Category Archives: Q & A with Bapuji

Spiritual Question – Answer Session

spritiualQइस सत्संग के मुख्यअंश – 

• संसार नश्वर है, मिथ्था है , यह सत्संग में सुनने मिलता है, फिर भी संसार में मन क्यों भागता है ?
• दिन भर हम सुमिरन करते है फिर भी मन क्यों भटकता है ?
• जब प्राणायम क्रिया /ध्यान क्रिया होती है तब तिलक करने के जगह में बहुत तेज होती है इसका क्या कारण ?
• बार-बार सत्संग और भगवान नाम की महिमा सुनने पर भी ईश्वर प्राप्ति की इच्छा क्यों नहीं जगती ?
• मैं गुरुतत्त्व से एकाकार होना चाहती हूँ क्या करें ?
• भगवान तो सबके अंदर होते है फिर भी कोई अच्छा और कोई बुरा क्यों बनता है ?
• हमसे ऐसा क्या करना चाहिये जिससे हमारी भक्ति बढ़ें ?
• मैंने हिमालय पे साधना की है फिर भी पूरा साक्षात्कार क्यों नहीं हुआ ? 
• कृष्णा भगवान ने कहाँ है की मैं जल, अग्नि, वायु में प्रवेश होकर भी प्रवेश नहीं हूँ, इसका मतलब क्या है ?
• कभी-कभी ४- ५ दिन लगातार पूजा करने के बाद मन भगवान या पूजा में नहीं लगता, मेरी साधना कैसे आगे बढ़ेगी ?
• हमें माला करते-करते नींद आती हो तो क्या करें ?
• मुझे गुस्सा बहुत आता है, मैं काया करूँ ?
• हमें पता है की भगवान हमारे है, संसार नश्वर है फिर कभी दुःख होता है तो मन उसकी चिंता में रहेता है, ऐसा क्यूँ ?

Jagat Ka Anubhav Kisko ? {जगत का अनुभव किसको?}

jagat hai hi nahi
प्रश्न : जगत है ही नहीं इसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

पूज्य बापूजी : जगत है ही नहीं इसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ? जगत है ही नहीं ..जैसे स्वप्न दिख रहा है उस समय स्वप्न है ये जगत नहीं है ऐसा नहीं लगता , जब स्वप्ने से उठते हैं तब लगता है कि स्वप्ने का जगत नहीं है , ऐसे ही अपने आत्मदेव में ठीक से जगते हैं तो फिर जगत की सत्यता नहीं दिखती, तो बोले जगत नहीं है जगत नहीं हैं ऐसा बोलने से तो कोई धर्मं चिंता लगा के…

तो उसे समय तो दुःख होगा , लेकिन दुःख होता हैं तो जो जिसको दुःख होता हैं वो भी वास्तव में नहीं हैं सदा नहीं हैं तो जो सदा है उसमे स्थिति कर के समझाने के लिए बोला जाता है कि जगत नहीं है | तो वो एक होती है व्यवहारिक सत्ता दूसरी होती है प्रतिभासिक सत्ता और तीसरी होती है वास्तविक सत्ता जैसे आप हम अभी बैठे हैं ये है व्यवहारिक सत्ता, अब जगत नहीं तो बापूजी क्यों बोलते हो … सत्संग में क्या आ रहे हैं नहीं कैसे है ? तो व्यावहारिक सत्ता में जगत है …. दूसरा प्रतिभासित जैसे स्वप्ने में दिखा तो उस समय तो सच्चा लगा लेकिन आँख खुली तो नहीं और तीसरा है वास्तविक सत्ता इस समय भी वास्तविक सत्ता चैतन्य आत्मा की हैं ! स्वप्ने भी वास्तविक सत्ता चैतन्य आत्मा की हैं और ये दोनों नहीं है फिर भी जो वास्तविक सत्ता है उसमे टिक के बोलो तो जगत है नहीं, न स्वप्ना है न जागृत हैं न गहरी नींद है, तीनो आ आ के चले जाते है फिर भी जो रहता है वो सत्चिदानन्द है, जगत है ही नहीं तो अपनी अपनी नजरिया से वो नहीं है और अपनी अपनी नजरिया से हैं, ठीक है |

मुक्‍ति और आत्‍मसाक्षात्‍कार एक ही है या अलग-अलग है – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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मुक्‍ति और आत्‍मसाक्षात्‍कार एक ही है या अलग-अलग  है – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू
मुक्‍त का मतलब है बंधनों से मुक्‍त होना और दुखों से मुक्‍त होना । दुखों से मुक्‍त…. आत्‍मसाक्षात्‍कार के बिना हुआ नहीं जाता । परमात्‍मा की प्राप्‍ति कहो, मुक्‍ति कहो एक ही बात है । मुक्‍ति भी पांच प्रकार की होती है – यहां से मर गये, स्‍वर्ग में चले गये, इसको स्‍वर्गीय मुक्‍ति कहते है । ठाकुरजी का भजन करके ठाकुरजी के देश में चले गये वो सायुज्‍य मुक्‍ति होती है । ठाकुरजी के नजदीक रहे तो सामीप्‍य मुक्‍ति । और नजदीक हो गये मंत्री की नाईं…….. सायुज्‍य मुक्‍ति, सामीप्‍य मुक्‍ति……. लेकिन वास्‍तविक में पूर्ण मुक्‍ति होती है कि जिसमें ठाकुरजी जिस आत्‍मा में, मैं रूप में जगे है उसमें अपने आप को जानना…. ये जीवनमुक्‍ति होती है …. जीते-जी यहां होती है । दूसरी मुक्‍ति मरने के बाद होती है …. स्‍वर्गीय मुक्‍ति, सालोक्‍य मुक्‍ति, सामीप्‍य मुक्‍ति, सायुज्‍य मुक्‍ति, सारूप्‍य मुक्‍ति । इष्‍ट के लोक में रहना सालोक्‍य मुक्‍ति है । उनका चपरासी अथवा द्वारपाल जितनी नजदीकी लाना सायुज्‍य मुक्‍ति है । सामीप्‍य मुक्‍ति …. उनका खास मंत्री अथवा भाई की बराबरी । जैसे रहते है राजा का भाई ऐसे हो जाना भक्‍ति से सारूप्‍य मुक्‍ति । इन मुक्‍तियों में द्वैत बना रहता है । ये अलग है, मैं अलग हूँ और ये खुश रहें । उनके जैसा सुख-सुविधा, अधिकार भोगना, ये सालोक्‍य, सामीप्‍य मुक्‍तियां है और पूर्ण मुक्‍ति है कि अपनी आत्‍मा की पूर्णता का साक्षात्‍कार करके यहीं……… पूर्ण गुरूकृपा मिली, पूर्ण गुरू के ज्ञान में अनंत ब्रह्माण्‍डव्‍यापी अपने चैतन्‍य स्‍वभाव से एकाकार होना…….. ये जीवनमुक्‍ति है, परममुक्‍ति है । मुक्‍तियों के पांच भेद है – यहां से मरकर स्‍वर्ग में गये, चलो मुक्‍त हो गये । वहां राग-द्वेष भी ज्‍यादा नहीं होता, और कम होता है लेकिन फिर भी इधर से तो बहुत अच्‍छा है । ….तो हो गये मुक्‍त । जैसे कर्जे से मुक्‍त हो गये, झगड़े से मुक्‍त हो गये । तलाक दे दिया, झंझट से मुक्‍त हो गये, ऐसी मुक्‍तियां तो बहुत है लेकिन पूर्ण परमात्‍मा को पाकर, बाहर से सुखी होने क बदले सत में, चित में, आनंद में स्‍थिति हो गई वो है पूर्ण मोक्ष……….. इसको जीवन्‍मुक्‍ति बोलते है, कैवल्‍यमुक्‍ति बोलते है ।

 

भगवान ने जगत क्‍यों बनाया ? – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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भगवान ने जगत क्‍यों बनाया ? – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू 
ये संसार भगवान ने पुजवाने के लिये नहीं बनाया, जैसे नेता वोट बैंक के लिये अपने एरिया में घूमता है ऐसे भगवान सृष्‍टि करके अवतार लेकर वोट बैंक के लिये नहीं आते अथवा वोट बैंक के लिये भगवान ने ये सृष्‍टि नहीं बनाई । भगवान ने आपको गुलाम बनाने के लिये भी सृष्‍टि नहीं बनार्इ । भगवान ने आपको अपने अलौकिक आनंद, माधुर्य, ज्ञान और प्रेमाभक्‍ति के द्वारा अपने से मिलने के लिये सृष्‍टि बनाई । भगवान परम प्रेमास्‍पद है । बिछड़े हुए जीव अपने स्‍वरूप से मिले इसलिये सृष्‍टि है । वो सृष्‍टि में अनुकूलता देकर, योग्‍यता देकर आपको उदार बनाता है कि इस योग्‍यता का आप ‘‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’’ सदुपयोग करो और प्रतिकूलता, विघ्‍न-बाधा देकर आपको सावधान करता है कि संसार तुम्‍हारा घर नहीं है । ये एक पाठशाला है, यहां से आप यात्रा करके मुझ परमेश्‍वर से मिलने आये हो । इसलिये दुख भी भेजता है । दुख सदा नहीं रहता और सुख भी सदा नहीं रहता । धरती का कोई व्‍यक्‍ति सुख को टिकाये रखे, संभव ही नहीं । दुख को टिकाये रखो, संभव नहीं है क्‍योंकि उसकी व्‍यवस्‍था है । सुख भी आकर तुम्‍हे उदार और परोपकारी बनाने का संदेश देता है । आप सुख के भोगी हो जाते हो तो रावण का रास्‍ता है और सुख को ‘’बहुजन हिताय’’ बांटते हो तो रामजी का रास्‍ता है । सुख को अपना भोग बनाते हो तो कंस का रास्‍ता है और सुख को बहुतों के लिये काम में लाते हो तो कृष्‍ण का रास्‍ता है । ऐसे ही दुख आया तो आप दुख के भोगी मत बनो । दुख आया है तो आपको पाठशाला में सिखाता है कि आप लापरवाही से उपर उठो, आप संसारी स्‍वाद से उपर उठें । संसारी स्‍वाद लेकर आपने कुछ ज्‍यादा खाया है तो बीमारी रूपी दुख आता है अथवा वाहवाही में आप लगे तो विघ्‍न और निंदा रूपी दुख आता है लेकिन वाहवाही में नहीं लगे फिर भी महापुरूषों के लिये कई कई उपद्रव पैदा होते है ताकि समाज को सीख मिले कि महापुरूषों के उपर इतने-इतने उपद्रव आते है, अवतारों पर इतने उपद्रव आते है पर वो मस्‍त रहते है, सम रहते है तो हम काहे को डिगें? हम काहे को घबरायें? ये व्‍यवस्‍था है । कृष्‍ण पर लांछन आये, रामजी पर लांछन आये, बुद्ध पर लांछन आये, कबीरजी पर आये, धरती पर ऐसा कोई सुप्रसिद्ध महापुरूष नहीं हुआ जिन पर लांछन की बौछार न पड़ी हो ।

Question & Answer with Pujya Bapuji

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Question & Answer with Pujaya Bapuji
१] मंत्र के अर्थ में प्रीति कैसे हो ?
अर्थ प्रेमस्वरुप ही तो है | बार-बार जपे, बार–बार अर्थ में गोते मारे तो प्रीति बढती है |
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२] ध्यान में मन नहीं लगता | कुसंगति  से कैसे बचें ? कामविकार से कैसे बचें ? स्वप्नदोष से कैसे बचें ? पानी पड़ने की बीमारी से कैसे बचें ?
ध्यान-भजन करते तो, मन इधर-उधर जाता है तो चुपचाप बैठते तो मन सुन्न हो जाता है | तो लंबा श्वास लिया और हरि ॐ…. ॐ….. ॐ… ॐ…. ॐ….. किया तो ये मनोराज मिटाने का, ध्यान लगाने का पद्धति है, ये मनोराज भगा देगा | 
कुसंगति  से कैसे बचें ? कामविकार से कैसे बचें ? स्वप्नदोष से कैसे बचें ? पानी पड़ने की बीमारी से कैसे बचें
नाक से श्वास निकाल दी…. उतनी देर योनिमुद्रा को सिकोड़ लिया और हमारी जीवनशक्ति ऊपर को उठ रही है ऐसी भावना की | फिर श्वास लिया.. फिर जब श्वास निकाल लिया तो योनि सिकोड़ लिया ..ऐसे १०-१५ बार किया और फिर उर्ध्व सर्वांगासन आसन करके योनि को १०-१५-२० धक्के मारे वीर्य को ऊपर आने को | तो पानी पड़ने की बीमारी, कामविकार का आकर्षण कम हो जायेगा और ब्रम्हचर्य की ओर” (दिव्य प्रेरणा प्रकाश) पुस्तक पढना और ब्रह्मचर्य की बुटीलेना | उससे वीर्य मजबूत हो जायेगा और कुसंगति से जान छूटेगी |
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३] अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिये, पर कैसे पता चले कि, ये आत्मा की आवाज है या मन की आवाज है ?
आत्मा की आवाज होगी तो निर्वासनिक होगी और मन की आवाज होगी तो सवासनिक होगी | अनुष्ठान किया और लड़का लौट के आया, “गुरूजी ! गुरूजी !! अंतरात्मा की आवाज है कि बेटा शादी कर ले |” गुरूजी ने कहा कि ये अंतरात्मा की आवाज नहीं है ये तेरे काम-विकार की, वासना की आवाज है| मन को बोलती है कि भगवान ने बोला है | अगर किसी के प्रति बोलते कि ये ऐसा ही होगा तो क्या हमारे मन में तटस्थता है कि द्वेष है ? अगर द्वेष है तो फिर उसका घाटा होने वाला हो चाहे न होने वाला, हमको लगेगा कि इसको ऐसा होगा | चुनाव के दिनों में जिन नेतोओं के प्रति नफरत थी तो बोले वो हार जाएगा और देवयोग से वो हारा तो बोले देखा, मैं बोल रहा था ना… हार गया | लेकिन ऐसे कई है जिनके लिए हार जाय.. वो जीते है और जिनके लिए जीतेंगे अंतरात्मा के आवाज सुनकर… सट्टा भी लगाये वो हार गये | तो ये अंतरात्मा की आवाज नहीं है अपनी मन की मलिनता, वासना, बेवकूफी होती है |तो अंतरात्मा की आवाज क्या होती है ? तो ज्यों-ज्यों आप निष्पक्ष हो जाओगे , अंत:करण शांत, स्वस्थ हो जायेगा त्यों-त्यों आत्मा की आवाज होगी | 
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४] जब साधन-भजन के लिए बैठते है तो मन शांत हो जाता है, न प्रार्थना, न बातें और ना ही मन में कोई भाव उठता है तो क्या करें ? 
कुछ करने के झंझट से बाहर हो जाओ, जो प्रभु तेरी मर्जी | बातें करके भी क्या करोगे | बातें करते-कराते जो अच्छी बातें हो तो भगवान में शांत हो जाओ, संकल्प रहित हो जाओ | वो तो आ गई तो फिर बातें करने के झंझट को क्यों बुलाते हो | मेरे से मानसिक बातें करोगे तो इतना खुश नहीं होऊगा जितना उस भगवान में शांत हो जाओ तो मैं खुश हो जाऊँगा | शराबी दूसरे शराबी को देख के खुश हो जाता है ऐसे ही भगवान में स्थित होने लगोगे तो मुझे प्रसन्नता होगी | न बाहर से मिलने की कोशिश करो, न बातें करने की कोशिश करों.. जो हो रहा है उसी में आगे बढ़ो | ईश्वर की ओर पुस्तक पढ़ते-पढ़ते, नारायण स्तुति पुस्तक पढ़ते-पढ़ते भगवान के स्वभाव में डूबते जाओ |
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५] ध्यान के अवस्था में कैसे पहुँचे ? अगर घर की परिस्थिति साधना के अनुकूल न हो तो क्या करें ?
घर की परिस्थिति ध्यान-भजन के अनुकूल नहीं है इसलिए ध्यान न करें ऐसी बात नहीं है | परिस्थितियों  को अनुकूल बनाकर ध्यान नहीं होता | हर परिस्थिति में ध्यान का माहौल अथवा सावधानी का माहौल, साक्षीभाव का माहौल, अपने चित्त में और वातावरण में बनाना चाहिये और कभी-कभी अलग से एकांत में, साधना की जगह पर, या आश्रम में एकांत जैसे मौन-मंदिर कर लिया.. ८ – ८ दिन के दो-चार, तो ध्यान का  रस आने से घर की परिस्थितियों और वातावरण बनाने में भी बल मिल जायेगा |
हम घर में थे तो रजोगुण, तमोगुण होता हैं  ध्यान-भजन में बरकत आती नहीं ये तो सीधी बात है तो किसी संत महापुरुष ने मौन-मंदिर बनाया था उसमे हम सात दिन रहे जिससे बड़ा बल मिला | अपने कई आश्रमों में मौन-मंदिर हैं और बहुत सारे आश्रम हमने इसी उद्देश्य से बनाये हैं कि जो ध्यान-भजन करना चाहे १५ दिन, महिना, २ महिना या ४ महिना अपने एकांत के आश्रम में रहकर कर सकते हैं, फिर घर जा सकते हैं |घर की परिस्थिति ध्यान-भजन के अनुकूल नहीं है इसलिए ध्यान न करें ऐसी बात नहीं है | परिस्थितियों  को अनुकूल बनाकर ध्यान नहीं होता | हर परिस्थिति में ध्यान का माहौल अथवा सावधानी का माहौल, साक्षीभाव का माहौल, अपने चित्त में और वातावरण में बनाना चाहिये और कभी-कभी अलग से एकांत में, साधना की जगह पर, या आश्रम में एकांत जैसे मौन-मंदिर कर लिया.. ८ – ८ दिन के दो-चार, तो ध्यान का  रस आने से घर की परिस्थितियों और वातावरण बनाने में भी बल मिल जायेगा | 
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६] यदि  कोई  दीक्षित  साधक ,आवेश  में  आकर ,किसी  कारण  के  बिना,  दूसरे  साधक  को  श्राप दे  तो वो  फलित  होगा ?  
श्राप  देना, देने  वाले  के  लिए  खतरे  से  खाली  नहीं  है । श्राप  देना अपनी  तपस्या  नाश  करना  है  । आवेश  में  जो  श्राप  दे  देते  हैं उनके  श्राप  में  दम  भी  नहीं  होता  ।   जितना  दमदार  हो और  हमने  गलती  की  है, वो  श्राप  दे  चाहे  न  दे,  थोड़ा  सा  उसके  हृदय  में  झटका  भी  लग  गया,  हमारे  नाराजी का,  तो   हमको  हानि  हो  जाती  है और  थोड़ा  सा  हमारे   लिए  उनके  हृदय  में  सद्‍भाव भी  आ  गया, तो   हमको  बड़ा  फायदा  मिलता  है ।
केवल  हम  उनकी  दृष्टि  के  सामने  आयें और  उनके  हृदय  में  सद्‍भाव आया  तो  हम  को  बहुत  कुछ  मिल  जाता  है ।  महापुरुषों  के  हृदय  में  तो  सद्‍भाव स्वाभाविक  होता  रहता  है  लेकिन  श्राप  तो  उनको  कभी-कभार  कहीं  आता  होगा अथवा  दुर्वासा  अवतार  कोई  श्राप  देकर  भी  लोगो  को  मोड़ने  की  कोई  लीला  हुई  तो  अलग  बात  है  ।
जरा-जरा बात  में  गुस्सा  होकर  जो  श्राप  देते  है  और  दम  मारते  है तो  आप  उस  समय  थोड़े  शांत  और  निर्भीक  रहो ।
नारायण नारायण !
७] श्री आसारामायण के  १०८ पाठ जल्दी-जल्दी करना ठीक है ,या   ५ – १०  पाठ अच्छे से करना उचित होगा ?
आसारामायण का पाठ शांति से भी कर सकते है और विश्रांति पाए तो भी लाभ देते है । लेकिन ,”एक सौ आठ जो पाठ करेंगे ,उनके सारे काज सरेंगे…” कोई कारज (कार्य) की सिद्धि करनी हो ,और यह विश्वास पक्का हो तो वह (जल्दी पाठ करना ) भी ठीक है और वह (धीरे पाठ करना ) भी ठीक है ।
८] काम विकार जब जब आता है तो अच्छे तरीके से गिरा देता है | इससे बचने का उपाय बताये |
सर्वांग आसन करो और मूलबंध करो सर्वांग आसन करके ताकि वो जो वीर्य बनता है वो ऊपर आये मस्तक में शरीर में और मजबूती करे |
प्राणायाम कस के करो सवा मिनट अंदर श्वास रोके और चालीस सेकण्ड बाहर श्वास रोके. और आवले के चूर्ण में २० प्रतिशत हल्दी मिलाकर ३-३ ग्राम सेवन करो .युवाधन पुस्तक पढ़ा करो |
शादी नहीं किया है तो पहले ईश्वर प्राप्ति करके फिर संसार में जाओ अथवा तो खाली होकर मरो फिर जन्मो तुम्हारी मर्जी की बात है |
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९] सेवा और साधना का संगम कैसे हो ? सेवा किसको बोलते हैं? 
जिसमें अपने स्वार्थ का, वाहवाही का उद्देश्य न हो, उसका नाम है सेवा और वो सेवा कर्म योग है | कर्म योग भी एक साधना है | जप करते हैं तो भक्ति योग हो गया, ज्ञान सुनते, विचारते हैं तो ज्ञान योग हो गया | लेकिन अपने हित का ,अपने स्वार्थ का छोड़कर दूसरों के हित में और वो भी भगवान और समाज को जोड़ने वाली सेवा | संत और समाज को जोड़ने वाली सेवा तो परम सेवा है | तो उस सेवा से कर्म योग हो जाता है, कर्म योग एक उत्तम साधना है | चाहे झाड़ू लगाती है शबरी भीलन, तो भी उसकी साधना है | हम गुरु के द्वार पर सब्जी खरीद के आते थे, बर्तन मांजते , चिट्ठियाँ पढ़ते , चिट्ठियों के उत्तर देते, सत्संग पढ़ते और बापूजी उस पर व्याख्या करते थें| तो पटावाला से लेकर खास अंगद सेक्रेटरी का काम हम करते थे | हमारी सभी साधना हो गयी वो  |ऐसा नहीं कि हम अलग से माला घुमाने को ही बैठ जाते थे | माला घुमाने का नियम कर लिया | सारा दिन तो माला नहीं घुमती, सारा दिन साधना नहीं होती, तो कर्म योग भी साधना है, उपासना योग भी साधना है , ज्ञान योग भी साधना है , ये समझ लेना चाहिए | फिर भी १००० बार तो भगवान का नाम लेना ही लेना चाहिए |
कम से कम १००० बार भगवान का नाम अर्थ सहित जपने से अनर्थ से रक्षा होती है, और भगवान का नाम अर्थ सहित जपने के बाद उसमें थोड़ा  शांत हो जायें| फिर अपनी जो पुस्तके हैं, “नारायण स्तुति” है, “भगवन्नाम जप महिमा” है, “युवाधन” है अथवा “निर्भय नाद” है ये जो भी “पंचामृत” हैं उसे पढें, उसी विचार में थोड़े खो जायें | तो इस प्रकार का इरादा होने से सब ठीक होने लगता है | उद्देश्य ऊँचा हो जाये बस  | ईश्वर प्राप्ति का उद्देश्य  होने से बेईमानी भी छूट जाएगी| कर्म में से पलायनवादिता भी छूट जाएगी, लापरवाही भी छूट जाएगी | राम काज बिन कहाँ विश्रामा | मैनाक पर्वत खड़ा हो जाता है बीच में कि  हनुमानजी आराम कर लो, लम्बा सफर करके आये हो, बोले नहीं-नहीं, भगवान के कार्य के बिना विश्राम कहाँ ? तो उद्देश्य भगवान के कार्य का है तो फिर सेवा में भी ईमानदारी होगी और साधना भी, और जिनको साधना में रूचि है वो सेवा ईमानदारी से करते हैं | जो ईमानदारी से सेवा करते हैं उनका चिन्तन साधनामय हो जाता है | इसलिए सेवा और साधना को अलग नहीं कर सकते आप | दायाँ पैर अलग से निकाल कर बाएँ पैर से नहीं जा सकते आप, बायाँ पैर निकाल कर दाएँ से नहीं जा सकते आप | जैसे दोनों पैर से हम चल सकते हैं ठीक से, ऐसे ही सेवा और साधना |
 जिसके जीवन में साधना है, उसके जीवन में सेवा का सद्गुण आ ही जाता है और जो सेवा तत्परता से करता है तो उसको साधना का रस सेवा से भी मिलेगा और साधना में भी मन लग ही जाएगा |
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१०]  गृहस्थ जीवन में कई बार साधना से विक्षेप होता है | इससे कैसे बचें ?
गृहस्थ जीवन में साधना से विक्षेप होता है तो गृहस्थ छोड़कर भागो | तो जहाँ भागोगे वहाँ भी विक्षेप होगा ,विक्षेप से भागो मत | अपने मन की हो तो खुश मत हो और अपने मन के विपरीत हो तो विक्षिप्त मत हो | अपने मन के नही हुई तो चलो हम चाहते हैं ऐसी नही हुई तो कोई सत्ता है, जो उसके चाह का हुआ है, तो भगवान ने अपना चाहा किया वाह-वाह | अपने मन की होती है तो हम फसते हैं आसक्ति में , अपने मन की नही हुई तो हमे मुक्ति का मजा आएगा, क्या फर्क पड़ता है ? तो विक्षेप कहाँ रहेगा ? विक्षेप उन्हीं बेवकूफ लोगों को होता है, जो अपने मन की ठानते हैं और नही होती है तो परेशानी पैदा करते हैं |
प्रकृति के, ईश्वर के अथवा नियम के आड़े खड़े होते हैं वे लोग परेशान होते हैं | मैं तो बड़ा परेशान हूँ , मैं तो बड़ा परेशान हूँ, मैं तो बड़ा परेशान हूँ | अरे संसार के नियम हैं, सब एक व्यक्ति की चाही नही होगी, अपने मन की चाही सबकी नही होती और थोड़ी-बहुत किसी की होती है | हम जो चाहते सब होता नही, जो होता है वो टिकता नहीं , जो होता है वो भाता नही, और जो भाता है वो टिकता नही | ये कथा तो हमने बार-बार कही है |
अपने मन की, किसी की चाहे रामजी हो, चाहे ईसामसीह हो, चाहे बड़ा अवतारी हो, अपने मन की सब नही होती | अगर सब किसी एक व्यक्ति या एक अवतार के मन की हो तो प्रकृति में उथल-पुथल हो जाये , व्यवस्था भंग हो जाये | वो तो जो होता है, आदि नियम है, उसी अनुसार होगा | हम जो चाहते वो सब होता नही, जो होता है वो सब भाता नही, और जो भाता है वो टिकता नही | इसी में नया रस है, आनंद है और उन्नति है |
भाया, मेरी पत्नी सदा रहे, मेरा पति सदा रहे, मेरा बेटा सदा रहे | तो टिकेंगे क्या ? अगर टिके तो संसार नर्क हो जाये | ये अच्छा है मरते हैं तो नये आते हैं, जरा फुल खिलते रहते हैं | मेरी दुकान मिटे नही, मेरा ये मिटे नही, वो मिटे नही, ये मिटे नही | कौन चाहेगा अपना कल्पना का संसार हट जाये, मिट जाये | लेकिन वो मिटता है, हटता है, तो नया आता है, अच्छा है न | तो विक्षेप, विक्षेप से भागो नही, विक्षेप न हो ऐसे ज्ञान में रहो | मन में विक्षेप आता है, लेकिन जैसे आग लगती है जंगल में तो आप सरोवर में खड़े तो जाते हैं तो आग से बच जाते हैं | ऐसे ही जब मन में विक्षेप आये तो ज्ञान के तालाब में आ जाओ |
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 ११] पूज्य गुरुदेव, संसार सत्य क्यों भासता है ?संसार मिथ्या है, यह बार बार सत्संग में सुनने को मिलता है, मगर यह सत्य क्यों भासता है ?
संसार नश्वर है, मिथ्या है, धोखा है, यह बार बार सुनते हैं फिर भी संसार में मन क्यों भागता है ? उधर के भागने की आदत पुरानी है और सुना है उसमें ज़रा दृढ़ता कम है इसीलिये बार बार भागता है, भागे तो भागे लेकिन तुम जागे रहो , यह मन भाग रहा है अब मैं भागु या जागु, मैं भगवान का हूँ, हे भगवान मन भाग रहा है अब इसके पीछे मैं क्यों भागु, मैं तो तेरा हूँ, ऐसे करते करते भगवान के भाव में आ जाओ, तो भागने से बचाव हो जायेगा, जैसे घर में कोई कुत्ता बिल्ली आ जाए तो आप दूध घी दही की रक्षा कर लेते हो जोर से आवाज लगाकर , ठीक ऐसे ही मन की रक्षा कर लो|
हे हरि, हे गोविन्द, हे प्रभु, आ गये चोर, संसार में भागने वाली वासना आ गयी महाराज, ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ प्रभुजी, प्यारेजी, गुरूजी ॐ, हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ हा हा हा तो मन को भगवान में लगा दो और क्या, तुलसीदास जी ने कहा प्रभु यह मेरा हृदय नहीं है यह तो आपका घर है लेकिन इसमें चोर घुस गए हैं कभी काम, कभी क्रोध, कभी लोभ , कभी मोह, ऐसे कई चोर घुस गए हैं आप जरा ख्याल करो|
लोग मुझे साधु बोलते हैं लेकिन मैं तो कभी काम में ,कभी क्रोध में ,कभी लोभ-मोह में फिसलता हूँ| लोग बोलेंगे भगवान का भक्त होकर ऐसा करता है मेरी ज़िन्दगी का भी सवाल है तो आपकी इज्ज़त का भी तो सवाल है |
मम हृदय भवन प्रभु तोरा, ताहि बसे आई बहु चोरा, इसमें बहुत चोर घुस गए हैं , मैं एकल अमित भट मारा कोई सुनत नहीं मोर पुकारा, रघुनायक बेगी करो सम्हारा, जल्दी सम्भाल लो, यह आपके ह्रदय को आप ही सम्भालो नहीं तो विकार इसे नोच लेंगे | महाराज महाराज हरि हरि सुबह शाम कमरा बंद कर के भगवान को पुकारो, रोओ, नाचों , हँसो , लम्बे पड़ जाओ, अंदर से बल मिलेगा, भगवान संभाल लेंगे |
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