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परिस्थितियों का गुलाम नहीं , महापुरुष का शिष्य हूँ मैं

mahapurush_ka_shishya

एक दिन महात्मा बुद्ध के शिष्यों को उनकी इच्छानुसार क्षेत्रों में धर्म-प्रचार करने के लिए भेजा जा रहा था | सभीने अपने परिचित एवं सुविधापूर्ण स्थान चुन लिए | आनंद ने एक ऐसा गाँव चुना, जो दुष्ट दुर्जनों के लिए प्रख्यात था | वहां कोई साधू पैर जमा ही नहीं सका था | सभी ने आश्चर्य से पूछा : “आप ऐसे विपरीत परिस्थिति वाले स्थान को अपने कार्यक्षेत्र के रूप में क्यूँ चुनते हैं ? ”

आनंद ने कहा : “चिकित्सक को वहां जाना चाहिए जहाँ भयंकर महामारी फैली हो | परिस्थितियों का गुलाम नहीं , एक आत्मज्ञानी महापुरुष का शिष्य हूँ मैं | यदि मैं इन परिस्थितिओं से डर गया तो अपने जीवभाव को कैसे मिटा सकूंगा, उस पर कैसे विजय पा सकूंगा ?”

जो लोग परिस्थितियों की भयंकरता को देखकर घुटने टेक देते हैं , वे अपने प्राकृत स्वभाव को जीतने में विफल हो जाते हैं | जो परिस्थितिओं की अनुकूलता या प्रतिकूलता को गौण समझकर गुरुकृपा के बल पर मार्ग में कदम बढ़ाते हैं , उनके लिए कांटे भी फूल बन जाते हैं | ऐसे सतशिष्य ही गुरु का कृपा प्रसाद पचाकर अपने प्राकृत स्वभाव को जीतने में सफल हो जाते हैं, औरों के भी मार्गदर्शक हो जाते हैं | इतिहास इसका साक्षी है |