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राजनांदगाँव में आत्‍मसाक्षात्‍कार दिवस

                                        राजनांदगाँव में आत्‍मसाक्षात्‍कार दिवस

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू का 53 वाँ आत्मसाक्षात्कार दिवस पर 2  अक्टूबर को संत श्री आशारामजी आश्रम राजनंदगाँव में पूज्य बापू के स्वास्थ्य लाभ व शीघ्र कारावास से रिहाई हेतु यज्ञ – हवन , महामृत्युंजय मंत्र पाठ , भजन – कीर्तन, गुरु – पूजन  कार्यक्रम धूमधाम से गया |

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कोरबा में आत्‍मसाक्षात्‍कार दिवस

कोरबा में आत्‍मसाक्षात्‍कार दिवस

पूज्‍य संत श्री आशारामजी बापूजी का 53 वां आत्‍मसाक्षात्‍कार दिवस पर श्री योग वेदांत सेवा समिति डोंगरगढ़ में श्री योग वेदांत सेवा समिति कोरबा  (छ.ग.) के साधको द्वारा गुरु पूजन कर ,भजन – कीर्तन किया गया तत्पश्चात भंडारा का आयोजन कर राहगीरों में प्रसादी भी बंटा गया |IMG-20161002-WA0042

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बिलासपुर में आत्‍मसाक्षात्‍कार दिवस

बिलासपुर में आत्‍मसाक्षात्‍कार दिवस

पूज्‍य संत श्री आशारामजी बापूजी का 53 वां आत्‍मसाक्षात्‍कार दिवस पर श्री योग वेदांत सेवा समिति बिलासपुर  (छ.ग.) द्वारा भव्य हरिनाम संकीर्तन यात्रा निकला गया |

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बेलोदी – दुर्ग में आत्‍मसाक्षात्‍कार दिवस

बेलोदी – दुर्ग में आत्‍मसाक्षात्‍कार दिवस 

संत श्री आशारामजी आश्रम, बेलोदी – दुर्ग (छ.ग.) में  मानस पूजन एवं आम भंडारे के साथ हर्षोल्‍लासपूर्वक मनाया गया पूज्‍य संत श्री आशारामजी बापूजी का 53 वां आत्‍मसाक्षात्‍कार दिवस ।IMG-20161002-WA0061IMG-20161002-WA0055 IMG-20161002-WA0057

आत्मसाक्षात्कार दिवस रायपुर आश्रम

आत्मसाक्षात्कार दिवस रायपुर आश्रम

2  अक्टूबर को पूज्य संत श्री आशारामजी बापू का 53 वाँ आत्मसाक्षात्कार दिवस पर संत श्री आशारामजी आश्रम रायपुर में यज्ञ – हवन , महामृत्युंजय मंत्र पाठ , भजन – कीर्तन, गुरु – पादुका – मानस पूजन , दीप प्रज्वलन , उत्सव एवं भंडारा कार्यक्रम धूमधाम से गया एवं वी. आई.पी.रोड पर राहगीरों को प्रसादी वितरण भी किया गया |

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श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ७

tera_prabhuयोग वशिष्ठ महारामायण : जो मनुष्य लेता है. देता है और सारे कार्य करता है, पर जिसके चित को अनात्म-अभिमान स्पर्श नहीं करता है उसको समाहित चित कहते हैं ।

बापूजी : लेता-देता, खाता-पिता सब व्यवहार करता है, लेकिन अविद्या वाली, अनात्म वाली वस्तु जिसके चित में सत बुद्धि नहीं करती वो मुक्त आत्मा है । प्रारब्ध वेग से दुःख आएगा, मान आएगा, सुख आएगा, निंदा आएगा, लांछन आएगा लेकिन सत्य बुद्धि नहीं है क्योंकी सत्य आत्मा है उसमे स्थिति हो गयी तो देह को और बाहर की चीजों को सत नहीं मानेगा । उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता ।

जो आत्मा में स्थित होकर चेष्टा करता है उसको पाप नहीं लगता । उसको पुण्य का अभिमान नहीं होता । वो मुक्त आत्मा है । हाय सीता, हाय सीता, करके रामजी चिल्ला रहे हैं लेकिन ये लवर-लवरियों का चिल्लाना नहीं है । कोई लवर बोले देखो रामजी अपनी औरत के लिए रो रहे हैं तो हम भी अपनी औरत के लिए रोये तो क्या हुआ । तेरे को रोना है तो रो, रामजी रोते हैं लेकिन तू ऐसे रोयेगा तो रोता ही रहेगा फिर ।

योग वशिष्ठ महारामायण : जो पुरुष इष्ट की कामना नहीं करता और अनिष्ट में दुखी भी नहीं होता है, दोनों अवस्थाओं में सम रहता है उसको समाहित चित कहते हैं ।

बापूजी : वो जीवन-मुक्त है, खुली आँख उसकी समाधि है । वो समाहित चित है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : इष्ट की कामना नहीं करता और अनिष्ट में दुखी भी नहीं होता है दोनों अवस्थाओं में सम रहता है उसको समाहित चित कहते हैं ।

बापूजी :  वो जीवन-मुक्त है, खुली आँख उसकी समाधि है । वो समाहित चित है । जो सुख के लिए इच्छा नहीं करता और दुःख से डरता-काँपता नहीं है, अपने सहेज स्वभाव में तटस्थ है, वो तो पूर्ण पुरुष है । जो सुख में सुखी, दुःख में दुखी, वो तो दो पैसे का है । लोहे जैसा – तपाया तो गर्म और पानी में डाला तो ठंडा । जो दुखी में दुखी नहीं होता और सुख में सुखी रहता है वो सोने जैसा है । जो सुख-दुःख में सम रहता है वो हीरे जैसा है । और जो सुख-दुःख सबको सपना समझता है वो तो शहंशाह है । शहंशाह की तिजोरी में कई हीरे होते है ।

योग वशिष्ठ महारामायण :  हे रामजी जिसके हृदय रूपी आकाश में विवेक रूपी चन्द्रमा सदैव प्रकाशता रहता है वह पुरुष शरीर नहीं, मानो शिर-समुद्र है ।

बापूजी : जिसको ऐसा ज्ञान हो गया वो शरीर नहीं मनो शिर-समुद्र है जो उसके निकट आता है वो गोते मरता है ।तस्य तुलना के न जायते॥ उस ज्ञानी महापुरुष की जिसको आत्म साक्षात्कार हुआ है उसकी तुलना तुम किससे करोगे ?तस्य तुलना के न जायते ।उसकी तुलना तुम किससे करोगे ?स तरतिवो तो तरता है,लोकान तारयतिऔर लोगों को तार लेता है ।स अमृतों भवतिवह अमृतमय हो जाता है और औरों को अमृत का स्वाद चखा देता है । वो मनो शिर-समुद्र है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हृदय में सदैव विष्णु विराजते हैं । जो कुछ उनको भोगना था वो उन्होंने भोगा और जो कुछ देखना था वह देख लिया है । फिर भोगने और देखने की कोई तृष्णा नहीं रहती ।

बापूजी : जो भोगना था वो भोग लिया और जो देखना था वह देख लिया है । फिर भोगने और देखने की कोई तृष्णा नहीं रहती । मनन नितध्यासन करके अपने को जान लिया तो सबके हृदय का आत्म स्वभाव ज्यों का त्यों । तो ये आत्म विषय में बुद्धि एक बार स्थित हो जाये, जग गए तो फिर ज्ञान नहीं होता । धारणा-ध्यान एक बार हो जाये, ऋद्धि-सिद्धि आ जाये और खर्च हो जाये तो आदमी ठन-ठन पाल हो जाता है । धन मिल जाये, आदमी मरता है तो छोड़कर ही मरता है फिर ठन-ठन पाल होता है । सौंदर्य,शक्ति और सत्ता मिलती है फिर भी कभी बुढ़ापे में आदमी ठन-ठन पाल होता है । लेकिन आत्म विषय में बुद्धि एक बार हो गयी, तो फिर ठन-ठन पाल नहीं होता है । और वो लोग अभागे हैं जिनको कोई कहने वाला नहीं होता, जिसके ऊपर अनुशासन नहीं । अनुशासन हीन व्यक्ति या तो स्वयं विवेकी हो या तो विवेकी के मार्गदर्शन में चले । जो आत्म-विवेक करके जगे हैं ऐसे पुरुष परम-स्वतंत्र हैं बाकी स्वतंत्र होना चाहेगा तो मन का गुलाम हो जायेगा ।

बच्चा अगर चाहे बचपन से ही स्वतंत्र हो तो पद-लिखकर काबिल ही नहीं होगा । बच्चा नहीं चाहेगा के मैं पढ़ने का झंझट मोल लूँ । बच्चा तो स्नान करना भी नहीं चाहेगा । माँ उसको पुचकारके, हुँकार के । और जो अति पराधीन होते हैं उनका विकास नहीं होता । किसी ना किसी के आधीन, किसी ना किसी की शरणागति होती है । अब शरणागति ज्ञानी की है के अज्ञानी की है ? स्वार्थी की है के निस्वार्थी की है ? हैं शरणागति है के उत्तम शरणागति है ? जैसे कैकई ने मंथरा की बात मानी तो मंथरा की शरणागति हुई । तो हैं शरणागति का परिणाम हैं आया ।

रामकृष्ण ने उत्तम शरणागति माँगी, माँ काली की तो माँगी लेकिन काली से भी आगे की यात्रा रामकृष्ण की हुई, गुरु तोतापुरी की शरणागति हुई । तो परिणाम ब्रह्मविचार आया । तो आप किसकी शरण हो ? किसकी बात मानते हो ? लापरवाह आदमी की, बेदरकार आदमी की, अज्ञानी की, मुर्ख की शरणागति लेते हो के सतर्क, ज्ञानवान की लेते हो ? त्त्व आप सतर्क रहते हैं तो अपने मन की शरणागति रहता है । जो जाकी शरणी गहे ताको ताकि लाज, उलटे बहाव मछली चले, बह चलो गजराज । मछली उलटे वेग में भी ऊपर को चलती है , वेग के उलटे में चलती है और हाथी बह जाता है । क्योंकी मछली पानी की शरण है । ऐसे ही जो ईश्वर की शरण है, शास्त्र की शरण है, ज्ञानवान की शरण है, तो उन्नति होगी । अपने मन की शरण में है तो २ साल, ३ साल किया साधन भजन जो थोड़ा बहुत सेवा और फिर जैसा मन में आये वैसा करने लगे । तो पहले की कमाई तो चट हो गयी और नया जीवन क्या पता कैसे गिरेगा ?

वो कहते हैं ना धोबी का कुत्ता ना घर का ना घाट का । वो साधारण अज्ञानी जैसा भी नहीं रहेगा और आत्मज्ञान भी नहीं पाया । आत्मा का भी अनुभव नहीं है तो ना उधर सेट होगा ना उधर सेट होगा । ऐसे ही जानकार महापुरुष ही जान सकते हैं । जैसे माता-पिता जानते हैं के बच्चा अब इधर जा रहा है तो आगे क्या-क्या है उसको नहीं समझ में आता है । अपनी मैं के साथ बच्चा खेलता है । अंगारों को चमकता हुआ समझकर उनमे हाथ डालेगा । गटर में जा रहा है । तो बच्चे को देखने वाले माँ-बाप हैं,तो बच्चा अभी माँ-बाप की शरण है तो वो ख्याल रखते हैं ।

ऐसे ही गुरु भी ख्याल रखते हैं अपने मन का । उत्तम शरणागति, उत्तम विचार और उत्तम में उत्तम विचार है आत्म-विचार । उत्तम में उत्तम है ब्रह्मज्ञान । तो ब्रह्म परमात्मा के विषय का ज्ञान पाकर ज्ञान मिटा दे अपना । फिर कोई डर नहीं पतन का ।
तो पानी ८० डिग्री पर गर्म हो गया, ७० पर ८० पर, और फिर छोड़ दिया तो फिर डाऊन हो जायेगा । अगर २०-२५-३० टका और कर लिया तो वो पूरा हो गया काम उसका । ये बात जो जानते हैं, जो मानते हैं वो कर लेते हैं बाकि के लोग खप जाते हैं अपने मन के इरादे पुरे करते करते । और मन के इरादे पुरे हुए तो भी संसार में भटकते हैं । कौन सुखी है ?

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी संसार समुद्र के तरने को ज्ञानवानों का संग करना और जो विकृत, निर्वैर पुरुष हैं उनकी भली प्रकार से टहल करना इससे अविद्या का अर्ध भाग नष्ट होगा |

बापूजी : तो आत्मविद्या कैसे मिले उसका उपाय बताते हैं राम के गुरूजी ।

योग वशिष्ठ महारामायण : संसार समुद्र के तरने को ज्ञानवानों का संग करना और जो विकृत, निर्वैर पुरुष हैं उनकी भली प्रकार से टहल करना इससे अविद्या का अर्ध भाग नष्ट होगा |

बापूजी :  जो निर्वैर पुरुष हैं, जिनको आत्मज्ञान मिल गया, पा लिया ऐसे पुरुषों का संग करना और ऐसे ब्रह्मज्ञानी महापुरुष की भली प्रकार से टहल करना, उसकी आज्ञा में रहना चाहिए । उनकी प्रसन्नता का ख्याल रखकर निर्णय करना चाहिए । तो आत्म-विषयी बुद्धि बनेगी । दिखावटी व्यवहार एक बात है, और वास्तविक में व्यवहार दूसरी बात है । ठाट-माट से शादी किया तो क्या सब ठाट-माट से शादी वाले जोड़े सब सुखी हो गए क्या ? जितने हमने देखे, जितने बड़े-बड़े होटलों में ठाट-माट से करते हैं उतने ही उनके जीवन में लगभग खिन्नता ज्यादा देखी जाती है । ठाट-माट से ख़ुशी का कोई संबंध नहीं है । ठाट-माट से शांति का कोई संबंध नहीं है । समझ से शांति का संबंध है । सच्चाई से शांति का संबंध है । सद्भाव से शांति का संबंध है । दिखावे से शांति का संबंध नहीं है । दिखावे से तो अहंकार का संबंध है । और अहंकार का विनाश के साथ संबंध है, अशांति के साथ संबंध है । तो आत्मविषयी बुद्धि होती है तो आत्मशांति से विचार करता है । लेकिन जगत विषयी बुद्धि होती है तो दे धमा-धम ।

दुःख भगवान ने नहीं बनाया, प्रकृति ने नहीं बनाया । जगत विषयी बुद्धि के कारण दुःख बना है । जगत में उलझ रहे हैं । ना खाने का कहते हैं तो बीमार पड़ेंगें । न सोचने का सोचते हैं, न करने का करते हैं तो अशांत होंगें ।

ऐसे ही अनात्म विषयी बुद्धि है तो आत्म विषयी बात लगती नहीं । संतों की बात दिल में लगती नहीं । मोह-माया की बातें ज्यादा घुसी हैं तो संतों की बात लगती नहीं । नहीं तो राम जैसे राम गुरुओं की आज्ञा के अनुसार राज-काज करते थे । और सीताजी को रामजी के साथ अर्धांग्नी के रूप में जाना था । वशिष्ठजी बोलते हैं के नहीं सीताजी गहने पहन के जाएँ । बकने वाले लोग बक रहे थे के ये महाराज क्या करते हैं ? जैसा पति ऐसा पत्नी को जाना चाहिए । हत्क्षेप किया वशिष्ठजी ने आके के सीता तो सजी-धजी महारानी होकर जाएगी । महाराज वल्कल हैं, राक्षस हैं, लुटेरे हैं जंगल में और सीता गहने पहनकर जाये, और राम तपस्वी का रूप लेकर जाये के हाँ ऐसे ही होगा । निंदा करने वालों ने तो खूब किया वशिष्ठजी की निंदा । लेकिन वशिष्ठजी ने हस्तक्षेप किया । सीता गहने पहन के ही गयी । और बाद में पता चला के यही गहने सीताजी फैकती-फैकती गयी और वही अंगूठी की निशानी रामजी ने हनुमान को दी और सीताजी को परिचय दिया कि हमारा दूत है । वशिष्ठजी ने हस्तक्षेप किया के वनवास सीताजी को नहीं मिला है, राम को मिला है । राम वनवासी होकर जाये, सीता वनवासी होकर नहीं जाएगी । लोग बोलने लगे इनका क्या जाता है पति-पत्नी में । मँगनी तो जनक राजा ने कराई,कन्या जनक की है और बेटा दशरथ का है । और वनवास कैकई के थ्रू है तो वशिष्ठ क्यों डिस्टर्ब करते हैं ? अरे मूर्खों वशिष्ठजी की कृपा है तो डिस्टर्ब करते हैं । डिस्टर्ब नहीं करते डिस्टर्ब से बचाते हैं ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी जैसे वानर चपलता करता है वैसे ही आत्मतत्व से विमुख अहंकार रूपी वानर वासना से चपलता करता है । जैसे गेंद हाथ के प्रहार से नीचे और ऊपर उछलता है वैसे ही जीव वासना से जन्मांतरों में भटकता-फिरता है । कभी स्वर्ग, कभी पाताल और कभी भूलोक में आता है । स्थिर कभी नहीं होता । इससे वासना को त्यागकर आत्मपद में स्थित रहो । हे तात ये संसार यात्री की मंजिल है,देखते-देखते नष्ट हो जाती है । इसको देखकर इसमें प्रीति करना और इसे सत्य जानना ही अनर्थ है । इससे संसार को त्याग कर आत्मपद में स्थित हो रहो । चित की वृति जो संसरण करती है इसी का नाम संसार है ।

बड़ा आश्चर्य है के मिथ्या, वासना से जीव भटकते-फिरते हैं । दुःख भोगते हैं । और बारं-बार जन्म लेते हैं और मरते हैं । बड़ा आश्चर्य है के विषय-वासना के बस हुए जीव अविद्यमान जगत को भर्म से सत्य जानते हैं ।

हे साधो ! जो इस वासना रूपी संसार से तर गए हैं वे वास्तव में धन्य हैं । वे प्रत्यक्ष चन्द्रमा की तरह शांत हैं । जैसे चन्द्रमा अमृत रूप, शीतल और प्रकाशमान है और सबको प्रसन्न करता है वैसे ही ज्ञानी पुरुष भी ।

इससे तू धन्य है के तुझे आत्मपद पाने की इच्छा हुई है । ये संसार तृष्णा से जलता है । जिनकी चेष्टा तृष्णा संयुक्त है, उनको तू बिलाव जान । जैसे बिलाव तृष्णा से चूहे को पकड़ता है वैसे ही वे भी तृष्णा से युक्त चेष्टाएँ करते हैं । मनुष्य शरीर में यही विशेषता है कि वह किसी भी प्रकार से आत्मपद को प्राप्त कर ले । जो नर देह पाकर भी आत्मपद पाने की इच्छा ना करें तो वह पशु समान है । विकार रहित है, पर वो उसको विकारी जानता है ।

बापूजी : वास्तव में तुम ६ विकारों से रहित हो । कौन से ६ विकार? कि जायते-जन्मना, वर्धते-बढ़ना, परिवर्तन-बदलना, क्षीयते-क्षीण होना, विनश्यते-मर जाना । इस प्रकार के विकार शरीरों में हैं । तुम्हारे में नहीं । लेकिन जो तुम हो उसका पता नहीं है क्योंकी आत्म-विषयी बुद्धि नहीं है । और जो तुम नहीं हो अविद्यमान शरीर है उसको तुम मैं मानकर अविद्या में ही घूम रहे हो । तो ये षड्विकार शरीर में हैं । जन्मना, दिखना, बढ़ना, बदलना, परिणाम पाना, क्षीण होना और नष्ट होना । ये छह विकार शरीर के पीछे हैं । छह विकार शरीर के हैं । पाँच उर्मियाँ भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, क्षोभ ये सब मन के विकार हैं । प्राणों के और मन के विकार हैं । लेकिन जो मन के, तन के विकार हैं वो अपने मानते हैं और अपन क्या हैं उसका पता नहीं है । और सब महेनत कर-करके बिचारे थक रहे हैं । कोई शांति नहीं, कोई ईश्वर का ज्ञान नहीं, कोई पूर्ण जीवन से संतुष्ट नहीं । तो आत्म संतोषी मति बढ़ानी चाहिए ।

आत्म परमात्मा की सिद्धि, विधि से भी होती है और निषेध से भी होती है ।

$$$$$ ॐ ॐ ॐ प्रभुजी ॐ ॐ ॐ $$$$$

श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ६

bapuji_leelashahjiयोग वशिष्ठ महारामायण : भुशुण्डी जी बोले हे मुनीश्वर, केवल एक आत्म दृष्टि ही सबसे श्रेष्ठ है, जिसे पाने से सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं और परम पद प्राप्त होता है ।

बापूजी : आत्म दृष्टि से सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं । जगत की दृष्टि रखो तो कितनी भी सुविधा हो, जरा सी असुविधा और अंत में मृत्यु सब छीन लेता है । लेकिन आत्म दृष्टि रखने से, मृत्यु तो आत्मा की होती नहीं । और आत्मा क्षणिक नहीं है । संसार का सुख-दुःख क्षणिक है । संसार का लाभ-हानि क्षणिक है । लेकिन उसको ये प्रभावित करता है जो संसार को सत्य मानता है ।

जिसकी आत्मदृष्टि हो गयी है, आत्म-विचार से सम्पन्न होगया, आत्म-शांति से सम्पन्न हो गया,आत्म-ज्ञान से सम्पन्न हो गया, उसकी गहराई में कोई दुःख टिकता नहीं है ।जैसे सागर की गहराई में कोई तरंग नहीं है, ऊपर-ऊपर तरंग है । ऐसे ही उसके ऊपर-ऊपर व्यवहार का प्रभाव दीखता है, गहराई में कुछ नहीं । जैसे आकाश में पक्षी उड़ान भरते हैं, उनके कोई चिन्ह नहीं रहते, पानी में मछलियाँ चलती हैं, उसके कोई चिन्ह नहीं होते, ऐसे ही आत्म दृष्टि वाले की कोई आसक्ति या कोई पकड़ नहीं होती । धीरा की गति धीरा जाने, ब्रह्मज्ञानी की मत कौन बखाने, नानक ब्रह्मज्ञानी की गत ब्रह्मज्ञानी जाने । वह ब्रह्मज्ञान पाना सुलभ है और उसके बिना जो कुछ पाया सब मजूरी है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ज्ञानवान सदा स्व सत्ता को प्राप्त होता है । और सदा आनंद से पूर्ण रहता है । वो जो कुछ क्रियाएँ करता है सो सब उसका विलास रूप है । सारा जगत उसके लिए आनंद रूप है । शरीर रूपी रथ और इन्द्री रूपी अश्व है । मन रूपी रस्से से उन अश्वों को खींचते हैं । बुद्धि रूपी रथ भी वही है जिसमें रथ में वह पुरुष बैठा है । और इन्द्री रूपी अश्व अज्ञानियों को खोटे मार्ग में डाल देते हैं । ज्ञान वान के इंद्री रूपी अश्व ऐसे हैं के वे जहाँ भी जाते हैं वहां आनंद रूप हैं । किसी ठौर में भी खेद नहीं पाते । सब क्रियाओं में उनको विलास है और सर्वदा परमानंद से तृप्त रहते हैं । हे रामजी इसी दृष्टि का आश्रय करो के तुम्हारा हृदय भी पुष्ट हो । फिर संसार के इष्ट-अनिष्ट से चलायमान ना होगा ।

बापूजी : जैसे रथ होता है और उसके घोड़े होते हैं, डोर होती है, रथ चलाने वाला सारथी होता है, अंदर बैठा हुआ रथी होता है । ऐसे ही शरीर है रथ और इन्द्रियां हैं घोड़े और मन है सारथी और ये जीवात्मा, ज्ञानी ,रथी । अज्ञानी का रथ जहाँ घोड़े जाते हैं वहाँ अज्ञानी की ढील चली जाती है । लेकिन ज्ञानी का मन ऐसा होता है के घोड़े ठीक ढंग से चलाता है । जब घोड़े ठीक ठंग से चलते हैं तो रथ ठीक जगह पहुँचता है । आनंद रहता है, खड्ढ़ो से बच जाता है । रथ का जमाना था तो रथ का, अभी ड्राइवर का जमाना है तो ड्राइवर का दृष्टांत । तो देह तो है गाड़ी और मन है ड्राइवर ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ! ये संसार रूपी सर्प अज्ञानियों के हृदय में दृढ हो गया है । वह योग रूपी गरुड़ी मंत्र करके नष्ट हो जाता है । अन्यथा नष्ट नहीं होता ।

बापूजी : ये संसार रूपी साँप अज्ञानी के हृदय में कुंडली मार के बैठा है । कुंडली मार के बैठो या फन फैला के गरुड़ को देखते ही रवाना । योग वशिष्ठ में आता है के भगवान राम के गुरु ध्यान से उठे तो एक विद्याधरी आई, उसने प्रार्थना की कि मेरे पति ध्यान समाधि में बैठे और उनको विवाह की इच्छा हुई । मेरे को उत्पन्न किया और बाद में समाधि में इतने विरक्त हो गए के मेरी तरफ देखते ही नहीं । चलकर उनको समझाइये । वशिष्ठ ब्राह्मण गए तो वो विद्याधरी एक पहाड़ी की शीला में घुसी लेकिन वशिष्ठ जी तो बाहर ही खड़े रहे । फिर वो वापस लौटी के महाराज आइये । बोले के इस पत्थर की चट्टान में मैं कैसे घुसूँ ? बोले आप मेरी वृति से तादाद में कीजिये तो इस सृष्टि में प्रति सृष्टि है । जैसे आप इस सृष्टि में रहते हो, और आपके अंदर सपने की सृष्टि है । आप रहते हो, आप एक जीव दिखते हो । लेकिन आपके अंदर कई जीवाणु हैं । ऐसे ही सृष्टि में प्रति सृष्टियाँ हैं । ये जो हमको दिखती हैं उतनी सृष्टि नहीं । आकाश गंगा में कई सूर्य हैं । और कई सृष्टियाँ हैं जो इधर का मानव नहीं जान पाता है, वो लोग हमको देख लेते हैं और हम उनको नहीं देख पाते हैं । ऐसी भी सृष्टियाँ हैं ।

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसा कल्याण पिता, माता, और मित्र भी ना करेंगें । और तीर्थ आदि सुकृत्य से भी ना होगा जैसा कल्याण बारं-बार विचारने से मेरा ये उपदेश करेगा ।

बापूजी : ऐसा कल्याण, ऐसा मंगल तो माता, पिता भी नहीं कर सकेंगें, तीर्थ भी नहीं करेंगें, जितना कल्याण बारं-बार मेरा ये उपदेश को विचारने से होगा, वशिष्ठजी कहते हैं ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी जो अपना दुःख दूर करना चाहें, वह मेरा ये उपदेश विचारें ।

बापूजी : जो अपना दुःख सदा के लिए दूर करना चाहें और परम-सुख पाना चाहें, वो मेरे इन विचारों को, मेरे सत्संग को विचारें । दुःख सदा के लिए मिट जायेंगें । जितना गहरा विचारेगा । सुनते तो हैं, लेकिन मनन करे, विचार करे, टिकाये । ये क्या सुना अनसुना किया फिर अड़ के खड़ा हो जाये तो कलयुग हो जायेगा । सतयुग में, अभी सात्विक वातावरण इसी को मनन करें बार-बार । सुनने से १० गुना मनन । मनन करें उससे १०० गुना नितध्यासन ।

योग वशिष्ठ महारामायण : संतों के वचनों का निषेद करना मुक्ति फल का नाश करने वाला और अंहता रूपी पिशाच को उपजाने वाला है ।

बापूजी : संतों के वचनों का निषेद करना, संतों की आज्ञा का उलंघन करना मुक्ति फल को हटाने वाला और मुसीबत को देने वाला है । और संतों के वचनों का मनन करना मुक्ति फल को देने वाला है और मुसीबतों को हटाने वाला है । हे रामजी ऐसा त्रिभुवन में कौन है जो संत की आज्ञा का उलंघन करके सुखी रह सके ? वो तो घोर कलयुग में जायेगा, अशांत हो जायेगा ।

योग वशिष्ठ महारामायण : इसलिए हे रामजी संतों की शरण में जाएँ और अहंता को दूर करें । इसमें कोई भी कष्ट नहीं ।

बापूजी : राम के गुरूजी रामजी को कह रहे हैं के संतों की शरण में जाओ । रामजी से बड़पन क्या है अपना ? राम जैसों को भी सत्संग की जरूरत है । ऐसा नहीं के वशिष्ठ महाराज के चरणों में गए । बनवास था वशिष्ठजी नहीं थे तो भरद्वाज जैसे ज्ञानी महापुरुषों के चरणों में रहे । अगस्त आदि ऋषियों के पास गए । जब रामजी को भी सत्संग और संतों का सानिध्य चाहिए तो दूसरे व्यक्ति की तो बात ही क्या है? वशिष्ठ दसों दिशा घूमे । वशिष्ठ के पास वो सामर्थ्य था, लोक-लोकांतर, स्वर्ग की सभाओं में भी जा सकते थे । स्वर्ग में जो चर्चा होती थी उसमें भी भाग लेते थे वशिष्ठजी महाराज । चिरंजीवियों में सबसे श्रेष्ठ कौन है के लोमश ऋषि । बोले उससे भी श्रेष्ठ, काकभुशुंडिजी । कई युग बीते हुए उन्होंने देखे हैं । लोमशजी से भी ज्यादा युग बिताये उन्होंने से भी ज्यादा युग बिताये होंगें । वशिष्ठ महाराज आ गए सुमेरु पर्वत के उस स्वर्णमय स्थान में । काकभुशुंडिजी ने कहा के महाराज आपने स्वर्ग में चिरंजीवियों की चर्चा में मेरा नाम सुनाया अब दर्शन देने को पधारे हैं, आपकी क्या सेवा करूँ ? मेरे दीर्घ होने का कारण ये है के मैंने प्राण-अपान की गति को सम किया । और चिरकाल अभ्यास किया । चितकला को जीता । वशिष्ठजी ने काकभुशुंडिजी का संवाद रामजी को सुनाया । के स्वर्ग में हुई थी चर्चा और मैं गया काकभुशुंडिजी से पूछने को के ऐसा पद आपने कैसे पाया । जो प्रलय हो जाये तो शरीर को छोड़कर तुम्हारी चितवृति टिक जाये सूक्ष्म में । फिर सृष्टि हो तो फिर अपने संकल्प से शरीर बना लेते हैं । काकभुशुंडिजी बोलते हैं १२ वख्त मैंने राम अवतार देखें हैं, १६ वख्त श्री कृष्ण अवतार मैंने देखें हैं, जो कुछ थोड़ा-थोड़ा सिमरन में आता है । ३ बार वेद व्यासजी आये और महाभारत लिखा है । वाल्मीकि रामायण लिखने वाले वाल्मीकिजी भी कई बार आएं हैं । ऐसी भी सृष्टियाँ थी के पुरुष के गर्भ से बालक जन्म लेता था । स्त्रियां व्यापर करती थी । ऐसे भी हमने युग देखें ।लेकिन सार ये है के भली प्रकार, वासनाओं को क्षय करके परमात्मा में शांत हुए बिना और कोई सार नहीं है। सारी त्रिलोकी का राज्य कर ले, अथवा अग्नि में प्रवेश कर ले, जल में प्रवेश कर ले, इतनी शक्तियां-सिद्धियां पा ले फिर भी आत्म-शांति के बिना कोई सार नहीं ।

राग जिसके प्रति है वस्तु, व्यक्ति के प्रति उससे बंधेगा राग । राग दीनता लाएगा, फसायेगा । द्वेष जलन लाएगा, हिंसा करेगा । जैलसी करेगा, दूसरे के प्रति द्वेष करेगा । जो समझता है के दूसरे मेरे दुःख का कारण हैं, वो जलेगा । किसी को अपने दुःख का कारण नहीं मानना चाहिए । दुःख-सुख का कारण दूसरे को मानने से राग-द्वेष होगा । राग-द्वेष से जलन होगी, बंधन होगा । वित राग, भय क्रोध,जिसका राग व्यथित होगया उसका भय भी व्यथित हो जायेगा, क्रोध भी व्यथित हो जायेगा ।

मुनि मोक्ष परायणा, मननशील मुनि मोक्ष प्रयाण हो जाता है । तो वासना का क्षय, राग मिटाकर वासना का क्षय करें, उससे जो परमात्मशांति मिलती है, अंतरात्मा का सुख मिलता है वो अदभुद है । बड़े-बड़े बुद्धिमानों से सलाह किया, बड़े-बड़े विचारवानों से चर्चा की, सत्संग की । कई योगी, जटी-मुनियों से मिले लोक-लोकांतर में यात्रा करने वाले ।
वशिष्ठ महाराज का अनुभव सत्य है । वासना-क्षय, मनो-नाश, बोध ये तीन बातें वैदिक हैं । वासना क्षय हो जाये । मनो-नाश, मन के भावों का नाश हो जाये और बोध हो जाये – मैं कौन हूँ ? यहां के विषय में, इसके विषय में, उसके विषय में संदेह हो सकता है के ये था के नहीं, वो हो सकता है के नहीं । लेकिन मैं हूँ के नहीं – जो मैं हूँ तो क्या हूँ ? वहाँ वासना रहित होकर देखो तो मैं वहीँ हूँ जिसको मौत नहीं मार सकती । मैं वो हूँ जहाँ दुःख फटक नहीं सकता, सुख फटक नहीं सकता । दुःख-सुख चित को होते हैं, रोग, पीड़ा, बीमारी शरीर को होती है, भूख-प्यास प्राणों को लगती है । मैं उसको देखने वाला सत-चित आनंद ईश्वर का अविभाज्य अंग हूँ । हे वासनाएँ दूर हटो, हे जगत को चाहने वाली इच्छाएँ दूर हटो । हमारा सुख स्वरूप अपना आप है । इस प्रकार का ज्ञान पाकर जो सुखी हुए हैं वहीँ परम लाभ को पाएं हैं । संसार सपना, सर्वेश्वर-चैतन्य अपना ।

योग वशिष्ठ महारामायण : पूर्ण आनंद को प्राप्त हुआ हूँ । संतों की संगति चन्द्रमा की चांदनी सी शीतल और अमृत की नाई आनंद को देने वाली है । ऐसा कौन है जो संत के संग से आनंद को प्राप्त ना हो ? अर्थात सभी आनंद को प्राप्त होते हैं । हे मुनीश्वर संत का संग, चन्द्रमा के अमृत से भी अधिक है । क्योंकी वो तो शीतल गौण है, हृदय की तपन नहीं मिटाता है । और संत का संग अन्त:करण की तपन मिटाता है । वह अमृत, क्षीर-समुद्र मंथन के क्षोभ से निकलता है और संत का संग सहज में सुख से प्राप्त होता है और आत्मानंद को प्राप्त कराता है । इससे यह परम-उत्तम है । मैं तो इससे उत्तम और कोई भी वस्तु नहीं मानता । संत का संग सबसे उत्तम है । संत भी वे ही हैं जिनकी आरंभ में रमणीय सारी इच्छाएँ निवृत हुई है । अर्थात अविचार से जो दृश्य पदार्थ सुंदर जान पड़ते हैं और नाशवान हैं, वे उनको तुच्छ प्रतीत होते हैं । वे सदा आत्मानंद से स्थित हैं । वे अद्वैत-निष्ठ हैं । उनकी द्वैत-कलना नहीं रही । वे सदा आनंद में स्थित हैं ।ऐसे पुरुष संत कहाते हैं। हे मुनीश्वर उन संतों की संगति ऐसी है जैसी चिंतामणि होती है, जिसके पाने से सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं । उनके वचन स्निग्ध, कोमल, और आत्म रस से पूर्ण, हृदय-गम्य और उचित होते हैं । उनका हृदय महा-गंभीर, उदार, धैर्यवान और सदा आत्मानंद से तृप्त है ।

बापूजी : धैर्यवान, उदार, और आत्मानंद से तृप्त । ज्यों-ज्यों छोटी-छोटी बातों में उलझना बंद हो जायेगा त्यों-त्यों हृदय की महानता बढ़ती जाएगी । उदारता, आनंद से आत्मुभव से पूर्ण । चन्द्रमा शीतल है लेकिन हृदय की तपन नहीं मिटाता । हे मुनीश्वर, सत्पुरुषों का संग अमृत से भी ज्यादा हितकारी है । अमृत तो सागर-मथने से निकला था । और ये संत की वाणी तो परमात्मा को छूकर निकलती है । स्वर्ग का अमृत पिने से तो पुण्य क्षीण होता है लेकिन सत्संग का अमृत पिने से पाप-ताप निवृत होकर आत्मरस की प्राप्ति होती है । इससे बढ़कर दुनिया में और कोई लाभ नहीं है ।

जैसे चिंतामणि से जो चिंतन करो वो प्राप्त हो जाता है, ऐसे ही संत के संग से जीव वांछित को पा लेता है देर-सवेर । जितनी दृढ़ भावना, दृढ़ श्रद्धा-भक्ति होता है उतना ही जीव अपना परम कल्याण साध लेता है ।

जिसका मन दृढ़ आत्म स्वभाव में है, उसका नाश मृत्यु भी नहीं कर सकती, मृत्यु का बाप भी उधर नहीं पहुँच सकता । ऐसा आत्म-पद है । पाप-ताप, शोक तो क्या, दुश्मन-शत्रु क्या, मौत का बाप भी नहीं पहुँच सकता है ।

श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ५

IMG-20131223-WA0002योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जो कोई उनके निकट आता है वह भी शीतल हो जाता है क्योंकि वे सदा निरावरण स्तिथ होते हैं | ज्ञानवान सबका आश्रय दाता है |

बापूजी : देखो जी अभी सुना था कि पाशवी अंश, मानवी अंश और ईश्वरीय अंश तीन अंशों का घटक हमारा मनुष्य शरीर है | तो जिसको अपने ईश्वरीय अंश का पूरा ज्ञान हो गया उसे ज्ञानवान कहते हैं | उसके संग से मानव को बहुत लाभ होता है… उसके शरीर से अध्यात्मिक ओरा निकलती हैं उसकी निगाहों से अध्यात्मिक ओरा निकलती है, उसकी वाणी से आत्मिक अनुभव संपन्न वचन निकलते हैं | उसका चित्त उसका ईश्वरीय अनुभव सबका आश्रय स्थान होता है |उसके चित्त में प्रसन्नता, शांति, वैराग्य, मुदिता आदि सद्गुण स्वाभाविक निवास करते हैं ऐसे ज्ञानवान जहाँ रहते हैं वो जगह भी उस आभामंडल से संपन्न हो जाती है | इक्ष्वाकु राजा ने मनु महाराज का आवाहन किया कि राज-पाठ तो भोगा, सोने की थाली में भोजन कर के भी देखा,सुंद्रियों और ललनाओं से चवर डुलवा के भी देखा लेकिन महाराज आयुष्य तो नाश हो रही है,मौत आकर ग्रास कर लेगी | तब मनु महाराज ने कृपा कर के कहा कि तुम नित्या अंतर्मुख रहो तुम्हारा राग और द्वेष चला जायेगा | हेय-उपादेय ये छोड़ना, ये पकड़ना इसीमें जीव झक मारके खत्म हो जाता है | अपने आत्मा को न छोड़ना है न पकड़ना है, उसको तो खाली जानकर विश्रांति पाना है | अपने आत्मा के बिना, स्व के सुख के बिना, कहीं पकड़ो और छोडो | अच्छी चीज़ है तो पकड़ो, और पकड़ा है तो उसको सम्हाल-सम्हाल के मरो, बुरी चीज़ है तो उसको छोड़ो और धकेल-धकेल के मरो | अपना आत्मा न अच्छा है न बुरा है, अपना आत्मा तो अपना आपा ही है |ईश्वरीय अंश, उस ईश्वरीय अंश को ज्यो का त्यों जताने वाले पुरुष ज्ञानवान कहे जाते है | ज्ञान-मान जहाँ एको नाही, देखत ब्रह्म सामान सब माहि | कहिये तासो परम वैरागी, तन सैम सिद्धि तीन गुण त्यागी ||

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठजी बोले हे रामजी, संत जन परम शांत, गम्भीर और ऊँचे अनुभव रूपी फल से युक्त वृक्ष के समान है | उनकी यश, कीर्ति और शुभ आचार फूल और पत्ते हैं, ऐसे संत जनों की संगती जब प्राप्त होती है, तब जगत के राग-द्वेष रूपी तम मिट जाते है | जैसे किसी मयूर के सिर पर भारी बोझ लदा हो, और वह तपन से दुखी हो, पर वृक्ष की शीतल छाया प्राप्त होने पर, वह शीतल हो जाता है | फल खाकर तृप्त होता है और थकान का कष्ट दूर हो जाता है | वैसे ही संतो के संग से मनुष्य सुख को प्राप्त होता है. जैसे चन्द्रमा की किरणों से मनुष्य…

बापूजी : संतो के संग से सुख को प्राप्त होता है | महाराज हमको वाइन मिल जाता है तो हम सुखी होते हैं, हमको ५ स्टार होटल मिल जाती है तो सुखी हो जाते हैं, तो संतो के संग से ही सुख मिलता है, तो वैसे दूसरों को नहीं मिलता है क्या! दूसरों को हर्ष मिलता है | जहाँ हर्ष है वहाँ शोक रहेगा| सुख हृदय की चीज़ है लेकिन शब्दों के साथ अन्याय हो जाता है जहाँ शास्त्रीय ढंग से सुख कहा गया है, वो आत्मिक सुख की बात है वहाँ सुविधाजन्य जो सुख है, उसे हर्ष बोलते हैं | जितना हर्ष लेगा उतना शोक होगा…जितना बाहर से सुख लेगा उतना ही बाहर से डरपोक रहेगा, खिन्न रहेगा और निष्तेज हो जायेगा और जितना सच्चा सुख लेगा उतना बलवान रहेगा, आत्मिक बल से संपन्न रहेगा | तो संतो के संग से हृदय का सुख मिलता है और बाहर से सुविधा मिलती है |सुविधा में और सुख में फर्क है | सुविधा इन्द्रियगत ज्ञान के जगत में आबध्द करती है और सुख जीवात्मा को परमात्मा से मिलाता है | भीड़-भाड़ से डरते है, क्यों ? के भाई शांति प्रिय हैं |लेकिन जिसको आत्मिक सुख पूरा मिल गया, उसके लिए भीड़ हो, चाहे एकांत हो सब में“उठत बैठत वोई उटाने, कहत कबीर हम उसी ठिकाने” |युद्ध के मैदान में बंसी बज रही है, ऐसा सुख स्वरुप कृष्ण का अपना आपा है | तो संतो के संग से आंतरिक सुख की प्राप्ति होती है और ज्यो-ज्यो सुख में विश्रांति पाता है उतना-उतना आत्मिक बल बढ़ता है | रिद्धि-सिद्धियाँ भी विश्रांति की ही जननी हैं | विश्रांति आंतरिक सुख की गहरी अवस्था | विश्रांति ही रिद्धि-सिद्धियों की उद्गम भूमि है, चित की विश्रांति प्रसाद की जननी है और वो प्रसाद ही सारे सिद्धियों के द्वार खोल देता है |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी! फूलों के बगीचे और सुंदर फूलों की शैया आदि विषयों से भी ऐसा निर्भय सुख नहीं प्राप्त होता जैसा संतों की संगति से प्राप्त होता है | हे रामजी ! कभी वसंत ऋतु भी सुख का स्थान हो, नंदन वन भी सुख का स्थान हो, उर्वशी आदि अप्सरायें पास आयी हों, चंद्रमा निकला हो, काम-धेनु विद्यमान हो और इन्द्रियों के सारे सुख प्राप्त हों, तो भी वह शांति प्राप्त नही होगी, जो ज्ञानवान के संग से प्राप्त होती है |
बापूजी : ये आंतरिक शांति, सोने की खाट हो, रेशम की नवार हो, पूनम की रात हो, केवड़े का इत्र छिड़का हो और अप्सरा आकर चम्पी-चरण करे और चरण-चम्पी करती हुई अप्सरा गले लगे, सारे भोग तैयार हो,फिर भी संतों के संग से जो आत्मिक सुख मिलता है, उसके सामने वो नगण्य है. उनसे तो परिणाम में दुःख, कलेश, अशक्ति, दीनता, हीनता मिलेगी और संतो के सत्संग-सानिध्य से परिणाम में पवित्र सुख के द्वार खुलते-खुलते परमात्मा मिलेंगे | शुकदेव जी महाराज देवतओं को मना करते हैं, कि तुम सत्संग के अधिकारी नही हो, तुम्हारे लिए संकल्प नही करूंगा | देवता बोलते है कि स्वर्ग का अमृत,तुम्हारे परीक्षित को हम दे देते हैं और बदले में हमको आप अपने सत्व का, अपने सत्संग रूपी सत्व का, कथा का अमृत दीजिये | शुखदेव जी कहते हैं की स्वर्ग का अमृत पीनेिने से तो पुण्य नाश होता है, अप्सरायें मिलती हैं और सत्व का सत्संग, सत्संग का अमृत तो पाप नाश करता है और अंत में परमात्मा दिलाता है | तो देवता लोग तुम बड़े चालबाज़ हो कोहिनूर लेकर कांच का टुकड़ा देना चाहते हो | शुखदेव जी ने इंकार कर दिया, ये है सत्व सुख, आत्मिक सुख…बिनु रघुवीर पद जिय की जरनी ना जाई…उस आत्मपद के बिना अंतरात्मा की, जीव की प्यास नही जायेगी, तपन नही जायेगी |संसार तापे तप्तानां, योगो परम औषध:| संसार के ताप में तपने वाले जीवों के लिए परमात्मा ध्यान, परमात्मा योग परम औषध कहा गया है| गुरु के अनुभव को झेल लेना ही गुरु पद की पूजा है | ऐसा नहीं कि पैर धोके पीना, तो जिनको भी आगे बढ़ना है, वो ध्यान-योग शिविर १-२ अटेंड करे, गुरु मंत्र मिला है तो उसको जपे बाकि सब खटपट में नही पड़े, नहीं तो भ्रमित हो जाओगे… संशय में नहीं जाना | इसीलिए तो रामकृष्ण देव को भी गुरु करना पड़ा…भगवान राम को भी गुरु की बात माननी पड़ी “वे राम थी मोटा होई जे गुरु की बात न माने हलो, जे कृष्ण भगवान नि मोटा है जो गुरु नि बात न माने हलो” |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे भगवन ! व्यथित दिनों के श्रम से आप श्रमित हैं और आपका शरीर अति कृश-सा हो गया है |

बापूजी : देखो कितना ख्याल करते हैं गुरूजी का शिष्य, कि आपने इतने दिन बीते हैं, परिश्रम से आपका शरीर कृश हो गया है | खान-पान शयन में अस्त-व्यस्तता हो गयी है तो गुरु जी आपका परिश्रम देखके हमको… फिर धीरे-से क्या बोलते हैं आगे…

योग वशिष्ठ महारामायण : हे भगवन! व्यथित दिनों के श्रम से आप श्रमित हैं और आपका शरीर अति कृश सा हो गया है |

बापूजी : देखो वशिष्ठ भी बेचारे कृश हो गए, परिश्रम से, चेलों के उद्धार के लिये |

योग वशिष्ठ महारामायण : इस निमित्त, हे मुनीश्वर! आप विश्राम कीजिये हे भगवन!

बापूजी : सब बोलो..

योग वशिष्ठ महारामायण : हे भगवन! व्यथित दिनों के श्रम से आप श्रमित हैं |

बापूजी : आप सब लोग सच बोल रहे हैं…

योग वशिष्ठ महारामायण : व्यथित दिनों के श्रम से आप श्रमित हैं और आपका शरीर भी अति कृश सा हो गया है |

बापूजी : हाँ पेट अंदर चला गया है…

योग वशिष्ठ महारामायण : हे मुनीश्वर, इस निमित् अब आप विश्राम कीजिये |

बापूजी : हम आपकी बात मानते हैं…चलो …हम आपकी बात, आपकी प्रार्थना बिलकुल मानते हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे मुनीश्वर अपने जो आनंदित वचन कहे हैं वे प्रकट रूप हैं और आपके उपदेश रूपी अमृत की वर्षा से हम सब आनंदवान हुये हैं |

बापूजी : हाँ… यह भी सच्ची बात है |

योग वशिष्ठ महारामायण : हमारे हृदय का तम दूर होकर शीतल चित्त हुआ है जैसे चन्द्रमा की किरणों से तम और तपन दोनों निवृत्त हो जाते हैं तैसे ही आपके अमृत वचनों से हम अज्ञान रूपी तप और तपन से निवृत हुये हैं |

बापूजी : ज्ञानी बोलता है तो आनंद के निमित्त ही बोलता है, सुख ही बरसाता है तो आपके वचनों से हमें आनंद सुख मिला, तम मिट रहा है… परिश्रम से आपका शरीर थोड़ा कृश-सा भी हो गया है तो आप आराम करो लेकिन हमको आपके परिश्रम से क्या फायदा हुआ है की हमारा चित्त प्रसन्न हुआ है, हमें कुछ समझने को मिला है, कुछ संयम के पाठ मिले हैं, कुछ समझ के पाठ मिले हैं कुछ गहराईयों की यात्रा हुई है…कुछ आत्मिक उड़ानें हुई हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण : रामजी की ओर मुख करके दशरथ जी ने कहा, “हे राघव जो काल संतों की संगती में व्यतीत होता है वही सफल होता है और जो दिन सत्संग के बिना व्यतीत होता है वह वृथा चला जाता है” |

बापूजी : वृथा..कला दिन है वह!!

योग वशिष्ठ महारामायण : रामजी बोले- हे मुनीश्वर! सहस्त्र सूर्य एकत्र उदय होकर भी हृदय के तम को दूर नहीं कर सकते पर वह तम आपने दूर किया है | सहस्त्र चंद्रमा इखट्टे उदय हो तो भी हृदय की तपन निवृत नहीं कर सकते |

बापूजी : हृदय का तम तो तब दूर होता है जब उत्तम साधक हो | सात्विक खुराक, सात्विक संयम और अवतारी हैं रामचन्द्र जी उनको भी कई समय तक अभ्यास करना हुआ, विचार करना पड़ा | जो सुन-सुना कर ब्रह्मज्ञानी हो जाते हैं उनको भ्रमज्ञान हो जाता है… ब्रह्मज्ञान नहीं होता | और कलयुग में तो बड़ा कठिन है आखरी यात्रा करना, पूरा ईश्वरीय अंश विकसित करना एक जरा-सी झलक भी पचती नहीं लोगों को | जरा-सी कृपा भी नहीं पचती तो पूरा ब्रह्मज्ञान तो बाबा !! लाखों-करोड़ों-करोड़ों में एक-आध पचा पाता है | तो एक होते हैं आम भक्त.. हजारों-लाखों की संख्या में, दूसरे होते हैं अन्तेवासी और तीसरे होते हैं सतगुरु के सत्-तत्व को पूर्ण रूप से पचाने वाले | जीवन में एक-आध मिल गया तो बहुत हो जाता है | भ्रांति में तो कई फंस जाते हैं | विवेकानंद बोलते हैं यहाँ इस आध्यात्मिकता में बड़ा में बड़ा खतरा है कि थोड़ा-सा किसी साधक को मिलता है तो भ्रम उसको हो जाता है की आह..मैं ब्रह्म हूँ… वह ब्रह्म नहीं भ्रम हो जाता है उसको | नानक जी कहते हैं- अरब-खरब दा लेखा गणे | नानक कोटिन में कोई जिन आपा चिन्या || अरब-ख़रब का लेखा करो तो, करोड़ों में कोई जिसने पूर्ण… पूरा प्रभु पहचाना |

योग वशिष्ठ महारामायण : विश्वामित्र जी बोले- हे मुनीश्वर! सब तीर्थों के स्नान और दूसरे कर्मों से भी मनुष्य ऐसा पवित्र नहीं होता जैसे आपके वचनों से हम पवित्र हुये हैं | आज हमारे कान भी पवित्र हुये हैं हमारे बहुत जन्मों के पुण्य इखट्टे हुए थे | उनके फल से ये आपके पावन वचन सुने हैं | हे भगवन! आपके वचन चंद्रमा की किरणों के सामान शीतल हैं | किन्तु उनसे भी अधिक है, हमारे जो चिरकाल के पुण्य थे उनका फल आज पाया हैं | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! ज्ञानवान तीनों ताप रुपी उष्णता का नाश करने को पूर्णमासी के चंद्रमा के समान होता है | सुरत्ता और समता सौभाग्य रुपी जल का नीचा स्थान है | जैसे जल नीचे स्थान में स्वाभाविक ही चला जाता हैं, वैसे ही सुरत्ता में सौभाग्य स्वाभाविक होता है | जैसे चंद्रमा की किरणों के अमृत से चकोर तृप्त होता हैं, वैसे ही आत्मरुपी चंद्रमा की समता और सुरत्ता रुपी किरणों को पाकर ब्रह्मा आदि चकोर भी तृप्त होकर आनंदित होते हैं और जीते हैं | हे रामजी ! ज्ञानवान ऐसी कांति से पूर्ण होता हैं जो कभी भी क्षीण नहीं होती | पूर्णिमासी के चंद्रमा में उपाधि दिखती है, परन्तु ज्ञानवान के मुख में वैसी उपाधि नहीं जैसी उत्तम चिंतामणि की कांति होती हैं, वैसी ही ज्ञानवान कि कांति होती हैं जो राग-द्वेष से कभी भी क्षीण नहीं होती | समता ही मानो सौभाग्य रुपी कमल की खान हैं | समदृष्टि पुरुष ऐसे आनंद के लिए जगत में विचरता है और प्राकृत आचार को करता है | सब लोग उसके कर्तृत्व की स्तुति करते हैं | हे रामजी! ऐसा पुरुष ब्रह्मा आदि का भी पूजनीय होता है |

बापूजी: कैसी ऊंचाई है ! कि ऐसा पुरुष ब्रह्मा आदि का भी पूजनीय होता है|

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी सब लोग उसके कर्तृत्व की स्तुति करते हैं और ऐसा पुरुष ब्रह्मा आदि का भी पूजनीय होता है | सभी उसका मान करते हैं, सब उसके दर्शन की इच्छा करते हैं और दर्शन करके प्रसन्न होते हैं |

बापूजी : ऐसा पुरुष मिले तो मुझे बताना, जिसके दर्शन की सब इच्छा करें, दर्शन कर के प्रसन्न हों | जिसने पूर्ण आत्मा परमात्मा का अनुभव किया हो | ऐसा नहीं कि थोड़े दिन जा के बस, मैं आत्मा हूँ | जैसे चूहे हो मिल गया एक हल्दी का टुकड़ा और बोले मैं गाढ़ी हूँ,मैं कर्याणा मर्चेंट हूँ, ऐसा नहीं! ऐसा नहीं सच-मुच में कोई मिला हो और ब्रह्म परमात्मा का अनुभव हो, ऐसे पुरुष के दर्शन से सब लोग आनंदित होते हैं | उसकी वाणी सुखदायी होती है, उसकी चेष्ठा आत्मिक अनुभव देने वाली होती है |ऐसा पुरुष कहीं दिखे तो बोलो !

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ! जिसके हृदय से सब अर्थो की आस्था नष्ट हुई है, वह मुक्त और उत्तम उदारचित्त पुरुष मुक्तिरूप परमेश्वर हो जाता है | फिर चाहें वह समाधी में रहे अथवा कर्म करे या न करे | हे रामजी ! मैंने देखने योग्य सब कुछ देखा है | दासों-दिशाओं में भी भ्रमा हूँ | कई जन्म यथार्थ दर्शी दृष्टि आये हैं और कितने हेय-उपादेय संयुक्त देखे, पर सभी आत्मज्ञान के लिए यत्न करते हैं | इससे भिन्न कुछ नहीं करते | सब ब्रह्माण्ड का राज्य करें अथवा अग्नि और जल में प्रवेश करे, पर ऐसे ऐश्वर्यों से संपन्न होकर भी आत्मलाभ के बिना शांति कदापि प्राप्त नहीं होती |

बापूजी : सारे ब्रह्माण्ड का राज्य मिले भारत का तो क्या? फिर भी आत्माज्ञान के बिना, आत्मलाभ के बिना शांति नहीं होती | अमृत उसको बोलते हैं जो मृतक पर पड़े तो उसे जीवित कर दे | बन्दर मरे हुए थे,अमृत की वर्षा हुई तो जिन्दा हो गए ऐसे ही सुख उसको बोलते हैं कि दुःख में पड़े तो दुःख भी सुख हो जाए | जैसे अमृत मृतक पर पड़े तो मृतक ज़िंदा हो जाता है ऐसे ही जिसको अमृत पान करने को मिले उसका फिर दुःख रहता ही नहीं | उसके चित्त को क्षोभ-दुःख नहीं होता |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी! जितने भी तेजस्वी बलवान हैं उन सभी में तत्व वेत्ता उत्तम है | उसके आगे सब लघु हो जाते हैं | और उस पुरुष को संसार के किसी भी पदार्थ की अपेक्षा नहीं रहती क्योंकि उसका चित्त सत्य-पथ को प्राप्त होता है | हे रामजी ! जिस पुरुष की आत्म पद में स्थिति हुई है वहसबसे उत्तमहो जाता है | जैसे सुमेरु पर्वत के निकट हाथी तुच्छ-सा भासता है, तैसे ही उसके निकट त्रिलोकी के सारे पदार्थ तुच्छ भासते हैं | वह ऐसे दिव्य तेज को प्राप्त होता है जिसको सूर्य भी प्रकाश नहीं कर सकता | वह परम प्रकाश रूप सब कलनाओं से रहित अद्वैत तत्व है | हे रामजी ! जिस पुरुष ने ऐसे स्वरुप को पाया है, उसने सब कुछ पा लिया है | और जिसने ऐसे स्वरुप को नहीं पाया उसने कुछ भी नहीं पाया | ज्ञानवान को देख कर हमको ज्ञान की वार्ता करते कुछ लज्जा नहीं आती | और जो उस ज्ञान से विमुख है, यद्यपि वह महाबाहू हो तो भी गर्धभ वत है |

बापूजी : गर्धभ माना Donkey (गधा) ! महाबाहू है, महाविद्वान है, महा प्रसिद्ध है, बड़ा धन वान है लेकिन आत्मा परमात्मा के ज्ञान और सुख में रूचि नहीं है तो संसार का बोझ उठा-उठा के खप जाएगा|

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जो बड़े ऐश्वर्य से संपन्न है और आत्मपद से विमुख है उसको विष्ठा के कीट से भी नीच जान | जीना उन्ही का श्रेष्ठ है जो आत्मपद के निमित्त यत्न करते हैं और जीना उनका वृथा है जो संसार क निमित यत्न करते हैं |

बापूजी : जो संसार क लिए यत्न करते हैं, नश्वर चीज़ों के लिए उनका जीना व्यर्थ है | मोघसा मोघकर्मा मोघज्ञाना विचेतसाम | सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाया है, सारा जीवन व्यर्थ हो जाता है, सारे कर्म व्यर्थ हो जाते हैं क्योकि वो नश्वर के लिए करते हैं | अनित्य के लिए करते हैं इसलिए उनका सारा ज्ञान, सारा कर्म, मोघसा मोघकर्मा मोघज्ञाना विचेतसाम | श्रीकृष्ण ने कहा शाश्वत के लिए जो करते हैं वे ही धन्य हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ! चित्त में जो राग रुपी मलिनता है उसे जब वैराग्य रुपी झाड़ू से झाड़िए, तभी चित्त निर्मल होगा | जब स्नेह रुपी संकल्प फूलता है तब भाव-अभाव रुपी जगत फ़ैल जाता है | जैसे जल में तेल के बूँद फ़ैल जाते हैं और जैसे बांस से अग्नि निकल कर बांस को दग्ध कर देती है, वैसे ही मन के संकल्प उपज कर इसी को खा जाते हैं | हे रामजी, आत्मा में जो देश, काल पदार्थ भासित होते हैं, यही अविद्या है, पुरुषार्थ से इसका अभाव करो | रामजी ने पूछा- हे मुनीश्वर ! जिन चार भागों से आत्म पद प्राप्त होता है, वह काल का क्रम क्या है? मुनीश्वर बोले, हे रामजी! संसार समुद्र के तरने को ज्ञानवानों का संग करना और जो विकृत निर्वैर पुरुष हैं उनकी भली प्रकार से टहल करना इससे अविद्या का अर्ध भाग नष्ट होगा | तीसरा भाग मनन करके और चतुर्थ भाग अभ्यास करके नष्ट होगा|…पर जब जागता है तब उसे भ्रम जानिये |

बापूजी : देखो बहुत सार बात आ गयी इसमें, मनुष्य जीवन दुर्लभ है लेकिन जवानी में…बुढ़ापे में तो अंग जर्जरिभूत होते हैं | बुढ़ापे में जर्जरिभूत हों उसके पहले ही जवानी में भी होते हैं | जैसे बारिश के दिन में पाचन तंत्र कमजोर होता है और रोज़ खाता है उतना कहाँ जाएगा ? सुबह शरीर टूटने लगेगा | फिर भी सावधान नहीं हुआ तो बुखार आ जाएगा और बुखार रहा तो इंजेक्शन लगेगा | तो अजीर्ण का रस जो कच्चा रह गया वो आगे चल के बीमारियाँ करेगा | तो शरीर टूटता है तो उपवास, भूख कम लगती है तो अदरक और शहद का मिश्रण करके, संत कृपा चूर्ण डाल कर, गुन-गुना पानी कर के लें | ये मौसम ऐसा है कि थोड़ा खुराक़ कम करना चाहिए | हफ्ते में एक-आध उपवास करना चाहिए | बुढ़ापे में तो शरीर जीर्ण होता ही है, बीमारी पकड़ती है लेकिन जवानी में भी लापरवाही करते हैं तो बीमारी पकड़ती है | तो फिर सुमिरन कब करेंगे? आत्मसुख कब पाएंगे? बचपन में तो अज्ञानता रहती है, बुढ़ापे में बीमारियाँ रहती हैं | जवानी में काम, क्रोध, लोभ, इर्ष्या… तो मनुष्य जन्म व्यर्थ हो जाता है | तो मनुष्य जीवन व्यर्थ न हो इसलिए गुरु महाराज समझा रहे हैं वशिष्ठजी |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, संत जन संसार समुद्र के पार के पर्वत के समान हैं | जैसे जहाज के आश्रय से समुद्र के पार होते हैं, वैसे ही संत जन संसार समुद्र से पार करने वाले हैं | जिनको संतजनों का आश्रय हुआ है वे ही तरे हैं | संतजन संसार समुद्र के पार के पर्वत हैं | जैसे समुद्र में बहुत जल होता है, तो बड़े तरंग उछलते हैं और उसमें बड़े मच्छ रहते हैं, पर जब उसका प्रवाह उछलता है तब पर्वत उस प्रवाह को रोक देता है और उछलने नहीं देता, वैसे ही जीव के चित्त रुपी समुद्र में इच्छायें और संकल्प रुपी तरंगे और राग द्वेष रुपी मच्छ रहते हैं |

बापूजी : जैसे सागर में तरंग उछलती हैं और पहाड़ है तो उन तरंगो की उछ्लाहट को सह कर उन तरंगों को शांत कर देता है | ऐसे ही हमारे ह्रदय में भी Desire (इच्छा), वासनाएं और राग द्वेष की तरंगें उछलती हैं | संत लोग वह पर्वत हैं जो हमारे चित्त को अशांति से बचाकर परमात्म-शांति के तरफ मोड़ते हैं | इसलिए जिन्होंने संतों का संग किया है, उनके वचन माने हैं, वे तो तर गए और जो मनमुख हुए वे तो फंस गए संसार में | कोई प्रेत होकर भटकता है तो राजा अज अजगर होकर भटक रहा है |

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसी दृष्टि का आश्रय करो जो दुःख का नाश करती है | नि:संग सन्यासी होकर अपने सब कर्म और चेष्ठाओं को ब्रह्मअर्पण करो | जिसमें यह सब है और जिससे यह सब है ऐसी सत्ता को तुम परमात्मा जानो | जड़ शरीर से कर्म स्वाभाविक होते हैं | जैसे वायु स्फुरण स्वाभाविक होता है वैसे ही शरीर से कर्म स्वाभाविक होते हैं | हे रामजी | जो मूर्ख अज्ञानी हैं, वह ऐसे कर्मों का आरम्भ करते हैं जिनका कल्प-पर्यन्त नाश न हो | वे देह इन्द्रियों के अभिमान का प्रतिबिंभ आप में मानते हैं कि मैं करता हूँ, मैं भोक्ता हूँ और योग से प्राणवायु स्थिर होती है |

बापूजी : यह बहुत सूक्ष्म बात है, उत्तम बात है, उत्तम पद को पाने के लिए है | चाहें कितना भी जगत का वैभव इकठ्ठा कर लें फिर भी इस पद को पाए बिना आदमी अंतर आत्मा का सुख या शांति नहीं पाता |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जब तुझको विवेक से आत्मतत्व का प्रकाश होगा तब तू संसार की तुच्छ वृत्तियों में न डूबेगा | जैसे गोपद के जल में हाथी नहीं डूबता तैसे ही तू भी राग द्वेष में न डूबेगा |

बापूजी : परमात्म शांति में ऐसा सुख होता है जैसे गाय के खुर तक के पानी में हाथी डूबे नहीं ऐसे ही तुम्हारा मन संसार की किसी परिस्थिति में न डूबे |

योग वशिष्ठ महारामायण : जिसको देह में अभिमान है और चित्त में वासना है वही तुच्छ संसार की वृत्तियों में डूबता है इससे जितना अनात्म भाव दृश्य है तब तक विगत जिवर होकर जीता है |

बापूजी : जिसको इस प्रकार अभ्यास करके अंतरात्मा का सुख मिलता है, वह जब तक जीता है तो ताप के बिना ह्रदय में तपन नहीं होती, शोक नहीं होता | चित्त का शीतल होना बड़ी तपस्या का फल है, ह्रदय में शांति पाना अपने आप में सुखी रहना, अपने आप के ध्यान में आनंदित होना, ये बड़ी तपस्या का फल है | तीर्थों में जाते हैं तो धर्म लाभ होता है-
तीर्थ नहाये एक फल, संत मिले फल चार |
सतगुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार ||
सत्गुरुओं का ज्ञान मिले और सत्गुरुओं की कृपा मिले तो अनंत फल होता है | इच्छा पूरी, श्रद्धा सब पूरी, रब रहया संग हजूरी | सारी इच्छायें पूरी हो जाती हैं जिसकी द्रण श्रद्धा होती है | श्रद्धा से भगवद जप ध्यान करे, श्रद्धा से संतों का सत्संग करें, कल्याण हो जाता है, बहुत मंगल हो जाता है |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, कोई पदार्थ श्रेष्ठ नहीं, न पृथ्वी का राज्य श्रेष्ठ है, न देवताओं का रूप श्रेष्ठ है, न नागों का पाताल लोक श्रेष्ठ है, न शास्त्रों का पठन-मनन श्रेष्ठ है, न काव्य का जानना श्रेष्ठ है, न पुरातन कथा क्रम वर्णन करना ही श्रेष्ठ है और न बहुत जीना श्रेष्ठ है, न मूढ़ता से मर जाना श्रेष्ठ है | न नरक में पड़ना श्रेष्ठ है और न इस त्रिलोकी में और कोई भी पदार्थ श्रेष्ठ है | जहाँ संत का मन स्थित है वाही श्रेष्ठ है |

बापूजी : संत का मन अंतरात्मा में रहता है वही श्रेष्ठ है | बहुत काव्यों का पढना, बहुत धन को इखट्टा करना, त्रिलोकी का राज्य प्राप्त करना ये श्रेष्ठ नहीं है | ये तो Tension(चिंता का कारण) है |श्रेष्ठ वही है जहाँ संत का मन परमात्मा में विश्रांति पता है वही श्रेष्ठ है | राम के गुरुदेव बोलते हैं | त्रिलोकी का राज्य पाना तो तुम्हारे बस की बात नहीं है लेकिन अंतर्मुख होना तुम्हारे हाथ की बात है | सारे काव्यों में विद्वान बनना सबके हाथ की बात नहीं है लेकिन सब परमात्मा का सुमिरन ध्यान करके महान बनना सबके हाथ की बात है | जो तुम्हारे हाथ की बात है वो तुम कर डालो, जो उसके हाथ की बात है वो अपने आप कर लेगा |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जैसे हाथी कीचड से अपने बल से ही निकलता है, तैसे ही अपना उद्धार आप करो |संसार रुपी गढ़धे में मन रुपी बैल गिर गया है । जैसे हाथी कीचड़ से अपने बल से ही निकलता है तैसे ही अपना उद्धार आप करो | संसार रुपी गड्ढ़े में मन रुपी बैल गिरा है जिससे अंग जीर्ण हो गए हैं |

बापूजी : हाँ, संसार रुपी गड्ढ़े में मन रुपी बैल गिरा है । ज्यों निकलता है त्यों ही बुड्ढा हो गया । उसके अंग जर्जरिभूत हो रहे हैं । दल-दल में गिरा, उस बैल को किसी का साथ-सहकार हो और अपना पुरुषार्थ हो और पैर चलाये नहीं तो कितना रस्सी बाँधकर घसीटोगे ? बैल अपना बल करे और रस्सी वाला अपना,निकल जाये । ऐसे ही अपना मन संसार रूपी गड्ढे में गिरा है, दल-दल में, कीचड़ में । मन रूपी बैल संसार रूपी कीचड़ में गिरा है तो उसको अपना पुरुषार्थ करके, साथ-सहकार लेकर शास्त्र का, गुरु का बाहर निकालना चाहिए । अपना पुरुषार्थ, शास्त्र और संत इनका आदर सहित पालन करके मन रूपी गड्ढे से । मन रूपी बैल को संसार रूपी गड्ढे से निकालना है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठ जी बोले हे रामजी जब तक आत्म ज्ञान नहीं होता तब तक शास्त्रों के अनुसार आनंदित आचार में विचरें । शास्त्रों के अर्थ में अभ्यास करें । और मन को राग-द्वेष आदि से मौन करें । तब पाने योग्य अजन्मे शुद्ध और शांत रूप को प्राप्त होता है । हे रामजी, तुम चित से शास्त्र और संतों के गुणों में चिर पर्यन्त चलो ।

बापूजी : शास्त्रों में और संतों के वचन पर चिर पर्यन्त चलो । लम्बा समय तक आदर से चलो । क्यों के अज्ञान, वासनाएँ, मन मुखता दीर्घ कालीन है । चिर काल तक चलो ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी जैसे हाथी कीचड़ से अपने बल से ही बाहर निकलता है, तैसे ही अपना उद्धार आप ही करो । हे रामजी, जब गुरु के वचन सुनकर उनके अनुसार पुरुषार्थ करें, तभी परम पद प्राप्त होता है और जय होती है ।

बापूजी : हाँ, गुरु के वचन सुनकर उनके अनुसार पुरुषार्थ करें, तभी परम पद प्राप्त होता है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी अभ्यास और वैराग्य के बल से इस मन रूपी बैल को निकलकर अपना उद्धार आप करो ।

बापूजी : हाँ, मन रूपी बैल को निकलकर अपना उद्धार आप करो । अभ्यास, जो सुना है, जो साधन गुरु ने दिया है, उसका अभ्यास करो । और फिर वैराग्य का आश्रय लो । किसी भी चीज में, वस्तु में, व्यक्ति में,परिस्थिति में राग बंधन का कारण है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी जिस पुरुष को अपने मन पर भी दया नहीं उपजती के संसार दुःख से निकले वह मनुष्य का आकार है परन्तु राक्षस है ।

बापूजी : अपने पर भी दया नहीं होती के संसार से निकले । मौत से बचें, बार-बार जन्मने-मरने से निकलें । अशांति से बचें । भविष्य में मुसीबतें आएँगी । पशु योनि में जाना पड़ेगा । ये दुःख होग। पशु योनि से बचें । जिनको अपने पे दया नहीं है वो मनुष्य की आकृति तो हैं लेकिन हैं दैत्य, राक्षस । भगवान ने कहा मोहिनी प्रकृति वाले, आसुरी प्रकृति वाले, राक्षसी प्रकृति वाले । मोहिनी प्रकृति वाले अपना कुछ बिगड़ता-सुधरता नहीं लेकिन फिर भी कुछ गड़-बड़ कर देना ।

श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ४

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योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, ज्ञानवान उस उत्तम पद में विराजता है जिसकी अपेक्षा से चंद्रमा और सूर्य पाताल में भासते हैं |

बापूजी इतना व्यापक, इतनी ऊचाई में उसकी चेतना व्याप्त रहती है की चंद्रमा और सुर्य भी पाताल में भासते हैं | इतना ज्ञानी उत्तम पद में, उचें में होते हैं | यह साधारण आदमी के समझ में ही नहीं आएगा |यह वशिष्ठ जी कह रहे हैं,…किसको कि रामजी को बता रहे हैं, जो विनोद में, मजाक में भी झूठ नहीं बोलते थे ऐसे सत्यनिष्ठ रामजी के आगे उपदेश देना कोई साधारण गुरु का काम नहीं है और रामजी कोई ऐरे-गैर को गुरु नहीं बनाते, अपने-से कई गुना ऊँचे होते हैं वहीँ मत्था टिकता है | गुरु का स्थान कोई ऐरे-गैर नहीं ले सकता, गुरु की जगह ऐसा-वैसा नहीं भर सकता है | कितनी भी सत्ता हो, कितना भी चतुराई का ढोल पीटे, फिर भी गुरु के लिये जो हृदय में जगह है, गुरु के सिंघासन पर किसी को बिठाया थोड़ी जाता है, कोई बैठ ही नहीं सकता |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, त्रणवत जानकर जिसने जगत को त्याग दिया है और सदा आत्मतत्व में स्थित है उनको किसकी उपमा दीजिए ?

बापूजी : त्रणवत समझ के, जगत की सत्यता को त्याग दिया चित्त से और सदैव अत्मस्तिथि है, लेता-देता,खाता-पिता, करता-कराता फिर भी अपने शुद्ध–बुद्ध स्वरुप में रहता हैं उस महापुरुष को किसकी उपमा दीजिए | अष्टावक्र कहते हैं जनक को “तस्य तुलना के न जायते |” उस ब्रह्मवेत्ता की तुलना किससे करोगे?…जनक !

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी! उस ईश्वर आत्मा को कौन तोल सकता है ? जब दूसरे उसके सामान कोई हो तब तो तोलें !

बापूजी : उस इश्वर आत्मा ब्रह्मवेत्ता को कौन तोल सकता है? किससे तोलोगे? उसके समान कोई बाट हो तभी तो तोलोगे | अच्छा किसी को परेशान होना हो अशांत होना हो तो आत्मज्ञानी गुरु के लिये फरियाद करे कि हमारा तो कुछ नही हुआ, हमको तो कोई लाभ नहीं हुआ, ये कुछ नही हुआ… तो कुछ नहीं हो जायेगा उसको और जो उसके प्रति आदर भाव और विधेयात्मक विचार करेगा उसकी तो बहुत प्रगति होगी और निषेधात्मक विचार करेगा तो निषेद्ध ही हो जायेगा | प्रकृति बड़ा ठीक गणित लगा देती है |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी! जितने भी तेजस्वी बलवान हैं उन सबों में तत्ववेत्ता सर्वोत्तम है |

बापूजी : तेजस्वी, बलवान, यशस्वी, बुद्धिमान जितने भी धरती पर हैं उन सब से ब्रह्मज्ञानी सबसे ऊँचे है |

योग वशिष्ठ महारामायण उसके आगे सब लघू हो जाते हैं और उस पुरुष को संसार के किसी भी पदार्थ की अपेक्षा नही रहती |

बापूजी : उसके आगे सब लघू हो जाते हैं | जैसे कीढ़ी से मकोड़ा बड़ा है, मकोड़े से चूहा बड़ा है, चूहे से कबूतर बड़ा है, कबूतर से फलाना पक्षी बड़ा है, उससे फलाना ढोर बड़ा है… सबसे बड़ा हाथी लेकिन सुमेरु पर्वत के आगे हाथी भी लघु हो जाता है |

योग वशिष्ठ महारामायण हे रामजी ! जैसे सूर्य के उदय हुये सूर्य मुखी कमल प्रफुल्लित हो आते हैं तैसे  ही वह पुरुष पूर्णिमा के चन्द्रमावत दैवी गुणों से शोभायमान हो जाता है | बहुत कहने से क्या है…ज्ञात ज्ञेय पुरुष आकाश वत हो जाता है वह न उदय होता है और ना कभी अस्त होता है, विचार करके जिसने आत्मा तत्व को जाना है वह उस पद को प्राप्त होता है जहां ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र स्तिथ होते हैं |

बापूजी : ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र जिस आत्मपद में स्थित हैं, उसी पद में वो ज्ञानवान स्तिथ होता है |

योग वशिष्ठ महारामायण : जहां ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र स्थित होते हैं, वहीँ वह आत्म तत्ववेत्ता स्थित होते हैं और सभी उन पर प्रसन्न होते हैं | प्रकट आकार उनका भस्ता है हृदय अहंकार से रहित होता है |

बापूजी : हाँ…उनका प्रकट आकार भासता है कि यह हैं लीलाशाह बापूजी पांच फुट के, साढ़े पांच फुट के | प्रकट आकार तो भासता है पर हृदय में अहंकार शुन्य हैं कि ये देह है, इतना ही देह मैं हूँ ऐसा नहीं, वो जो हैं,वो हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ! ब्रह्महत्या से भी ज्ञानवान पुरुष को कुछ पाप नहीं लगता और जो अश्वमेघ यज्ञ करे तो भी कुछ पुण्य नहीं होता |

बापूजी : ज्ञानी को सारा संसार मिलकर भी कोई मदद नहीं कर सकता और सारा संसार उल्टा होकर टंग जाए तो भी ज्ञानी की हानि नहीं कर सकता और उसे शूली पर चढ़ा सकता है, सुकरात को ज़हर दे सकता है लेकिन उसके शरीर को तंग कर सकता है उसको नहीं कर सकता | सारा संसार मिलकर ज्ञानी की मदद नहीं कर सकता | हाँ…लोग बोलते हैं, बापू कोई काम-काज हो तो हमारी मदद कि ज़रूरत हो तो…और बोलते भी हैं आपने तो बड़ी मदद किया भाई…जैसी दुनिया है ऐसा वो खेल खेल कर चला जाता है |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, उनके निश्चय में जगत जीव कोई नहीं और वह चारों प्रयोजन धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की पूर्णता को प्राप्त होते हैं | किसी और से भी उनको न्यूनता नहीं होती वह सर्व सम्पदा संपन्न विराजमान होते हैं | जैसे पूर्णमासी का चंद्रमा न्यूनताओं से रहित होकर विराजता है तैसे ही यद्यपि वह भोगों को सेवते हैं, तो भी वह उनको दुःख दायक नहीं होते |

बापूजी : यद्यपि वह भोगों को सेवता है, रथ में बैठेगा, राजा होकर राज्य करेगा, योद्धा हो कर युद्ध करेगा, भिक्षुक होकर भीख मांगेगा सब करते कराते भी अपने चित्त में कहीं कर्तृत्व भाव से लेपायमान नहीं होता |

योग वशिष्ठ महारामायण हे रामजी, ऐसे ज्ञान वान पुरुष विष्णु नारायण के अंग हो जाते हैं | जैसे सुमेरु पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता वैसे ही वह ज्ञानवान पुरुष दुखों से कभी भी चलायमान नहीं होते | ऐसे जो ज्ञान वान पुरुष हैं…

बापूजी : विश्वामित्र ब्रह्मऋषि  बनना चाहते थे और लोगो ने तो हाँ बोल दी | वशिष्ठ जी ने कहा नहीं, अभी उनमें रजोगुण है, विलासी राजा में से विश्वामित्र बने हैं | अभी ब्रह्म ऋषि नहीं, अभी तो राज ऋषि हैं | अरे! हम राज ऋषि कैसे? उनका इतना किया फिर भी वशिष्ठ जी ब्रह्म ऋषि नहीं बोल रहे थे | पहले राजवी तो थे, लड़ाई-झगड़ा, मार-काट तो पहले ही था उनका, एक शौक था हॉबी थी | वशिष्ठ जी के बेटे मार डाले, वशिष्ठ जी के बेटे मार दिए | एक दिन वशिष्ठ जी पुत्र शोक में गए गंगा में कूदने को, तो गंगा जी का पानी कम हो गया | फिर वहाँ से दूर चले गए और पत्थर बांध के हर गंगे ! तो गंगा प्रकट हो गयीं, बोले आप तो ब्रह्मवेत्ता हैं, आपको तो हर्ष-शोक नहीं और आपके पुत्र मरने का शोक करके आप आत्मा हत्या कर रहे हैं | बोले चल री, तू क्या मेरे को उपदेश देती है, मैं थोड़े ही मर रहा हूँ, ये तो मेरे चित्त को मैं…| गंगा जी ने हाथ जोड़ लिए वशिष्ठ जी डेढ़ लाख वर्ष जिये | कल्प करते-करते-करते चवन ऋषि साठ हज़ार वर्ष जिए | अब डेढ़ लाख वर्ष जिए हुए महापुरुषों का कितना निचोड़ होगा ! कितना ऊँचा अनुभव होगा !

योग वशिष्ठ महारामायण हे रामजी, ऐसे जो ज्ञानवान पुरुष हैं, वे वन में विचरते है और नगर, द्वीप आदि नाना प्रकार के स्थानों में भी फिरते हैं |

बापूजी कभी वन में रहें, कभी नगरो में रहें, कई स्थानों में रहें, अपने चित में दुःख नहीं होता उनको | तरती शोकं आत्मवेत्ता| आत्मवेत्ता सारे शोक समुद्र से तर जाता है |

योग वशिष्ठ महारामायण और शत्रुओं को मारकर शासन भी करते हैं |

बापूजी : राज्य  करते हैं, शत्रुओं को बराबर ठिकाने लगाकर शासन भी करते हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण कितने श्रुति, स्मृति के अनुसार कर्म करते हैं, कोई भोग भोगते हैं, कोई विरक्त होकर स्थित होते हैं |

बापूजी : कोई खूब भोग भोगकर, ठाठ से, मौज से रहते हैं, कोई बिल्कुल सादगी से रहते हैं | कोई ललनओं के साथ विचरण करते हैं तो कोई विरक्त होकर रहते हैं | कोई स्वर्ग में अप्सराओं के गीत-नाच देखते हैं तो कोई भूमण्डल की गिरी-गुफा में समाधी में मस्ती में बैठे हैं तो कोई आचार्य बनकर दूसरों को उस रंग में रंगने में लगे हैं | ऐसे आचार्य भी कभी देखो तो भीड़ में, कभी एकांत में, कभी लेने में, तो कभी देने में तो कभी सब फेंक कर चल देने में भी कोई संकोच नहीं |

आश्चर्यो त्रिभुवन जेई,राजे राजवताम युवे युवास्त्रे स्त्रियाः|

राजा मिले तो बड़े राजा… राजकारण की बात, युवान मिले तो बड़े जुवान, बालक मिले तो बालक, माइयां मिलें तो बड़ी सासु की नाईं उनको भी सम्भाले, क्यूंकि आत्मा सब कुछ बन के बैठा है | जो सब कुछ बन के बैठा है उसमें एकाकार हुए पुरुष को सब स्नेह करते हैं, सबको अपने ही लगते हैं | ज्ञानी के प्रति सबको अपनापन लगता है | सभी धर्म, सभी पंथ, सभी मतवालों को अपनापन लगेगा, जो भी उसके निकट आयंगे | ज्ञानवान से मिलो तो ऐसे नहीं लगेगा कि हम कोई नए महात्मा से मिले, लगेगा कि हाँ ये तो अपने ही हैं क्योकि उनकी नज़र में अपनत्व इतना परिपक्व है… भेद है ही नहीं ज्ञान की नज़र में |एक्स-रे मशीन एक बार फ़ोटो लेती है न… तो आपके रक्त के कण डिस्टर्ब हो जाते है, वहाँ रास्ता ही बन जाता है | सात-सात परतों को चीरकर हड्डियों का फ़ोटो लेती है एक्स-रे तो वे किरण एक प्रकार की परतों को धुंधला कर देते हैं | क्यों! सात-सात परतों का जब एक्स-रे लेती है फ़ोटो तो परतों को धुंधला कर देती है तो वो जड़ मशीन हड्डियों की फ़ोटो लेती है तो सात परतें धुंधुली हो जाती हैं तो ज्ञानी की नज़र पड़ती है तो आपके अंतःकरण, आपके आत्मा और उसके बीच जो ये अज्ञान की और दूसरी परते हैं, वो भी ज्ञानी की नज़र से धुंधली हो जाती हैं | ज्ञानी की दृष्टि से भी फायदा होता है, ज्ञानी की वाणी से भी फायदा होता है | ऐसा ज्ञानी बोले तो ठीक है… नहीं बोले खली बैठे रहे तभी भी बहुत लाभ होता है अपने को | रमण महर्षि चुपचाप बैठे रहते, मोरारजी भाई देसाई उनके चरणों में शांति से बैठे रहते, बड़ा लाभ होता है, शांति मिलती है | ये बात  तो मोरारजी भाई देसाई ने शिकागो के गणेश टेम्पल में कही थी, हम नहीं थे वहाँ… लोगों ने बाद में बताया | मोरारजी भाई देसाई बोलते हैं कि हमने आई.ए.एस. ऑफिसर से लेकर प्राइम मिनिस्टर पद तक की यात्रा की लेकिन आज भी मुझे कहना पड़ता है कि रमण महर्षि के चरणों में बैठने से जो शांति मिली थी, जो सुख ह्रदय का मिला था वैसा प्राइम मिनिस्टर पद में भी नहीं है | जिनकी हाजिरी मात्र से प्राइम मिनिस्टर पद का सुख भी तुच्छ हो जाता है | और एक दो व्यक्ति नहीं कई व्यक्तियों को वो सुख देते हैं, तो उनके पास कितना सुख होगा!! अपन जाते हैं, अपने जैसे हज़ारों-लाखों  को वो संतुष्ट और सुखी कर देते हैं | उनके पास आखिर ऐसी कौन-सी चीज़ है कि घटती ही नहीं! योगी तो बारह साल तप किया और सिद्धाई प्राप्त की पानी पर चलने की और अखबारों में डाल दिया कि हम सिद्ध योगी हैं, पानी पर चल सकते हैं | फलानी तारीख कांकरिया के पानी पर चल के दिखायंगे | अखबार में फ़ोटो आया, कांकरिया पर भीड़ हो गयी और डी.एस.पी. ने अपना फ़ोर्स पी.एस.आई. लगा दिए | डी.एस.पी. खुद भी नज़दीक खड़े हो गए कि अपन भी देखें और हुआ वही दिखाने गए तो अभी ब्रह्मज्ञान तो हुआ नहीं, अभी तो सिद्धाई के बल से प्रभाव डालना है | तो व्यक्तित्व है, परिछिन्नता है, ज्यों पानी में पैर रखे धूम गिरे, फिर दुबारा किया तो गिरे | मुँह बचा के भागे, ओये ओये करके!! तो कुछ विशेष व्यक्ति, व्यक्ति-विशेष बनकर प्रसिद्ध होना या कुछ पाना, ये तो जीव का काम है, ज्ञानी कुछ विशेष बनने की कोशिश नहीं करते, जो है उसी को जानकार, उसी में एकाकार होते हैं| तो सब विशेषों का बाप बन जाता है, सारे जो विशेष-विशेष व्यक्ति हैं, उनसे भी ज्ञानी जो निर्विशेष है वो सर्वोपरि विशेष हो जाता है | जोगी बने, तपस्वी बने, कुछ बने, सेठ बने, राजा बने लेकिन ज्ञानी तो एक साथ सब रूप में जो है उससे एक होकर सभी बना बनाया है | बिना मेहनत किये उसको तो राज्य मिल गया, वो तो योगी बना है, वो राजा बना है लेकिन जिससे बना है उसमें ज्ञानी एक हुआ है | तो ज्ञानी समझता है कि सभी हम बने बैठे हैं, तो मौज ही मौज है, मुफत में! उसको कुछ बनना नहीं पड़ता… ब्रह्मा होकर हम सृष्टि करते हैं, विष्णु होकार पालन करते हैं, शिव होकर संहार करते हैं | ज्ञानी जैसा तृप्त और कोई नहीं है | ज्ञानी को जो अनुभव होता है, आत्मवेत्ता को, उसकी बराबरी देव-सुख भी कुछ नहीं कर सकता, यक्ष-गन्धर्व भी कुछ नहीं, ऐसा होता है ज्ञानवान का सुख और सत्संग आत्मज्ञान का सुनकर उसी विचार को महत्व देना चाहिए |

योग वशिष्ठ महारामायण हे रामजी, जैसे माता की पुत्र पर दया और ममता होती है, वैसे ही वे सब पर दया करते हैं | जैसे कमलों के निकट भँवरा जाता है तो वे उनको विश्राम का स्थान देते हैं और सुगंध से उनको संतुष्ट करते हैं | वैसे ही संत जन निहाल कर देते हैं | हे रामजी संत जन इस लोक और परलोक में भी सुख देने वाले हैं | जिन पुरुषों में ऐसे गुण पाइए, वे ही सच्चे संत हैं | जैसे जहाज के आश्रय से समुद्र के पार हो जाते हैं, वैसे ही संत जन संसार समुद्र से पार करने वाले हैं | जिनको संत जनों का आश्रय हुआ है, वे ही लोग तरे हैं |

बापूजी : संत पुरुषों का आश्रय मिला है वे ही तरे हैं | जैसे जहाज़ के आश्रय से दरिया पार कर लेते हैं लोग ऐसे ही संत का संग, सानिध्य, आश्रय मिलता है तो तर जाते हैं | हम भी अपनी साधना-बल से कुछ भी करते, तो इतना नहीं मिलता जितना गुरु की कृपा से हमे मिला |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, महापुरुष और संत जनों का युक्ति रुपी जहाज़ है, उसी से संसार रुपी समुद्र तर जावेगा और उपाय कोई नहीं |

बापूजी : और उपाय कोई नहीं है, और उपाय कोई हो ही नहीं सकता | तन सुखाय पिंजर कियो, धरे रैन-दिन ध्यान, तुलसी मिटे न वासना बिना विचारे ज्ञान मनमाना साधन करने जाए कितना भी, उससे कुछ नहीं होता | गुरु कृपा ही केवलं शिष्यस्य परम मंगलम मंगल तो अपने ताप से कर सकता है, परम मंगल, परम तत्व का ज्ञान गुरु कृपा से होता है | कर्म कोटिनाम, यज्ञ जप तप क्रिया, ताः सर्व सफल देवी गुरु संतोष मात्रतः पूरे कल्प तक के यज्ञ जप तप व्रत का सार यह है की आप आत्मवेत्ता महापुरुष के ह्रदय में आपके लिए संतोष हो | महापुरुष का हृदय आपके प्रति ज्ञान भाव के संकल्प करने को उद्यत | सारे पूजा-पाठ व्रत नियमों का फल यही है कि तुम्हारे हृदय में परमात्मा को पाने की प्यास पैदा हो और तुम्हारा ऐसा आचरण हो कि ज्ञानवां के चित्त से छलके वो परमात्मा |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, ज्ञानवान गुरु सत्शास्त्रों का उपदेश करे और शिष्य अपने अनुभव से ज्ञान पावे | अर्थात गुरु अपना अनुभव और शास्त्र जब ये तीनों इखट्टे मिलें तभी परम कल्याण होता है |

बापूजी : अपना अनुभव, अपना पुरुषार्थ सत आचरण का, शास्त्र सम्मत और गुरु की कृपा | शिष्य का पुरुषार्थ एक पंख, गुरु की कृपा दूसरा पंख, एक पंख कितना भी बलवान हो, दूसरा पंक बलबान न हो तो नहीं हो सकता |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जिस देश में संत जन रुपी वृक्ष नहीं हैं और जिनकी फलों सहित शीतल छायाँ नहीं है |उस निर्जन मरुस्थल में एक दिन भी न रहिये |

बापूजी : जहाँ संत रुपी विशाल वृक्ष नहीं है और उनकी करुना कृपा की छायाँ नहीं है उस देश को मरुभूमि समझ कर त्याग दो | और जहाँ संत का संग सानिध्य मिले, खाने-पीने को न मिले, चांडाल के घर की भिक्षा ठीकरे में लेकर खानी पड़े, लेकिन संत जनों का संग मिलता है तो वहाँ रहना चाहिए | क्योंकि अन्य ऐश्वर्य भोगने वाला तो अंत में नरकों में जाएगा लेकिन संत का संग वाला तो अंत में परमात्मा से मिलेगा इसलिए उज्जवल भविष्य है | चांडाल के घर की भिक्षा ठीकरे में खानी पड़े, और संत का सानिध्य मिलता है तो वो जगह नही छोड़ना, अन्य ऐश्वर्यों का त्याग कर दें,क्योंकि अन्य ऐश्वर्य अंत में गर्क में डाल देंगे और संत का सानिध्य अंत में अनंत से मिला देगा |इसलिए कहते हैं-

सम्राट के साथ राज्य करना भी बुरा है न जाने कब रुला दे|
फ़क़ीर के साथ भीख मांग के रहना भी अच्छा है न जाने कब मिला दे |

योगवशिष्ठमहारामायण: हे रामजी उनमें उदारता, धीरज, संतोष, वैराग्य, समता, मित्रता. मुदिता और उपेक्षा है |

बापूजी: वे अच्छे से मित्रता करते हैं | जो निपट निराला है वो उपेक्षा करते हैं | तो यह जो ज्ञानवान के लक्षण हैं, योग वशिष्ठ बार बार पढ़ें और सात्विक भोजन करें और जप-ध्यान करें तो परमात्मा का साक्षात्कार हो जाए |

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठ जी बोले, हे रामजी! जिनके हृदय रूपी आकाश में आत्म-विवेक रूपी चंद्रमा प्रकाशता है वह पुरुष शरीर नही मानो क्षीर समुन्द्र है, उसके हृदय में साक्षात विष्णु विराजते हैं | जो कुछ उनको भोगना था वो उन्होने भोगा और जो कुछ देखना था वह भी देखा फिर उन्हे भोगने और देखने की तृष्णा नहीं रहती | और आत्म-रूप, आत्म-बोध से आनंदित होता है |

बापूजी : तुरियावस्था में स्तिथ होकर हर्षवान होता है, ज्ञानवान होता है | तो तुरिया क्या है ? तीन अवस्था आती हैं, अभी जो बोल रहे हैं इसको जागृत अवस्था बोलते हैं, रात को स्वप्न आता है उसको स्वप्न अवस्था बोलते हैं और गहरी नींद होती है उसको सुषुप्ति अवस्था बोलते हैं | ये तीन अवस्था में सब लोग जीते हैं | ज्ञानी तुरिया अवस्था में पहुँच जाता है | जो जागृत को जनता है, स्वप्ने को जनता है और सुषुप्ति को जनता है उसमें ज्ञानी जगें हैं वो तुरिया अवस्था है | इसका वर्णन क्यों करते हैं कि तुम भी उस तुरियावस्था में जगो | जागृत आया बदल गया, स्वप्ना आया बदल गया, सुषुप्ति आई बदल गयी…तुरिया… तुरियावस्था में ज्ञानवान के आत्मा और वैसे वास्तव में सब तुरिया में ही हैं | कल की जागृत चली गयी तो तुम थोड़ी चले गये, कल का स्वप्ना चला गया तुम थोड़ी गये, सुषुप्ति गयी तुम थोड़ी गये! लेकिन कल जैसा था उस समय तुम उसमय हो गये | ज्ञानी उसमें जागृत रहता है…तुरियावस्था में और अज्ञानी लोगों को तुरियावस्था की पता नही इसीलिए ज़्यादा दुख भोगता है और करा-कराया सब चट हो जाता है उसका और ज्ञानी सभी दुखों के बीच भी सुखी रहता है क्योंकि अवस्था है सब बदलती हैं, डटा रहता है |

 

श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ३

g66योगवशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ! जिस पुरुष को बड़े भोग प्राप्त हुए हैं, और उसने इंद्रियों को जीता नहीं, तो वो शोभा नहीं पाता है । जो त्रिलोकी का राज्य प्राप्त किया और इन्द्रियां ना जीती, तो उसकी भी कुछ प्रशंसा नहीं । जो बड़ा शूरवीर है और उसने इंद्रियों को नहीं जीता तो उसकी भी शोभा कुछ नहीं ।

बापूजी : बड़ा शूरवीर है और उसने इंद्रियों को नहीं जीता तो उसकी भी शोभा कुछ नहीं । बड़ा राज्य है लेकिन सयंम नही तो कोई शोभा नहीं । बड़ा धन है, बड़ा परिवार है लेकिन आत्मसुख नहीं तो कोई सुख नहीं । आत्म शांति, आत्म सुख, आत्म ज्ञान ।

योगवशिष्ठ महारामायण : जिसकी बड़ी आयु है और उसने इन्द्रियां नहीं जीती तो उसका वो जीना भी व्यर्थ है । रामजी, जिस प्रकार इन्द्रियां जीती जाती हैं, और आत्म पद प्राप्त होता है सो सुनो । इस पुरुष का सवरूप अचिंत चिन मात्र है । उसमें जो संवित जगी है, उस ज्ञान संवित का अंतरकरण और दृश्य जगत से संबंध हुआ है, उसी का नाम जीव पड़ा है ।

बापूजी : जो चैतन्य परमात्मा है उससे जो संवित, फुरणहुत हुआ और जगत की तरफ गया और जीने की इच्छा हुई तो नाम जीव पड़ा । नहीं तो है तो शुद्ध परमात्मा । Every Man is God playing fool. सब भगवान का स्वरुप हैं लेकिन मूर्खों की नाई खेल रहे हैं । मैं दुखी हूँ, मैं ये करूं, वो करूं । वाईन पियेगा, विस्की पियेगा, सिगरेट पियेगा तो मजा आएगा । डॉलर मिलेगा तो मजा आएगा । मजा इसमें नहीं है, मजा तो soul (आत्मा) में, अपने आप में है । सब भगवद् स्वरूप हैं लेकिन खेल रहे हैं पागलों के जैसे । सब सपना हो गया, सब सपने में बदल रहा है, अच्छा बुरा-सब फुरना मात्र है| । सपने को देखने वाला अपना परमात्मा साक्षी है |

योगवशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जहाँ से चित्त जगता है वहीं चित्त को स्थिर करो, तब इंद्रियों का भी आभाव हो जायेगा । इंद्रियों का नायक मन है । जब मन रूपी मतवाले हाथी को वैराग्य और अभ्यास रूपी जंजीर से जकड़कर वश करोगे, तभी तुम्हारी जय होगी और इन्द्रियाँ रोकी जा सकेंगी । जैसे राजा को वश करने से सारी सेना भी वश हो जाती है, वैसे ही मन को स्थिर करने से सब इन्द्रियाँ वश हो जाएँगी । हे रामजी, जिस-जिस ओर मन जावे उस-उस ओर से उसे रोको । जब दृश्य जगत की ओर से मन को रोकोगे तब वृत्ति, संवित ज्ञान की ओर आवेगी । और जब वृत्ति ज्ञान की ओर आये तब तुमको परम उदारता प्राप्त होगी और शुद्ध आत्मसत्ता का ज्ञान होगा ।

बापूजी :  जहाँ-जहाँ मन जाये उसको रोको अपने आत्मा में, ज्ञान में, शांति-आनंद मिलेगा, परम उदार स्वरुप का अनुभव होगा । जो मन में आये ऐसा कर लिया, भोग लिया, खा लिया, तो धीरे-धीरे तमोगुण बढ़ जायेगा, क्रीडक योनि में जायेगा । मन में आया वो भोगा, थोड़ा छोड़ा, तो रजोगुण बढ़ जायेगा, मनुष्य जन्म में भटकेगा | मन में आया लेकिन सात्विक किया और बाकि को रोका सत्वगुण आयेंगे लेकिन मन को भगवान में रोक दिया, आत्मा में, यह साधन सबका बाप है | जैसे राजा वश हो जाता है तो सारी सेना वश हो जाती है, ऐसे ही मन वश हो गया तो इन्द्रियाँ यह-वह-सब..वश हो जाता है | रोज अभ्यास करना चाहिए ध्यान करने का श्वासों-श्वास के द्वारा, जप के द्वारा, एक-टक देखने के द्वारा,अभ्यास करें | २ घंटे गृहस्थी को रोज ध्यान करना चाहिये और जो सब कुछ छोड़ कर साधू बन गये हैं, उनको कम से कम ४ घंटे रोज ध्यान में गुजारने चाहिए | इधर से उधर – इधर से उधर, ४ घंटे ध्यान करें, ६ घंटे सोये तो १० घंटे हुए | ८ घंटे सेवा करे कमाए खाये तो १८ घंटे हुए, फिर भी ६ घंटे फालतू हैं और ८ घंटा तत्परता से काम करे तो जो १२ घंटे में नहीं होता उतना ८ घांटों में हो जायेगा |जो समय का दुरूपयोग करता है, समय उसी को खा जाता है|

योगवशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, इन्द्रियाँ और मन रूपी चील पक्षी हैं जब इनको विषय भोग नहीं होते तब उर्ध्व को उड़ते हैं और जब विषय प्राप्त होते हैं तब नीचे को आ गिरते हैं |

बापूजी : जैसे चील, गिद्ध जब कुछ होता नहीं तो आकाश की ओर ऊपर उड़ते हैं लेकिन जब देखते हैं मरा हुआ साँप , मरा हुआ ढोर, विषय तो धड़ाक नीचे…ऐसे ही मन विषय विकार नहीं तो बैठे हैं ध्यान में तो ऊँचा उठता है और जब संसार का चस्का लगता है तो फिर गिरता है नीचे | एक पंडित ने बिल्ली पाल रखी थी, भागवद की कथा करे और बिल्ली को बिठाये पास में… बिल्ली हो पास में और भागवद की कथा.. भागवद की कथा प्रारम्भ करे तो बिल्ली के माथे पर दीया हो उसको जला दे और बिल्ली को हाथ घुमावे की भागवद कथा सुनने वाली मुख्य यजमान महारानी बिल्ली बैठिये…बैठे रहेगी ना ! बिल्ली पाली हुई थी पूँछ हिलाती थी | पंडित जी कथा करते ..कथा करते ..जब तक कथा चलती रहती और बिल्ली हिले डुले नहीं और दीया उसके सिर पर ..एक आध घंटे कथा हो जाती | पब्लिक बहुत बढ़ने लगी, पंडित की कथा तो कथा लेकिन वो पंडित की बिल्ली देखने आते थे कि बिल्ली कथा सुनती है और उसके सिर पर दीया-दीपक रखते और बिल्ली हिलती नही है… कैसा यह ? तो कथा में भीड़ होने लगी तो किसी ने जाकर किसी गुरु, संत को बताया की पंडित के पास तो बहुत लोग आते हैं |आकर्षित करने के लिये एक युक्ति है उसने बिल्ली पाला है और उसके सिर पर दीया रखते हैं और जब तक कथा चलती है बिल्ली ध्यान से कथा सुनती है | गुरु ने कहा अब तुम ऐसा करो कि तुम कथा सुनने चले जाओ और एक चूहा ले जाओ पिंजरे में और कथा सुनने जाओ तब तक तो पिंजरा ढक कर ले जाना | जब बैठो बिल्ली के सामने और थोड़ी-सी कथा शुरू हो तो धीरे-से जिसमें चूहा छुपा है वह पिंजरे का …धीरे से पिंजरे का कवर , वस्त्र हटा तो बिल्ली को चूहा दिखेगा और फिर क्या होता है दीये का और पंडित की कथा का मेरे को बताना | भगत ने ऐसा किया, वह ले गया ढक के कोई सामान है ऐसा ..बराबर बिल्ली के सामने बैठा और पंडित ने अपना श्लोक शुरू किया कथा “अथ श्रीमद् भागवतं चतुर्दश अध्याय आरम्भ, द्वितीया स्कंध चतुर्दश अध्याय, अच्युतम वासुदेवाय”…. पंडित ने कथा शुरू की तो भगत ने पिजरे पर से पर्दा हटाया और पर्दा हटाते ही बिल्ली कूदी और बस !!! ..ऐसे ही हमारे बुद्धि और मन जब तक विषय-विकार नहीं तब तक भले सीधे-सज्जन लगते हैं और जो विषय-विकार, यह-वह आये तो फिर सब भूल जाते हैं क्योंकि निर्विकार भगवान के स्वरुप का अभ्यास नहीं है और सच्चे सुख के तरफ तत्परता नही है | वशिष्ठ जी गुरु हैं राम जैसा सतशिष्य हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण :  वशिष्ठ जी बोले हे राम जी, अपने पुरुषार्थ का आश्रय करो नहीं तो सर्प, कीट आदि की नीच योनियों को प्राप्त होगे |

बापूजी : वशिष्ठ जी गुरु हैं, राम जैसा शिष्य है फिर भी सावधान करते हैं पुरुषार्थ का आश्रय करो नहीं तो सर्प,कीट, पतंग नीच योनियों को प्राप्त होगे |

योग वशिष्ठ महारामायण : जो अल्प भी बुद्धि सत्य मार्ग की ओर होती है, तो बड़े-बड़े संकटों को दूर कर देती है जैसे छोटी नाव भी नदी से उतार देती है | संसार रूपी समुद्र के तरने को अपना बुद्धि रूपी जहाज़ है और तप, तीर्थ आदि शुभ आचार से जहाज़ चलता है | हे राम जी जो बोध से रहित, चल ऐश्वर्य से भी बड़ा है उसको तुच्छ अज्ञान भी नष्ट कर डालता है |

बापूजी जैसे नाव भी बड़े सागर को पार करा देती है ऐसे बल करके अपना, संसार से तर जाना चाहिये | छोटी-सी युक्ति का आश्रय ले कर भी विवेक वैराग्य बढ़ाना चाहिये सावधानी-साधना बढ़ानी चाहिये | ऐसा अपना बल पूर्वक कार्य कर के कल्याण करना चाहिये |

योग वशिष्ठ महारामायण कर्मो के फल की इच्छा भी ना हो और कर्मो से नीरसता भी ना हो |

बापूजी हाँ, क्या सार बात है !! कर्म के फल की इच्छा भी ना हो और नीरसता भी ना हो | बेदरकर, पलायन वादी से तो स्वार्थी अच्छा और स्वार्थी से निःस्वार्थी अच्छा | बेदरकर, पलायन वादी से तो तत्पर स्वार्थी अच्छा और स्वार्थी से नि:स्वार्थी अच्छा |

योग वशिष्ठ महारामायण वशिष्ठ जी बोले हे रामजी, जो पुरुष अद्वैत निष्ठ हैं उनके हृदय से त्याग और ग्रहण की भ्रांति चली जाती है | वे उस भ्रम से रहित हो कर प्रारब्ध के अनुसार चेष्ठा करते हैं जो कुछ स्वाभाविक क्रिया उनकी होती है | जब तुझको विवेक से आत्म-तत्व का प्रकाश होगा तब तू संसार की तुच्छ वृत्तियों में ना डूबेगा जैसे गोपद के जल में हाथी नहीं डूबता तैसे ही तू राग-द्वेष में ना डूबेगा जिसको देह में ..

बापूजी : गाय के खुर जितना गड्डा हो तो हाथी क्या डूबेगा उसमें ?! ऐसे ही जिसका विवेक हो गया उसके लिये संसार गोपद की नाई हो जाता है फिर वह संसार का लेते-देते खाते-पीते व्यवहार करते हुये भी उसमें सत्य बुद्धि नहीं रहेगा, आसक्ति नहीं होगी, ममता नहीं रहेगी |

योग वशिष्ठ महारामायण : परम आकाश ही जिसका हृदय मात्र विवेक है और बुद्धि उसकी सखी है जिसके निकट विवेक और बुद्धि हैं वे परम व्यव्हार करते हुये भी संकट को कभी भी प्राप्त नहीं होते |

बापूजी जिनके पास बुद्धि सात्विक है और विवेक है | कोई भी काम करो तो धैर्य से, सात्विक बुद्धि से, रात को,देर रात को निर्णय करना, देर रात को भोजन करना, देर रात को कोई निर्णय करना, कल के लिये ठीक नहीं है | सुबह सात्विक बुद्धि हो तब निर्णय करें | जो भी काम करें खूब निर्णय विचार कर के करें|

योग वशिष्ठ महारामायण तत्ववेत्ताओं के संग से जैसा अमृत मिलता है वैसा शीर समुद्र से भी नहीं मिलता, वह जो देवताओं की सेवा से भी नहीं मिलता | जिसका आदि अंत नहीं और जो अनंत और अमृत सार है, ऐसा अमृत तत्ववेत्ताओं के संग से मिलता है |

बापूजी : जिसका आदि नहीं, अंत नहीं और अमृत का सार है ऐसा सुख स्वरुप परमात्मा का ज्ञान और शांति माधुर्य और मस्ती | तत्ववेत्ता, परमात्मा प्राप्त महापुरुषों से जो सुख मिलता है, शांति मिलती है, ज्ञान मिलता है और आदि-अंत जिसका नहीं है उस अनंत का प्रकाश जो मिलता है वैसा शीर सागर के अमृत के पास नहीं है स्वर्ग की अप्सराओं के पास नही है, यक्ष, गंधर्व और किन्नरों के पास नहीं है | वशिष्ठ जी कहते हैं हे रामजी, मैंने चौदह लोकों में विचरण किया…कहीं सार नहीं है…गंधर्व गान करते फिरते है लेकिन जिससे गाया जाता है उस परमात्मा सुख का उनको पता नहीं है | उन गंधर्वों को धिक्कार है |यक्ष यक्षिणियों के पीछे याक्षिणियाँ यक्षों से सुख ढूंढते फिरते हैं लेकिन जो सुख-स्वरुप है उसका उनको पता नहीं है इसलिए उनको मेरा धिक्कार है |

योग वशिष्ठ महारामायण : वह मुक्त और उत्तम उदार चित्त पुरुष, मुक्ति रूप परमेश्वर हो जाता है | हे रामजी! मैंने चिरकाल पर्यंत अनेक शास्त्र विचारे हैं और उत्तम से उत्तम पुरुषों से चर्चा भी की है परंतु परस्पर यही निश्चय किया है कि भली प्रकार से वासनाओं का त्याग करें, इससे उत्तम पद पाने योग्य कोई नहीं | जो कुछ देखने योग्य है वह मैंने सब देखा है और दसों दिशाओं में मैं भ्रमा हूँ | कई जन यथार्थ दर्शी दृष्टि आये हैं और कितने हेय-उपादेय संयुक्त भी देखे हैं पर सभी यही यत्न करते हैं इससे भिन्न कुछ नहीं करते |सारे ब्रह्माण्ड का राज्य करें अथवा अग्नि और जल में प्रवेश करे पर ऐसे ऐश्वर्य से संपन्न होकर भी आत्मलाभ के बिना शांति प्राप्त नहीं होती |

बापूजी खाली गुजरात का नहीं, खाली भारत का नहीं, पूरी पृथ्वी का नहीं, पूरे ब्रह्माण्ड का राज्य मिल जाये |पूरे ब्रह्माण्ड का, चौदह लोकों का और आत्म शांति नहीं मिली तो भी ठनठन पाल हैं और आत्म-शांति मिली तो ब्रह्माण्ड के राजा का भी बाप का बाप |

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठ जी बोले हे रामजी! बड़े बुद्धिमान और शांत भी वही हैं जिन्होंने अपने इन्द्रीय रूपी शत्रु जीते हैं और वही सुरमे हैं | उनको जरा, जन्म और मृत्यु का अभाव है वही पुरुष उपासना करने योग्य है |

बापूजी वैसे ही पुरुष उपासना करने योग्य है | भगवान का तो काल्पनिक चित्र किसी ने बनाया है लेकिन भगवान जहाँ अपनी महिमा में प्रकट हुये वे पुरुष तो साक्षात् हमारे पास हैं वे उपासना करने योग्य हैं,पूजने योग्य है | कट्ठ्वली उपनिषद में आता है जिसको इस लोक का यश और सुख सुविधा चाहिये वो भी ज्ञानवान का पूजन करे और परलोक में किसी ऊँचे लोक में जाना है तभी भी

यं यं लोकं मनसा संविभाति| विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् ||” वो ज्ञानी अपने शिष्य के लिये भक्त के लिये मन से जिस-जिस लोक की भावना संकल्प कर देता हैं उसका शिष्य उसी उसी लोक में जायेगा |तं तं लोकं जयते तांश्च कामां| स्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकामः।।अपनी कामना पूर्ण करने के लिये आत्मज्ञानी पुरुष का पूजन करें, अर्चन करें, उपासना करें | लेकिन हम तो कहते हैं कि आत्मज्ञानी पुरुष का पूजन अर्चन करो ये तो ठीक लेकिन आप ही आत्मज्ञानी हो जाओ मेरा उधर ज्यादा ध्यान है… घुमा-फिरा कर हमारा प्रयत्न उधर ही रहता है |