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श्री गणेश अष्टोत्तर शतनामावलि

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श्री गणेश अष्टोत्तर शतनामावलि
१] ॐ गजाननाय नमः।
२] ॐ गणाध्यक्षाय नमः।
३] ॐ विघ्नाराजाय नमः।
४] ॐ विनायकाय नमः।
५] ॐ द्वैमातुराय नमः।
६] ॐ द्विमुखाय नमः।
७] ॐ प्रमुखाय नमः।
८] ॐ सुमुखाय नमः।
९] ॐ कृतिनॆ नमः।
१०] ॐ सुप्रदीपाय नमः।
११] ॐ सुखनिधयॆ नमः।
१२] ॐ सुराध्यक्षाय नमः।
१३] ॐ सुरारिघ्नाय नमः।
१४] ॐ महागणपतयॆ नमः।
१५] ॐ मान्याय नमः।
१६] ॐ महाकालाय नमः।
१७] ॐ महाबलाय नमः।
१८] ॐ हॆरम्बाय नमः।
१९] ॐ लम्बजठरायै नमः।
२०] ॐ ह्रस्व ग्रीवाय नमः।
२१] ॐ महॊदराय नमः।
२२] ॐ मदॊत्कटाय नमः।
२३] ॐ महावीराय नमः।
२४] ॐ मन्त्रिणॆ नमः।
२५] ॐ मङ्गल स्वराय नमः।
२६] ॐ प्रमधाय नमः।
२७] ॐ प्रथमाय नमः।
२८] ॐ प्राज्ञाय नमः।
२९] ॐ विघ्नकर्त्रॆ नमः।
३०] ॐ विघ्नहन्त्रॆ नमः।
३१] ॐ विश्व नॆत्रॆ नमः।
३२] ॐ विराट्पतयॆ नमः।
३३] ॐ श्रीपतयॆ नमः।
३४] ॐ वाक्पतयॆ नमः।
३५] ॐ शृङ्गारिणॆ नमः।
३६] ॐ अश्रितवत्सलाय नमः।
३७] ॐ शिवप्रियाय नमः।
३८] ॐ शीघ्रकारिणॆ नमः।
३९] ॐ शाश्वताय नमः।
४०] ॐ बल नमः।
४१] ॐ बलॊत्थिताय नमः।
४२] ॐ भवात्मजाय नमः।
४३] ॐ पुराण पुरुषाय नमः।
४४] ॐ पूष्णॆ नमः।
४५] ॐ पुष्करॊत्षिप्त वारिणॆ नमः।
४६] ॐ अग्रगण्याय नमः।
४७] ॐ अग्रपूज्याय नमः।
४८] ॐ अग्रगामिनॆ नमः।
४९] ॐ मन्त्रकृतॆ नमः।
५०] ॐ चामीकरप्रभाय नमः।
५१] ॐ सर्वाय नमः।
५२] ॐ सर्वॊपास्याय नमः।
५३] ॐ सर्व कर्त्रॆ नमः।
५४] ॐ सर्वनॆत्रॆ नमः।
५५] ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः।
५६] ॐ सिद्धयॆ नमः।
५७] ॐ पञ्चहस्ताय नमः।
५८] ॐ पार्वतीनन्दनाय नमः।
५९] ॐ प्रभवॆ नमः।
६०] ॐ कुमारगुरवॆ नमः।
६१] ॐ अक्षॊभ्याय नमः।
६२] ॐ कुञ्जरासुर भञ्जनाय नमः।
६३] ॐ प्रमॊदाय नमः।
६४] ॐ मॊदकप्रियाय नमः।
६५] ॐ कान्तिमतॆ नमः।
६६] ॐ धृतिमतॆ नमः।
६७] ॐ कामिनॆ नमः।
६८] ॐ कपित्थपनसप्रियाय नमः।
६९] ॐ ब्रह्मचारिणॆ नमः।
७०] ॐ ब्रह्मरूपिणॆ नमः।
७१] ॐ ब्रह्मविद्यादि दानभुवॆ नमः।
७२] ॐ जिष्णवॆ नमः।
७३] ॐ विष्णुप्रियाय नमः।
७४] ॐ भक्त जीविताय नमः।
७५] ॐ जितमन्मधाय नमः।
७६] ॐ ऐश्वर्यकारणाय नमः।
७७] ॐ ज्यायसॆ नमः।
७८] ॐ यक्षकिन्नेर सॆविताय नमः।
७९] ॐ गङ्गा सुताय नमः।
८०] ॐ गणाधीशाय नमः।
८१] ॐ गम्भीर निनदाय नमः।
८२] ॐ वटवॆ नमः।
८३] ॐ अभीष्टवरदाय नमः।
८४] ॐ ज्यॊतिषॆ नमः।
८५] ॐ भक्तनिधयॆ नमः।
८६] ॐ भावगम्याय नमः।
८७] ॐ मङ्गलप्रदाय नमः।
८८] ॐ अव्यक्ताय नमः।
८९] ॐ अप्राकृत पराक्रमाय नमः।
९०] ॐ सत्यधर्मिणॆ नमः।
९१] ॐ सखयॆ नमः।
९२] ॐ सरसाम्बुनिधयॆ नमः।
९३] ॐ महॆशाय नमः।
९४] ॐ दिव्याङ्गाय नमः।
९५] ॐ मणिकिङ्किणी मॆखालाय नमः।
९६] ॐ समस्त दॆवता मूर्तयॆ नमः।
९७] ॐ सहिष्णवॆ नमः।
९८] ॐ सततॊत्थिताय नमः।
९९] ॐ विघातकारिणॆ नमः।
१००] ॐ विश्वग्दृशॆ नमः।
१०१] ॐ विश्वरक्षाकृतॆ नमः।
१०२] ॐ कल्याणगुरवॆ नमः।
१०३] ॐ उन्मत्तवॆषाय नमः।
१०४] ॐ अपराजितॆ नमः।
१०५] ॐ समस्त जगदाधाराय नमः।
१०६] ॐ सर्वैश्वर्यप्रदाय नमः।
१०७] ॐ आक्रान्त चिद चित्प्रभवॆ नमः।
१०८] ॐ श्री विघ्नॆश्वराय नमः।

 

स्यमन्तक मणि कथा

maniश्रीमदभागवत १० वाँ स्कंद ५६-५७ वाँ अध्याय  में ये कथा आती है |

श्री शुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित ! सत्राजित ने श्रीकृष्ण को झूठा कलंक लगाया था। फिर उस अपराध का मार्जन करने के लिए उसने स्वयं स्यमन्तक मणि सहित अपनी कन्या सत्याभामा भगवान श्रीकृष्ण को सौंप दी।

राजा परीक्षित ने पूछाः भगवन् ! सत्राजित ने भगवान श्रीकृष्ण का क्या अपराध किया था ? उसे स्यमंतक मणि कहाँ से मिली ? और उसने अपनी कन्या उन्हें क्यों दी ?

श्रीशुकदेव जी ने कहाः परीक्षित ! सत्राजित भगवान सूर्य का बहुत बड़ा भक्त था। वे उसकी भक्ती से प्रसन्न होकर उसके बहुत बड़े मित्र बन गये थे। सूर्य भगवान ने ही प्रसन्न होकर बड़े प्रेम से उसे स्यमंतक मणि दी थी। सत्राजित उस मणि को गले में धारण कर ऐसा चमकने लगा, मानो स्वयं सूर्य ही हो। परीक्षित ! जब सत्राजित द्वारका आया, तब अत्यन्त तेजस्विता के कारण लोग उसे पहचान न सके। दूर से ही उसे देखकर लोगों की आँखें उसके तेज से चौंधिया गईं। लोगों ने समझा कि कदाचित स्वयं भगवान सूर्य आ रहे हैं। उन लोगों ने भगवान के पास आकर उन्हें इस बात की सूचना दी। उस समय भगवान चौसर खेल रहे थे। लोगों ने कहाः ‘शंख-चक्र-गदाधारी नारायण ! कमलनयन दामोदर ! यदुवंशशिरोमणि गोविन्द ! आपको नमस्कार है। जगदीश्वर देखिये, अपनी चमकीली किरणों से लोगों के नेत्रों को चौंधियाते हुए प्रचण्डरश्मि भगवान सूर्य आपका दर्शन करने आ रहे हैं। प्रभो ! सभी श्रेष्ठ देवता त्रिलोकी में आपकी प्राप्ति का मार्ग ढूँढते रहते हैं, किन्तु उसे पाते नहीं। आज आपको यदुवंश में छिपा हुआ जानकर स्वयं सूर्यनारायण आपका दर्शन करने आ रहे हैं।

श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित ! अनजान पुरूषों की यह बात सुनकर कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण हँसने लगे। उन्होंने कहा- ‘अरे, ये सूर्यदेव नहीं है। यह तो सत्राजित है, जो मणि के कारण इतना चमक रहा है। इसके बाद सत्राजित अपने समृद्ध घर में चला आया। घर पर उसके शुभागमन के उपलक्ष्य में मंगल-उत्सव मनाया जा रहा था। उसने ब्राह्मणों द्वारा स्यमंतक मणि को एक देवमन्दिर में स्थापित करा दिया। परीक्षित ! वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना दिया करती थी। और जहाँ वह पूजित होकर रहती थी, वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहपीड़ा, सर्पभय, मानसिक और शारीरिक व्यथा तथा मायावियों का उपद्रव आदि कोई भी अशुभ नहीं होता था। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसंगवश कहा- ‘सत्राजित ! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेन को दे दो।’ परन्तु वह इतना अर्थलोलुप-लोभी था कि भगवान की आज्ञा का उल्लंघन होगा, इसका कुछ भी विचार न करके उसे अस्वीकार कर दिया।

एक दिन सत्राजित के भाई प्रसेन ने उस परम प्रकाशमयी मणि को अपने गले में धारण कर लिया और फिर वह घोड़े पर सवार होकर शिकार खेलने वन में चला गया। वहाँ एक सिंह ने घोड़े सहित प्रसेन को मार डाला और उस मणि को छीन लिया। वह अभी पर्वत की गुफा में प्रवेश कर ही रहा था कि मणि के लिए ऋक्षराज जाम्बवान् ने उसे मार डाला। उन्होंने वह मणि अपनी गुफा में ले जाकर बच्चे को खेलने के लिए दे दी। अपने भाई प्रसेन के न लौटने से उसके भाई सत्राजित को बड़ा दुःख हुआ। वह कहने लगा, ‘बहुत सम्भव है श्रीकृष्ण ने ही मेरे भाई को मार डाला हो, क्योंकि वह मणि गले में डालकर वन में गया था।’ सत्राजित की यह बात सुनकर लोग आपस में काना-फूँसी करने लगे। जब भगवान श्रीकृष्ण ने सुना कि यह कलंक का टीका मेरे सिर लगाया गया है, तब वे उसे धो-बहाने के उद्देश्य से नगर के कुछ सभ्य पुरूषों को साथ लेकर प्रसेन को ढूँढने के लिए वन में गये। वहाँ खोजते-खोजते लोगों ने देखा कि घोर जंगल में सिंह ने प्रसेन और उसके घोड़े को मार डाला है। जब वे लोग सिंह के पैरों का चिन्ह देखते हुए आगे बढ़े, तब उन लोगों ने यह भी देखा कि पर्वत पर रीछ ने सिंह को भी मार डाला है।

भगवान श्रीकृष्ण ने सब लोगों को बाहर ही बिठा दिया और अकेले ही घोर अन्धकार से भरी हुई ऋक्षराज की भयंकर गुफा में प्रवेश किया। भगवान ने वहाँ जाकर देखा कि श्रेष्ठ मणि स्यमन्तक को बच्चों का खिलौना बना दिया गया है। वे उसे हर लेने की इच्छा से बच्चे के पास जा खड़े हुए। उस गुफा में एक अपरिचित मनुष्य को देखकर बच्चे की धाय भयभीत की भाँति चिल्ला उठी। उसकी चिल्लाहट सुनकर परम बली ऋक्षराज जाम्बवान क्रोधित होकर वहाँ दौड़ आये। परीक्षित ! जाम्बवान उस समय कुपित हो रहे थे। उन्हें भगवान की महिमा, उनके प्रभाव का पता न चला। उन्होंने एक साधारण मनुष्य समझ लिया और वे अपने स्वामी भगवान श्रीकृष्ण से युद्ध करने लगे। जिस प्रकार मांस के लिये दो बाज आपस में लड़ते हैं, वैसे ही विजयाभिलाषी भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवान आपस में घमासान युद्ध करने लगे। पहले तो उन्होंने अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार किया, फिर शिलाओं का तत्पश्चात वे वृक्ष उखाड़कर एक दूसरे पर फेंकने लगे। अन्त में उनमें बाहुयुद्ध होने लगा। परीक्षित ! वज्र-प्रहार के समान कठोर घूँसों की चोट से जाम्बवान के शरीर की एक एक गाँठ टूट गयी। उत्साह जाता रहा। शरीर पसीने से लथपथ हो गया। तब उन्होंने अत्यंत विस्मित-चकित होकर भगवान श्रीकृष्ण से कहा- ‘प्रभो ! मैं जान गया। आप ही समस्त प्राणियों के स्वामी, रक्षक, पुराणपुरूष भगवान विष्णु हैं। आप ही सबके प्राण, इन्द्रियबल, मनोबल और शरीर बल हैं। आप विश्व के रचयिता ब्रह्मा आदि को भी बनाने वाले हैं। बनाये हुए पदार्थों में भी सत्तारूप से आप ही विराजमान हैं। काल के कितने भी अवयव है, उनके नियामक परम काल आप ही हैं और शरीर भेद से भिन्न-भिन्न प्रतीयमान अन्तरात्माओं के परम आत्मा भी आप ही हैं। प्रभो ! मुझे स्मरण है, आपने अपने नेत्रों में तनिक सा क्रोध का भाव लेकर तिरछी दृष्टि से समुद्र की ओर देखा था। उस समय समुद्र के अंदर रहने वाल बड़े-बड़े नाक (घड़ियाल) और मगरमच्छ क्षुब्ध हो गये थे और समुद्र ने आपको मार्ग दे दिया था। तब आपने उस पर सेतु बाँधकर सुन्दर यश की स्थापना की तथा लंका का विध्वंस किया। आपके बाणों से कट-कटकर राक्षसों के सिर पृथ्वी पर लोट रहे थे। (अवश्य ही आप मेरे वे ही राम जी श्रीकृष्ण के रूप में आये हैं।) परीक्षित ! जब ऋक्षराज जाम्बवान ने भगवान को पहचान लिया, तब कमलनयन श्रीकृष्ण ने अपने परम कल्याणकारी शीतल करकमल को उनके शरीर पर फेर दिया और फिर अहैतुकी कृपा से भरकर प्रेम गम्भीर वाणी से अपने भक्त जाम्बवान जी से कहा- ऋक्षराज ! हम मणि के लिए ही तुम्हारी इस गुफा में आये हैं। इस मणि के द्वारा मैं अपने पर लगे झूठे कलंक को मिटाना चाहता हूँ। भगवान के ऐसा कहने पर जाम्बवान बड़े आनन्द से उनकी पूजा करने के लिए अपनी कन्या कुमारी जाम्बवती को मणि के साथ उनके चरणों में समर्पित कर दिया।

भगवान श्रीकृष्ण जिन लोगों को गुफा के बाहर छोड़ गये थे, उन्होंने बारह दिन तक उनकी प्रतीक्षा की। परन्तु जब उन्होंने देखा कि अब तक वे गुफा से नहीं निकले, तब वे अत्यंत दुःखी होकर द्वारका लौट गये। वहाँ जब माता देवकी, रूक्मणि, वसुदेव जी तथा अन्य सम्बन्धियों और कुटुम्बियों को यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण गुफा से नहीं निकले, तब उन्हें बड़ा शोक हुआ। सभी द्वारकावासी अत्यंत दुःखित होकर सत्राजित को भला बुरा कहने लगे और भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए महामाया दुगदिवी की शरण गये, उनकी उपासना करने लगे। उनकी उपासना से दुगदिवी प्रसन्न हुई और उन्होंने आशीर्वाद दिया। उसी समय उनके बीच में मणि और अपनी नववधू जाम्बवती के साथ सफलमनोरथ होकर श्रीकृष्ण होकर श्रीकृष्ण सबको प्रसन्न करते हुए प्रकट हो गये। सभी द्वारकावासी भगवान श्रीकृष्ण को पत्नी के साथ और गले में मणि धारण किये हुए देखकर परमानन्द में मग्न हो गये, मानो कोई मरकर लौट आया हो।

तदनन्तर भगवान ने सत्राजित को राजसभा में महाराज उग्रसेन के पास बुलवाया और जिस प्रकार मणि प्राप्त हुई थी, वह सब कथा सुनाकर उन्होंने वह मणि सत्राजित को सौंप दी। सत्राजित अत्यंत लज्जित हो गया। मणि तो उसने ले ली, परन्तु उसका मुँह नीचे की ओर लटक गया। अपने अपराध पर उसे बड़ा पश्चाताप हो रहा था, किसी प्रकार वह अपने घर पहुँचा। उसके मन की आँखों के सामने निरन्तर अपना अपराध नाचता रहता। बलवान के साथ विरोध करने के कारण वह भयभीत भी हो गया था। अब वह यही सोचता रहता कि ‘मैं अपने अपराध का मार्जन कैसे करूँ ? मुझ पर भगवान श्रीकृष्ण कैसे प्रसन्न हों ? मैं ऐसा कौन सा काम करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो और लोग मुझे कोसे नहीं। सचमुच मैं अदूरदर्शी, क्षुद्र हूँ। धन के लोभ से मैं बड़ी मूढ़ता का काम कर बैठा। अब मैं रमणियों में रत्न के समान अपनी कन्या सत्याभामा और वह स्यमंतक मणि दोनों ही श्रीकृष्ण को दे दूँ। यह उपाय बहुतअच्छा है। इसी से मेरे अपराध का मार्जन हो सकता है, और कोई उपाय नहीं है। सत्राजित ने अपनी विवेक बुद्धि से ऐसा निश्चय करके स्वयं ही इसके लिए उद्योग किया और अपनी कन्या तथा स्यमन्तक मणि दोनों ही ले जाकर श्रीकृष्ण को अर्पण कर दीं। सत्यभामा शील स्वभाव, सुन्दरता, उदारता आदि सदगुणों से सम्पन्न थी। बहुत से लोग चाहते थे कि सत्यभामा हमें मिले और उन लोगों ने उन्हें माँगा भी था। परन्तु अब भगवान श्रीकृष्ण ने विधिपूर्वक उनका पाणिग्रहण किया। परीक्षित ! भगवान श्रीकृष्ण ने सत्राजित से कहा- ‘हम स्यमन्तक मणि न लेंगे। आप सूर्य भगवान के भक्त हैं, इसलिए वह आपके ही पास रहे। हम तो केवल उसके फल के अर्थात उससे निकले हुए सोने के अधिकारी हैं। वही आप हमें दे दिया करें।

गणेश चतुर्थी को चन्द्रदर्शन हो जाये तो ….

ganesh2इस वर्ष चतुर्थी लगातार दो दिन रहेगी। 4 सितम्बर को चंद्रोदय के साथ ही चंद्र दर्शन नहीं करने हैं। अगले दिन 5 सितम्बर को भी चंद्रोदय के बाद रात्रि 9.09 बजे बाद तक भी चंद्रास्त होने तक चतुर्थी रहेगी और उनके दर्शन नहीं करने चाहिये। अर्थात् 4 सितम्बर को सायं 6.54 मिनिट से लेकर 5 सितम्बर को रात्रि 9.09 मिनिट तक चतुर्थी रहने के कारण चंद्र दर्शन नहीं करने चाहिये।

गणेश चतुर्थी को चन्द्रदर्शन हो जाये तो ….

यदि कोई मनुष्य अनिच्छा से भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की गणेश चतुर्थी के चन्द्रमा को देख ले तो उसे निम्न मंत्र से पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिए । इस मंत्र का २१, ५४ अथवा १०८  बार जप करने से वह तत्काल शुद्ध हो भूतल पर निष्कलंक बना रहता है । जल को पवित्र करने का मंत्र इस प्रकार है:

सिहः प्रसेनमवधीत सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥

“सुंदर सलोने कुमार! इस मणि के लिए सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया है, अतः तुम रोओ मत । अब इस स्यमन्तक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार है ।” – ब्रह्मवैवर्त पुराण, अध्याय ७८

चौथ के चन्द्रदर्शन से कलंक लगता है | इस मंत्र-प्रयोग अथवा स्यमन्तक मणि कथा के वचन या श्रवण से उसका प्रभाव कम हो जाता है |

– ऋषिप्रसाद अगस्त २००६ से

श्री गणेश – कलंक चतुर्थी – ५ सितम्बर

ganesh1एक बार गणपतिजी अपने मौजिले स्वभाव से आ रहे थे | वह दिन था चौथ का | चंद्रमा ने उन्हें देखा | चंद्र को अपने रूप,लावण्य, सौंदर्य का अहंकार था | उसने गणपतिजी की मजाक उड़ाते हुये कहा : “ क्या रूप बनाया है | लंबा पेट है, हाथी का सिर है …” आदि कह के व्यंग कसा तो गणपतिजी ने देखा की दंड के बिना इसका अहं नहीं जायेगा |

गणपतिजी बोले: “ जा, तू किसीको मुँह दिखने के लायक नहीं रहेगा |”
फिर तो चंद्रमा उगे नहीं | देवता चिंतित हुये की पृथ्वी को सींचनेवाला पूरा विभाग गायब! अब औषधियाँ पुष्ट कैसी होगी, जगत का व्यवहार कैसे चलेगा ?”

ब्रम्हाजी ने कहा: “चंद्रमा की उच्छृंखलता के कारण गणपतिजी नाराज हो गये है|”

गणपतिजी प्रसन्न हो इसलिये अर्चना-पूजा की गयी | गणपतिजी जब थोड़े सौम्य हुये तब चंद्रमा मुँह दिखाने के काबिल हुआ | चंद्रमा ने गणपतिजी भगवान की स्त्रोत्र-पाठ द्वारा स्तुति की | तब गणपतिजी ने कहा: “ वर्ष के और दिन तो तुम मुँह दिखाने के काबिल रहोंगे लेकिन भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चौथ के दिन तुमने मजाक किया था तो इस दिन अगर तुमको कोई देखेंगा तो जैसे तुम मेरा मजाक उडाकर मेरे पर कलंक लगा रहे थे, ऐसे ही तुम्हारे दर्शन करनेवाले पर वर्ष भर में कोई भारी कलंक लगेगा ताकि लोगों को पता चले की

रूप दिसी मगरूर न थीउ
एदो हसन ते नाज न कर |

रूप और सौंदर्य का अहंकार मत करो | देवगणों का स्वामी, इन्द्रियों का स्वामी आत्मदेव है | तू मेरे आत्मा में रमण करनेवाले पुरुष के दोष देखकर मजाक उडाता है | तू अपने बाहर के सौंदर्य को देखता है तो बाहर का सौंदर्य जिस सच्चे सौंदर्य से आता है उस आत्म-परमात्म देव मुझको तो तू जानता नहीं है | नारायण-रूप में है और प्राणी-रूप में भी वही है | हे चंद्र! तेरा ही असली स्वरुप वही है, तू बाहर के सौंदर्य का अहंकार मत कर |”

भगवान श्रीकृष्ण जैसे ने चौथ का चाँद देखा तो उनपर स्वमन्तक मणि चराने का कलंक लगा था | इतना भी नहीं की बलराम ने भी कलंक लगा दिया था, हालोंकी भगवान श्रीकृष्ण ने मणि चुरायी नहीं थी |
जो लोग बोलते है की ‘वह कथा हम नहि मानते , शास्र-वास्त्र हम नहीं मानते |’ तो आजमा के देखो भैया ! भाद्रपद शुक्ल चौथ के चंद्रमा के दर्शन करके देख, फिर देख, कथा-सत्संग को नही मानता तो समजा जायेगा, प्रतिष्ठा को धुल में मिला दे ऐसा कलंक लगेगा वर्ष भर में |

आप सावधान हो जाना | ‘नहीं देखना है, नहीं देखना है, नहीं देखना है ‘ ऐसा भी दिख जाता है | ऐसा कई बार हुआ हम लोगों से | एक बार लंदन में दिख गया, फिर हम हिंदुस्तान आये तो हमारे साथ न जाने क्या-क्या चला | फिर एक-दो साल बीते | फिर दिख गया तो क्या-क्या चला | अगले साल नहीं देखा तो उस साल ऐसे कुछ खास गडबड नहीं हुई |फिर इस साल देखेंगे तो ऐसा कुछ होगा…. लेकिन हम तो आदि हो गये, हमारे कंधे मजबूत हो गये |

एक बार घाटवाले बाबा ने मुझसे पूछा: “भाई! चौथ का चंद्रमा देखने से कलंक लगता है – ऐसा लिखा है |”

मैंने कहाँ : “हाँ |”.
“श्रीकृष्ण को भी लगा था ?”
“हाँ |”
“हमने तो देख लिया |”
“अपने देखा तो आपको कुछ नहीं हुआ|”
“मेरे को तो कुछ नहीं हुआ |”
“कितना समय हो गया |”
“वर्ष पूरा हो गया | अगले साल देखा चंद्र को तो कुछ नहीं हुआ |”
“कुछ नहीं तो शास्त्र झूठा है ?”
“नहीं, मेरे को तो कुछ नहीं हुआ पर लोगों ने हरिद्वार की दीवारों पर लिख दिया घाटवाला बाबा रंडीबाज है |” लोगों ने लिख दिया एयर लोगों ने पढ़ा, मेरे को तो कुछ नहीं हुआ|
अब ब्रम्हज्ञानी संत को तो क्या होगा बाबा !
यदि भूल से भो चौथ का चंद्रमा दिख जाय तो ‘श्रीमदभागवत’ के १०वे स्कंध, ५६-५७वे अध्याय में दी गयी ‘स्यमंतक मणि की चोरी’ की कथा का आदरपूर्वक श्रवण करना | भाद्रपद शुक्ल तृतीया या पंचमी के चंद्रमा के दर्शन कर लेना, इससे चौथ को दर्शन हो गये हाँ तो उसका ज्यादा खतरा नही होगा |
भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी ५ सितम्बर को है | चतुर्थी लगातार दो दिन रहेगी। 4 सितम्बर को चंद्रोदय के साथ ही चंद्र दर्शन नहीं करने हैं। अगले दिन 5 सितम्बर को भी चंद्रोदय के बाद रात्रि 9.09 बजे बाद तक भी चंद्रास्त होने तक चतुर्थी रहेगी और उनके दर्शन नहीं करने चाहिये। अर्थात् 4 सितम्बर को सायं 6.54 मिनिट से लेकर 5 सितम्बर को रात्रि 9.09 मिनिट तक चतुर्थी रहने के कारण चंद्र दर्शन नहीं करने चाहिये।

ऋषिप्रसाद – अगस्त २००६ से