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वराह जयंती – ४ सितम्बर

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भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह अवतार लिया था। यह अवतार पहला अवतार माना जाता है। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दिति के पुत्र थे।

विष्णु पुराण में उल्लेखित है दोनों जुड़वां भाइयों ने जन्म लिया तो पृथ्वी कांप उठी थी। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए तप किया। उनके तप से ब्रह्मा प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान दिया।

दोनों भाइयों में से हिरण्याक्ष ने पृथ्वी पर प्रलयकारी गतिविधियां उत्पन्न कीं। उसने इंद्रलोक पर विजय प्राप्त की। इंद्रलोक जीतने के बाद हिरण्याक्ष ने पृथ्वी भी जीत ली और धरती को समुद्र में डुबो दिया। इसके बाद वह वरुण देव की राजधानी विभावरी नगरी में पहुंचा। उसने वरुण देव को युद्ध के लिए ललकारा।

वरुण के कथन सुन हिरण्याक्ष समुद्र में पहुंचा। वहां उसने रसातल में एक हैरान कर देना वाला दृश्य देखा। हिरण्याक्ष देखता है कि एक वराह अपने दांतों से उसके द्वारा डुबोई गई धरती को उठाए हुए आ रहा है।

वह नहीं जानता था कि वराह रूप में स्वयं भगवान विष्णु उसके सामने मौजूद हैं। हिरण्याक्ष मन ही मन सोचने लगा, यह वराह कौन है? कोई भी साधारण वराह धरती को अपने दांतों के ऊपर नहीं उठा सकता।

वह पहचान गया कि यह और कोई नहीं, बल्कि भगवान विष्णु हैं। उसने कहा, ‘आज तुम मुझे छल नहीं सकोगे। मैं पुराने बैर का बदला लेकर रहूंगा।’ हिरण्याक्ष ने अपनी कटु वाणी से गहरी चोट की थी, किंतु फिर भी भगवान विष्णु शांत ही रहे।

भगवान वराह ने रसातल धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया। भगवान वराह ने हिरण्याक्ष की ओर देखते हुए कहा,’तुम तो बड़े बलवान हो। बलवान लोग कहते नहीं हैं, करके दिखाते हैं। यह सुन कर हिरण्याक्ष हाथ में त्रिशूल लेकर भगवान विष्णु की ओर आया।

भगवान वराह ने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया, चक्र उनके हाथों में आ गया। उन्होंने अपने चक्र से हिरण्याक्ष के त्रिशूल के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

भगवान विष्णु के हाथों मारे जाने के कारण हिरण्याक्ष बैकुंठ लोक में चला गया। वह फिर बैकुंठ में द्वार का प्रहरी बनकर आनंद से जीवन व्यतीत करने लगा।