Category Archives: Shraadh Mahima

रायपुर आश्रम में सामूहिक श्राद्ध

रायपुर  आश्रम में  सामूहिक श्राद्ध 

संत श्री आशारामजी बापू आश्रम रायपुर (छ.ग.) में सर्वपितृ अमावस्या के निमित्त तारीख ३०/०९/२०१६ को हजारों श्रद्धालुओं ने विद्वान् ब्राह्मणों द्वारा अपने पितरों का श्राद्ध व तर्पण किया । हर श्रद्धालु भावविभोर होकर प्रत्येक वैदिक श्राद्ध विधि को कर रहा था और सबने पितरों की सद्गति  के लिए दिव्य संकल्प भी किया। इस बार श्रद्धालुओं की संख्या पहले से और भी ज्यादा थी । श्रद्धालुओं को श्राद्ध तर्पण की सामग्री आश्रम द्वारा उपलब्ध करायी गयी । श्राद्ध तर्पण के प्रारंभ में श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ एवं भगवन्नाम जप, कीर्तन आदि किया गया ।

शास्त्रों में श्राद्ध की महत्ता बताई गई है की श्रद्धापूर्वक किया गया श्राद्ध पितरों तकअवश्य पहुँचता है । कृतज्ञता की भावना से कियागया श्राद्ध पितरों को आनंद, शांति एवं तृप्ति प्रदानकरता है । सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध तर्पण करने से पितृओं की सद् गति हो जाती है तथा पितृ संतुष्ट होकर परिवार में सुखशांति व समृद्धि बढ़ने का आशीर्वाद देते हैं ।सामूहिक श्राद्ध तर्पण का इस बार का दृश्य अलौकिक था ।श्राद्ध के अंत में प्राणिमात्र के कल्याण और विश्वशांति के लिए दिव्य संकल्प किया गया ।पूज्य बापूजी के मार्गदर्शन में प्रतिवर्ष ‘सर्वपितृ अमावस्या ’ को बापूजी के सभी आश्रमों में श्राद्ध तर्पण किया जाता है । जहाँ गरीबों में खीर वितरण कार्यक्रम भी रखा जाता है ।

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सुहागिनों के लिये किया जाता है अविधवा नवमी श्राद्ध

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पितृपक्ष की नवमी तिथि मृत सधवा स्त्री के लिए नियत की गई है। पति के जीवित रहते जिस स्त्री का निधन होता है, उसे “अहेव” कहा जाता है। मरने के बाद उसकी गिनती सधवा में ही होती है। कालांतर में जब उसके पति का देहांत होता है तब भी वह सधवा रहती है। अत: उसके पति यानी श्राद्धकर्ता का निधन होने पर पितृपक्ष की अविधवा नवती का श्राद्ध उसके पुत्र जारी रखें। यदि श्राद्धकर्ता पुत्र का देहांत हो जाए तो उसके बच्चो पितामही अविधवा नवमी का श्राद्ध न करे।

यदि सौतेली मां जीवित हो और सगी मां का निधन हो जाए या सगी मां जीवित हो तथा सौतेली मां का निधन हो जाए तो भी पुत्र को यह श्राद्ध करना चाहिए। यदि एक से अधिक माता का देहांत सधवा स्थिति में हुआ हो तो उन माताओं का श्राद्ध अविधवा नवमी को एकतंत्रय पद्धति से करना चाहिए। ऎसे समय भोजन के लिए उतनी ही संख्या में सुहासिनियों को आमंत्रित करे।

लडका न होने पर अविधवा नवमी का श्राद्ध पुत्री या जमाई नहीं कर सकते।

श्राद्ध करने का विधि – श्राद्ध पक्ष ( १६ सितम्बर से ३० सितम्बर)

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पितृ पक्ष श्राद्ध की तिथियां निम्न हैं:

तिथि

दिन

श्राद्ध तिथियाँ

16 सितंबर

शुक्रवार

पूर्णिमा श्राद्ध

17 सितंबर

शनिवार 

प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध

18 सितंबर

रविवार

द्वितीया तिथि का श्राद्ध

19 सितंबर

सोमवार

तृतीया – चतुर्थी तिथि का श्राद्ध (एक साथ)

20 सितंबर

मंगलवार

पंचमी तिथि का श्राद्ध

21 सितंबर

बुधवार

षष्ठी  तिथि का श्राद्ध

22 सितंबर

गुरुवार

सप्तमी तिथि का श्राद्ध

23 सितंबर

शुक्रवार

अष्टमी तिथि का श्राद्ध

24 सितंबर

शनिवार

नवमी तिथि का श्राद्ध

25 सितंबर

रविवार

दशमी तिथि का श्राद्ध

26 सितंबर

सोमवार

एकादशी तिथि का श्राद्ध

27 सितंबर

मंगलवार

द्वादशी तिथि का श्राद्ध

28 सितंबर

बुधवार

त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध

29 सितंबर

गुरुवार

 चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध

30 सितंबर

शुक्रवार

अमावस्या व सर्वपितृ श्राद्ध 

रायपुर आश्रम में सामूहिक श्राद्ध

    रायपुर आश्रम में सामूहिक श्राद्ध

12 अक्टूबर 2015 को रायपुर आश्रम में सर्वपित्री (सोमवती ) अमावस्या पर वैदिक रीती -रिवाज से सामूहिक श्राद्ध (पितृ तर्पण ) कार्यक्रम किया गया व गों पूजन कर गों ग्रास खिलाया गया |

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गरूड़ पुराण में श्राद्ध-महिमा

“अमावस्या के दिन पितृगण वायुरूप में घर के दरवाजे पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। जब तक सूर्यास्त नहीं हो जाता, तब तक वे भूख-प्यास से व्याकुल होकर वहीं खड़े रहते हैं। सूर्यास्त हो जाने के पश्चात वे निराश होकर दुःखित मन से अपने-अपने लोकों को चले जाते हैं। अतः अमावस्या के दिन प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि पितृजनों के पुत्र तथा बन्धु-बान्धव उनका श्राद्ध करते हैं और गया-तीर्थ में जाकर इस कार्य में प्रवृत्त होते हैं तो वे उन्ही पितरों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करने का अधिकार प्राप्त करते हैं। उन्हें भूख-प्यास कभी नहीं लगती। इसीलिए विद्वान को प्रयत्नपूर्वक यथाविधि शाकपात से भी अपने पितरों के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति।
आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।।
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।
देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।।
देवताभ्यः पितृणां हि पूर्वमाप्यायनं शुभम्।

“समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।”  (10.57.59)

जो लोग अपने पितृगण, देवगण, ब्राह्मण तथा अग्नि की पूजा करते हैं, वे सभी प्राणियों की अन्तरात्मा में समाविष्ट मेरी ही पूजा करते हैं। शक्ति के अनुसार विधिपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य ब्रह्मपर्यंत समस्त चराचर जगत को प्रसन्न कर देता है।

हे आकाशचारिन् गरूड़ ! पिशाच योनि में उत्पन्न हुए पितर मनुष्यों के द्वारा श्राद्ध में पृथ्वी पर जो अन्न बिखेरा जाता है उससे संतृप्त होते हैं। श्राद्ध में स्नान करने से भीगे हुए वस्त्रों द्वारा जी जल पृथ्वी पर गिरता है, उससे वृक्ष योनि को प्राप्त हुए पितरों की संतुष्टि होती है। उस समय जो गन्ध तथा जल भूमि पर गिरता है, उससे देव योनि को प्राप्त पितरों को सुख प्राप्त होता है। जो पितर अपने कुल से बहिष्कृत हैं, क्रिया के योग्य नहीं हैं, संस्कारहीन और विपन्न हैं, वे सभी श्राद्ध में विकिरान्न और मार्जन के जल का भक्षण करते हैं। श्राद्ध में भोजन करने के बाद आचमन एवं जलपान करने के लिए ब्राह्मणों द्वारा जो जल ग्रहण किया जाता है, उस जल से पितरों को संतृप्ति प्राप्त होती है। जिन्हें पिशाच, कृमि और कीट की योनि मिली है तथा जिन पितरों को मनुष्य योनि प्राप्त हुई है, वे सभी पृथ्वी पर श्राद्ध में दिये गये पिण्डों में प्रयुक्त अन्न की अभिलाषा करते हैं, उसी से उन्हें संतृप्ति प्राप्त होती है।

इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वेश्यों के द्वारा विधिपूर्वक श्राद्ध किये जाने पर जो शुद्ध या अशुद्ध अन्न जल फेंका जाता है, उससे उन पितरों की तृप्ति होती है जिन्होंने अन्य जाति में जाकर जन्म लिया है। जो मनुष्य अन्यायपूर्वक अर्जित किये गये पदार्थों के श्राद्ध करते हैं, उस श्राद्ध से नीच योनियों में जन्म ग्रहण करने वाले चाण्डाल पितरों की तृप्ति होती है।

हे पक्षिन् ! इस संसार में श्राद्ध के निमित्त जो कुछ भी अन्न, धन आदि का दान अपने बन्धु-बान्धवों के द्वारा किया जाता है, वह सब पितरों को प्राप्त होता है। अन्न जल और शाकपात आदि के द्वारा यथासामर्थ्य जो श्राद्ध किया जाता है, वह सब पितरों की तृप्ति का हेतु है।

महाकाल ने दिए पितरों के उद्धार के लिए सुंदर उपाय!!

एक बार महाराज करन्धम महाकाल का दर्शन करने गये। कालभीति महाकाल ने जब करन्धम को देखा, तब उन्हें भगवान शंकर का वचन स्मरण हो आया। उन्होंने उनका स्वागत सत्कार किया और कुशल-प्रश्नादि के बाद वे सुखपूर्वक बैठ गये। तदनन्तर करन्धम ने महाकाल (कालभीति) से पूछाः “भगवन ! मेरे मन में एक बड़ा संशय है कि यहाँ जो पितरों को जल दिया जाता है, वह तो जल में मिल जाता, फिर वह पितरों को कैसे प्राप्त होता है? यही बात श्राद्ध के सम्बन्ध में भी है। पिण्ड आदि जब यहीं पड़े रह जाते हैं, तब हम कैसे मान लें कि पितर लोग उन पिण्डादि का उपयोग करते हैं? साथ ही यह कहने का साहस भी नहीं होता कि वे पदार्थ पितरों को किसी प्रकार मिले ही नहीं, क्योंकि स्वप्न में देखा जाता है कि पितर मनुष्यों से श्राद्ध आदि की याचना करते हैं। देवताओं के चमत्कार भी प्रत्यक्ष देखे जाते हैं। अतः मेरा मन इस विषय में मोहग्रस्त हो रहा है।”

महाकाल,श्राद्ध,shraadhमहाकाल ने कहाः “राजन ! देवता और पितरों की योनि ही इस प्रकार की है दूर से कही हुई बात, दूर से किया हुआ पूजन-संस्कार, दूर से की हुई अर्चा, स्तुति तथा भूत, भविष्य और वर्त्तमान की सारी बातों को वे जान लेते हैं और वहीं पहुँच जाते हैं। उनका शरीर केवल नौ तत्त्वों (पाँच तन्मात्राएँ और चार अन्तःकरण) का बना होता है, दसवाँ जीव होता है, इसलिए उन्हें स्थूल उपभोगों की आवश्यकता नहीं होती।”

करन्धम ने कहाः “यह बात तो तब मानी जाये, जब पितर लोग यहाँ भूलोक में हों। परन्तु जिन मृतक पितरों के लिए यहाँ श्राद्ध किया जाता है वे तो अपने कर्मानुसार स्वर्ग या नरक में चले जाते हैं। दूसरी बात, जो शास्त्रों में यह कहा गया है किः पितर लोग प्रसन्न होकर मनुष्यों को आयु, प्रज्ञा, धन, विद्या, राज्य, स्वर्ग या मोक्ष प्रदान करते हैं… यह भी सम्भव नहीं है, क्योंकि जब वे स्वयं कर्मबन्धन में पड़कर नरक में है, तब दूसरों के लिए कुछ कैसे करेंगे!”

महाकाल ने कहाः “ठीक है, किन्तु देवता, असुर, यक्ष आदि के तीन अमूर्त तथा चारों वर्णओँ के चार मूर्त, ये सात प्रकार के पितर माने गये हैं। ये नित्य पितर हैं। ये कर्मों के आधीन नहीं, ये सबको सब कुछ देने समर्थ हैं। इन नित्य पितरों के अत्यन्त प्रबल इक्कीस गण हैं। वे तृप्त होकर श्राद्धकर्त्ता के पितरों को, वे चाहे कहीं भी हो, तृप्त करते हैं।”

करन्धम ने कहाः “महाराज ! यह बात तो समझ में आ गयी, किन्तु फिर भी एक सन्देह है। भूत-प्रेतादि के लिए जैसे एकत्रित बलि आदि दिया जाता है, वैसे ही एकत्रित करके संक्षेप मे देवतादि के लिए भी क्यों नहीं दिया जाता? देवता, पितर, अग्नि, इनको अलग-अलग नाम लेकर देने में बड़ा झंझट तथा विस्तार से कष्ट भी होता है।”

महाकाल ने कहाः “सभी के विभिन्न नियम हैं। घर के दरवाजे पर बैठनेवाले कुत्ते को जिस प्रकार खाना दिया जाता है, क्या उसी प्रकार एक विशिष्ट सम्मानित व्यक्ति को भी दिया जाए?…. और क्या वह उस तरह दिए जाने पर उसे स्वीकार करेगा? अतः जिस प्रकार भूतादि को दिया जाता है उसी प्रकार देने पर देवता उसे ग्रहण नहीं करते। बिना श्रद्धा के दिया हुआ चाहे उसी प्रकार देने पर देवता उसे ग्रहण नहीं करते। बिना श्रद्धा के दिया हुआ चाहे वह जितना भी पवित्र तथा बहूमूल्य क्यों न हो, वे उसे कदापि नहीं लेते। यही नहीं, श्रद्धापूर्वक दिये गये पवित्र पदार्थ भी बिना मंत्र के वे स्वीकार नहीं करते।”

करन्धम ने कहाः “मैं यह जानना चाहता हूँ कि जो दान दिया जाता है वह कुश, जल और अक्षत के साथ क्यों दिया जाता है?”

महाकाल ने कहाः “पहले भूमि पर जो दान दिये जाते थे, उन्हें असुर लोग बीच में ही घुसकर ले लेते थे। देवता और पितर मुँह देखते ही रह जाते। आखिर उन्होंने ब्रह्मा जी से शिकायत की।

ब्रह्माजी ने कहा कि पितरों को दिये गये पदार्थों के साथ अक्षत, तिल, जल, कुश एवं जौ भी दिया जाए। ऐसा करने पर असुर इन्हें न ले सकेंगे। इसीलिए यह परिपाटी है।”

एकनाथजी महाराज के श्राद्ध में पितृगण साक्षात प्रकट हुए!

श्राद्ध

एकनाथजी महाराज श्राद्धकर्म कर रहे थे। उनके यहाँ स्वादिष्ट व्यंजन बन रहे थे। भिखमंगे लोग उनके द्वार से गुजरे। उन्हे बड़ी लिज्जतदार खुश्बू आयी। वे आपस में चर्चा करने लगेः “आज तो श्राद्ध है…. खूब माल उड़ेगा।”

दूसरे ने कहाः “यह भोजन तो पहले ब्राह्मणों को खिलाएँगे। अपने को तो बचे-खुचे जूठे टुकड़े ही मिलेंगे।”

एकनाथजी ने सुन लिया। उन्होंने अपनी धर्मपत्नी गिरजाबाई से कहाः “ब्राह्मणों को तो भरपेट बहुत लोग खिलाते हैं। इन लोगों में भी तो ब्रह्मा परमात्मा विराज रहा है। इन्होंने कभी खानदानी ढंग से भरपेट स्वादिष्ट भोजन नहीं किया होगा। इन्हीं को आज खिला दें। ब्राह्मणों के लिए दूसरा बना दोगी न? अभी तो समय है।”

गिरजाबाई बोलीः “हाँ, हाँ पतिदेव ! इसमें संकोच से क्यों पूछते हो?”

गिरजाबाई सोचती है किः “मेरी सेवा में जरूर कोई कमी होगी, तभी स्वामी को मुझे सेवा सौंपने में संकोच हो रहा है।”

अगर स्वामी सेवक से संकुचित होकर कोई काम करवा रहे हैं तो यह सेवक के समर्पण में कमी है। जैसे कोई अपने हाथ-पैर से निश्चिन्त होकर काम लेता है ऐसे ही स्वामी सेवक से निश्चिन्त होकर काम लेने लग जायें तो सेवक का परम कल्याण हो गया समझना।

एकनाथ जी ने कहाः “……………..तो इनको खिला दें।”

उन भिखमंगों में परमात्मा को देखनेवाले दंपत्ति ने उन्हें खिला दिया। इसके बाद नहा धोकर गिरजाबाई ने फिर से भोजन बनाना प्रारम्भ कर दिया। अभी दस ही बजे थे मगर सारे गाँव में खबर फैल गई किः ‘जो भोजन ब्राह्मणों के लिए बना था वह भिखमंगों को खिला दिया गया। गिरजाबाई फिर से भोजन बना रही है।’

सब लोग अपने-अपने विचार के होते हैं। जो उद्दंड ब्राह्मण थे उन्होंने लोगों को भड़काया किः “यह ब्राह्मणों का घोर अपमान है। श्राद्ध के लिए बनाया गया भोजन ऐस म्लेच्छ लोगों को खिला दिया गया जो कि नहाते धोते नहीं, मैले कपड़े पहनते हैं, शरीर से बदबू आती है…. और हमारे लिए भोजन अब बनेगा? हम जूठन खाएँगे? पहले वे खाएँ और बाद में हम खाएँगे? हम अपने इस अपमान का बदला लेंगे।”

तत्काल ब्राह्मणों की आपातकालीन बैठक बुलाई गई। पूरा गाँव एक तरफ हो गया। निर्णय लिया गया कि “एकनाथ जी के यहाँ श्राद्धकर्म में कोई नहीं जाएगा, भोजन करने कोई नहीं जायेगा ताकि इनके पितर नर्क में पड़ें और इनका कुल बरबाद हो।”

एकनाथ जी के घर द्वार पर लट्ठधारी दो ब्राह्मण युवक खड़े कर दिये गये।

इधर गिरजाबाई ने भोजन तैयार कर दिया। एकनाथ जी ने देखा कि ये लोग किसी को आने देने वाले नहीं हैं।….. तो क्या किया जाये? जो ब्राह्मण नहीं आ रहे थे, उनकी एक-दो पीढ़ी में पिता, पितामह, दादा, परदादा आदि जो भी थे, एकनाथ जी महाराज ने अपनी संकल्पशक्ति, योगशक्ति का उपयोग करके उन सबका आवाहन किया। सब प्रकट हो गये।

“क्या आज्ञा है, महाराज !”

एकनाथजी बोलेः “बैठिये, ब्राह्मणदेव ! आप इसी गाँव के ब्राह्मण हैं। आज मेरे यहाँ भोजन कीजिए।”

गाँव के ब्राह्मणों के पितरों की पंक्ति बैठी भोजन करने। हस्तप्रक्षालन, आचमन आदि पर गाये जाने वाले श्लोकों से एकनाथ जी का आँगन गूँज उठा। जो दो ब्राह्मण लट्ठ लेकर बाहर खड़े थे वे आवाज सुनकर चौंके ! उन्होंने सोचाः ‘हमने तो किसी ब्राह्मण को अन्दर जाने दिया।’ दरवाजे की दरार से भीतर देखा तो वे दंग रह गये ! अंदर तो ब्राह्मणों की लंबी पंक्ति लगी है…. भोजन हो रहा है !

जब उन्होंने ध्यान से देखा तो पता चला किः “अरे ! यह क्या? ये तो मेरे दादा हैं ! वे मेरे नाना ! वे उसके परदादा !”

दोनों भागे गाँव के ब्राह्मणों को खबर करने। उन्होंने कहाः “हमारे और तुम्हारे बाप-दादा, परदादा, नाना, चाचा, इत्यादि सब पितरलोक से उधर आ गये हैं। एकनाथजी के आँगन में श्राद्धकर्म अब भोजन पा रहे हैं।”

गाँव के सब लोग भागते हुए आये एकनाथ झी के यहाँ। तब तक तो सब पितर भोजन पूरा करके विदा हो रहे थे। एकनाथ जी उन्हें विदाई दे रहे थे। गाँव के ब्राह्मण सब देखते ही रह गये ! आखिर उन्होंने एकनाथजी को हाथ जोड़े और बोलेः “महाराज ! हमने आपको नहीं पहचाना। हमें माफ कर दो।”

इस प्रकार गाँव के ब्राह्मणों एवं एकनाथजी के बीच समझौता हो गया। नक्षत्र और ग्रहों को उनकी जगह से हटाकर अपनी इच्छानुसार गेंद की तरह घुमा सकते हैं। स्मरण करने मात्र से देवता उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो सकते हैं। आवाहन करने से पितर भी उनके आगे प्रगट हो सकते हैं और उन पितरों को स्थूल शरीर में प्रतिष्ठित करके भोजन कराया जा सकता है।