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परमात्मप्रेम में पाँच बातें – पूज्य बापूजी की कल्याणकारी अमृतवाणी

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परमात्मप्रेम में पाँच बातें – पूज्य बापूजी की कल्याणकारी अमृतवाणी

परमात्मप्रेम बढ़ाने के लिये जीवन में निम्नलिखित पाँच बातें आ जायें ऐसा यत्न करना चाहिए :
1. भगवच्चरित्र का श्रवण करो । महापुरुषों के जीवन की गाथाएँ सुनो या पढ़ो । इससे भक्ति बढ़ेगी एवं ज्ञान-वैराग्य में मदद मिलेगी ।
2. भगवान की स्तुति-भजन गाओ या सुनो ।
3. अकेले बैठो तब भजन गुनगुनाओ । अन्यथा, मन खाली रहेगा तो उसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य आयेंगे । कहा भी गया है कि : ‘खाली दिमाग शैतान का घर ।’
4. जब परस्पर मिलो तब परमेश्वर की, परमेश्वर-प्राप्त महापुरुषों की चर्चा करो । दिया तले अँधेरा होता है लेकिन दो दीयों को आमने-सामने रखो तो अँधेरा भाग जाता है । फिर प्रकाश-ही- प्रकाश रहता है । अकेले में भले कुछ अच्छे विचार आयें किन्तु वे ज्यादा अभिव्यक्त नहीं होते हैं । जब ईश्वर की चर्चा होती है तब नये-नये विचार आते हैं । एक-दूसरे का अज्ञान हटता है, एक-दूसरे का प्रमाद हटता है, एक-दूसरे की अश्रद्धा मिटती है ।
भगवान और भगवत्प्राप्त महापुरुषों में हमारी श्रद्धा बढ़े ऐसी ही चर्चा करनी-सुननी चाहिए । सारा दिन ध्यान नहीं लगेगा, सारा दिन समाधि नहीं होगी । अतः ईश्वर की चर्चा करो, ईश्वर-संबंधी बातों का श्रवण करो । इससे समझ बढ़ती जायेगी, प्रकाश बढ़ता जायेगा, शांति बढ़ती जायेगी ।
5. सदैव प्रभु की स्मृति करते-करते चित्त में आनंदित होने की आदत डाल दो ।
ये पाँच बातें परमात्मप्रेम बढ़ाने में अत्यंत सहायक हैं ।
परमात्मप्रेम में बाधक पाँच बातें
निम्नलिखित पाँच कारणों से परमात्मप्रेम में कमी आती है :
1. अधिक ग्रंथ पढ़ने से परमात्मप्रेम बिखर जाता है ।
2. बहिर्मुख लोगों की बातों में आने से और उनकी लिखी हुई पुस्तकें पढ़ने से परमात्मप्रेम बिखर जाता है ।
3. बहिर्मुख लोगों के संग से, उनके साथ खाने-पीने अथवा हाथ मिलाने से हल्के स्पंदन (‘वायब्रेशन’) आते हैं और उनके श्वासोछ्वास में आने से भी परमात्मप्रेम में कमी आती है ।
4. किसी भी व्यक्ति में आसक्ति करोगे तो आपका परमात्मप्रेम खड्डे में फँस जायेगा, गिर जायेगा । जिसने परमात्मा को नहीं पाया है उससे अधिक प्रेम करोगे तो वह आपको अपने स्वभाव में गिरायेगा । परमात्मप्राप्त महापुरुषों का ही संग करना चाहिए ।
‘श्रीमद्भागवत’ में देवहूति को भगवान कपिल कहते हैं : ‘‘आसक्ति बड़ी दुर्जय है । वह जल्दी नहीं मिटती । वही आसक्ति जब सत्पुरुषों में होती है तब वह संसारसागर से पार लगानेवाली हो जाती है ।’’
प्रेम करो तो ब्रह्मवेत्ताओं से, उनकी वाणी से, उनके ग्रंथों से । संग करो तो ब्रह्मवेत्ताओं का ही । इससे प्रेमरस बढ़ता है, भक्ति का माधुर्य निखरता है, ज्ञान का प्रकाश होने लगता है ।
5. उपदेशक या वक्ता बनने से भी प्रेमरस सूख जाता है ।

चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं… पूज्य बापूजी की तात्त्विक अमृतवाणी

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चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं… पूज्य बापूजी की तात्त्विक अमृतवाणी

श्री भोले बाबा ने कहा है :
पृथ्वी नहीं जल भी नहीं, नहीं अग्नि तू नहीं है पवन ।
आकाश भी तू है नहीं, तू नित्य है चैतन्यघन ॥
इन पाँचों का साक्षी सदा, निर्लेप है तू सर्व पर ।
निज रूप को पहिचानकर, हो जा अजर हो जा अमर ॥
आत्मा अमल साक्षी अचल, विभु पूर्ण शाश्वत मुक्त है ।
चेतन असंगी निःस्पृही, शुचि शांत अच्युत तृप्त है ॥
निज रूप के अज्ञान से, जन्मा करे फिर जाय मर ।
भोला ! स्वयं को जानकर, हो जा अजर हो जा अमर ॥
श्रीमद् आद्य शंकराचार्यजी ने इसी बात को अपनी भाषा में कहा है :
मनो बुद्धयहंकारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
सदा मे समत्वं न मुक्तिर्नबन्धः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
‘चिद्’ अर्थात् चैतन्य । ‘शिवोऽहम्’ अर्थात् कल्याणकारी आत्मस्वरूप मैं हूँ । दृढ़ भावना करो कि ‘मैं आत्मा हूँ… चैतन्यस्वरूप हूँ… आनंदस्वरूप हूँ…’ जिन क्षणों में हम जाने-अनजाने देहाध्यास भूल जाते हैं, उन्हीं क्षणों में हम ईश्वर के साथ एक हो जाते हैं । जाने-अनजाने जब हम देहाभिमान से ऊपर उठे हुए होते हैं, उस वक्त हमारा मन दैवी साम्राज्य में विहार करता है । जिस क्षण अनजाने में भी हम काम करते-करते ‘मैं-मेरापना’ भूल जाते हैं उसी समय अलौकिक आनंदस्वरूप आत्मा के राज्य में हम अठखेलियाँ करने लगते हैं और जब हम नामरूप के जगत को सत्य समझकर देखने, सुनने एवं विचारने लगते हैं, उसी क्षण अद्भुत आत्मराज्य से नीचे आ जाते हैं ।
दिन में न जाने कितनी बार ऐसी सुन्दर घड़ियाँ आती हैं, जब हम अनजाने में ही आत्मराज्य में होते हैं, आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में होते हैं लेकिन ‘यह वही अवस्था है…’ इसका हमें पता नहीं चलता । इसीलिए हम बार-बार मनोराज्य में, मानसिक कल्पनाओं में बह जाते हैं । ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो परमात्मा का दर्शन न करता हो, साक्षात्कार न करता हो लेकिन पता नहीं होता कि ‘यही वह अवस्था है…’ इसलिए प्रपंचों में उलझ जाता है ।
दूसरी बात यह है कि इन्द्रियाँ भी उसे बाहर खींच ले जाती हैं, बहिर्मुख कर देती हैं । स्वरूप का ज्ञान अगर एक बार भी ठीक से हो जाये तो इन्द्रियों के बाहर जाने पर भी वह अपने वास्तविक होश (भान) में बना रहता है ।
कई लोग सोचते हैं कि : ‘मैं ब्रह्म तो हूँ लेकिन यह भाव दृढ़ हो जाये… सोऽहम् अर्थात् वह मैं हूँ लेकिन यह भाव दृढ़ करूँ…’ तो यह दृढ़ करने का जो भाव आ रहा है वह इसीलिये कि अभी ब्रह्मतत्त्व को ठीक से नहीं समझ पाये हैं । यदि ठीक से समझ लें तो इसमें आवृत्ति की जरूरत नहीं और पा लेने के बाद खोने का भय नहीं ।
उस परमात्मा को भावना करके नहीं पाया जाता क्योंकि भावनाएँ सदा बदलती रहती हैं जबकि परमात्मज्ञान सदा एकरस रहता है । जैसे भावना करो कि ‘मेरे हाथ में चाँदी का सिक्का है ।’ आप भावना तो करेंगे लेकिन संदेह बना रहेगा कि ‘सच में है कि नहीं… या कुछ और है ?’ …लेकिन आपने यदि एक बार भी देख लिया कि ‘यह चाँदी का सिक्का है…’ तो इसका ज्ञान आपको हो गया । फिर यह ज्ञान मैं आपसे छीन नहीं सकता ।
आपको इसका विस्मरण हो सकता है, अदर्शन हो सकता है लेकिन अज्ञान नहीं होगा । ऐसे ही भगवान की भावना करते हो तो भावना बदल सकती है लेकिन एक बार भी भगवान के स्वरूप का ज्ञान हो जाये, भगवान के स्वरूप का साक्षात्कार हो जाये तो फिर चलते-फिरते, लेते-देते, जीते-मरते, इस लोक-परलोक में सर्वत्र, सर्व काल में ईश्वर का अनुभव होने लगता है । आवृत्ति करके पक्का नहीं किया जाता कि ‘मैं आत्मा हूँ… मैं आत्मा हूँ…’ क्योंकि परमात्मा तो आपका वास्तविक स्वरूप है, उसे रटना क्या ? जैसे आपका नाम मोहन है तो क्या आप दिन-रात ‘मैं मोहन हूँ… मोहन हूँ…’ रटते हो ? नहीं, मोहन तो आप हो ही । ऐसे ही ब्रह्म तो आप हो ही । अतः यह रटना नहीं है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ…’ वरन् इसका अनुभव करना है । परमात्मा के खोने का कभी भय नहीं रहता । रूपये-पैसे खो सकते हैं, पढ़ाई-लिखाई के शब्द आप खो सकते हो, भूल सकते हो लेकिन उस परमात्मा को भूलना चाहो तो भी नहीं भूल सकते । जो सदा है, सर्वत्र है, आपका अपना-आपा बना बैठा है, उसे कैसे भूल सकते हो ? उसको समझने के लिये केवल तत्परता चाहिए ।
उच्च कोटि के एक महात्मा थे । किसी शिष्य ने उनसे कहा : ‘‘गुरुजी ! मुझे भगवान का दर्शन कराइये ।’’
महात्मा ने उठाया डण्डा और कहा : ‘‘इतने रूपों में प्रभु दिख रहा है, उसका तूने क्या सदुपयोग किया ? फिर से प्रभु का कोई नया रूप तेरे आगे प्रगट कराऊँ ? कितने रूपों में वह गा रहा है ! कितने रूपों में वह गुनगुना रहा है ! उसका तूने क्या फायदा उठाया, जो फिर एक नया रूप देखना चाहता है ?’’ 
तुलसीदासजी कहते हैं :
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि ।
जड़ और चेतन सब परमात्ममय ही तो है ! जहाँ घन अवस्था है उसको जड़ बोलते हैं और जहाँ जाग्रत अवस्था है उसे चेतन कहते हैं । जैसे, एक ही पानी बर्फ भी बन जाता है और वाष्प भी । वाष्प एक सूक्ष्म और चेतन अवस्था है जबकि बर्फ घनीभूत और जड़ अवस्था है लेकिन हैं तो दोनों पानी ही । ऐसे ही चित्त की वृत्ति जब सूक्ष्म, अति सूक्ष्म होती है तब परब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है और स्थूल इन्द्रियों के द्वारा जो व्यवहार हो रहा है वह परब्रह्म परमात्मा का स्थूल रूप से साक्षात्कार ही है ।
अज्ञानी लोग देह को ही ‘मैं’ मानते हैं लेकिन देह के भीतर जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म चेतना कार्य करती है वह आनंदस्वरूप आत्मा है, सुखस्वरूप आत्मा है । परम पुरुषार्थ यही है कि उसे जान लें ।
उसे जानने की सबसे सरल युक्ति तो यही है कि ऐसी भावना करें : ‘जो कुछ दिख रहा है उसमें मेरा ही स्वरूप है ।’ जैसे केश, नख, त्वचा, रोमकूप आदि सब भिन्न-भिन्न होते हुए भी शरीर की एकता का अनुभव होता है, ऐसे ही स्थूल जगत में सब भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी ज्ञानवान् को सर्वत्र अपने अद्वैत स्वरूप का अनुभव होता है ।
‘जन्म और मृत्यु शरीर के होते हैं, जाति स्थूल शरीर की होती है, बन्धु और मित्र सब स्थूल शरीर के संबंध हैं ।
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता न जन्मः ।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
‘मैं तो चिदानंदस्वरूप हूँ… ॐ…ॐ…ॐ…’

बाह्य सुख-सुविधाओं के न होते हुए भी जितना सुख यहाँ ध्यानयोग शिविर में मिल रहा है, उतना सुख बड़ी-बड़ी होटलों में रहने पर भी नहीं मिला होगा क्योंकि वह सुख सदोष सुख था, विकारी सुख था । भगवान के रास्ते का, ईश्वरीय मार्ग का निर्दोष-निर्विकारी सुख वह नहीं था लेकिन यहाँ जो सुख मिल रहा है वह किसी विषय-भोग का नहीं, वरन् निर्विषय नारायण का सुख मिल रहा है ।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने ‘श्रीरामचरितमानस’ में कहा है :
सकल पदारथ इह जग मांही ।
कर्म हीन नर पावत नाहीं ॥

इस संसार में सब प्रकार के पदार्थ हैं फिर यत्न करके चाहे नर्क का सामान इकट्ठा करो चाहे स्वर्ग का, चाहे वैकुंठ का करो चाहे एकदम निर्दोष, शुद्ध-बुद्ध आत्मा का ज्ञान पाकर मुक्त हो जाओ… यह आपके हाथ की बात है ।

मासिक शिवरात्रि {Masik Shivratri}

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मासिक शिवरात्रि {Masik Shivratri}
वर्ष में एक महाशिवरात्रि आती है और हर महीने में एक मासिक शिवरात्रि आती है। यही मासिक शिवरात्रि यदि मंगलवार के दिन पड़े तो उसे भौम प्रदोष व्रत कहते हैं। मंगलदेव ऋणहर्ता देव हैं। उस दिन संध्या के समय यदि भगवान भोलेनाथ का पूजन करें तो भोलेनाथ की, गुरु की कृपा से हम जल्दी ही कर्ज से मुक्त हो सकते हैं। इस दैवी सहायता के साथ थोड़ा स्वयं भी पुरुषार्थ करें। पूजा करते समय यह मंत्र बोलें –
मृत्युंजयमहादेव त्राहिमां शरणागतम्।

 जन्ममृत्युजराव्याधिपीड़ितः कर्मबन्धनः।।

मासिक शिवरात्रि को शिवजी के १७ मंत्र – 
हर मासिक शिवरात्रि को सूर्यास्‍त के समय अपने घर में बैठकर अपने गुरुदेव का स्मरण करके शिवजी का स्मरण करते करते ये 17 मंत्र बोलें । ‘जो शिव है वो गुरु है, जो गुरु है वो शिव है’ इसलिये गुरुदेव का स्मरण करते है । जिसकी गुरुदेव में दृढ़ भक्ति है वो गुरुदेव का स्मरण करते-करते मंत्र बोले | आस-पास शिवजी का मंदिर तो जिनके सिर पर कर्जा ज्यादा हो वो शिवमंदिर जाकर दिया जलाकर ये १७ मंत्र बोले – 
१) ॐ शिवाय नम:
२) ॐ सर्वात्मने नम:
३) ॐ त्रिनेत्राय नम:
४) ॐ हराय नम:
५) ॐ इन्द्र्मुखाय नम:
६) ॐ श्रीकंठाय नम:
७) ॐ सद्योजाताय नम:
८) ॐ वामदेवाय नम:
९) ॐ अघोरह्र्द्याय नम:
१०) ॐ तत्पुरुषाय नम:
११) ॐ ईशानाय नम:
१२) ॐ अनंतधर्माय नम:
१३) ॐ ज्ञानभूताय नम:
१४) ॐ अनंतवैराग्यसिंघाय नम:
१५) ॐ प्रधानाय नम:
१६) ॐ व्योमात्मने नम:
१७) ॐ युक्तकेशात्मरूपाय नम: 
उक्‍त मंत्र बोलकर अपने इष्ट को, गुरु को प्रणाम करके यह शिव गायत्री मंत्र बोलें–
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे | महादेवाय धीमहि, तन्नो रूद्र प्रचोदयात् || 
जिनके सिर पर कर्जा है वो शिवजी को प्रणाम करते हुये ये १७ मंत्र बोले कि मेरे सिर से ये भार उतर जाये | मैं निर्भार जीवन जी सकूं, भक्ति में आगे बढ़ सकूं| केवल समस्या को याद न करता रहूँ | 
 

भगवान का अनुभव कैसे हो ? – पूज्य बापूजी की कल्याणकारी अमृतवाणी

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भगवान का अनुभव कैसे हो ?

पूज्य बापूजी की कल्याणकारी अमृतवाणी

परमात्मा कैसा है ? आत्मा का स्वरूप क्या है ? कोई कहता है कि भगवान तो मोरमुकुटधारी हैं । कोई कहता है कि भगवान तो मर्यादापुरुषोत्तम हैं । कोई कहता है कि भगवान सर्वगुणसंपन्न हैं । कोई कहता है कि भगवान सर्वशक्तिमान् हैं । कोई कहता है कि भगवान सर्वत्र हैं । कोई कहता है कि वे वैकुण्ठ, कैलास आदि में हैं । कोई कहता है कि भगवान हमारे हृदय में बैठे हैं । कोई कहता है कि कण-कण में भगवान हैं । कोई कहता है कि नहीं… यह सब माया का पसारा है । भगवान तो निर्गुण- निराकार हैं ।

कोई कहता है : ‘‘नहीं… निर्गुण-निराकार तुम्हारी दृष्टि में होगा । हम तो साकार भगवान को पूजते हैं । मुरलीमनोहर, मोरमुकुट एवं पीतांबरधारी जो हैं, वे ही हमारे भगवान हैं । उनको हम सुबह बालभोग, दोपहर को राजभोग एवं शाम को भी भोग लगाकर ही खाते हैं । हमारे भगवान के दर्शन करने हों तो चलो, हम तुम्हें करवाते हैं ।’’
पूछो : ‘‘कहाँ हैं भगवान ?’’
कहेंगे : ‘‘चलो हमारे साथ ।’’
ले जायेंगे पूजा के कमरे में । हटायेंगे पर्दा और कहेंगे : ‘‘ये हैं हमारे भगवान ।’’
इस प्रकार कोई कहता है कि भगवान स्थान-विशेष में हैं तो कोई कहता है वे सर्वत्र हैं । कोई कहता है वे सर्वगुणसंपन्न हैं तो कोई कहता है गुणातीत हैं । कोई कहता है वे साकार हैं तो कोई कहता है निराकार हैं । अब हम भगवान श्रीकृष्ण के पास चलते हैं और देखते हैं कि वे क्या कहते हैं । भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं :

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोतिश्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥

‘कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही (इसके तत्त्व का) आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई (अधिकारी पुरुष) ही इस आत्मा को आश्चर्य की तरह सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको (आत्मा को) नहीं जानता ।’ (गीता : 2.29)

कोई व्यक्ति भगवान को आश्चर्य की भाँति देखता है कि : ‘‘आहाहा… हमने भगवान की छवि देखी ! आज रात को मुझे ऐसा स्वप्न आया था कि ‘मोरमुकुटधारी भगवान मेरे सामने प्रकट हुए हैं और वे मुझसे पूछ रहे हैं कि, ‘क्या हाल है ?’ …और मैं कह रहा हूँ कि, ‘भगवन् ! आपकी कृपा है ।’ फिर उन्होंने बड़े प्रेम से मेरे सिर पर हाथ फेरा जिससे मैं तो गद्गद् हो गया !’’

‘कोई व्यक्ति भगवान को, आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है…’ इसका एक अर्थ ऐसा भी हो सकता है कि जैसे संसार की दूसरी चीजें देखने, सुनने, पढ़ने और जानने में आती हैं वैसे इस परमात्मा को नहीं जाना जा सकता, क्योंकि अन्य वस्तुएँ तो देह-इन्द्रिय-बुद्धि के द्वारा जानी जाती हैं जबकि परमात्मा को तो स्वयं अपने-आपसे ही जाना जाता है । इसीलिए कहा गया है :

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्…

कोई इसको आश्चर्य की तरह कहता है – आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः… क्योंकि यह परमात्मतत्त्व वाणी का विषय नहीं है । जिससे वाणी प्रस्फुटित होती है, वाणी उसका वर्णन कैसे कर सकती है ? फिर भी भगवान के गुण-कर्म, लीला-स्वभाव आदि का वर्णन करके महापुरुष लोग वाणी से उनकी ओर केवल संकेत ही करते हैं ताकि सुननेवाले का लक्ष्य उधर हो जाये ।

आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति…

कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह सुनता है क्योंकि दूसरा जो कुछ भी सुनने में आता है वह सब इन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि का विषय होता है किन्तु परमात्मा न इन्द्रियों का विषय है, न मन का और न बुद्धि का, वरन् वह तो इन्द्रियादि सहित उनके विषयों को भी प्रकाशित करनेवाला है । इसलिये आत्मा (परमात्मा) संबंधी विलक्षण बात को वह आश्चर्य की तरह सुनता है ।

श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ।
‘सुनकर भी इसको कोई नहीं जानता ।’

इसका तात्पर्य यह कि केवल सुनकर इसको कोई भी नहीं जान सकता वरन् सुनने के बाद जब वह स्वयं उसमें स्थित होगा, तब वह अपने-आपसे ही अपने-आपको जानेगा ।

श्रुतियाँ अनेक हैं, स्मृतियाँ अनेक हैं, पुराण भी अठारह हैं । इनमें जो जैसा पाता है, भगवान को ठीक वैसा-वैसा मानता है । हकीकत में अति विस्मयकारक बात और तथ्य यह है कि पशु से लेकर परम सूक्ष्म जीवाणुओं में भी वही आत्मा सूक्ष्म रूप से स्थित है । कोई उसे छोटा कहता है तो भी ठीक है और कोई उसे बड़ा कहता है तो भी ठीक है… कोई परमात्मा को सगुण-साकार कहता है तो भी ठीक है और कोई निर्गुण-निराकार कहता है तो भी ठीक है । येन-केन-प्रकारेण वह अपनी बुद्धि को भगवान में तो लगा रहा है… इस बात से हमें आनंद है । बस, हमारा यही एकमात्र कर्त्तव्य है कि हम अपनी बुद्धि को परमात्मा में प्रतिष्ठित करें ।

इस युग में अधिकांश लोग विषयपरायण हो चले हैं । विषय-भोगों में वे इतने लिप्त हो गये हैं कि जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । उस परमात्मा के विषय में जानना तो दूर, विचार तक नहीं करते । वह आत्म-परमात्मतत्त्व इतना सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है और महान् से भी महान् है कि हम उसकी कल्पना तक नहीं कर सकते । कीड़ी के पग नेवर बाजे सो वह भी साहिब सुनत हैं… इतना वह सूक्ष्म है । हमारे बोलने-चालने एवं हिलने-डुलने से कितने ही जीवाणु मर जाते हैं । वैज्ञानिक लोगों का कहना है कि जब हम बोलते हैं तब असंख्य जीवाणु मर जाते हैं । इस हाथ को उठाने एवं नीचे लाने में भी न जाने कितने ही सूक्ष्म-से-सूक्ष्म जीवाणु मर जाते होंगे ! क्षण-क्षण में लाखों-करोड़ों जीवाणु उत्पन्न होते एवं मरते रहते हैं । इस शरीर में भी असंख्य बैक्टीरिया उत्पन्न होते एवं मरते रहते हैं जो कि ‘माइक्रोस्कोप’ (सूक्ष्मदर्शी यंत्र) से देखने में आते हैं । इतने वे सूक्ष्म हैं ! जब वे जीवाणु इतने सूक्ष्म हैं तो उनका हृदय कितना सूक्ष्म होगा और उस हृदय में बैठा हुआ भगवान कितना सूक्ष्म होगा, कितना छोटा होगा ! बाल के अग्रभाग के एक लाख हिस्से करो । उसमें से एक हिस्से पर भी हजार बैक्टीरिया (जीवाणु) बैठे होते हैं और उनमें भी भगवान की चैतन्यता मौजूद होती है । आप सोचिये कि भगवान कितने समर्थ और व्यापक हैं ! किन्तु हम अल्पज्ञ हो गये हैं, उच्छृंखल हो गये हैं इसीलिये आत्ममहिमा से दूर हैं ।

एक फकीर ने कहा है : 

अल्ला रे अल्ला ! क्या फ़ैज़ है मेरे साकी का !
अपने हिस्से की भी वे मुझे पिलाए जाते हैं ॥

अर्थात् भगवान कैसे हैं ? शांति के महासागर… आनंद के महास्रोत… वे अपने हिस्से की शांति, आनंद, माधुर्य आदि का हमें अनुभव करवा रहे हैं फिर भी हम उन्हें दूर मानते हैं । हम उन्हें किसी अवस्था-विशेष अथवा स्थान-विशेष में मानते हैं जो हमारी बड़ी भारी भूल है, गलती है । इससे हमारी श्रद्धा और विश्वास डावाँडोल हो जाते हैं, चित्त में संशय हो जाता है और संशयात्मा विनश्यति ।

जहाँ संशय होता है वहाँ विनाश हुआ समझो । भगवान को जब-जब केवल आकाश-पाताल में मानेंगे, किसी मंदिर-मस्जिद-गिरिजाघर-गुरुद्वारे में मानेंगे या किसी अवस्था-विशेष अथवा स्थान-विशेष में मानेंगे, जैसे कि ‘फलानी जगह जायेंगे तब भगवान मिलेंगे… फलानी अवस्था आयेगी तब भगवान मिलेंगे… ऐसा-ऐसा करेंगे तब भगवान मिलेंगे…’ तब-तब भगवान दूर हो जायेंगे । हैं तो भगवान निकट से भी निकट, लेकिन दूर मानने से दूर हो गये और जिसने भगवान को निकट समझा, अपने हृदय में स्थित समझा उसके भीतर भगवान ने शांतिरूप से, आनंदरूप से, और भी पता नहीं किस-किस रूप से, जिसका वर्णन नहीं हो सकता ऐसे अवर्णनीय ढंग से अपने अस्तित्व का एहसास कराया, अनुभूति करायी और अपना प्रकाश फैलाया ।

भगवान को न तो किसी अवस्था-विशेष में मानना है और न ही किसी स्थल-विशेष में मानना है । वह तो सर्वत्र है, सदा है और सबके पास है । वह सबका अपना-आपा होकर बैठा है । 
कोई जिज्ञासु यहाँ प्रश्न उठा सकता है कि : ‘जब भगवान सर्वत्र है, सदा है, हमारे ही भीतर है तो फिर संतों के पास, सद्गुरु के पास जाने की क्या जरूरत ? सत्संग सुनने की क्या जरूरत ?’ 
जैसे, यहाँ आपके व मेरे पास रेडियो एवं टेलिविजन की तरंगें हैं, फिर भी हमें सुनाई-दिखाई नहीं देतीं । क्यों ? क्योंकि इस समय यहाँ पर रेडियो या टेलिविजन नहीं है, रेडियो का एरियल नहीं है, टी.वी. की ‘एन्टीना’ नहीं है । हमारे पास ये साधन-सामग्रियाँ होंगी तभी हम रेडियो भी सुन पायेंगे और टी.वी. भी देख पायेंगे । ठीक इसी प्रकार भगवान सर्वत्र हैं । रेडियो और टी.वी. की तरंगें जितनी व्यापक होती हैं उससे भी कहीं ज्यादा व्यापक भगवान की सत्ता है लेकिन उसकी अनुभूति, उसका लाभ संतों-सद्गुरुओं की कृपा से ही मिलता है क्योंकि संतों के हृदय में ही भगवान ने अपना प्रादुर्भाव कर रखा है ।

संतों ने अपने हृदय में ‘एन्टीना’ लगा रखा है । इस एन्टीना से उन्हें भगवान के दर्शन हुए हैं और उसकी महिमा का वे वर्णन भी कर सकते हैं । इसीलिए हम संतों के सान्निध्य की अपेक्षा रखते हैं । जैसे, इस पृथ्वी के वायुमंडल में रेडियो और टी.वी. की तरंगों के सर्वत्र व्याप्त होने पर भी बिना टी.वी. व रेडियो के उन्हें देखना और सुनना कठिन है, ठीक इसी प्रकार भगवान की सर्वव्यापकता होने के बावजूद भी उनके आनंद, उनकी शांति, उनके माधुर्य का अनुभव बिना सद्गुरु व सत्संग के करना कठिन है । यह अनुभव तो केवल संतों के सान्निध्य एवं सत्संग से ही प्राप्त किया जा सकता है । 

ठीक ही कहा है : 
कर नसीबांवाले सत्संग दो घड़ियाँ…

अहंकारी, मनमुख और दूसरों के यशो-तेज से उद्विग्न निंदकों के लिए नानकजी ने कहा है :

संत कै दूखनि आरजा घटै ।
संत कै दूखनि जम ते नहीं छुटै ॥
संत कै दूखनि सुखु सभु जाइ ।
संत कै दूखनि नरक मांहि पाइ ॥
संत कै दूखनि मति होइ मलीन ।
संत कै दूखनि सोभा ते हीन ॥
संत के हते कउ रखै न कोई ।
संत कै दूखनि थान भ्रसटु होई ॥
संत कृपाल कृपा जे करैं ।
‘नानक’ संत संगि निंदकु भी तरै ॥

निंदकों की बातों में न आनेवाले सत्संगी तो फायदा उठाते हैं । दृढ़निश्चयी पुण्यात्मा शिष्यों-साधकों-भक्तों के लिए मानों नानकजी कह रहे हैं:

साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥
साध संगि मलु सगली खोत ॥
साध कै संगि मिटै अभिमानु ॥
साध कै संगि प्रगटै सु गिआनु ॥
साध कै संगि बुझै प्रभु नेरा ।
साध कै संगि पाए नाम रतनु ।
साध कै संगि एक ऊपरि जतनु ॥
साध की महिमा बरनै कउनु प्रानी ।
नानक ! साध की सोभा प्रभ माहि समानी ॥

Root of All Sufferings [Chup Sadhna] Part -1

chupsadhnaPart -1

Part- 2

Param Pujya Gurudev’s golden words.
“You go anywhere, any good place, you will get some comfort, you will assume that to be happiness, but pain and sufferings will automatically generate..then you will run from there…whether you go to picnic place or to in-law’s house anywhere you go, till you are making mistake from inside… till then you won’t get complete happiness.

Who increases by happening of something is not Truth
Who decreases by happening of something is not Truth.

In the world if you get degrees, jobs, promotions, even rule of the whole earth but if you don’t have love for your inner soul, for your inner God then what is the use of all this?
Whatever you get for the body, which is going to die, is the numb part, son. And whatever goes away is the loss of this numb body. What is yours that has gone?”