Category Archives: Satsang

रामकृष्ण परमहंस के सतशिष्य नाग महाशय की कथा – प.पू.संत श्री आशारामजी बापू

 

नाग महाशय

Nag Mahashay

रामकृष्ण परमहंस के सतशिष्य नाग महाशय की कथा – प.पू.संत श्री आशारामजी बापू  

 

Durga Charan Nag better known as Nag Mahasaya, born in 1846 and died in 1899 in Deobhog village of erstwhile East Bengal and now Bangladesh, was one of the householder disciples of Sri Ramakrishna Paramahansa.

जयदेव महाराज की कथा – प.पू.संत श्री आशारामजी बापू

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जयदेव महाराज की कथा – प.पू.संत श्री आशारामजी बापू  

संत श्री आसारामजी बापू की अमृतवाणी :

2 दिसंबर 200 9

जापानी पार्क,

रोहिणी, दिल्ली

सत्संग के मुख अंश:

* गृहस्थ संत जयदेव महाराज के हाथ काट कर कुआ में डाल दीया ……

* जयदेव के हाथ काटने वालो पर प्रकृति का प्रकोप ……

* कोई भी पपी पाप करता है, कोई देखे चहे ना देखे, पापी को उस्का पाप खुतर खुतर कर खाता है ….

* जयदेव महाराज कटे हुये हाथ वापस आ गयें …

 

दुनिया में जो होता है वो अच्छा होता है और भगवान की इच्छा से होता है – प.पू.संत श्री आशारामजी बापू

 

 प.पू.संत श्री आशारामजी बापू

दुनिया में जो होता है वो अच्छा होता है और भगवान की इच्छा से होता है

दुनिया में जो होता है वो अच्छा होता है और भगवान की इच्छा से होता है – प.पू.संत श्री आशारामजी बापू    

व्यर्थ की जानकारियाँ क्यों ? -प.पू.संत श्री आशारामजी बापू

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व्यर्थ की जानकारियाँ क्यों ?

ओम …… ॐ  | ओम नारायण हरि | और फिर कोई ना सुने, जिव्हा, होंठ भी ना हिले और शांत मन में वही मंत्र स्फुरित हो जैसे मैं बोलता हूँ वैसे आप बोलो प्यार से ओम…… चुप हो गए | वही भीतर चले और शांत हो रहे हैं हम उस ओम स्वरूप इश्वर में | ये भी अपने आप में स्वतंत्र साधन है | विश्रांति योग देने में सक्षम साधन | ओम…… | चुप हो गए औए हृदय में चले | २-४ बार ….. | जितनी देर बाहर उच्चारण किया उससे थोडा समय ज्यादा भीतर उच्चारण किया और उससे भी ज्यादा शांत हो गए | ना किंचित अपि चिन्तयेत ||

ये सारी शिक्षाओ से भी ऊँची शिक्षा है |  सारी आपा-धापी के कर्मों से बहुत ऊँचा कर्म है | ओम माना वो अंतर आत्मा परमेश्वर | जिसकी सत्ता हर वस्तु में, हर परिस्थिति में, हर देश में, हर काल में है |

एक महात्मा सत्संग करते थे | किसी नास्तिक को लगा के ये क्या बात है ? क्यों लोगों का समय खराब करना ? और प्रार्थना और भगवान ये सब क्या है ? व्यंग में, विनोद में, कटाक्ष के भाव में उलझा हुआ नास्तिक था | लेकिन महात्मा को देखकर मजा आता था | सत्संगियों के बीच बैठकर उसको अच्छा तो लगता था | लेकिन ये सब क्या है ? व्हाट इस थिस ? महात्माजी का सत्संग था, उसने अपने घर से २ नारंगी उठाई | जहां सत्संगी थे उधर जा रहा था | रस्ते में एक माई लेटी थी, बूढी थी ८० साल की | उसके हाथ जेब में गए और दोनों नारंगी उठकर हाथ फैलाई माई के हाथ पे रख दी | जब वो सत्संग से लौटा, देखा वो माई बड़ी प्रसन्नता से, बडे चाव से नारंगी चूस रही थी | बोला क्या खा रही हो ? बोले भई क्या खाऊ ? मैंने अपने पिता से जो चीज माँगी भेज दी उन्होंने | गैस हो गया था | तबियत जरा अच्मचा रहा था | मैं क्या मुझ बुढिया के पास कहाँ पैसे और कहाँ खरीद करने को जाऊँ ? हे पिता नारंगी भेज दे और मैंने तो एक माँगी | मैं लेटी थी और मेरे हाथ में दो नारंगी रख गया | नास्तिक के कपाट खुल गए | कि बुढिया का मेरा कोई परिचय नही था | वो कौन प्रेरक है जो मेरे को प्रेरणा दी, २ नारंगी मैंने जेब से उठाई और बुढिया सोई थी और उसके हाथ पे रखी | एक-आध घंटे के बाद लौटता हूँ तो बुढिया नारंगी खा रही है | कौन है तुम्हारा पिता, तुम ८० साल की | बोले वो पिता वही है जो प्रार्थना सुन लेता है | और उसी के अनुसार किसी को भी प्रेरित करके अपने प्यारों को तृप्त करता है | वो ही तो है परमात्मा |  नास्तिक के कपाट खुल गए कि मैं आज तक चीख रहा था, चिल्ला रहा था के प्रार्थना-व्रार्थ्ना में कुछ नही रखा | ये हरि ओम, हरि ओम में कुछ नही रखा | अब ये माई को तो पता नही, मेरे को भी पता नही, वो कौन प्रेरक है जो मेरे को २ नारंगी उठवाई और फिर सीधा मैं इस माई के हाथ में रख के गया सत्संग सुनने व्यंग में, मजाक में | और फिर प्रेरणा मिली माई से बात करने की | मेरे भ्रम को दूर करने वाला और माई के मनोरथ को पूर्ण करने वाला वो कोई आकृति वाला नही है | सारी आकृतियाँ जिससे चलती हैं महात्मा ने कहा वही परमेश्वर है |

उच्च शिक्षा और तुच्छ शिक्षा, साधारण पढ़ाई और ऊँची पढ़ाई जरा समझ लें | ऊँची पढ़ाई किसको कहते हैं और तुच्छ पढ़ाई किसको कहते हैं ?

तुच्छ पढ़ाई वो है जो तुच्छ शरीर को मैं माने और तुच्छ वस्तुओं की तरफ तुम्हारी इच्छाएँ, ख्वाइशे, वासनाएँ बढाएँ | एम.बी.ए. कर लो मतलब गंजे आदमी को भी कंघी बेच दो | नागालेंड में जो कपड़े नही पहनते उनको कपड़े धोने वाला साबुन पकड़ा दो | पैसे निकालो | ये तुच्छ शिक्षा है |

कबीरजी उच्च शिक्षा बोलते हैं | कबीरा आप ठगाइयो और ना ठ्गियो कोई | आप ठगे सुख उपजे और ठगे दुःख होए | तो उच्च शिक्षा क्या है ? उच्च शिक्षा है, महत्वपूर्ण शिक्षा है, शुद्ध प्रेम, आनंद कैसे बढ़े ? उसका उपाय और उसके तरफ की यात्रा |

उत्साही दृष्टि कैसे बढ़े ? कैसी भी परिस्थिति आये, हार कर उद्विघन होकर भागा-भागी ना करे | लेकिन परस्थिति के सर पर पैर रखके अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाये, फिसले नही | दुःख कैसे मिटे ? ये उच्च शिक्षा का उद्देश्य है | दुःख आये लेकिन हम तक दुःख ना पहुंचे, ये क्या कला है ? ये उच्च शिक्षा बताती है | आत्मविश्वास और एकाग्रता कैसे पाये ? ये उच्च शिक्षा का उद्देश्य है | महत्वहीन शिक्षा क्या है, अनावश्यक डिग्रियाँ, पढ़ते रहें, डिग्री तो ले लें | डिग्री तो मिल जाये और डिग्री लेके भटक रहें हैं | अनावश्यक डिग्रियाँ लेना, व्यर्थ चीजों को याद करना, व्यर्थ विषयों में उलझते रहना | व्यर्थ विषयों को याद रखना | व्यर्थ जानकारी एकत्रित करना | और किसी के क्षणिक प्रभाव में आ जाना | किसी का रूप, लावण्य देखकर इम्प्रेस हो जाना | किसी का कुछ देखकर प्रभावित हो जाना | लट्टू हो जाना | ये महत्वहीन शिक्षा है | जगतराम अनपढ़, गवार था | नाम तो जगतराम था पर अनपढ़, गवार था | हरिहर बाबा को कहा बाबा, मैं तो अनपढ़, गवार | मेरा भला हो जायेगा क्या ? मैं पढा-लिखा कुछ नही हूँ | और बाहर की योग्यताओ से दुःख नही मिटते | दुःखहारी प्रभु मेरे हैं | मैं पढा-लिखा हूँ या नही हूँ लेकिन तुम्हारा हूँ | मैं तुम्हारा हूँ | भीतर ओम……. | शांत हो गया और उस शांति से भीतर में भगवान का प्रसाद आया | महाराज भगवान कैसे हैं मैं तो नही जानता | मोको तो आप ही भगवान लगो | ओम….. | महाराज दिखे, महाराज से मन ही मन बाते करे | धीरे-धीरे मन शांत और गुरु भाव में इतना एकाग्र की जो होने वाला हो वो बोल देवे | जो मन में सोचे वो चीज, वस्तु, परिस्थिति आजाये | क्योंकी उच्च शिक्षा के मूल तक पहुंच गया |

आप जो लेते हैं वो प्राण, प्राण-अपान की क्रिया से सब व्यवहार चलता है | जैसे पौधा है तो उसकी प्राण शक्ति उपर ले आती है उसके पत्ते, फुल, टहनियाँ | और अपान शक्ति जड़े नीचे को जाती हैं | ऐसे ही आपके जीवन में भी चंद्र, सूर्य का प्रभाव | प्राण-अपान का प्रभाव जैसे सूर्य से आकर्षित चंदा और चंदा में सूर्य का प्रभाव | तो आपकी जो प्राण-अपान शक्ति चल रही है या जीवन चल रहा है | जब अपान का महत्व बढता है, नीचे के केन्द्रों में जीते हैं और दुष्ट वासनाओं की पूर्ति में लगते हैं | तमोगुण की प्रधानता होती है | वो नारिकीय जीवन का अधिकारी हो जाता है | कैसा भी करो, खाओ, पियो, भोगो, वार-तिथि का पता नही | अपान के आकर्षण में चलेगा, देखा जायेगा | हम नही मानते, ये अपान का आकर्षण नीचे के केन्द्रों में जीने वाले व्यक्ति को उलझा देता है | तमस होता है फिर |

रजस होता है तो कुछ में फिसलता है, कुछ में टिकता है |

जब सत्वगुण बढता है तो अपान के आकर्षण से, नीचे के केन्द्रों से, बातों से आकर्षित नही होता | भजन्ते माम दृढ़ व्रतः || दृढ़ता होगी, वो स्वर्गीय सुख का अधिकारी और तत्वज्ञानी गुरु मिल जाये तो आत्म साक्षात्कार कर ले | उन्नति की लिए प्राण को महत्व दो और अवन्ती के लिए अपान | तो अपन जब हरि ओम बोलते हैं तो प्राण उपर आते हैं | हरि, ओम, राम इन शब्दों से प्राण शक्ति हमारी उपर के तरफ चलती है |

मनुष्य का जन्म प्रज्ञा, बुद्धि, और कर्म का मिश्रण है | बुद्धि से निर्णय करेगा और इन्द्रियों से कर्म करेगा | बुद्धि और कर्म के मिश्रण से जो कर्म करके, बुद्धि से निर्णय करके कर्म करके सुखी होना चाहता है, डिग्रीयां पाकर सुखी होना चाहता है, पति पाकर, पत्नी पाकर, भोग पाकर, वाह-वाही पाकर सुखी होना चाहता है, उसको सुखद अवस्था तो मिलती है लेकिन उसका प्राण और मति प्रवृति की तरफ है | संसार के तरफ | और संसार फिर अपान में ले जायेगा | लेकिन जो वासना पूर्ति की इच्छा छोड़ने वाला सत्संग समझ लेता है कि वासना पूर्ति का सुख पतन की तरफ ले जायेगा, लेकिन वासना निवृति का सुख परमात्मा में ले जाता है | तो फिर वो वासना, अपनी इच्छा पूरी हो तो उस पचड़े में नही पड़ता | इच्छा निवृत हो उस सूझ-बूझ  में पड़ता है | तो बोले भगवान को पाने की इच्छा भी नही करे | भगवान को पाने की इच्छा सारी इच्छा को मिटाने का एक सबल साधन है | सारी इच्छा मिट गयी तो फिर भगवान को पाने की इच्छा भी अपने-आप शांत हो जाती है | भगवान ही प्रकट हो जाते हैं | तो संकल्प पूरा करके सुखी होना, वे लोग चमचों के चक्कर में आ जाते हैं | परिस्थिति के चक्कर में आ जाते हैं | राग-द्वेष के चक्कर में आ जाते हैं | एक बार राजा बन जाऊँ, ५ साल के लिए, बाबाजी आशीर्वाद करो | ५ साल हो गए फिर बाबा फिर से दया करो, फिर से दया करो, अब फिर फिर करते बाबा की जरूरत ही नही है | बाबा को कुचलो | ये अपान वृति जीव को अधोगति की तरफ ले जाती है |

संकल्प की निवृति की तरफ महत्व देते हो तो आपको अंदर का सुख मिलेगा | अंदर का सामर्थ्य मिलेगा और जीते-जी आप परिस्थितियों के प्रभाव से आप मुक्त हो जायेंगे | मरने का भय नही रहेगा, जीने की आशा नही रहेगी | जीवन में एक अवर्णीय शांति, अवर्णीय सामर्थ्य | कोई खोज-खोज के भी नी बता सके और आप जो बताएँगे वही बात सच्ची निकलेगी | नानक बोले सहज स्वभाव | वासना रहित जीवन में सहज स्वभाव | परमात्म ज्ञान, परमात्म हो जाते हो तुम | तो महत्वपूर्ण शिक्षा प्रेम, आनंद, उत्साह, दूरदृष्टि, सत्य संकल्प, सत्य परिणाम, सत्य वाक्य और महत्वपूर्ण शिक्षण | अनावश्क डिग्रीयां, अनावश्क सुचना, अनावश्क बोलना, हाथ हिलाते रहना, ये करना, मान नही है तो तुच्छ जीवन है तो चंचलता है | ये जन लो, वो सीख लो, वो सीख लो | जहाज में भी बैठेंगे तो बोलो थोड़ी देर शांत हो जाओ | तो वो पढेंगे, वो पढेंगे | बस खोपड़ी में भरो, भरो…. | नॉलेज, नॉलेज क्या कचरा भर के ? खिन्न हो जाते हैं | विश्रांति ओम….. | मन इधर-उधर जाता है तो दीर्घ उच्चरण फिर प्लुत या हर्ष उच्चारण |  जैसे भी मन शांत हो | इच्छाओ की गुलामी ना हो | परम आत्म शांति बढ़ जाये | व्यर्थ की जानकारियों में दिमाग खराब ना करें |

शिव के द्वादश बारा ज्योतिर्लिंग की कथा और महत्त्व

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१२  ज्योतिर्लिंगों का महत्व व महिमा

भगवान शिव की भक्ति का महीना सावन शुरू हो चुका है। शिवमहापुराण के अनुसार एकमात्र भगवान शिव ही ऐसे देवता हैं, जो निष्कल व सकल दोनों हैं। यही कारण है कि एकमात्र शिव का पूजन लिंग व मूर्ति दोनों रूपों में किया जाता है। भारत में १२ प्रमुख ज्योतिर्लिंग हैं। इन सभी का अपना महत्व व महिमा है।

ऐसी मान्यता भी है कि सावन के महीने में यदि भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किए जाएं तो जन्म-जन्म के कष्ट दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि सावन के महीने में भारत के प्रमुख १२ ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। आज हम आपको बता रहे हैं इन १२ ज्योतिर्लिंगों का महत्व व महिमा-:

१] सोमनाथ : सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है, कि जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चन्द्र देव ने की थी। विदेशी आक्रमणों के कारण यह १७  बार नष्ट हो चुका है। हर बार यह बिगड़ता और बनता रहा है।

२] मल्लिकार्जुन : यह ज्योतिर्लिंग आंध्रप्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं।

कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं।

३] महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग : यह ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है। उज्जैनवासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं।

४] ओंकारेश्वर : ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग ॐकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।

५] केदारनाथ : केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के १२ प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ समुद्र तल से ३५८४ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है।

६] भीमाशंकर : भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से इस मंदिर का दर्शन प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।

७] काशी विश्वनाथ: विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे।

८] त्र्यंबकेश्वर : यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा।

९] वैद्यनाथ : श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह स्थान झारखंड राज्य (पूर्व में बिहार ) के देवघर जिला में पड़ता है।

१०] नागेश्वर ज्योतिर्लिंग : यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी १७ मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शन के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।

११] रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग : यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरं नामक स्थान में स्थित है। भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है।

१२] घृष्णेश्वर मन्दिर : घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।

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