ लीपी-पुती मनोहर पृथ्वी पर, गोबर से लीपे हुए एकांत घर में नित्य ही विधिपूर्वक श्राद्ध करने से मनोरथ पूर्ण होते है एवं इस प्रकार व्यक्ति ब्रह्मत्व की सिद्धि प्राप्त कर सकता है |

अश्रद्धधाना: पाप्मानो नास्तिका: स्थितसंशया: |
हेतुद्रष्टा च पंचैते न तीर्थ फल मश्चुते ||
गुरुतीर्थ परासिद्धिस्तिर्थाना परमं पदम |
ध्यानं तिर्थपर तस्माद ब्रह्मतीर्थ सनातम ||

‘श्राद्ध न करनेवाले. पापात्मा, परलोक को न माननेवाले संशयात्मा एवं सभी पुण्य कार्यों में किसी कारण का अन्वेषण करनेवाले कुतर्की – इन पांचो को पवित्र तीर्थो का फल नहीं मिलता | गुरुरुपी तीर्थ में परम सिद्धि प्राप्त होती है | वह सभी तीर्थो से श्रेष्ठ है | उसमे भी श्रेष्ठ तीर्थ ध्यान है | यह ध्यान साक्षात् ब्रह्मतीर्थ है | इसका कभी विनाश नहीं होता |’

ये तू व्रते स्थिता नित्यं ज्ञानिनो ध्यानिनस्तथा |
देवभक्ता महात्मान: पुनियुर्दर्शनादपी ||

‘जो ब्राह्मण नित्य व्रतपरायण रहते है, ज्ञानार्जन में प्रवृत रहकर योगाभ्यास में निरंत रहते है, देवता में भक्ति रखते है, महान आत्मा होते है वे दर्शन मात्र से पवित्र करते है |’
(वायुपुराण : ७९.९०)
जो व्यक्ति अष्टकाओं में पितरों की पूजा आदि नही करते उनका यह लोक (जन्म) व्यर्थ हो जाता है और जो कुछ प्राप्त है वह नष्ट हो जाता है | जो इन अवसरों पर श्राद्धादि का दान करते है वे देवताओं के समीप अर्थात स्वर्गलोक को जाते है और जो नहीं देते वे तीर्थक (अधम पक्षी आदि) योनियों में जाते है |जो पूर्णमासी के दिन श्राद्धादि करता है उसकी बुद्धि, पुष्टि, स्मरणशक्ति, धारणाशक्ति, पुत्र-पौत्रादि एवं ऐश्वर्य की वृद्धि होती है, वह पूर्ण पर्व का फल भोगता है |

इसी प्रकार प्रतिपदा धन-संम्पति के लिये होती है, एवं श्राद्ध करनेवाले की प्राप्त वास्तु नष्ट नहीं होती |
द्वितीया को श्राद्ध करनेवाला दो पादवालों (मनुष्यों) का राजा होता है | उत्तम अर्थ की प्राप्ति के अभिलाषी को तृतीया विहित है |
यही तृतीया शत्रुओं का नाश करनेवाली और पापनाशिनी है |
जो चतुर्थी को श्राद्ध करता है वह शत्रुओं का छिद्र देखता है अर्थात उसे शत्रुओं की समस्त कूट चालों का ज्ञान हो जाता है |
पंचमी तिथि को श्राद्ध करनेवाला उत्तम लक्ष्मी की प्राप्ति करता है |
जो षष्ठी तिथि को श्राद्धकर्म को संपन्न करता है उसकी पूजा देवता लोग करते है |
जो सप्तमी को श्राद्धादि करते है उनको महान यज्ञों के पुण्यफल प्राप्त होते है और वे गणों के स्वामी होते है |
जो मनुष्य अष्टमी को श्राद्ध करता है वह सम्पूर्ण समृद्धियाँ प्राप्त करता है |
नौवीं तिथि को श्राद्ध करनेवाले प्रचुर ऐश्वर्य एवं मन के अनुसार अनुकूल चलनेवाली स्त्री को प्राप्त करते है |
दशवी तिथि को श्राद्ध करनेवाला मनुष्य ब्रम्ह्त्व की लक्ष्मी प्राप्त करता है |
एकादशी का श्राद्ध सर्वश्रेष्ठ दान है | वह समस्त वेदों को प्राप्त कराता है | उसके सम्पूर्ण पापकर्मों का विनाश हो जाता है तथा उसे निरंतर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है |
द्वादशी तिथि के श्राद्ध से राष्ट्र का कल्याण तथा अन्नों की प्राप्ति कही गई है |
त्रयोदशी के श्राद्ध से संतति, बुद्धि, पशु, धारणाशक्ति, स्वतंत्रता, उत्तम पुष्टि, दीर्घायु तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है |
चतुर्दशी का श्राद्ध जिसके घर में जवान लोग मर गये हो उन सबके लिये किया जाता है तथा जो हथियारों द्वारा मरे गये हो उनके लिये भी चतुर्दशी को श्राद्ध करना चाहिए |
अमावश्या का श्राद्ध समस्त विषम उत्पन्न होनेवालों के लिये अर्थात तीन कन्याओं के बाद पुत्र या तीन पुत्रों के बाद कन्याएँ हो उनके लिए होता है | जुड़वे उत्पन्न होनेवालों के लिए ब्राम्हणों को भोजन देना चाहिये | इसका महान फल है |

जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते है वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते है और अनंतकाल तक स्वर्ग का उपयोग करते है | मघा नक्षत्र पितरों को अभीष्ट सिद्धि देनेवाला है | अत: उक्त नक्षत्र के दिन किया गया श्राद्ध अक्षय कहा गया है | पितृगण उसे सर्वदा अधिक पसंद करते है |
बृहस्पति ने कहा : श्राद्ध विषयक चर्चा एवं उसकी विधियों को सुनकर जो मनुष्य दोषदृष्टि से देखकर उनके अश्रध्दा करता है वह नास्तिक चारों ओर अंधकार से घिरकर घोर नरक में गिरता है | जो योग के द्वेष करनेवाले है वे समुद्र में ढोला बनकर तब तक निवास करते है जबतक इस पृथ्वी की अवस्थिति रहती है | भूल से भी योंगियो की निंदा तो करनी ही नहीं चाहिये क्योंकि योगियों की निंदा करने से बही कृमि होकर जन्म धारण करना पडता है | योगपरायण योगेश्वरों की निंदा करने से मनुष्य चारों ओर से अंधकार से आछन्न, अत्यंत घोर दिखाई पड़नेवाले नर्क में निश्चय ही जाता है | आत्मा को वश में रखनेवाले योगेश्वरो की निंदा जो मनुष्य सुनाता है वह चिरकाल पर्यंत कुम्भीपाक नरक में निवास करता है इसमें तनिक भी संदेह नहीं | योगियों के प्रति द्वेष की भावना मनसा, वाचा, कर्मणा.सर्वथा वर्जित रखनी चाहिये |
जिस प्रकार चरागाह में सैकड़ो गौओ में छिपी हुई अपनी माँ को बछड़ा ढूंढ लेता है उसीप्रकार श्राद्धकर्म में दिये गये पदार्थों को मंत्र वहाँ पर पहुंचा देता है जहाँ जिव अवस्थित रहता है | पितरों के नाम,गोत्र और मंत्र श्राद्ध में दिये गये अन्न को उनके पास ले जाते है, चाहे वे सैकड़ो योनियों में क्यों न गये हो | श्राद्ध के अन्नादि से उनकी तृप्ति होती है | परमेष्टि ब्रम्हा ने इसी प्रकार की श्राद्ध की मर्यादा स्थिर की है |
जो मनुष्य इस श्राद्ध के माहात्म्य को नित्य श्रद्धाभाव से, क्रोध को वश में रख, लोभ आदि से रहित होकर श्रवण करता है वह अनंत काल पर्यंत स्वर्ग भोगता है | समस्त तीर्थो एवं दानों के फलों को वह प्राप्त करता है | यह मौत का सबसे श्रेष्ठ उपाय है | स्वर्गप्राप्ति के लिए इससे बढ़कर श्रेष्ठ उपाय कोई दूसरा नहीं है | आलस्य रहित होकर पर्वसन्धियों में जो मनुष्य इस श्राद्ध विधि का पाठ सावधानीपूर्वक करता है वह मनुष्य परम तेजस्वी संततिवान होता है और देवताओं के सामान उसे पवित्र लोक की प्राप्ति होती है | जिन अजन्मा भगवान स्वयंभू (ब्रह्मा) ने श्राद्ध की पुनीत विधि बतलाई है उन्हें हम नमस्कार करते है | महान योगेश्वरों के चरणों में हम सर्वदा प्रणाम करते है | (वायुपुराण : अ . ७१ से ६१ का संक्षेप)

जैसे यहाँ के भेजे हुए रुपये लदंन में पाउंड, अमेरिका में डॉलर एवं जापान में येन बन जाते है ऐसे ही पितरों के प्रति किये गये श्राद्ध का अन्न, श्राद्धकर्म का फल हमारे पितर जहाँ है, जैसे है उनके अनुरूप उनको मिल जाता है | उससे संतुष्ट होकर वे श्राद्धकर्ता के कुल में कुलीन संतान और सुख-संतोष प्रदान करते है |दूरभाष और दूरदर्शन आदि यंत्र हजोरों किलोमीटर का अंतराय दूर करते है यह प्रत्यक्ष है | इन यंत्रों से भी मंत्रों का प्रभाव बहुत ही ज्यादा होता है | भगवान रामचंद्र भी श्राद्ध करते थे | पैठण के महान आत्मज्ञानी संत हो गये श्री एकनाथजी महाराज | पैठण के निंदक ब्राह्मणों ने एकनाथजी को ज्ञाति से बाहर क्र दिया था एवं उनके श्राद्ध का बहिष्कार किया था | उन योग्सपन्न एकनाथजी ने ब्राह्मणों के एवं अपने पिता,पितामह, प्रपितामह जो पितृलोक में थे, उनको बुलाकर भोजन कराया | यह देखकर पैठण के ब्राह्मण चकित रह गये एवं उनसे अपराधों की क्षमायाचना की |

देवलोक एवं पितृलोक का आयुष्य माननीय हजारों वर्षों से ज्यादा होता है |श्राद्धपर्व का वर्णन महाभारत, चतुर्थ खंड, स्त्रीपर्व में छब्बीसवें अध्याय में तथा श्राद्धकल्प का वर्णन सविस्तार वायुपुराण के ७१ से ८१ अध्याय तक एवं मत्स्यपुराण में भी श्राद्धकल्प एवं पितृगाथा वर्णन में आता है |इससे पितर एवं पितृलोक को मानकर उनका फायदा उठाना चाहिये तथा श्राद्ध करना चाहिये |

Also See Pujya Bapuji Ka Shraadh Mahima Satsang
Listen Audio:


Download Audio