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Shri Guru Hargovind Sahib ki Jayanti- 14 June 2014

guru bahadurसदगुरु सच्चे बादशाह

( संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से )
एक बार सिखों के छठे गुरु हरगोविंद साहब से मुगल बादशाह जहाँगीर ने कहा : ‘‘गुरुओं की बातों में मुझे ज्यादा विश्वास नहीं है । मुझे एक बात ओर खटकती है कि आपको लोग ‘सच्चे बादशाह’ कहते हैं। आप इसका मतलब बताइये ।

गुरु ने कहा : ‘‘जहाँगीर ! वक्त आयेगा तब तुझे इस बात का अनुभव हो जायेगा|”
समय ने करवट ली । एक दिन जहाँगीर बादशाह और हरगोविंद साहब -दोनों आगरा के अरण्य में शिकार खेलने के लिए गये । दोपहर के समय दोनों अपने-अपने खेमों में आराम कर रहे थे ।
एक घसियारा था। वह घास काटकर बेचता और अपना गुजारा करता। उसने सुना कि गुरु आगरा के अरण्य में पधारे हैं तो सोचा कि ‘गुरु के पास जाऊँ तो कुछ लेकर जाऊँ ।उसने गुरुसाहब के घोडे के लिए बढ़िया-सा घास एकत्रित किया और उसका गट्ठर सिर पर उठाये चल पडा । सिर पर बोझा था लेकिन दिल में प्रीति थी । बाहर धूप थी लेकिन भीतर शीतलता थी ।

दुर्भाग्यवश हरगोविंद साहब के खेमे के बदले वह जहाँगीर बादशाह के खेमे की तरफ जा पहुँचा । उसने सैनिकों से पूछा : ‘‘साहब कहाँ रहते हैं ?”
सैनिकों ने समझा कि जहाँगीर साहब के लिए पूछ रहा है । वे उसे जहाँगीर के खेमे के पास ले गये । दरबान ने कहा : ‘‘साहब से मिलना है तो यह घास बाहर रख|”
घसियारा : ‘‘नहीं, बहुत दिनों से इंतजार था बादशाह का । मैं उनके पास खाली हाथ नहीं जाऊँगा । बादशाह साहब के घोडे की सेवा मेरे मुकद्दर में भी लिखने दो ।”
जहाँगीर घसियारे और दरबान की बातचीत सुन रहा था । दरबान इनकार कर रहा था और घसियारा श्रद्धा-प्रेम से भरी वाणी में गिडगिडा रहा था । जहाँगीर बादशाह ने भीतर से आवाज लगायी: ‘‘इसे भीतर आने दो।”

घसियारा खुश हो गया कि ‘देखो, सच्चे बादशाह ने मेरी पुकार सुन ली। उसने गुरु हरगोविंद साहब का केवल नाम सुन रखा था, उन्हें देखा नहीं था । उसने गट्ठर नीचे धरा, टक्का रखा और मत्था टेका । उस जमाने का टक्का आज के रुपये से भी अधिक मूल्य रखता था। एक टक्के में लोग दिनभर का भोजन कर सकते थे। समझो, १० रुपये रख दिये उसने।
वह भक्त जहाँगीर से कहता है : ‘‘सच्चे बादशाह ! आज तक आपका केवल नाम सुन रखा था लेकिन आज इस पापी जीव को आपके रू-बरू दर्शन हुए । सच्चे बादशाह! मैं धन्य हो गया… मुझे और तो कुछ नहीं चाहिए, केवल मुक्ति का मार्ग बताने की कृपा करें । मेरा जन्म-मरण का चक्र तोडने की कृपा करें।”

जहाँगीर उसकी प्रेमाभक्ति, नम्रता और प्रीति से बडा प्रभावित हुआ । किन्तु जहाँगीर के बाप की भी ताकत नहीं थी कि उसे मुक्ति दे सके, जन्म-मरण से पार कर सके । वह तो सच्चे बादशाह, सदगुरुलोग ही कर सकते हैं ।

जहाँगीर खुश हुआ और मन-ही-मन सोचने लगा कि ‘इसको क्या दूँ ?’

जहाँगीर ने कहा : ‘‘देखो, यह चौरासी के चक्कर से छूटने की बात छोड दो, मुक्ति की बात भूल जाओ । यह सब बकवास है । मैं सच्चा बादशाह जहाँगीर, खुद खुदा का खास आदमी हूँ । तुम्हें चाहिए तो एक रियासत तुम्हारे नाम कर दूँ । घोडे-गाड़ियाँ आदि सब तुम्हें मिल जायेंगे, फिर मौज से जीवन जीना।”
तब भारत का वह घसियारा कहता है : ‘‘अच्छा, मैं गलत जगह पर आ गया हूँ।”

‘‘नहीं, नहीं । तुम सही जगह पर आये हो । सच्चा बादशाह तो मैं ही हूँ । देख लो, मेरा राजवैभव ! जो चाहो, वह तुम्हें मिल सकता है।

‘‘आप नश्वर चीजें दे सकते हैं, भोग-वस्तुएँ दे सकते हैं लेकिन अंदर का संतोष और जन्म-मरण से पार करनेवाला ब्रह्मज्ञान नहीं दे सकते । आपकी दी हुई चीजों से मैं दुनिया के भुलावे में पड सकता हूँ कि ‘मेरे पास इतने घोडे हैं, मेरी इतनी गाड़ियाँ हैं, मेरी इतनी रियासतें हैं… बादशाह ! आप बुरा मत मानना । मेरा तो शरीर भी नहीं रहेगा फिर मेरी ये चीजें कब तक रहेंगी ?”

उसने जहाँगीर के पास रखा अपना टक्का उठा लिया, घास का गट्ठर सिर पर रखा और यह कहते हुए चल पडा कि ‘मैं गलती से यहाँ आया ।’
जहाँगीर के मुँह पर मानों, थप्पड लगा ! अब उसे पता चला कि सच्चे बादशाह कौन होते हैं ?

नश्वर चीजों की कोई महत्ता नहीं है । जो सच्चे बादशाह होते हैं, सदगुरुहोते हैं वे शाश्वत शांति, शाश्वत ज्ञान और शाश्वत प्रीति देते हैं । उनके आगे जहाँगीर का राज्य तो क्या, सारी पृथ्वी का राज्य भी दो कौडी की कीमत नहीं रखता ।
जब मिला आतम हीरा। जगत हो गया सवा कसीरा ।।
वह घसियारा चलते-चलते गुरु हरगोविंद साहब के खेमे में पहुँचा । गुरुजी के श्रीचरणों में टक्का रखा, घास का गट्ठर रखा और मत्था टेका । गुरु हरगोविंद साहब ने देखा कि बाहर से तो गरीब दिखता है, घास काटकर गुजारा करता है लेकिन भीतर से इसकी बुद्धि बहुत ऊँची है, यह भीतर से धनी है ।
बाहर से कंगाल दिखता है किंतु कई अमीर भी इसकी आध्यात्मिकता के आगे कंगाल हैं ।
गुरु हरगोविंद सिंह ने उससे बातचीत की । आखिर उसने कहा : ‘‘सच्चे बादशाह ! मैंने आपका नाम सुन रखा था । आज मैं आपके दीदार के लिए निकला था लेकिन गलती से जहाँगीर के खेमे में चला गया । वह मुझे इधर-उधर की चीजें देना चाहता था किंतु उनसे रब का रस तो नहीं मिलता । अगर रब का रस नहीं मिला तो विकारी रसों में तो जीव जन्मों से भटक रहा है । भोगों में उलझाने वाले नकली बादशाह के पास मैं गलती से चला गया था ।
सच्चे बादशाह ! वह तो नकली, माया का सुख दे रहा था । यह आपकी ही रहमत थी कि मैं माया से बचकर आपके श्रीचरणों तक पहुँच पाया । सच्चा सुख बाहर के विषय-विकारों में नहीं वरन् अपने ही भीतर है – यह सुन रखा है। सच्चे बादशाह! अब आप मुझे सच्चे सुख का मार्ग बताने की कृपा करें ।
ऊँचे-में-ऊँचा सुख है रब का सुख । उस सुख को जो चाहता है उसकी समझ ऊँची है । जब सदगुरु किसी की ऊँची समझ देखते हैं तो उनका दिल खुश होता है । ऊँची समझ का धनी बाहर से गरीब हो तो भी वे खुश हो जाते हैं और अमीर हो तो भी ।

गुरु हरगोविंद सिंह ने उसे सत्संग सुनाया : ‘‘बेटा ! संसार सुख और दुःख, जीवन और मृत्यु, लाभ और हानि का ताना-बाना है । संसार आने और जाने, मिलने एवं बिछुडने के ताने-बाने से बना है, किंतु तेरा आत्मा इनसे अलग है । अगर तू अपने को शरीर मानेगा तो संसार के ताने-बाने में फँस जायेगा, लेकिन यदि तू अपने को रब का और रब को अपना मानेगा तो यह ताना-बाना तुझे नहीं बाँधेगा, तू इस ताने-बाने से पार हो जायेगा । मेरे प्यारे सिख ! तू मेरा सच्चा सिख है । सच्चा सिख वही है जो गुरु की सीख मान ले । गुरु ने अपनी गहरी अनुभूति की बातें उसे सुनायीं। घसियारे को लगा : ‘आज मेरा जन्म सफल हो गया ।
भागु होआ गुरि संतु मिलाइआ ।।
प्रभु अबिनासी घर महि पाइया ।।
धनभागी हैं वे लोग, जो भोग-विकारों में उलझाने वाले नकली बादशाहों से बचकर शाश्वत शांति और शाश्वत ज्ञान देने वाले सदगुरुओं को, सच्चे बादशाहों को खोज लेते हैं एवं उनका मार्गदर्शन पाकर अपने जीवन की मंजिल तय करने के लिए चल पडते हैं|