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वट सावित्री व्रत कथा (Vatsavitri Vrat katha)-12 June 2014

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वट सावित्री व्रत

यह व्रत सौभाग्यवती स्त्रियों का मुख्य त्यौहार माना जाता है | यह व्रत मुख्यतः जेष्ठ शुद्ध की पोर्णिमा  को किया जाता है | इस दिन वट (बरगद) के वृक्ष की पूजा होती है | इस दिन सत्यवान-सावित्री और यमराज की पूजा की जाती है | स्त्रियां इस व्रत की अखंड सौभाग्यवती अर्थात अपने पति की लम्बी आयु, सेहत तथा तरक्की के लिए करती है | सावित्री ने इसी व्रत के द्वारा अपने पति सत्यवान की धर्मराज से छीन लिया था |

वट-सावित्री व्रत कथा     

एक समय मद देश में अश्वपति नामक परम ज्ञानी राजा राज करता था | उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए अपनी पत्नीं के साथ सावित्री देवी का विधिपूर्वक व्रत तथा पूजन किया और पुत्री होने का वर प्राप्त किया | इस पूजा के फल से उनके यहाँ सर्वगुण सम्पन्न सावित्री का जन्म हुआ |

सावित्री जब विवाह योग्य हुई तो राजा ने उसे स्वयं अपना वर चुनने को कहा | अश्वपति ने उसे अपने पति के साथ वर का चुनाव करने के लिए भेज दिया | एक दिन महर्षि नारदजी राजा अश्वपति के यहाँ आये हुए थे तभी सावित्री अपने वर का चयन करके लौटी | उसने आदरपूर्वक नारदजी को प्रणाम किया | नारदजी के पूछने पर सावित्री ने कहाँ – “ राजा धुमत्सेन, जिसका राज्य हर लिया हैं, जो अंधे होकर अपनी पत्नी के साथ वनों में भटक रहे है, उन्ही के इकलौते आज्ञाकारी पुत्र सत्यवान को मैंने अपने पतिरूप में वरण किया है |”

तब नारदजी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहों की गणना करके उसके भूत, वर्तमान  तथा भविष्य को देखकर राजा से कहाँ –“ राजन ! तुम्हारी कन्या ने नि:संदेह बहुत योग्य वर का चुनाव किया है | सत्वान गुणों तथा धर्मत्मा है | वह सावित्री के लिए सब प्रकार से योग्य है परंतु एक भारी दोष है | यह अल्पायु है और एक वर्ष के बाद अर्थात जब सावित्री बारह वर्ष की हो जायेगी उसकी मृत्यु हो जायेगी |

नारदजी की ऐसी भविष्यवाणी सुनकर राजा ने अपनी पुत्री को कोई अन्य वर खोजने के लिए कहा | इस पर सावित्री ने कहा – “ पिताजी ! आर्य कन्याएं जीवन में एक ही बार अपने पति का चयन करती है | मैंने भी सत्यवान को मन से अपना पति स्वीकार कर लिया है, अब चाहे वह अल्पायु हो या दीर्घायु, मैं किसी अन्य को अपने ह्रदय में स्थान नहीं दे सकती |”

सावित्री ने आगे कहा –“ पिताजी, आर्य कन्याएं अपना पति एक बार चुनती है | राजा एक बार ही आज्ञा देते है, पंडित एक बार प्रतिज्ञा करते हैं तथा कन्यादान भी एक बार किया जाता है | अब चाहे जो हो सत्यवान ही मेरे पति होगा |”

सावित्री के ऐसे दृढ़ वचन सुनकर राजा अश्वपति ने उसका विवाह सत्यवान से कर दिया | सावित्री ने नारदजी से अपने पति की मृत्यु का समय ज्ञात कर लिया था | सावित्री अपने पति और सास-ससुर की सेवा करती हुई वन में रहने लगी | समय बीतता गया और सावित्री बारह वर्ष की हो गयी | नारदजी के वचन उसको दिन-प्रतिदिन परेशान करते रहे | आखिर जब नारदजी के कथनानुसार उसके पति के जीवन के तीन दिन बचें, तभी से वह उपवास करें लगी | नारदजी द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया | प्रतिदिन की भांति उस दिन भी सत्यवान लकड़ियाँ काटने के लिए चला तो सास-ससुर से आज्ञा लेकर वह भी उसके साथ वन में चल दी |

वन में सत्यवान ने सावित्री को मीठे-मीठे फल लाकर दिये और स्वयं एक वृक्ष पर लकड़ियाँ काटने के लिए चढ़ गया | वृक्ष पर चढ़ते ही सत्यवान के सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी | वह वृक्ष से नीचे उतर आया | सावित्री ने उसे पास के बड के वृक्ष के नीचे लिटाकर सिर अपनी गोद में रख लिया | सावित्री का ह्रदय काँप रहा था | तभी उसने दाक्षिण दिशा से यमराज को आते देखा | यमराज और उसके दूत धर्मराज सत्यवान के जीव को लेकर चल दिये तो सावित्री भी उनके पीछे चल पड़ी | पीछा करती सावित्री की यमराज ने समझकर वापस लौट जाने को कहा | परंतु सावित्री ने कहा – “ हे यमराज ! पत्नी के पत्नीत्व की सार्थकता इसी में है कि वह पति का छाया के समान अनुसरण करे | पति के पीछे जाने जाना ही स्त्री धर्म है | पतिव्रत के प्रभाव से और आपकी कृपा से कोई मेरी गति नही रोक सकता यह मेरी मर्यादा है | इसके विरुद्ध कुछ भी बोलना आपके लिए शोभनीय नहीं है |”

सावित्री के धर्मयुक्त वचनों से प्रसन्न होकर यमराज ने उससे उसके पति के प्राणों के अतिरिक्त कोई भी वरदान माँगने को कहा | सावित्री ने यमराज से अपने सास-ससुर की आँखे की खोई हुई ज्योति तथा दीर्घायु माँग ली | उमराज ‘तथास्तु’ कहकर आगे बढ़ गये | फिर भी सावित्री ने यमराज का पीछा नहीं छोड़ा | उमराज ने उसे फिर वापस जाने के लिए कहा | इस पर सावित्री ने कहा – “ हे धर्मराज ! मुझे अपने पति के पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है | पति के बिना नारी जीवन की कोई सार्थकता नहीं है | हम पति-पत्नी भिन्न-भिन्न मार्ग कैसे जा सकते है | पति का अनुगमन मेरा कर्तव्य है |”

यमराज ने सावित्री के पतिव्रत धर्म की निष्ठा देख कर पुन: वर मांगने के लिए कहा | सावित्री ने अपने सास-ससुर के खोये हुए राज्य को प्राप्ति तथा सौ भाइयों की बहन होने का वर माँगा | उमराज पुन: “तथास्तु” कहकर आगे बढ़ गये | परंतु सावित्री अब भी यमराज का पीछा किये जा रही थी | यमराज ने फिर से उसे वापस लौट जाने को कहाँ, किंतु सावित्री अपने पण पर अडिग रही |

तब यमराज ने कहा – “ हे देवी ! यदि तुम्हारे मन में अब भी कोई कामना है तो कहो | जो माँगोगी वही मिलेगा |” इस पर सावित्री ने कहा –“यदि आप सच में मुझ पर प्रसन्न है और सच्चे हद्रय से वरदान देना चाहते है तो मुझे सौ पुत्रों की माँ बनने का वरदान दें |” यमराज “तथास्तु” कहकर आगे बढ़ गये |

यमराज ने पीछे मुडकर देखा और सावित्री से कहा – “ अब आगे मत बढ़ो | तुम्हे मुँह माँगा वर दे चूका हूँ, फिर भी मेरा पीछा क्यों कर रही है ?”

सावित्री बोली – “ धर्मराज ! आपने मुझे सौ पुत्रों की माँ होने का वरदान तो दे दिया, पर क्या मैं पति के बिना संतान को जन्म दे सकती हूँ ? मुझे मेरा पति वापस मिलना ही चाहिए, तभी मई आपका वरदान पूरा कर सकूँगी |”

सावित्री की धर्मनिष्ठा, पतिभक्ति और शुक्तिपूर्ण वचनों को सुनकर यमराज ने सत्यवान के जीव को मुक्त कर दिया | सावित्री को वर देकर यमराज अंतर्ध्यान हो गये |

सावित्री उसी वट वृक्ष के नीचे पहुंची जहाँ सत्यवान का शरीर पड़ा था | सावित्री ने प्रणाम करके जैसे ही वट वृक्ष की परिक्रमा पूर्ण की वैसे ही सत्यवान के मृत शरीर जीवित हो उठा | दोनों हर्षातुर से घर की ओर चल पड़े |

प्रसन्नचित सावित्री अपने पति सहित सास-ससुर के पास गई | उनकी नेत्र ज्योति वापस लौट आयी थी | उनके मंत्री उन्हें खोज चुके थे | धुमत्सेन ने पुन: अपना राज सिंहासन संभाल लिया था |

उधर महाराज अश्वसेन सौ पुत्रो के पिता हुए और सावित्री सौ भाइयों की बहन | यमराज के वरदान से सावित्री सौ पुत्रों की माँ बनी | इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रत का पालन करते हुए अपने पति के कुल एवं पितृकुल दोनों का कल्याण कर दिया |

सत्यवान और सावित्री चिरकाल तक राज सुख भोगते रहे और चारों दिशाओं में सावित्री के पतिव्रत धर्म की कीर्ति गूंज उठी |