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सोऽहं से आगे की साधना – संत आसाराम बापूजी

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लालजी महाराज की कथा, गरीब बाई के घर भोजन, कंतान पर बैठे – बाजरी की रोटी खाई – नवधा भक्ति रामजी ने शबरी बाई को बताई – सोऽहं की साधना – शिवोहं की साधना – अमलानंद जी – सोऽहं से भी आगे की साधना – सिर्फ सतशिष्यों के लिए – आसाराम बापूजी का जन्म अम्माजी ने रोक रखा, जानिए क्यों? – जानिए आसुमल से कैसे हुए साईं आसाराम – डीसा की साधना – लीलाशाह प्रभुजी ने पक्का बना दिया – भीम और माया – मया और श्री कृष्ण – आप भी पाइये – पूर्ण गुरु कृपा |

भगवान का अनुभव कैसे हो ? – पूज्य बापूजी की कल्याणकारी अमृतवाणी

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भगवान का अनुभव कैसे हो ?

पूज्य बापूजी की कल्याणकारी अमृतवाणी

परमात्मा कैसा है ? आत्मा का स्वरूप क्या है ? कोई कहता है कि भगवान तो मोरमुकुटधारी हैं । कोई कहता है कि भगवान तो मर्यादापुरुषोत्तम हैं । कोई कहता है कि भगवान सर्वगुणसंपन्न हैं । कोई कहता है कि भगवान सर्वशक्तिमान् हैं । कोई कहता है कि भगवान सर्वत्र हैं । कोई कहता है कि वे वैकुण्ठ, कैलास आदि में हैं । कोई कहता है कि भगवान हमारे हृदय में बैठे हैं । कोई कहता है कि कण-कण में भगवान हैं । कोई कहता है कि नहीं… यह सब माया का पसारा है । भगवान तो निर्गुण- निराकार हैं ।

कोई कहता है : ‘‘नहीं… निर्गुण-निराकार तुम्हारी दृष्टि में होगा । हम तो साकार भगवान को पूजते हैं । मुरलीमनोहर, मोरमुकुट एवं पीतांबरधारी जो हैं, वे ही हमारे भगवान हैं । उनको हम सुबह बालभोग, दोपहर को राजभोग एवं शाम को भी भोग लगाकर ही खाते हैं । हमारे भगवान के दर्शन करने हों तो चलो, हम तुम्हें करवाते हैं ।’’
पूछो : ‘‘कहाँ हैं भगवान ?’’
कहेंगे : ‘‘चलो हमारे साथ ।’’
ले जायेंगे पूजा के कमरे में । हटायेंगे पर्दा और कहेंगे : ‘‘ये हैं हमारे भगवान ।’’
इस प्रकार कोई कहता है कि भगवान स्थान-विशेष में हैं तो कोई कहता है वे सर्वत्र हैं । कोई कहता है वे सर्वगुणसंपन्न हैं तो कोई कहता है गुणातीत हैं । कोई कहता है वे साकार हैं तो कोई कहता है निराकार हैं । अब हम भगवान श्रीकृष्ण के पास चलते हैं और देखते हैं कि वे क्या कहते हैं । भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं :

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोतिश्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥

‘कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही (इसके तत्त्व का) आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई (अधिकारी पुरुष) ही इस आत्मा को आश्चर्य की तरह सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको (आत्मा को) नहीं जानता ।’ (गीता : 2.29)

कोई व्यक्ति भगवान को आश्चर्य की भाँति देखता है कि : ‘‘आहाहा… हमने भगवान की छवि देखी ! आज रात को मुझे ऐसा स्वप्न आया था कि ‘मोरमुकुटधारी भगवान मेरे सामने प्रकट हुए हैं और वे मुझसे पूछ रहे हैं कि, ‘क्या हाल है ?’ …और मैं कह रहा हूँ कि, ‘भगवन् ! आपकी कृपा है ।’ फिर उन्होंने बड़े प्रेम से मेरे सिर पर हाथ फेरा जिससे मैं तो गद्गद् हो गया !’’

‘कोई व्यक्ति भगवान को, आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है…’ इसका एक अर्थ ऐसा भी हो सकता है कि जैसे संसार की दूसरी चीजें देखने, सुनने, पढ़ने और जानने में आती हैं वैसे इस परमात्मा को नहीं जाना जा सकता, क्योंकि अन्य वस्तुएँ तो देह-इन्द्रिय-बुद्धि के द्वारा जानी जाती हैं जबकि परमात्मा को तो स्वयं अपने-आपसे ही जाना जाता है । इसीलिए कहा गया है :

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्…

कोई इसको आश्चर्य की तरह कहता है – आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः… क्योंकि यह परमात्मतत्त्व वाणी का विषय नहीं है । जिससे वाणी प्रस्फुटित होती है, वाणी उसका वर्णन कैसे कर सकती है ? फिर भी भगवान के गुण-कर्म, लीला-स्वभाव आदि का वर्णन करके महापुरुष लोग वाणी से उनकी ओर केवल संकेत ही करते हैं ताकि सुननेवाले का लक्ष्य उधर हो जाये ।

आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति…

कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह सुनता है क्योंकि दूसरा जो कुछ भी सुनने में आता है वह सब इन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि का विषय होता है किन्तु परमात्मा न इन्द्रियों का विषय है, न मन का और न बुद्धि का, वरन् वह तो इन्द्रियादि सहित उनके विषयों को भी प्रकाशित करनेवाला है । इसलिये आत्मा (परमात्मा) संबंधी विलक्षण बात को वह आश्चर्य की तरह सुनता है ।

श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ।
‘सुनकर भी इसको कोई नहीं जानता ।’

इसका तात्पर्य यह कि केवल सुनकर इसको कोई भी नहीं जान सकता वरन् सुनने के बाद जब वह स्वयं उसमें स्थित होगा, तब वह अपने-आपसे ही अपने-आपको जानेगा ।

श्रुतियाँ अनेक हैं, स्मृतियाँ अनेक हैं, पुराण भी अठारह हैं । इनमें जो जैसा पाता है, भगवान को ठीक वैसा-वैसा मानता है । हकीकत में अति विस्मयकारक बात और तथ्य यह है कि पशु से लेकर परम सूक्ष्म जीवाणुओं में भी वही आत्मा सूक्ष्म रूप से स्थित है । कोई उसे छोटा कहता है तो भी ठीक है और कोई उसे बड़ा कहता है तो भी ठीक है… कोई परमात्मा को सगुण-साकार कहता है तो भी ठीक है और कोई निर्गुण-निराकार कहता है तो भी ठीक है । येन-केन-प्रकारेण वह अपनी बुद्धि को भगवान में तो लगा रहा है… इस बात से हमें आनंद है । बस, हमारा यही एकमात्र कर्त्तव्य है कि हम अपनी बुद्धि को परमात्मा में प्रतिष्ठित करें ।

इस युग में अधिकांश लोग विषयपरायण हो चले हैं । विषय-भोगों में वे इतने लिप्त हो गये हैं कि जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । उस परमात्मा के विषय में जानना तो दूर, विचार तक नहीं करते । वह आत्म-परमात्मतत्त्व इतना सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है और महान् से भी महान् है कि हम उसकी कल्पना तक नहीं कर सकते । कीड़ी के पग नेवर बाजे सो वह भी साहिब सुनत हैं… इतना वह सूक्ष्म है । हमारे बोलने-चालने एवं हिलने-डुलने से कितने ही जीवाणु मर जाते हैं । वैज्ञानिक लोगों का कहना है कि जब हम बोलते हैं तब असंख्य जीवाणु मर जाते हैं । इस हाथ को उठाने एवं नीचे लाने में भी न जाने कितने ही सूक्ष्म-से-सूक्ष्म जीवाणु मर जाते होंगे ! क्षण-क्षण में लाखों-करोड़ों जीवाणु उत्पन्न होते एवं मरते रहते हैं । इस शरीर में भी असंख्य बैक्टीरिया उत्पन्न होते एवं मरते रहते हैं जो कि ‘माइक्रोस्कोप’ (सूक्ष्मदर्शी यंत्र) से देखने में आते हैं । इतने वे सूक्ष्म हैं ! जब वे जीवाणु इतने सूक्ष्म हैं तो उनका हृदय कितना सूक्ष्म होगा और उस हृदय में बैठा हुआ भगवान कितना सूक्ष्म होगा, कितना छोटा होगा ! बाल के अग्रभाग के एक लाख हिस्से करो । उसमें से एक हिस्से पर भी हजार बैक्टीरिया (जीवाणु) बैठे होते हैं और उनमें भी भगवान की चैतन्यता मौजूद होती है । आप सोचिये कि भगवान कितने समर्थ और व्यापक हैं ! किन्तु हम अल्पज्ञ हो गये हैं, उच्छृंखल हो गये हैं इसीलिये आत्ममहिमा से दूर हैं ।

एक फकीर ने कहा है : 

अल्ला रे अल्ला ! क्या फ़ैज़ है मेरे साकी का !
अपने हिस्से की भी वे मुझे पिलाए जाते हैं ॥

अर्थात् भगवान कैसे हैं ? शांति के महासागर… आनंद के महास्रोत… वे अपने हिस्से की शांति, आनंद, माधुर्य आदि का हमें अनुभव करवा रहे हैं फिर भी हम उन्हें दूर मानते हैं । हम उन्हें किसी अवस्था-विशेष अथवा स्थान-विशेष में मानते हैं जो हमारी बड़ी भारी भूल है, गलती है । इससे हमारी श्रद्धा और विश्वास डावाँडोल हो जाते हैं, चित्त में संशय हो जाता है और संशयात्मा विनश्यति ।

जहाँ संशय होता है वहाँ विनाश हुआ समझो । भगवान को जब-जब केवल आकाश-पाताल में मानेंगे, किसी मंदिर-मस्जिद-गिरिजाघर-गुरुद्वारे में मानेंगे या किसी अवस्था-विशेष अथवा स्थान-विशेष में मानेंगे, जैसे कि ‘फलानी जगह जायेंगे तब भगवान मिलेंगे… फलानी अवस्था आयेगी तब भगवान मिलेंगे… ऐसा-ऐसा करेंगे तब भगवान मिलेंगे…’ तब-तब भगवान दूर हो जायेंगे । हैं तो भगवान निकट से भी निकट, लेकिन दूर मानने से दूर हो गये और जिसने भगवान को निकट समझा, अपने हृदय में स्थित समझा उसके भीतर भगवान ने शांतिरूप से, आनंदरूप से, और भी पता नहीं किस-किस रूप से, जिसका वर्णन नहीं हो सकता ऐसे अवर्णनीय ढंग से अपने अस्तित्व का एहसास कराया, अनुभूति करायी और अपना प्रकाश फैलाया ।

भगवान को न तो किसी अवस्था-विशेष में मानना है और न ही किसी स्थल-विशेष में मानना है । वह तो सर्वत्र है, सदा है और सबके पास है । वह सबका अपना-आपा होकर बैठा है । 
कोई जिज्ञासु यहाँ प्रश्न उठा सकता है कि : ‘जब भगवान सर्वत्र है, सदा है, हमारे ही भीतर है तो फिर संतों के पास, सद्गुरु के पास जाने की क्या जरूरत ? सत्संग सुनने की क्या जरूरत ?’ 
जैसे, यहाँ आपके व मेरे पास रेडियो एवं टेलिविजन की तरंगें हैं, फिर भी हमें सुनाई-दिखाई नहीं देतीं । क्यों ? क्योंकि इस समय यहाँ पर रेडियो या टेलिविजन नहीं है, रेडियो का एरियल नहीं है, टी.वी. की ‘एन्टीना’ नहीं है । हमारे पास ये साधन-सामग्रियाँ होंगी तभी हम रेडियो भी सुन पायेंगे और टी.वी. भी देख पायेंगे । ठीक इसी प्रकार भगवान सर्वत्र हैं । रेडियो और टी.वी. की तरंगें जितनी व्यापक होती हैं उससे भी कहीं ज्यादा व्यापक भगवान की सत्ता है लेकिन उसकी अनुभूति, उसका लाभ संतों-सद्गुरुओं की कृपा से ही मिलता है क्योंकि संतों के हृदय में ही भगवान ने अपना प्रादुर्भाव कर रखा है ।

संतों ने अपने हृदय में ‘एन्टीना’ लगा रखा है । इस एन्टीना से उन्हें भगवान के दर्शन हुए हैं और उसकी महिमा का वे वर्णन भी कर सकते हैं । इसीलिए हम संतों के सान्निध्य की अपेक्षा रखते हैं । जैसे, इस पृथ्वी के वायुमंडल में रेडियो और टी.वी. की तरंगों के सर्वत्र व्याप्त होने पर भी बिना टी.वी. व रेडियो के उन्हें देखना और सुनना कठिन है, ठीक इसी प्रकार भगवान की सर्वव्यापकता होने के बावजूद भी उनके आनंद, उनकी शांति, उनके माधुर्य का अनुभव बिना सद्गुरु व सत्संग के करना कठिन है । यह अनुभव तो केवल संतों के सान्निध्य एवं सत्संग से ही प्राप्त किया जा सकता है । 

ठीक ही कहा है : 
कर नसीबांवाले सत्संग दो घड़ियाँ…

अहंकारी, मनमुख और दूसरों के यशो-तेज से उद्विग्न निंदकों के लिए नानकजी ने कहा है :

संत कै दूखनि आरजा घटै ।
संत कै दूखनि जम ते नहीं छुटै ॥
संत कै दूखनि सुखु सभु जाइ ।
संत कै दूखनि नरक मांहि पाइ ॥
संत कै दूखनि मति होइ मलीन ।
संत कै दूखनि सोभा ते हीन ॥
संत के हते कउ रखै न कोई ।
संत कै दूखनि थान भ्रसटु होई ॥
संत कृपाल कृपा जे करैं ।
‘नानक’ संत संगि निंदकु भी तरै ॥

निंदकों की बातों में न आनेवाले सत्संगी तो फायदा उठाते हैं । दृढ़निश्चयी पुण्यात्मा शिष्यों-साधकों-भक्तों के लिए मानों नानकजी कह रहे हैं:

साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥
साध संगि मलु सगली खोत ॥
साध कै संगि मिटै अभिमानु ॥
साध कै संगि प्रगटै सु गिआनु ॥
साध कै संगि बुझै प्रभु नेरा ।
साध कै संगि पाए नाम रतनु ।
साध कै संगि एक ऊपरि जतनु ॥
साध की महिमा बरनै कउनु प्रानी ।
नानक ! साध की सोभा प्रभ माहि समानी ॥

Root of All Sufferings [Chup Sadhna] Part -1

chupsadhnaPart -1

Part- 2

Param Pujya Gurudev’s golden words.
“You go anywhere, any good place, you will get some comfort, you will assume that to be happiness, but pain and sufferings will automatically generate..then you will run from there…whether you go to picnic place or to in-law’s house anywhere you go, till you are making mistake from inside… till then you won’t get complete happiness.

Who increases by happening of something is not Truth
Who decreases by happening of something is not Truth.

In the world if you get degrees, jobs, promotions, even rule of the whole earth but if you don’t have love for your inner soul, for your inner God then what is the use of all this?
Whatever you get for the body, which is going to die, is the numb part, son. And whatever goes away is the loss of this numb body. What is yours that has gone?”