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उत्तम संतानप्राप्ति के लिए

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उत्तम संतानप्राप्ति के लिए ( ५ जनवरी २०१४ से १८ सितम्बर २०१४ तक का समय गर्भधान के लिए अति उत्तम है |)

ग्रह-नक्षत्रों का असर मुनष्यों-प्राणियों पर ज्यादा होता है | ब्रहस्पति, बुध, शुक्र, चन्द्र – ये शुभ ग्रह हैं | उनमे भी ब्रहस्पति अत्यंत शुभ ग्रह है | ब्रहस्पति जब बलवान होता है, तब पुण्यात्माएँ पृथ्वी पर अवतरित होती हैं | बलवान ब्रहस्पति जिसकी जन्मकुंडली में होता है, उसमें आध्यात्मिकता, ईमानदारी, सच्चारित्र्य, विद्या और उत्तम विशेषताएँ होती हैं | इसलिए गर्भाधान ऐसे समय में होना चाहिए, जिससे बच्चे का जन्म बलवान उत्तम ग्रहों की स्थिति में हो |

५ जनवरी २०१४ से १८ सितम्बर २०१४ तक का समय गर्भधान के लिए अतिशय उत्तम है | उत्तम संतान की इच्छावाले दम्पति को अधिकाधिक गुरुमंत्र का जप या हॉट सके तो पुरुष को ४० – ४० दिन के तथा महिला को २१ – २१ दिन के दो – तीन अनुष्ठान करके उत्तम संतान हेतु परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए, तत्पश्च्यात गर्भाधान करना चाहिए | गर्भाधान से पहले कम-से-कम १ – २ माह का ब्रम्हचर्य – व्रत अवश्य रखें | गाय का दूध, घी, खीर और सात्त्विक आहार लें | अंडा, मांस, मदिरा, तम्बाकू, वासी भोजन, फास्टफूड जैसे तामसी पदार्थों का सेवन न करें | गर्भाधान के बाद ज्यों – ज्यों गर्भ बढे, त्यों – त्यों स्त्री को वजन उठाना, हर प्रकार की वाहन – यात्रा, व्यायाम, नीचे झुककर काम करना (जैसे झाड़ू – पोंछा) आदि कार्यों से बचते रहना चाहिए | लाल मिर्च, हरी मिर्च, हिंग, मेथी, राई, गाजर, कपसिया तेल (Cotton seed oil), गर्म दवाईयों और गर्भ पदार्थों का सेवन न करें |
नौकरी करनेवाली महिलाओं को गर्भाधान के दिनों में और बाद के दिनों में शारीरिक-मानसिक आराम पर ख़ास ध्यान देना चाहिए | पुरुषों को भी शारीरिक आराम और मानसिक प्रसन्नता के बाद ही गर्भाधान के लिए प्रवृत्त हों योग्य है | रात्रि-जागरण बल, बुद्धि, स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर करता है | काम-धंधा है तब भी रात्रि की नींद का फायदा लिया करो | तुमने देखा होगा कि ट्रक ड्राइवर का श्रम तुम्हारे-हमारे से ज्यादा है लेकिन कोई बढ़िया मकान या बढ़िया गाड़ीवाला नहीं मिलेगा | तन-मन-बुद्धि का रात्रि की नींद में जितना विकास होता है, उतना दिन की नींद में नहीं होता |
 ऋषिप्रसाद – मार्च २०१४ से  

 

 

 

आपके जीवन में शिव-ही-शिव हो-पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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आपके जीवन में शिव-ही-शिव हो-पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

चार महारात्रियाँ हैं – जन्माष्टमी, होली, दिवाली और शिवरात्रि | शिवरात्रि को अहोरात्रि भी बोलते हैं । इस दिन ग्रह नक्षत्रों आदि का ऐसा मेल होता है कि हमारा मन नीचे के केन्द्रों से ऊपर आये । देखना, सुनना, चखना, सूँघना व स्पर्श करना– इस विकारी जीवन में तो जीव-जंतु भी होशियार हैं । बकरा जितना काम विकार में होशियार है, उतना मनुष्य नहीं हो सकता । बकरा एक दिन में चालीस बकरियों के साथ काला मुँह कर सकता है, मनुष्य करे तो मर जाय । यह विकार भोगने के लिए तो बकरा, सुअर, खरगोश और कई नीच योनियाँ हैं । विकार भोगने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है ।

विकारी शरीरों की परम्परा में आते हुए भी निर्विकार नारायण का आनंद-माधुर्य पाकर अपने शिवस्वरूप को जगाने के लिए शिवरात्रि आ जाती है कि ‘लो भाई ! तुम उठाओ इस मौके का फायदा….।’

शिवजी कहते हैं कि ‘मैं बड़े-बड़े तपों से, बड़े-बड़े यज्ञों से, बड़े-बड़े दानों से, बड़े-बड़े व्रतों से इतना संतुष्ट नहीं होता हूँ, जितना शिवरात्रि के दिन उपवास करने से होता हूँ ।’ अब शिवजी का संतोष क्या है ? तुम भूखे मरो और शिवजी खुश हों, क्या शिव ऐसे हैं ? नहीं, भूखे नहीं मरोगे, भूखे रहोगे तो शरीर में जो रोगों के कण पड़े हैं, वे स्वाहा हो जायेंगे और जो आलस्य, तन्द्रा बढ़ाने वाले विपरीत आहार के कण हैं वे भी स्वाहा हो जायेंगे और तुम्हारा जो छुपा हुआ सत् स्वभाव, चित् स्वभाव, आनंद स्वभाव है, वह प्रकट होगा । शिवरात्रि का उपवास करके, जागरण करके देख लो । मैंने तो किया है । मैंने एक शिवरात्रि का उपवास घर पर किया था,  ऐसा फायदा हुआ कि मैं क्या-क्या वर्णन करूँ ! क्या-क्या अंतर्प्रेरणा हुई ! क्या-क्या फायदा हुआ ! उसका वर्णन करना मेरे बस का नहीं है । नहीं तो न जाने घिस-पिट के क्या हालत होती सत्तर की उम्र में ! ‘अरे बबलू ! ऐंह…. अरे जरा उठा दे… जरा बैठा दे ।’– यह हालत होती ।

इस दिन जो उपवास करे, उसे निभाये । जो बूढ़े हैं, कमजोर हैं, उपवास नहीं रख सकते, वे लोग थोड़ा अंगूर खा सकते हैं अथवा एक छोटे-मोटे नारियल का पानी पी सकते हैं, ज्यादा पीना ठीक नहीं ।

शरीर में जो जन्म से लेकर विजातीय द्रव्य हैं, पाप-संस्कार हैं, वासनाएँ हैं, उन्हें मिटाने में शिवरात्रि की रात बहुत काम करती है ।

शिवरात्रि का जागरण करो और ‘बं’ बीजमंत्र का सवा लाख जप करो । संधिवात (गठिया) की तकलीफ दूर हो जायेगी | बिल्कुल पक्की बात है ! एक दिन में ही फायदा ! ऐसा बीजमंत्र है शिवजी का | वायु मुद्रा करके बैठो और ‘बं बं बं बं बं’ जप करो । जैसे जनरेटर घूमता है तो बिजली बनती है, फिर गीजर भी चलेगा और फ्रिज भी चलेगा । दोनों विपरीत हैं लेकिन बिजली से दोनों चलते हैं । ऐसे ही ‘बं बं’ से विपरीत धर्म भी काम में आ जाते हैं । बुढ़ापे में तो वायु-संबंधी रोग ज्यादा होते हैं । जोड़ों में दर्द हो गया, यह पकड़ गया-वह पकड़ गया…. ‘बं बं’ जपो, उपवास करो, देखो अगला दिन कैसा स्फूर्तिवाला होता है ।

शिवरात्रि की रात का आप खूब फायदा उठाना । विद्युत के कुचालक आसन का उपयोग करना । भीड़ भाड़ में, मंदिर में नहीं गये तो ऐसे ही ॐ नमः शिवाय जप करना । मानसिक मंदिर में जा सको तो जाना । मन से ही की हुई पूजा षोडषोपचार की पूजा से दस गुना ज्यादा हितकारी होती है और अंतर्मुखता ले आती है।

शिवजी का पत्रम् -पुष्पम् से पूजन करके मन से मन का संतोष करें, फिर ॐ नमः शिवाय…. ॐ नमः शिवाय…. शांति से जप करते गये । इस जप का बड़ा भारी महत्त्व है । अमुक मंत्र की अमुक प्रकार की रात्रि को शांत अवस्था में, जब वायुवेग न हो आप सौ माला जप करते हैं तो आपको कुछ-न-कुछ दिव्य अनुभव होंगे । अगर वायु-संबंधी बीमारी हैं तो बं बं बं बं बं सवा लाख जप करते हो तो अस्सी प्रकार की वायु-संबंधी बीमारियाँ गायब ! अगर तुम प्रणव की 120 मालाएँ करते हो रोज और ऐसे पाँच लाख मंत्रों का जप करते हो तो आपकी मंत्रसिद्धि की शक्तियाँ जागृत होने लगती है । ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र तो सब बोलते हैं लेकिन इसका छंद कौन सा है, इसके ऋषि कौन हैं, इसके देवता कौन हैं, इसका बीज क्या है, इसकी शक्ति क्या है, इसका कीलक क्या है- यह मैं बता देता हूँ । अथ ॐ नमः शिवाय मंत्र: । वामदेव ऋषिः । पंक्तिः छंदः । शिवो देवता । ॐ बीजम् । नमः शक्तिः । शिवाय कीलकम् । अर्थात् ॐ नमः शिवाय का कीलक है ‘शिवाय’, ‘नमः’ है शक्ति, ॐ है बीज… हम इस उद्देश्य से (मन ही मन अपना उद्देश्य बोलें) शिवजी का मंत्र जप रहे हैं, ऐसा संकल्प करके जप किया जाय तो उसी संकल्प की पूर्ति में मंत्र की शक्ति काम देगी ।

अगर आप शिव की पूजा स्तुति करते हैं और आपके अंदर में परम शिव को पाने का संकल्प हो जाता है तो इससे बढ़कर कोई उपहार नहीं और इससे बढ़कर कोई पद नहीं है । भगवान शिव से प्रार्थना करें : ‘इस संसार के क्लेशों से बचने के लिए, जन्म-मृत्यु के शूलों से बचने के लिए हे भगवान शिव ! हे साम्बसदाशिव ! हे शंकर ! मैं आपकी शरण हूँ, मैं नित्य आने वाली संसार की यातनाओं से हारा हुआ हूँ, इसलिए आपके मंत्र का आश्रय ले रहा हूँ । आज के शिवरात्रि के इस व्रत से और मंत्रजप से तुम मुझ पर प्रसन्न रहो क्योंकि तुम् अंतर्यामी साक्षी चैतन्य हो । हे प्रभु ! तुम संतुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्राप्त कराओ । सुख और दुःख में मैं सम रहूँ । लाभ और हानि को सपना समझूँ । इस संसार के प्रभाव से पार होकर इस शिवरात्रि के वेदोत्सव में मैं पूर्णतया अपने पाप-ताप को मिटाकर आपके पुण्यस्वभाव को प्राप्त करूँ ।’

शिवधर्म पाँच प्रकार का कहा गया है : एक तो तप (सात्त्विक आहार, उपवास, ब्रह्मचर्य) शरीर से, मन से, पति-पत्नी, स्त्री पुरुष की तरफ के आकर्षण का अभाव । आकर्षण मिटाने में सफल होना हो तो ॐ अर्यमायै नमः…. ॐ अर्यमायै नमः….. यह जप शिवरात्रि के दिन कर लेना, क्योंकि शिवरात्रि का जप कई गुना अधिक फलदायी कहा गया है । दूसरा है भगवान की प्रसन्नता के लिए सत्कर्म, पूजन-अर्चन आदि (मानसिक अथवा शारीरिक), तीसरा शिवमंत्र का जप, चौथा शिवस्वरूप का ध्यान और पाँचवाँ शिवस्वरूप का ज्ञान। शिवस्वरूप का ज्ञान – यह आत्मशिव की उपासना है । चिता में भी शिवतत्त्व की सत्ता है, मुर्दे में भी शिवतत्त्व की सत्ता है तभी तो मुर्दा फूलता है । हर जीवाणु में शिवतत्त्व है । तो इस प्रकार अशिव में भी शिव देखने के नजरियेवाला ज्ञान, दुःख में भी सुख को ढूँढ निकालने वाला ज्ञान, मरूभूमि में भी वसंत और गंगा लहराने वाला श्रद्धामय नजरिया, दृष्टि यह आपके जीवन में शिव ही शिव लायेगी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2011, पृष्ठ संख्या 14, 15 अंक 218

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कल्याणमय शिव के पूजन की रात्रि : महाशिवरात्रि-पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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कल्याणमय शिव के पूजन की रात्रि : महाशिवरात्रि-पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी अर्थात् महाशिवरात्रि पृथ्वी पर शिवलिंग के प्राकट्य का दिवस है और प्राकृतिक नियम के अनुसार जीव-शिव के एकत्व में मदद करने वाले ग्रह-नक्षत्रों के योग का दिवस है । इस दिन रात्रि-जागरण कर ईश्वर की आराधना-उपासना की जाती है |

‘शिव’ से तात्पर्य है ‘कल्याण’ अर्थात् यह रात्रि बड़ी कल्याणकारी रात्रि है | इस रात्रि में जागरण करते हुए ॐ… नमः…. शिवाय… इस प्रकार प्लुत जप करें, मशीन की नाईं जप, पूजा न करें, जप में जल्दबाजी न हो | बीच बीच में आत्मविश्रांति मिलती जाय | इसका बड़ा हितकारी प्रभाव, अदभुत लाभ होता है | साथ ही अनुकूल की चाह न करना और विपरीत परिस्थिति से भागना-घबराना नहीं | यह परम पद में प्रतिष्ठित होने का सुंदर तरीका है | महाशिवरात्रि को भक्तिभावपूर्वक रात्रि-जागरण करना चाहिए | ‘जागरण’ का मतलब है जागना | जागना अर्थात् अनुकूलता-प्रतिकूलता में न बहना, बदलने वाले शरीर संसार में रहते हुए अबदल आत्मशिव में जागना | मनुष्य जन्म कहीं विषय-विकारों में बर्बाद न हो जाये बल्कि अपने लक्ष्य परमात्म-तत्त्व को पाने में ही लगे – इस प्रकार की विवेक बुद्धि से अगर आप जागते हो तो वह शिवरात्रि का ‘जागरण’ हो जाता है। इस जागरण से आपके कई जन्मों के पाप-ताप, वासनाएँ क्षीण होने लगती हैं तथा बुद्धि शुद्ध होने लगती है एवं जीव शिवत्व में जागने के पथ पर अग्रसर होने लगता है।

महाशिवरात्रि का पर्व अपने अहं को मिटाकर लोकेश्वर से मिलने के लिए है | आत्मकल्याण के लिए पांडवों ने भी शिवरात्रि महोत्सव का आयोजन किया था, जिसमें सम्मिलित होने के लिए भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका से हस्तिनापुर आये थे | जिन्हें संसार से सुख वैभव लेने की इच्छा होती है वे भी शिवजी की आराधना करते हैं और जिन्हें सदगति प्राप्त करनी होती है अथवा आत्मकल्याण में रूचि है वे भी शिवजी की आराधना करते हैं |

जल, पंचामृत, फल-फूल एवं बिल्वपत्र से शिवजी का पूजन करते हैं | बिल्वपत्र में तीन पत्ते होते हैं जो सत्त्व, रज एवं तमोगुण के प्रतीक हैं | हम अपने ये तीनों गुण शिवार्पण करके गुणों से पार हो जायें, यही इसका हेतु है | पंचामृत-पूजा क्या है ? पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश – इन पंचमहाभूतों का ही सारा भौतिक विलास है | इन पंचमहाभूतों का भौतिक विलास जिस चैतन्य की सत्ता से हो रहा है उस चैतन्यस्वरूप शिव में अपने अहं को अर्पित कर देना, यही पंचामृत पूजा है | धूप और दीप द्वारा पूजा से क्या तात्पर्य है ? शिवोऽहम्, आनन्दोऽहम्, (मैं शिवस्वरूप हूँ, आनन्दस्वरूप हूँ) इस भाव में तल्लीन होकर अपने शिवस्वरूप, आनन्दस्वरूप की सुवास से वातावरण को महकाना ही धूप करना है और आत्मज्ञान के प्रकाश में जीने का संकल्प करना दीप प्रकटाना है |

चाहे जंगल या मरूभूमि में क्यों न हो, रेती या मिट्टी के शिवजी बना लिये, उस पर पानी के छींटे मार दिये, जंगली फूल तोड़कर धर दिये और मुँह से ही नाद बजा दिया तो शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं एवं भावना शुद्ध होने लगती है, आशुतोष जो ठहरे ! जंगली फूल भी शुद्ध भाव से तोड़कर शिवलिंग पर चढ़ाओगे तो शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं और यही फूल कामदेव ने शिवजी को मारे तो शिवजी नाराज हो गये | क्यों ? क्योंकि फूल मारने के पीछे कामदेव का भाव शुद्ध नहीं था, इसीलिए शिवजी ने तीसरा नेत्र खोलकर उसे भस्म कर दिया | शिवपूजा में वस्तु का मूल्य नहीं, भाव का मूल्य है | ‘भावे हि विद्यते देवः’ |

आराधना का एक तरीका यह है कि उपवास रखकर पुष्प, पंचामृत, बिल्पत्रादि से चार प्रहर पूजा की जाय | दूसरा तरीका यह है कि मानसिक पूजा की जाय | हम मन ही मन भावना करें-

ज्योतिर्मात्रस्वरूपाय निर्मलज्ञानचक्षुषे |

नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिंगमूर्तये ||

‘ज्योतिमात्र (ज्ञानज्योति अर्थात् सच्चिदानन्द, साक्षी) जिनका स्वरूप है, निर्मल ज्ञान ही जिनका नेत्र है, जो लिंगस्वरूप ब्रह्म हैं, उन परम शांत कल्याणमय भगवान शिव को नमस्कार है |’

‘स्कंद पुराण’ के ब्रह्मोत्तर खंड में शिवरात्रि के उपवास तथा जागरण की महिमा का वर्णन है-

“शिवरात्रि का उपवास अत्यन्त दुर्लभ है | उसमें भी जागरण करना तो मनुष्यों के लिये और दुर्लभ है | लोक में ब्रह्मा आदि देवता और वसिष्ठ आदि मुनि इस चतुर्दशी की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं | इस दिन यदि किसी ने उपवास किया तो उसे सौ यज्ञों से अधिक पुण्य होता है |”

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नास्ति शिवरात्रि परात्परम् – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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नास्ति शिवरात्रि परात्परम् – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

‘स्कन्द पुराण’ में सूतजी कहते हैं-

सा जिह्वा या शिवं स्तौति तन्मनो ध्यायते शिवम् |

तौ कर्णौ तत्कथालोलौ तौ हस्तौ तस्य पूजकौ ||

यस्येन्द्रियाणि सर्वाणि वर्तन्ते शिवकर्मसु |

स निस्तरति संसारे भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ||

‘वही जिह्वा सफल है जो भगवान शिवजी की स्तुति करती है | वही मन सार्थक है जो शिव के ध्यान में संलग्न रहता है | वे ही कान सफल हैं जो उनकी कथा सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं और वे ही हाथ सार्थक हैं जो शिवजी की पूजा करते हैं | इस प्रकार जिसकी संपूर्ण इन्द्रियाँ भगवान शिव के कार्यों में लगी रहती हैं, वह संसार-सागर से पार हो जाता है और भोग एवं मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है |’           (स्कन्द पु. ब्रह्मोत्तर खंडः 4.1,7,9)  

ऐसे ऐश्वर्याधीश, परम पुरुष, सर्वव्यापी, सच्चिदानंदस्वरूप, निर्गुण, निराकार, परब्रह्म परमात्मा भगवान शिव की आराधना का पर्व है – ‘महाशिवरात्रि’ | महाशिवरात्रि अर्थात् भूमंडल पर ज्योतिर्लिंग के प्रादुर्भाव का परम पावन दिवस, भगवान महादेव के विवाह का मंगल दिवस, प्राकृतिक विधान के अनुसार जीव-शिव के एकत्व का बोध करने में मदद करने वाले गृह-नक्षत्रों के योग का सुंदर दिवस |

शिव से तात्पर्य है – ‘कल्याण’ | महाशिवरात्रि बड़ी कल्याणकारी रात्रि है | इस रात्रि में किये जाने वाले जप, तप और व्रत हजारों गुना पुण्य प्रदान करते हैं | ‘इशान संहिता’ में भगवान शिव पार्वती जी से कहते हैं-

फाल्गुनो कृष्णपक्षस्य या तिथिः स्याच्चतुर्दशी |

तस्या या तामसी रात्रि सोच्यते शिवरात्रिका ||

तत्रोपवासं कुर्वाणः प्रसादयति मां ध्रुवम् |

न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया |

तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः ||

‘फाल्गुन के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को आश्रय करके जिस अंधकारमयी रात्रि का उदय होता है, उसी को शिवरात्रि कहते हैं | उस दिन जो उपवास करता है वह निश्चय ही मुझे संतुष्ट करता है | उस दिन उपवास करने पर मैं जैसा प्रसन्न होता हूँ, वैसा स्नान कराने से तथा वस्त्र, धूप और पुष्प के अर्पण से भी नहीं होता |

‘ व्रत में श्रद्धा, उपवास एवं प्रार्थना की प्रधानता होती है | व्रत नास्तिक को आस्तिक, भोगी को योगी, स्वार्थी को परमार्थी, कृपण को उदार, अधीर को धीर, असहिष्णु को सहिष्णु बनाता है | जिनके जीवन में व्रत और नियमनिष्ठा है, उनके जीवन में निखार आ जाता है |

शिवरात्रि व्रत सभी पापों का नाश करने वाला है और यह योग एवं मोक्ष की प्रधानता वाला व्रत है |

‘स्कंद पुराण’ में आता है :

परात्परं नास्ति शिवरात्रि परात्परम् |

न पूजयति भक्तयेशं रूद्रं त्रिभुवनेश्वरम् |

जन्तुर्जन्मसहस्रेषु भ्रमते नात्र संशयः ||

‘शिवरात्रि व्रत परात्पर (सर्वश्रेष्ठ) है, इससे बढ़कर श्रेष्ठ कुछ नहीं है | जो जीव इस रात्रि में त्रिभुवनपति भगवान महादेव की भक्तिपूर्वक पूजा नहीं करता, वह अवश्य सहस्रों वर्षों तक जन्म-चक्रों में घूमता रहता है |’

शिवरात्रि में रात्रि जागरण, बिल्वपत्र-चंदन-पुष्प आदि से शिव पूजन तथा जप-ध्यान किया जाता है | यदि इस दिन ‘बं’ बीजमंत्र का सवा लाख जप किया जाय तो जोड़ों के दर्द एवं वायु संबंधी रोगों में विशेष लाभ होता है |

जागरण का मतलब है- ‘जागना’ | आपको जो मनुष्य जन्म मिला है वह कहीं विषय विकारों में बरबाद न हो, बल्कि जिस हेतु वह मिला है उस अपने लक्ष्य – शिवतत्त्व को पाने में ही लगे, इस प्रकार की विवेक बुद्धि रखकर आप जागते हैं तो वह शिवरात्रि का उत्तम जागरण हो जाता है | इस जागरण से आपके जन्म-जन्मांतर के पाप-ताप कटने लगते हैं, बुद्धि शुद्ध होने लगती है और शिवत्व में जागने के पथ पर अग्रसर होने लगता है |

अन्य उत्सवों जैसे – दीपावली, होली, मकर सक्रान्ति आदि में खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, मिलने-जुलने आदि का महत्त्व होता है, लेकिन शिवरात्रि महोत्सव व्रत, उपवास एवं तपस्या का दिन है | दूसरे महोत्सवों में तो औरों से मिलने की परंपरा है लेकिन यह पर्व अपने अहं को मिटाकर लोकेश्वर से मिलने के लिए हैं, भगवान शिव के अनुभव को अपना अनुभव बनाने के लिए है | मानव में अदभुत सुख, शांति एवं सामर्थ्य भरा हुआ है | जिस आत्मानुभव में शिवजी तृप्त एवं संतुष्ट हैं, उस अनुभव को वह अपना अनुभव बना सकता है | अगर उसे शिवतत्त्व में जागे हुए, आत्मशिव में रमण करने वाले जीवन्मुक्त महापुरुषों का सत्संग-सान्निध्य मिल जाय, उनका मार्गदर्शन, उनकी असीम कृपादृष्टि मिल जाय तो उसकी असली शिवरात्रि, कल्याणमयी रात्रि हो जाय….                  

महाशिवरात्रि महापर्व है शिवतत्त्व को पाने का |

आत्मशिव की पूजा करके अपने-आपमें आने का ||

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आत्मशिव से मुलाकात – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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आत्मशिव से मुलाकात- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू
शिवरात्रि का जो उत्सव है वह तपस्या प्रधान उत्सव है, व्रत प्रधान उत्सव है | यह उत्सव मिठाइयाँ खाने का नहीं, सैर-सपाटा करने का नहीं बल्कि व्यक्त में से हटकर अव्यक्त में जाने का है, भोग से हटकर योग में जाने का है, विकारों से हटकर निर्विकार शिवजी के सुख में अपने को डुबाने का उत्सव है |
‘महाभारत’ में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को शिव-महिमा बताते हुए कहते हैं- “तत्त्वदृष्टि से जिनकी मति सूक्ष्म है और जिनका अधिकार शिवस्वरूप को समझने में है वे लोग शिव का पूजन करें, ध्यान करें, समत्वयोग को प्राप्त हो नहीं तो शिव की मूर्ति का पूजन करके हृदय में शुभ संकल्प विकसित करें अथवा शिवलिंग की पूजा करके अपने शिव-स्वभाव को, अपने कल्याण स्वभाव को, आत्मस्वभाव को जाग्रत करें |”
मनुष्य जिस भाव से, जिस गति से परमात्मा का पूजन, चिंतन, धारणा, ध्यान करता है उतना ही उसकी सूक्ष्म शक्तियों का विकास होता है और वह स्थूल जगत की आसक्ति छोड़कर सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम स्वरूप परमात्मा शिव को पाकर इहलोक एवं परलोक को जीत लेता है |
इहलोक और परलोक में ऐंद्रिक सुविधाएँ हैं, शरीर के सुख हैं लेकिन अपने को ‘स्व’ के सुख में पहुँचाये बिना शरीर के सुख बे-बुनियाद हैं और अस्थायी हैं | अनुकूलता का सुख तुच्छ है, आत्मा का सुख परम शिवस्वरूप है, कल्याणस्वरूप है |
जो प्रेम परमात्मा से करना चाहिए वह किसी के सौंदर्य से किया तो प्रेम द्वेष में बदल जायेगा, सौंदर्य ढल जायेगा या तो सौंदर्य ढलने के पहले ही आपकी प्रीति ढल जायेगी | जो मोहब्बत परमात्मा से करनी चाहिए वह अगर हाड़-मांस के शरीर से करोगे तो अपना और जिससे मोहब्बत करते हो उसका, दोनों का अहित होगा |
जो विश्वास भगवान पर करना चाहिए, वह विश्वास अगर धन पर करते हो तो धन भी सताता है | इसलिए अपने ऊपर कृपा कीजिये, अब बहुत समय बीत गया |
जैसे पुजारी ब्राह्मण लोग अथवा भक्तगण भगवान शिव को पंचामृत चढ़ाते हैं, ऐसे ही आप पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश – इन पंचभूतों से बने हुए पंचभौतिक पदार्थों का आत्मशिव की प्रसन्नता के लिए सदुपयोग करें और सदाचार से जीयें तो आपकी मति सत्-चित्-आनन्दस्वरूप शिव का साक्षात्कार करने में सफल हो जायेगी |
जो पंचभूतों से मिश्रित जगत में कर्ता और भोक्ता का भाव न रखकर परमात्मशिव के संतोष के लिए तटस्थ भाव से पक्षपात रहित, राग-द्वेष रहित भाव से व्यवहार करता है वह शिव की पूजा ही करता है |
पंचभूतों को सत्ता देने वाला यह आत्मशिव है | उसके संतोष के लिए, उसकी प्रसन्नता के लिए जो संयम से खाता पीता, लेता-देता है, भोग-बुद्धि से नहीं निर्वाह बुद्धि से जो करता है उसका तो भोजन करना भी पूजा हो जाता है |
कालरात्रि, महारात्रि, दारूणरात्रि, अहोरात्रि ये जो रात्रियाँ हैं, ये जो पर्व हैं इन दिनों में किया हुआ ध्यान, भजन, तप, जप अनंतगुना फल देता है | जैसे किसी चपरासी को एक गिलास पानी पिला देते हो, ठीक है, वो बहुत-बहुत तो आपकी फाइल एक मेज से दूसरे मेज तक पहुँचा देगा, किन्तु तुम्हारे घर पर प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति पानी का प्याला पी लेता है तो उसका मूल्य बहुत हो जाता है | इसलिए पद जितना-जितना ऊँचा है उनसे संबंध रखने से उतना ऊँचा लाभ होता है | ऊँचे-में-ऊँचा सर्वराष्ट्रपतियों का भी आधार, चपरासियों का भी आधार, संत-साधु सबका आधार परमात्मा है, तुम परमात्मा के नाते अगर थोड़ा बहुत भी कर लेते हो तो उसका अनंत गुना फल होना स्वाभाविक है |
मन सुखी होता है, दुःखी होता है | उस सुख-दुःख को भी कोई सत्यस्वरूप देख रहा है, वह कल्याणस्वरूप तेरा शिव है, तू उससे मुलाकात कर ले | जो शिवरात्रि को उपवास करना चाहे, जप करना चाहे वह मन ही मन शिवजी को कह दे :
देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु ते |
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव ||
तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति |
कामाद्याः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि ||
‘देवदेव ! महादेव ! नीलकण्ठ ! आपको नमस्कार है | देव ! मैं आपके शिवरात्रि-व्रत का अनुष्ठान करना चाहता हूँ | देवेश्वर ! आपके प्रभाव से यह व्रत बिना किसी विघ्न बाधा के पूर्ण हो और काम आदि शत्रु मुझे पीड़ा न दें |’ (शिवपुराण, कोटिरूद्र संहिता अ. 37) ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ 

आत्मशिव में आराम पाने का पर्व : महाशिवरात्रि- पूज्य बापूजी

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आत्मशिव में आराम पाने का पर्व : महाशिवरात्रि- पूज्य बापूजी

फाल्गुन (गुजरात-महाराष्ट्र में माघ) कृष्ण चतुर्दशी को ‘महाशिवरात्रि’ के रूप में मनाया जाता है | यह तपस्या, संयम, साधना बढ़ाने का पर्व है, सादगी व सरलता से बिताने का दिन है, आत्मशिव में तृप्त रहने का, मौन रखने का दिन है |

महाशिवरात्रि देह से परे आत्मा में, सत्यस्वरूप शिवतत्त्व में आराम पाने का पर्व है | भाँग पीकर खोपड़ी खाली करने का दिन नहीं है लेकिन रामनाम का अमृत पीकर हृदय पावन करने का दिन है | संयम करके तुम अपने-आपमें तृप्त होने के रस्ते चल पडो, उसीका नाम है महाशिवरात्रि पर्व |

 महाशिवरात्रि जागरण, साधना, भजन करने की रात्रि है | ‘शिव’ का तात्पर्य है ‘कल्याण’ अर्थात यह रात्रि बड़ी कल्याणकारी है | इस रात्रि में किया जानेवाला जागरण, व्रत-उपवास, साधन-भजन, अर्थ सहित शांत जप-ध्यान अत्यंत फलदायी माना जाता है | ‘स्कन्द पुराण’ के ब्रह्मोत्तर खंड में आता है : ‘शिवरात्रि का उपवास अत्यंत दुर्लभ है | उसमें भी जागरण करना तो मनुष्यों के लिए और दुर्लभ है | लोक में ब्रह्मा आदि देवता और वसिष्ठ आदि मुनि इस चतुर्दशी की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं | इस दिन यदि किसी ने उपवास किया तो उसे सौ यज्ञों से अधिक पुण्य होता है |’

‘जागरण’ का मतलब है जागना | जागना अर्थात अनुकूलता-प्रतिकूलता में न बहना, बदलनेवाले शरीर-संसार में रहते हुए अब्दल आत्मशिव में जागना | मनुष्य-जन्म कही विषय-विकारों में बरबाद न हो जाय बल्कि अपने लक्ष्य परमात्म-तत्त्व को पाने में ही लगे – इस प्रकार की विवेक-बुद्धि से अगर आप जागते हो तो वह शिवरात्रि का ‘जागरण’ हो जाता है |

आज के दिन भगवान साम्ब-सदाशिव की पूजा, अर्चना और चिंतन करनेवाला व्यक्ति शिवतत्त्व में विश्रांति पाने का अधिकारी हो जाता है | जुड़े हुए तीन बिल्वपत्रों से भगवान शिव की पूजा की जाती है, जो संदेश देते हैं कि ‘ हे साधक ! हे मानव ! तू भी तीन गुणों से इस शरीर से जुड़ा है | यह तीनों गुणों का भाव ‘शिव-अर्पण’ कर दें, सात्विक, राजस, तमस प्रवृतियाँ और विचार अन्तर्यामी साम्ब-सदाशिव को अर्पण कर दे |’

बिल्वपत्र की सुवास तुम्हारे शरीर के वात व कफ के दोषों को दूर करती है | पूजा तो शिवजी की होती है और शरीर तुम्हारा तंदुरुस्त हो जाता है | भगवान को बिल्वपत्र चढ़ाते-चढ़ाते अपने तीन गुण अर्पण कर डालो, पंचामृत अर्पण करते-करते पंचमहाभूतों का भौतिक विलास जिस चैतन्य की सत्ता से हो रहा है उस चैतन्यस्वरूप शिव में अपने अहं को अर्पित कर डालो तो भगवान के साथ तुम्हारा एकत्व हो जायेगा | जो शिवतत्त्व है वही तुम्हारा आत्मा है और जो तुम्हारा आत्मा है वही शिवस्वरूप परमात्मा है |

 शिवरात्रि के दिन पंचामृत से पूजा होती है, मानसिक पूजा होती है और शिवजी का ध्यान करके हृदय में शिवतत्त्व का प्रेम प्रकट करने से भी शिवपूजा मानी जाती है | ध्यान में आकृति का आग्रह रखना बालकपना है | आकाश से भी व्यापक निराकार शिवतत्त्व का ध्यान …….! ‘ॐ……. नमः …….. शिवाय…….’ – इस प्रकार प्लुत उच्चारण करते हुए ध्यानस्थ हो जायें |

 शिवरात्रि पर्व तुम्हें यह संदेश देता है कि जैसे शिवजी हिमशिखर पर रहते हैं, माने समता की शीतलता पर विराजते हैं, ऐसे ही अपने जीवन को उन्नत करना हो तो साधना की ऊँचाई पर विराजमान होओ तथा सुख-दुःख के भोगी मत बनो | सुख के समय उसके भोगी मत बनो, उसे बाँटकर उसका उपयोग करो | दुःख के समय उसका भोग न करके उपयोग करो | रोग का दुःख आया है तो उपवास और संयम से दूर करो | मित्र से दुःख मिला है तो वह आसक्ति और ममता छुडाने के लिए मिला है | संसार से जो दुःख मिलता है वह संसार से आसक्ति छुडाने के लिए मिलता है, उसका उपयोग करो |

 तुम शिवजी के पास मंदिर में जाते हो तो नंदी मिलता है – बैल | समाज में जो बुद्धू होते हैं उनको बोलते हैं तू तो बैल है, उनका अनादर होता है लेकिन शिवजी के मंदिर में जो बैल है उसका आदर होता है | बैल जैसा आदमी भी अगर निष्फल भाव से सेवा करता है, शिवतत्त्व की सेवा करता है, भगवतकार्य क्या है कि ‘बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय’ जो कार्य है वह भगवतकार्य है | जो भगवन शिव की सेवा करता है, शिव की सेवा माने हृदय में छुपे हुए परमात्मा की सेवा के भाव से जो लोगों के काम करता है, वह चाहे समाज की नजर से बुद्धू भी हो तो भी देर-सवेर पूजा जायेगा | यह संकेत है नंदी की पूजा का |

शिवजी के गले में सर्प है | सर्प जैसे विषैले स्वभाववाले व्यक्तियों से भी काम लेकर उनको समाज का श्रृंगार, समाज का गहना बनाने की क्षमता, कला उन ज्ञानियों में होती है |

भगवन शिव भोलानाथ हैं अर्थात जो भोले-भाले हैं उनकी सदा रक्षा करनेवाले हैं | जो संसार-सागर से तैरना चाहते हैं पर कामना के बाण उनको सताते हैं, वे शिवजी का सुमिरण करते हैं तो शिवजी उनकी रक्षा करते हैं |

 शिवजी ने दूज का चाँद धारण किया है | ज्ञानी महापुरुष किसी का छोटा-सा भी गुण होता है तो शिरोधार्य कर लेते हैं | शिवजी के मस्तक से गंगा बहती है | जो समता के ऊँचे शिखर पर पहुँच गये हैं, उनके मस्तक से ज्ञान की तरंगें बहती हैं इसलिए हमारे सनातन धर्म के देवों के मस्तक के पीछे आभामण्डल दिखाया जाता है |

 शिवजी ने तीसरे नेत्र द्वारा काम को जलाकर यह संकेत किया कि ‘हे मानव ! तुझमे भी तेरा शिवतत्त्व छुपा है, तू विवेक का तीसरा नेत्र खोल ताकि तेरी वासना और विकारों को तू भस्म कर सके, तेरे बंधनों को तू जला सके |’

 भगवान शिव सदा योग में मस्त है इसलिए उनकी आभा ऐसे प्रभावशाली है कि उनके यहाँ एक-दूसरे से जन्मजात शत्रुता रखनेवाले प्राणी भी समता के सिंहासन पर पहुँच सकते हैं | बैल और सिंह की, चूहे और सर्प की एक ही मुलाकात काफी है लेकिन वहाँ उनको वैर नही है | क्योंकि शिवजी की निगाह में ऐसी समता है कि वहाँ एक-दूसरे के जन्मजात वैरी प्राणी भी वैरभाव भूल जाते हैं | तो तुम्हारे जीवन में भी तुम आत्मानुभव की यात्रा करो ताकि तुम्हारा वैरभाव गायब हो जाय | वैरभाव से खून खराब होता है | तो चित्त में ये लगनेवाली जो वृत्तियाँ हैं, उन वृत्तियों को शिवतत्त्व के चिंतन से ब्रह्माकार बनाकर अपने ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार करने का संदेश देनेवाले पर्व का नाम है शिवरात्रि पर्व |

समुद्र-मंथन के समय शिवजी ने हलाहल विष पीया है | वह हलाहल न पेट में उतारा, न वमन किया, कंठ में धारण किया इसलिए भोलानाथ ‘नीलकंठ’ कहलाये | तुम भी कुटुम्ब के, घर के शिव हो | तुम्हारे घर में भी अच्छी-अच्छी समग्री आये तो बच्चों को, पत्नी को, परिवार को दो और घर में जब विघ्न-बाधा आये, जब हलाहल आये तो उसे तुम कंठ में धारण करो तो तुम भी नीलकंठ की नाई सदा आत्मानंद में मस्त रह सकते हो | जो समिति के, सभा के, मठ के, मंदिर के, संस्था के, कुटुम्ब के, आस-पड़ोस के, गाँव के बड़े हैं उनको उचित है कि काम करने का मौका आये तो शिवजी की नाई स्वयं आगे आ जाये और यश का मौका आये तो अपने परिजनों को आगे कर दें |

अगर तुम पत्नी हो तो पार्वती माँ को याद करो, जगजननी, जगदम्बा को याद करो कि वे भगवान शिवजी की समाधि में कितना सहयोग करती है ! तो तुम भी यह विचार करो कि ‘आत्मशिव को पाने की यात्रा में आगे कैसे बढ़े ?’ और अगर तुम पत्नी की जगह पर हो तो यह सोचो कि ‘पत्नी पार्वती की नाई उन्नत कैसे हो ?’ इससे तुम्हारा ग्रहस्थ-जीवन धन्य हो जायेगा |

शिवरात्रि का पर्व यह संदेश देता है कि जितना-जितना तुम्हारे जीवन में निष्कामता आती है, परदुःखकातरता आती है, परदोषदर्शन की निगाह कम होती जाती है, दिव्य परम पुरुष की ध्यान-धरणा होती है उतना-उतना तुम्हारा वह शिवतत्त्व निखरता है, तुम सुख-दुःख से अप्रभावित अपने सम स्वभाव, इश्वरस्वभाव में जागृत होते हो और तुम्हारा हृदय आनंद, स्नेह, साहस एवं मधुरता से छलकता है |