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लाला लाजपत राय पुण्यतिथि – १७ नवम्बर २०१४

lala_laj[atraiलाला लाजपत राय जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे ! वह एक लेखक, राजनीतिग्य ,उत्कृष्ठ समाजसेवी ,पंजाब नॅशनल बैंक व लक्ष्मी इंश्योरेंस कंपनी के संस्थापक भी थे किन्तु उनकी सर्वाधिक प्रसिधी एक महान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में ही है !

प्रारंभिक जीवन व समाज-सेवा
लाला जी का जन्म 28-जनवरी-1865 को पंजाब राज्य के मोंगा जिले के दुधिके गाँव में हुआ था ! उनके पिता श्री लाला राधा किशन आजाद जी सरकारी स्कूल में उर्दू के शिक्षक थे जबकि उनकी माता देवी गुलाब देवी धार्मिक महिला थीं !
लाला जी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थे व धन , आदि की अनेक कठिनाइयों के पश्चात् भी उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की ! 1880 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी व पंजाब यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षाएं पास करने के बाद उन्होंने लाहोर गवर्नमेंट कॉलेज में दाखिला ले लिया व कानून की पढाई प्रारंभ की ! लेकिन घर की माली हालत ठीक न होने के कारन दो वर्ष तक उनकी पढाई बाधित रही !

लाहोर में बिताया गया समय लाला जी के जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ और यहीं उनके भावी जीवन की रूप-रेखा निर्मित हो गयी ! उन्होंने भारत के गौरवमय इतिहास का अध्ययन किया और महान भारतीयों के विषय में पढ़कर उनका हृदय द्रवित हो उठा ! यहीं से उनके मन में राष्ट्र प्रेम व राष्ट्र सेवा की भावना का बीजारोपण हो गया !कानून की पढाई के दौरान वह लाला हंसराज जी व पंडित गुरुदत्त जी जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आये ! यह तीनों अच्छे मित्र बन गए और 1882 में आर्य समाज के सदस्य बन गए ! उस समय आर्य समाज समाज-सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था और यह पंजाब के युवाओं में अत्यधिक लोकप्रिय था ! 1885 में उन्होंने लाहोर के गवर्नमेंट कॉलेज से द्वितीय श्रेणी में वकालत की परीक्षा पास की और हिसार में अपनी कानूनी प्रैक्टिस प्रारंभ कर दी ! प्रेक्टिस के साथ-साथ वह आर्य समाज के सक्रीय कार्यकर्ता भी बने रहे ! स्वामी दयानंद जी की म्रत्यु के पश्चात् उन्होंने अंग्लो-वैदिक कॉलेज हेतु धन एकत्रित करने में सहयोग किया ! आर्य समाज के तीन कक्ष्य थे : समाज सुधार, हिन्दू धर्म की उन्नति और शिक्षा का प्रसार ! वह अधिकांश समय आर्य समाज के सामाजिक कार्यों में ही लगे रहते ! वह सभी सम्प्रदायों की भलाई के प्रयास करते थे और इसी का नतीजा था की वह हिसार म्युनिसिपल्टी हेतु निर्विरोध चुने गए जहाँ की अधिकांश जनसँख्या मुस्लिम थी !

समाज-सेवा और राजनीतिक जीवन

लाला जी के मन में अब स्वतंत्रता की उत्कट भावना पैदा हो चुकी थी और इसीलिए 1888 में 23 वर्ष की आयु में उन्होंने समाज सेवा के साथ-साथ राजनीती में भी प्रवेश किया और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के सदस्य बन गए ! जब पंजाबी प्रतिनिधिमंडल के साथ उन्होंने इलहाबाद में कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया तो उनका जोरदार स्वागत हुआ और उनके उर्दू भाषण ने सभी का मन मोह लिया ! अपनी योग्यता के बल पर वह जल्द ही कांग्रेस के लोकप्रिय नेता बन गए !

लगभग इसी समय जब सर सैयद अहमद खान ने कांग्रेस से अलग होकर मुस्लिम समुदाय से यह कहना शुरू किया की उसे कांग्रेस में जाने की बजाय अंग्रेज सरकार का समर्थन करना चाहिए तब लाला जी ने इसके विरोध में उन्हें “कोहिनूर” नामक उर्दू साप्ताहिक में खुले पत्र लिखे जिन्हें काफी प्रशंसा मिली !

1892 में पंजाब हाईकोर्ट में वकालत करने हेतु वह हिसार से लाहोर चले गए ! यहाँ भी लालाजी राष्ट्र सेवा में जुटे रहे !

उन्होंने लेखन द्वारा भी अपना प्रेरक कार्य जरी रखा और शिवाजी, स्वामी दयानंद, मेजिनी, गैरीबाल्डी जैसे प्रसिद्ध लोगों की आत्मकथाएं अनुवादित व प्रकाशित कीं ! इन्हें पढ़कर अन्य लोगों ने भी स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु संघर्ष की प्रेरणा प्राप्त की !

लाला जी जन सेवा के कार्यों में तो सदैव ही आगे रहते थे इसीलिए 1896 में जब सेन्ट्रल प्रोविंस में भयानक सूखा पड़ा तब लाला जी ने वहां अविस्मर्णीय सेवाकार्य किया ! जब वहां सैकड़ों निर्धन, अनाथ, असहाय मात्र इसाई मिशनरियों की दया पर निर्भर थे और वह उन्हें सहायता के बदले अपने धर्म में परिवर्तित कर रहीं थीं तब लाला जी ने अनाथों के लिए एक आन्दोलन चलाया व जबलपुर, बिलासपुर,आदि अनेक जिलों के 250 अनाथ बालकों को बचाया और उन्हें पंजाब में आर्य समाज के अनाथालय में ले आये ! उन्होंने कभी भी धन को सेवा से ज्यादा महत्व नहीं दिया और जब उन्हें प्रतीत हुआ की वकालत के साथ-साथ समाज सेवा के लिए अधिक समय नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने अपनी वकालत की प्रेक्टिस कम कर दी !

इसी प्रकार 1899 में जब पंजाब, राजस्थान, सेन्ट्रल प्रोविंस, आदि में और भी भयावह अकाल पड़ा और 1905 में कांगड़ा जिले में भूकंप के कारन जन-धन की भारी हानि हुई तब भी लालाजी ने आर्य समाज के कार्यकर्त्ता के रूप में असहायों की तन,मन,धन से सेवा-सहायता की !

उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया ! भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में उन्होंने रचनात्मकता, राष्ट्र निर्माण व आत्मनिर्भरता पर जोर दिया ! कांग्रेस में वह बाल गंगाधर तिलक जी व बिपिनचंद्र पाल जी के साथ उग्रवादी विचारधारा से सहमत थे और यह तीनों ” लाल-बाल-पाल ” नाम से प्रसिद्ध थे ! जहाँ उदारवादी कांग्रेसी अंग्रेज सरकार की कृपा चाहते थे वहीँ उग्रवादी कांग्रेसी अपना हक़ चाहते थे ! लाला जी मानते थे की स्वतंत्रता भीख और प्रार्थना से नहीं बल्कि संघर्ष और बलिदान से ही मिलेगी !

बंगाल विभाजन के समय उन्होंने भी स्वदेशी, स्वराज और विरोध के राष्ट्रिय आन्दोलन में बढ़-चढ़ के भाग लिया था ! 1906 में जब कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी धडों में विवाद हुआ तब उन्होंने मध्यस्थता करने का बहुत प्रयास किया ! 1907 में जब तिलक जी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद हेतु उनका नाम प्रस्तावित किया लेकिन विवाद की संभावना देखते हुए लाला जी ने अपना नाम आगे नहीं बढ़ने दिया !

लाला जी मानते थे की राष्ट्रिय हित के लिए विदेशों में भी भारत के समर्थन में प्रचार करने हेतु एक संगठन की जरूरत है ताकि पूरी दुनिया के सामने भारत का पक्ष रखा जा सके और अंग्रेज सरकार का अन्याय उजागर किया जा सके ! इसीलिए 1914 में वह ब्रिटेन यात्रा पर गए ! यहाँ से वह अमेरिका गए जहाँ उन्होंने ” इन्डियन होम लीग सोसायटी ऑफ़ अमेरिका ” की स्थापना की और ” यंग इण्डिया ” नामक पुस्तक लिखी ! इसमें अंग्रेज सरकार का कच्चा चिटठा खोला गया था इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रकाशित होने से पूर्व ही इंग्लॅण्ड और भारत में प्रतिबंधित कर दिया ! प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् वह भारत वापस आ गए !

उन्होंने पंजाब में जलियांवाला नरसंहार के विरोध में असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व किया ! उन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा लेकिन वह पीछे नहीं हटे ! जब चौरी-चौरा घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन स्थगित किया तब लाला जी इससे बहुत निराश हुए ! 1925 में वह केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य भी चुने गए !

म्रत्यु
1928 में सात सदस्यीय सायमन कमीशन भारत आया जिसके अध्यक्ष सायमन थे ! इस कमीशन को अंग्रेज सरकार ने भारत में संवेधानिक सुधारों हेतु सुझाव देने के लिए नियुक्त किया था जबकि इसमें एक भी भारतीय नहीं था ! इस अन्याय पर भारत में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस ने पूरे देश में सायमन कमीशन के शांतिपूर्ण विरोध का निश्चय किया !
इसीलिए जब 30-अक्टूबर-1928 को सायमन कमीशन लाहोर पहुंचा तब वहां उसके विरोध में लाला जी ने मदन मोहन मालवीय जी के साथ शांतिपूर्ण जुलूस निकाला ! इसमें भगत सिंह जैसे युवा स्वतंत्रता सेनानी भी शामिल थे ! पुलिस ने इस अहिंसक जुलूस पर लाठी चार्ज किया ! इसी लाठीचार्ज में लालाजी को निशाना बनाकर उन पर जानलेवा हमला किया गया जिस से उन्हें घातक आघात लगा और अंतत: 17-नवम्बर-1928 को यह सिंह चिर-निद्रा में सो गया ! अपनी म्रत्यु से पूर्व लाला जी ने भविश्यवाणी की थी की ” मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी अंग्रेज सरकार के ताबूत में अंतिम कील साबित होगी ! ” , जो की सच साबित हुई !

लाला जी की इस हत्या ने भगत सिंह, आदि क्रांतिकारियों को उद्वेलित कर दिया ! अभी तक वह गाँधी जी के अहिंसक आन्दोलन में जी-जान से जुड़े थे किन्तु जब उन्होंने देखा की शांतिपूर्ण विरोध पर भी दुष्ट अंग्रेज सरकार लाला जी जैसे व्यक्ति की हत्या कर सकती है तो उन्होंने इस अन्याय व अत्याचार का बदला लेने की ठान ली और लाला जी के हत्यारे अंग्रेज अधिकारी सौन्ड़ेर्स को मारकर ही दम लिया !

लाला जी की माँ श्रीमती गुलाब देवी की म्रत्यु टी.बी. के कारण हुई थी इसीलिए लाला जी ने 1927 में उनकी स्मृति में एक ट्रस्ट की स्थापना की जिसका उद्देश्य था महिलाओं के लिए टी.बी. होस्पीटल की स्थापना करना ! इस का निर्माण 1934 में पूरा हो गया और महात्मा गाँधी ने इसका उद्घाटन किया किन्तु दुर्भाग्यवश लाला जी इस सुअवसर पर जीवित न थे !

प्रेरणा व यादगार
1895 में लाला जी के सहयोग से “पंजाब नॅशनल बैंक” व लक्ष्मी इंश्योरेंस कंपनी की स्थापना हुई !उन्होंने राष्ट्रिय भावना के प्रचार हेतु उर्दू में “वंदे मातरम” और अंग्रेजी में “द पीपल” नामक साप्ताहिक समाचारपत्र निकाले !
उन्होंने अनाथ बालकों के लिए अनेक अनाथालयों की स्थापना की !उनके सहयोग से ही ” ऑल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस” नामक श्रमिक संघ की स्थापना हुई और वह उसके प्रथम अध्यक्ष भी बने ! उनकी जन्मशती के अवसर पर पंजाबी समाज के व्यक्तियों द्वारा शिक्षा के प्रसार हेतु ” लाला लाजपत राय ट्रस्ट ” की स्थापना की गयी !
उनके नाम पर अनेक स्थानों, होस्पीटलों, संस्थानों, स्कूलों, आदि का नाम रखा गया है !
लाला जी सच्चे अर्थों में राष्ट्र प्रेमी थे ! वह केवल “पंजाब के सिंह” ही नहीं बल्कि पूरे भारत के सिंह थे जिनका जीवन हर भारतीय के लिए प्रेरणा का अविरल स्त्रोत है !

तुलसी विवाह- (३ से ६ नवम्बर २०१४ तक )

garden-tulasiतुलसी विवाह की पूजन विधि

कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है। तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना गया है। तुलसी की नियमित पूजा से हमें सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। कार्तिक शुक्ल एकादशी पर तुलसी विवाह का विधिवत पूजन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

तुलसी विवाह की पूजन विधि

तुलसी विवाह के लिए तुलसी के पौधे का गमले को गेरु आदि से सजाकर उसके चारों ओर ईख (गन्ने) का मंडप बनाकर उसके ऊपर ओढऩी या सुहाग की प्रतीक चुनरी ओढ़ाते हैं। गमले को साड़ी में लपेटकर तुलसी को चूड़ी पहनाकर उनका श्रंगार करते हैं। श्री गणेश सहित सभी देवी-देवताओं का तथा श्री शालिग्रामजी का विधिवत पूजन करें। पूजन के करते समय तुलसी मंत्र (तुलस्यै नम:) का जप करें। इसके बाद एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखें। भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं। आरती के पश्चात विवाहोत्सव पूर्ण किया जाता है।

जैसे विवाह में जो सभी रीति-रिवाज होते हैं उसी तरह तुलसी विवाह के सभी कार्य किए जाते हैं। विवाह से संबंधित मंगल गीत भी गाए जाते हैं।

अनंत, अनादि, अनीश्वर, देवों के देव महादेव को क्या नाम से पुकारें ?

images (1)अनंत, अनादि, अनीश्वर, देवों के देव महादेव को क्या नाम से पुकारें ?

शिव  –              कल्याण स्वरूप
महेश्वर –          माया के अधीश्वर
शम्भू –             आनंद स्स्वरूप वाले
पिनाकी –          पिनाक धनुष धारण करने वाले
शशिशेखर –      सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले
वामदेव –          अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
विरूपाक्ष –        भौंडी आँख वाले
कपर्दी –           जटाजूट धारण करने वाले
नीललोहित –    नीले और लाल रंग वाले
शंकर –            सबका कल्याण करने वाले
शूलपाणी –       हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
खटवांगी –       खटिया का एक पाया रखने वाले
विष्णुवल्लभ –  भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
शिपिविष्ट –     सितुहा में प्रवेश करने वाले
अंबिकानाथ –   भगवति के पति
श्रीकण्ठ –        सुंदर कण्ठ वाले
भक्तवत्सल –   भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
भव –             संसार के रूप में प्रकट होने वाले
शर्व –             कष्टों को नष्ट करने वाले
त्रिलोकेश –      तीनों लोकों के स्वामी
शितिकण्ठ –    सफेद कण्ठ वाले
शिवाप्रिय –     पार्वती के प्रिय
उग्र –            अत्यंत उग्र रूप वाले
कपाली –        कपाल धारण करने वाले
कामारी –       कामदेव के शत्रु
अंधकारसुरसूदन – अंधक दैत्य को मारने वाले
गंगाधर –       गंगा जी को धारण करने वाले
ललाटाक्ष –     ललाट में आँख वाले
कालकाल –    काल के भी काल
कृपानिधि –    करूणा की खान
भीम –          भयंकर रूप वाले
परशुहस्त –    हाथ में फरसा धारण करने वाले
मृगपाणी –    हाथ में हिरण धारण करने वाले
जटाधर –      जटा रखने वाले
कैलाशवासी – कैलाश के निवासी
कवची –        कवच धारण करने वाले
कठोर –        अत्यन्त मजबूत देह वाले
त्रिपुरांतक –  त्रिपुरासुर को मारने वाले
वृषांक –       बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
वृषभारूढ़ –   बैल की सवारी वाले
भस्मोद्धूलितविग्रह – सारे शरीर में भस्म लगाने वाले
सामप्रिय –   सामगान से प्रेम करने वाले
स्वरमयी –   सातों स्वरों में निवास करने वाले
त्रयीमूर्ति –   वेदरूपी विग्रह करने वाले
अनीश्वर –   जिसका और कोई मालिक नहीं है
सर्वज्ञ –       सब कुछ जानने वाले
परमात्मा – सबका अपना आपा
सोमसूर्याग्निलोचन – चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आँख वाले
हवि –          आहूति रूपी द्रव्य वाले
यज्ञमय –    यज्ञस्वरूप वाले
सोम –        उमा के सहित रूप वाले
पंचवक्त्र –   पांच मुख वाले
सदाशिव –   नित्य कल्याण रूप वाले
विश्वेश्वर – सारे विश्व के ईश्वर
वीरभद्र –     बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले
गणनाथ –   गणों के स्वामी
प्रजापति –   प्रजाओं का पालन करने वाले
हिरण्यरेता – स्वर्ण तेज वाले
दुर्धुर्ष –       किसी से नहीं दबने वाले
गिरीश –    पहाड़ों के मालिक
गिरिश –    कैलाश पर्वत पर सोने वाले
अनघ –      पापरहित
भुजंगभूषण – साँप के आभूषण वाले
भर्ग –         पापों को भूंज देने वाले
गिरिधन्वा – मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
गिरिप्रिय –   पर्वत प्रेमी
कृत्तिवासा – गजचर्म पहनने वाले
पुराराति –    पुरों का नाश करने वाले
भगवान् –    सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न
प्रमथाधिप – प्रमथगणों के अधिपति
मृत्युंजय –   मृत्यु को जीतने वाले
सूक्ष्मतनु –   सूक्ष्म शरीर वाले
जगद्व्यापी – जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले
जगद्गुरू –     जगत् के गुरू
व्योमकेश –    आकाश रूपी बाल वाले
महासेनजनक – कार्तिकेय के पिता
चारुविक्रम –   सुन्दर पराक्रम वाले
रूद्र –            भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
भूतपति –      भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी
स्थाणु –        स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
अहिर्बुध्न्य –   कुण्डलिनी को धारण करने वाले
दिगम्बर –     नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
अष्टमूर्ति –    आठ रूप वाले
अनेकात्मा –  अनेक रूप धारण करने वाले
सात्त्विक –    सत्व गुण वाले
शुद्धविग्रह –    शुद्धमूर्ति वाले
शाश्वत –      नित्य रहने वाले
खण्डपरशु –   टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
अज –          जन्म रहित
पाशविमोचन – बंधन से छुड़ाने वाले
मृड –           सुखस्वरूप वाले
पशुपति –      पशुओं के मालिक
देव –           स्वयं प्रकाश रूप
महादेव –      देवों के भी देव
अव्यय –       खर्च होने पर भी न घटने वाले
हरि –           विष्णुस्वरूप
पूषदन्तभित् – पूषा के दांत उखाड़ने वाले
अव्यग्र –       कभी भी व्यथित न होने वाले
दक्षाध्वरहर – दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले
हर –            पापों व तापों को हरने वाले
भगनेत्रभिद् – भग देवता की आंख फोड़ने वाले
अव्यक्त –   इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
सहस्राक्ष –   अनंत आँख वाले
सहस्रपाद –  अनंत पैर वाले
अपवर्गप्रद – कैवल्य मोक्ष देने वाले
अनंत –      देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
तारक –     सबको तारने वाला
परमेश्वर – सबसे परे ईश्वर​

Sant Eknath Maharaj Shashthi – 22 March 2014

imagesShantibramha Sant Eknath Maharaj

Sant Ekanath Maharaj is one of the greatest saints of Maharashtra. He was born in Paithan, on the banks of River Godavari around 1533.Paithan is a holy place and in those days it was a centre of Sanskrit learning as well as Brahminical orthodoxy. Ekanath was the great grandson of the well-known saint, Saint Bhanudas. His parents died when he was 3 years old and he was brought up by his grandparents. He became a disciple of Janardana Swami who lived a little distance away from his town. His Guru made him undergo spiritual disciplines and taught him Sanskrit grammar, philosophy and basic texts of the Vedanta and other holy books. It was here that Ekanath studied the holy Dnyaneshwari, which is a commentary on the Bhagvad Gita made by Shri Dnyaneshwar Maharaj. Shri Ekanath Maharaj’s glorious work was based in the time span of 150 years after Shri Dnyaneshwar Maharaj and 150 years before Chattrapati Shivaji Maharaj and Tukaram Maharaj.
When Ekanath Maharaj completed his education, Guru and disciple went on a pilgrimage. At Tryambakeshwar, they heard a discourse on the 4 fundamental shlokas of the Bhagavat Mahapurana given by Pandit Chandroba in Sanskrit. Janardana Swami asked his disciple, Ekanath to translate them into Marathi and to write his own commentary, so that ordinary people could enjoy it. Ekanath Maharaj did this, and the result was the Chatushloki-Bhagavat, his first important work. Sant Ekanath was a great Guru-bhakta and he attributed not just this first book, but all his works to his Guru, invariably writing ‘Eka-Janardana’ i.e (Ekanath of Janardana) as his signature. He also displayed his gratitude towards Shri Dnyaneshwar Maharaj by using Dnyaniyacha-Eka(Dnyaneshwar’s Ekanath) as his signature for some of his works. The holy Sanskrit scriptures-The Brahmasutra, Upanishada and Shri Geeta together are known as ‘Prasthanatrayi’. These 3 important texts that lead us towards the true-self are called ‘Prasthanatrayi’. ‘Prasthan’ means to go towards one’s true-self i.e The Almighty.
Similarly, The Dnyaneshwari, Tukaram Maharaj’s Gatha and Shri Ekanath Maharaj’s narration of the Bhagavat which are written in Marathi are considered as the Prasthanatrayi. His commentary on the 11th skanda(Canto) of the Bhagavat Mahapurana i.e Ekanathi Bhagavat which is a dialogue between Lord Krishna and Uddhava is one of the most important works. In this, the 9 traditional limbs of the ‘Bhakti Marga’ have been explained. Ekanath Maharaj a profilic writer, wrote the Bhavartha Ramayana and also Rukmini-Swayamwar that narrates the marriage of Lord Krishna to Rukmini Devi. Sant Ekanath also wrote many abhangas and bharuds. Bharuds are short poems with dual meaning, one which is secular and the other is spiritual. These bharuds put forward concepts of philosophy to rid the society of ignorance, discrimination and unjust customs. This was an innovative way to introduce moral values in the society and benefit people. During the intervening period of about 250 years between Dnyaneshwar and Ekanath Maharaj, various Islamic invaders ravaged Maharashtra. Defeats after defeats had completely demoralized people. There was the dominance and strong influence of rituals, blind faith and quackery. The need of the time was to restore people’s faith and to abolish blind faith and hypocracy, discard the caste system and also the distorted method of penance. It was necessary to instill moral values and ethics in society and Shri Ekanath Maharaj propogated those on the basis of great literature like Shri Ramayana, Shrimad Bhagavad, Shri Geeta and Shri Dnyaneshwari. During this time the great legacy of Sant Dnyaneshwar Maharaj was nearly forgotten. Sant Ekanath devoted himself to change this situation. His first task was to locate the ‘samadhi’ of Dnyaneshwar Maharaj. He completed editing the Dnyaneshwari in 1584. In those days, there were several interpolations on the Dnyaneshwari and more than one version. The Dnyaneshwari we read today is his edition.
The tradition of ‘dnyaan’ i.e knowledge and ‘bhakti’ yoga got from Maharshi Vedvyas, Jagadguru ShrimadAadyaShankarayacharya-The promoter of Advait (non-duality), Vishvaguru Shri Gorakshanath Maharaj and Santshreshtha Shri Dnyaneshwar Maharaj was made available to the common people by Eknath Maharaj. Shri Eknath Maharaj was a great preacher of the Bhagvad Sampraday. The Bhagvad Sampraday is a wonderful confluence of the concept of yoga from the Natha Sampraday and the concept of ‘Bhakti’ and ‘Dnyaan’ from the Vaishnava Sampraday. Thus he created a fusion of ‘Bhakti’ (devotion ) and Advait (non- duality). He taught the people the importance of ‘bhakti’ and also taught the devotees the essence of pure knowledge. ‘Chaturvarnya’ i.e Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Shudra were considered as the 4 castes of the Aryan society. Sant Eknath Maharaj eliminated this misconception from minds of people and preached that Chaturvarnya were not castes that discriminated the people in society, but they were 4 classes of the Aryan society. They were also the 4 qualities in society. Shri Eknath Maharaj said that we adopt different qualities in different situations and accomplish our duties. Thus he re-established this thought from the Upanishadas. Shri Eknath Maharaj declared that every individual had the right to gain knowledge. This brought about a change in society and the socially neglected people also started believing in God i.e The Almighty and attaining knowledge. Sant Eknath Maharaj worked for the upliftment of the downtrodden, socially oppressed classes like the Garudi, Dombari, Kaikadi, Bhoote and Mahar and enabled them to enhance the quality of their thoughts and life. In this manner, Sant Eknath Maharaj preached brotherhood and unity and criticized the caste system prevalent during that time.
Sant Eknath Maharaj popularized the Vedanta philosophy to a great extent and his main achievement was the spread of Sanatana Dharma. He emphasized on the practice of bhajan, nama-smaran(chanting the Lord’s name), purity of conduct, meditation, discharging one’s duties, retirement into solitude and saguna bhakti(devotion to the Divine with a form) leading to Nirguna. His ideal was to see God everywhere and in everything. Sant Eknath Maharaj preached that blindfaith, quackery and egocentric devotion had to be done away with but not by means of atheism but should be done by means of faith in God (i.e theism). While preaching against blindfaith, Sant Eknath Maharaj also told people as to where and why to have faith. Eknath Maharaj believed in the Sanskrit verse, ‘Shradhavan labhate dnyaanam’
This means that the one who is devoted and has faith can attain knowledge and purity of thoughts which is necessary for the elimination of ignorance, caste discrimination and other differences at different levels of society. His inspiration to fight untouchability were the teachings of Shri Krishna. Sant Eknath’s teachings may be summarized as “ Vichar, Ucchaar and Aachaar”- i.e purity of thoughts, purity of speech and practices. Exemplifying the way of ethical and spiritual living, he practised what he preached. His work, verses and preachings kindled hope among people at a time when they needed it the most. At last following the example of the great Dnyaneshwar Maharaj, he left for his heavenly abode by voluntarily lying down his life in the sacred Godavari on the Krishna Shashti day of Phalguna in the year shaka 1521(1599AD).Shri Ranade, a modern day historian, rightly states that, ‘With Dnyanadeva, philosophy reigned in the clouds and reached great heights; with Eknath, it came down upon the Earth and dwelt among men.’

Ahmedabad Ashram Establish Day -30th January

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Ahmedabad Ashram Establish Day -30th January
Sant Shri Asharamji Ashram, Ahmedabad, Gujarat
“Great Souls have a sympathetic heart as magnanimous and forgiving as that of a Mother giving shelter and love to all regardless of race, religion, or financial stature.”
The sacred land of India is the mother of the world’s oldest and most profound philosophy – Vedanta. She has given birth to innumerable great souls like Swami Vivekananda who have had a deep and lasting impact on all of humanity. In this era, Mother India has yet again given the world a Divine Soul bearing unconditional love and liberating Self Knowledge to lead the masses on the path to ultimate peace! Pujya Sant Shri Asharamji Bapu is that ideal role model of wisdom, compassion, razor sharp intellect and wit. The following passage tries to introduce Sant Shri Asharamji Bapu (endearingly called ‘Bapu’) and the associated Ashrams; as well as Shri Yoga Vedanta Seva Samiti, an organization founded by Pujya Bapuji.
 

व्यवहार – कुशलता के आदर्श : श्रीरामजी

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व्यवहार – कुशलता के आदर्श : श्रीरामजी 
सीता-स्वयंवर में गुरु विश्वामित्रजी की आज्ञा पाकर श्रीरामजी ने शिवजी का धनुष तोडा | उसी समय परशुरामजी वहाँ आ पहुँचे | वे शिवजी के टूटे हुए धनुष को देख क्रोध से तिलमिला उठे और गरजकर बोले : “जिसने भी शिवजी के धनुष को तोडा है, वह सहस्त्रबाहू के सामान मेरा शत्रु है | वह इस समाज को छोडकर अलग हो जाय नहीं तो यहाँ उपस्थित सारे राजा मारे जायेंगे |”

यह सुन लक्ष्मणजी अधीर हो उठे और परशुरामजी को अपमानयुक्त वचन बोलने लगे | लक्ष्मणजी और परशुरामजी में वाद-विवाद बढ़ने लगा | वातावरण बिगड़ता देख श्रीरामजी ने नेत्रों के इशारे से लक्ष्मणजी को रोक दिया और परशुरामजी की क्रोधाग्नि को शांत करने के लिए हाथ जोडकर जल के समान शीतल वचन बोले : “हे मुनीश्वर ! इस छोटा बच्चा और अपना सेवक जानकार इस पर कृपा कीजिये | बालक यदि कुछ चपलता भी करता है तो गुरु, पिता और माता उसे देखकर आनंदित होते हैं | आप तो समदर्शी, सुशील, धीर और ज्ञानी मुनि हैं | आपका अपराधी तो मैं हूँ | कृपा, क्रोध, वध, बंधन जो कुछ करना हो दास समझकर मुझ पर कीजिये |”

“तेरा यह भाई तेरी ही सम्मति से कटु वचन बोलता है और तू छल से हाथ जोडकर विनय करता है ! या तो तू युद्ध कर, नहीं तो राम कहलाना छोड़ दे |” इस प्रकार अपमानयुक्त वचन कहकर परशुरामजी ने कुठार (फरसा) उठा लिया |

तब धैर्य के मूर्तिमंतस्वरुप श्रीरामजी बड़ी विनम्रता से सिर झुकाकर बोले : “हे मुनीश्वर ! आपके हाथ में कुठार है और मेरा सिर आगे है | जिस प्रकार आपका क्रोध शांत हो, वाही कीजिये | स्वामीऔर सेवक में युद्ध कैसा ! हमारी और आपकी बराबरी कैसी ! कहाँ मेरा राममात्र छोटा-सा नाम और कहाँ आपका ‘परशु’ सहित बड़ा नाम (परशुराम) !”

इतना विनम्र होने पर भी जब परशुरामजी का क्रोध शांत नहीं हुआ बल्कि इसके विपरीत वे रामजी को और भी अपमानित और लांछित करने लगे तब श्रीरामजी ने कहा : “हे भृगुनाथ ! यह सत्य सुनिये, संसार में ऐसा कौन योद्धा हैं, जिसे हम डर के मारे मस्तक नवायें ! यदि रण में हमें कोई भी ललकारें तो हम उससे सुखपूर्वक लड़ेंगे |क्षत्रिय का शरीर धरकर जो युद्ध से डर गया, उस नीच ने अपने कुल पर कलंक लगा दिया | रघुवंशी रण में काल से भी नहीं डरते | पर ब्राम्हणदेव ! आपकी ऐसी प्रभुता है कि जो आपसे डरता है वह सबसे निर्भय हो जाता है |”

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसे कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजी का क्रोध तो शांत हो गया लेकिन अपने मन का संदेह दूर करने के लिए उन्होंने श्रीरामजी धनुष देने लगे, धनुष अपने-आप ही चला गया | यह देख वे आश्चर्यचकित हो गये | तब उन्हें श्रीरामजी के बल, प्रभाव व महिमा का पता चला | उन्होंने श्रीरामजी से क्षमायाचना की और उनको अनुपम स्तुति करके तप के लिए वन को चले गये |

कैसी अदभुत है श्रीरामजी की व्यवहार कुशलता ! गुरूजी के प्रति ऐसा आज्ञापालन कि स्वयंवर में गुरु विश्वामित्रजी की आज्ञा मिलने पर ही उन्होंने धनुष तोडा | छोटों के प्रति स्नेह व अनुशासन भरा व्यवहार भी इतना विलक्षण कि लक्ष्मणजी द्वारा अनुचित व्यवहार करने पर उन्हें भरी सभ में अपमानित न करते हुए केवल नेत्रों के संकेत से चुप करा दिया | नम्रता, समता, धैर्य व सर्वहितकारिता की साक्षात् मूर्ति भी ऐसे कि जब परशुरामजी खूब अधिक कोपायमान हुए, कुठार द्वारा उनका वध करने को आतुर हो गये, तब भी श्रीरामजी ने मधुर वचन बोलना व मधुर व्यवहार करना नहीं छोड़ा | न घबराये, न गिडगिडाये अपितु उनका क्रोध व तपन किस प्रकार शांत हो और उन्हें सिख प्राप्त हो, इसी उद्देश्य से उन्हें मना लिया | शौर्य भी इतना कि जब श्रीरामजी ने देखा कि क्षमायाचना से काम नहीं बन रहा है तो महायोद्धा परशुरामजी की युद्ध की चुनौती स्वीकार करके उन्होंने अपने रघुकुल की वीरता का परिचय भी दिया |

श्रीरामजी के ये सद्गुण सभीके लिए व्यवहार – कुशलता का मार्ग प्रशस्त करते है |