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Veshya Ki Putri Kanupatra ki Bhagwad Bhakti- Pujya Bapuji

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Vaishya Ki Putri Kanupatra ki Bhagwad Bhakti- Pujya Bapuji
Shayama naam ki vaishya kaami logo ko apna sharir bech kar gujara karti thi.. uskibeti kanupatra jitni bahar se sundar thi utni hi andar se bhi sundar thi…usne apni maa se vaishya ka dhanda karne se mana kar diya.. to maa ne use kisi sabhya vyukti se shadi karke ghar basane ki salaah di.. lekin kanupatra patni ke haad mans ko noch kar sukhi  hokar apne or patni ke swasthaya ka satya naash karne wala pati nahi chahti thi.. Jo patni ko bhi bhagwan ke raste chalne me madad kare or  khud bhi bhagwan me man lagaye aisa pati chahti thi.. lekin aisa pati to ya to bhagwan ko paya hua mahapurush ho sakta hai ya bhagwan swayam honge.. ab brahmgyani kaha dhoodu.. to brahm swaroop bhagwan vitthal ke paas jane lagi.. or bhagwan ko 1 tak dekhti.. ektak dekhne se sankalp vikalp kam hote hai to mansik shaktiya viksit hone lagi..dhyan moolam guru murti se chithda pahan ne wala eklavya itna uncha gaya ki arjun jinko satat bhagwan ka sang the we bhi uske age bone ho gaye.. bhagwan or guru jab apne lagne lagte hai to unme prema bhakti jaagti hai.. or prema bhakti dosho ko har leti hai.. uska sondarya or shraddha bhakti dekh kar sab uski sarahna karne lage or wahi uske liye musibat ban gaya..

Yuvtiyo ke liye 2 musibat hai 1 to unka saundrya or dusra unka yowan teen cheeze badi khatarnaak hai or badi hitkari hai youvan ,swasthya or dhan.. ye teno agar sukh bogne me lagte hai to tabah kar dete hai.. aj kal ke yuvaan bahar ke saundrya ko mahatva dekar andar ke saundarya ko nazar andaaz kar dete hai.. naak me kya bhara hai mans hai rakh hai kuch addiya hai sharir meky hai kuch adi haddi kuch khadi haddi 
1 civil surgeon ke agrah se hum ceserion dekhne gaye the waha ka drishya dekh kar hi mujhe low BP ho gaya itna khatarnaak drishya tha.. ye sharir jo bahar se sundar dikhta hai andar thoda sa dekho to tauba hai..

Kanupatra is sharir ki pol jaankar bhagwan ki bhakt ban gayi thi.. vdarbh ke badshah ne uski sundarta ki sarahna sunkar raja ne mantri adi ko use lane bhej diya.. stri me nazar parakhne ka sadgun hota hai jaha bhi thodi nazar idhar udhar hui to wo smajh jati hai ye behan ke bhaav se baat kar raha hai ya kisi galat bhaav se wo turant savdhaan ho jayegi..jab mantri ne use chalne k agrah kiya to wo samajh gayi.. us samay womandir ke paas thi.. usne kaha me jaantu hu agar me nahi jaungi to aap mujhe bal poorvak le jaogelekin pahle mujhe jara mandir ke darshan kar lene dijiye.. 

Darshan karte karte prarthana karte karte wo aisi antaran ho gayi.. kipandurang me tumhri sharan hu.. ab tumhari sharan ayi hu or me dukhiyari hu.. sansaar ki sharan jaungi to mera dukh nahi mitega lekin tumhari sharan jaungi to mera dukh nahi tikega ye mujhe poora vishwas hai..sant vachan pramaa hai.. o bhagwan ki sharan jate hai uska dukh tikta nahi or jo sansaar ki sharan jate hai unka dukh mit ta nahi.. me terisharan ayi hu mere pandurang ab is kaam vikaar ke putle jaise sharir se mujhe kya lena? Mai tumko var chuki hu.. ab tumhari sati ko koi kami kaise le ja sakta hai.. sansaar ka pati mitra pita pati 1 sath nahi ho sakta lekin tum mere pati bhi ho pitabhi ho putra bhi ho bandhu bhi ho or guru bhi.. jo bhi sambandh mano lekin mujhe apne charno me le lo..ektak dekhte dekhte dekhte kanupatra wahi dhal gayi.. uski jeev rupi kyoti param vyapak pandurang tatva me mil gayi.. ghada foota to akash kaha gaya mahakash me mil gaya.. uske sharir ki antyesthi kar ke uski haddiya mandir ke dakshin bhaag me gaad di gayi.. jis se duniya ko pata chale ki jab dukh aaye to dukh hari hari ki sharan jao.. chahe sharir mito chahe dukh mito.. par tumhara dukh nahi tikega.. kanupatra ka to sharir na rahne ke baad sharir nahi tika lekin aisa jaruri nahi hai ki sab ka kanuptra jaisa sharir choot jaye usne sankalp kiya tha.. ki is kami purusho ke akarshan ka kendr tum le lo or mujhe apne me mila do.. jaisi apne sankalp ki dhara drad hoti hai bhagwan aisa kar dete hai.. pandurang ki moorti ke age aaj bhi kanupatra ki moorti khadi hai bhagwan ke darshan to bhakt karte hai lekin jo vaishya ka dhandha kar rahi hai uski putri ke bhi darshan log karte hai.. 

दृढ़ संकल्प से ईश्वर प्राप्ति – पुराना दुर्लभ सत्संग

संत आसाराम बापू, ब्रम्ह ज्ञानी, कवि कालिदास, कवि दंडी, सरस्वती, श्री कृष्ण, ज्ञानी, देवता, राग-द्वेष, ब्राह्मण, संत, त्राटक, दृढ़ निश्चय

  • कवि कालिदास और कवि दंडी में कौन श्रष्ठ ?
  • माँ सरस्वती की आराधना
  • श्री कृष्ण – ज्ञानी मेरा स्वरुप
  • ज्ञानी की कोई इच्छा नहीं
  • देवता की आराधना
  • राग-द्वेष से शाक्तियो का नाश
  • एक ब्राह्मण की कथा
  • संत के संकेत से लाभ
  • त्राटक- एकाग्रता बढ़ाने की कुंजी
  • दृढ़ निश्चय -आत्म ज्ञान की कुंजी

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वास्तविक सुख का रहस्य – पुराना दुर्लभ सत्संग

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  • ब्रह्मज्ञानी ही जीवन मुक्त पुरुष
  • युक्ति से मुक्ति
  • ज्ञान से अंतःकरण की शुद्धि
  • दों प्रकर की विद्या : ऐहीक विद्या और ब्रह्म विद्या
  • सुकरात के जीवन का एक किस्सा
  • ज्ञान-विज्ञान परमात्मा
  • परमात्मा सबका  दाता
  • भगवान के स्वभाव को उजागर करते हुए ब्रह्मज्ञानी
  • ईश्वर प्राप्ति की ओर
  • क्षमा करो भगवन्

तत्वज्ञान के मोती – पुराना दुर्लभ सत्संग

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  • उलझे जीवन को सुलझाना 
  • ज्ञानी का शरीर चिन्मय 
  • ज्ञानी का तेज- ब्रह्मतेज
  • ब्रह्मज्ञानी का सानिध्य, सौभाग्य का अवसर
  • आत्म शांति है केवल सच्ची शांति
  • संत  सानिध्य – जीवन मुक्ति का उपाय 
  • गुरु-शिष्य परंपरा 
  • ब्रह्मावस्था सब से बड़ी अवस्था
  • अविकंप योग  – परम सुख की और 
  • रामकृष्ण परमहंस की कथा

भगवान के गुण अपने में आने दो ….

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कबीरा आप ठगायियो
और ना ठगियो कोई
आप ठगे सुख उपजे
और ठगे दुःख होई

किसी से धोका कर के आप ने उस के 25-50 हजार या लाख छीन लिए..तो वो मरता तो छोड़ के जाता..तो मरने के बाद छोड़ के जाने वाली चीज आप ने छिनी, लेकिन आप ने अपना ह्रदय खराब किया..आप मरने के बाद भी वो आदत और वो करम आप को तपाएगा..किसी का मैं बुरा चाहू तो उस का बुरा हो ना हो, लेकिन मेरा ह्रदय तो अभी से ही बुरा होने लगेगा..बुरा करने में सफल भी हो गया तो अहंकार बढेगा.. और दूसरों का बुरा करूंगा..अगर भला करने में सफल होता हूँ तो उस का तो बाहर का भला होगा, लेकिन मेरा तो ह्रदय भला होता चला जाएगा..ऐसा भला होगा, ऐसा भला होगा की भला बढ़ते बढ़ते भगवान की व्यापकता और मेरे दिल की व्यापकता एकाकार भी तो हो जाती है!

इसलिए भगवान के गुण अपने में आने दो.. क्यों की आप का असली स्वरुप भगवान से मिलता है..नकली स्वरुप संसार से मिलता है..शरीर नकली स्वरुप है..पहेले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा..बिच में दिख रहा है..स्वप्ना नकली होता है तो बिच में दीखता है न? ऐसे ही ये शरीर पहेले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा…लेकिन शरीर के पहेले तुम थे…
बचपन चला गया तब भी तुम थे..जवानी बुढापे में कब बदली पता नहीं लेकिन उस को जानने वाले तुम हो! और ये शरीर मर जाएगा उस के बाद भी तुम रहेते हो..तो तुम हो सत !

जो ‘सत’ है , वो चेतन भी है..हाथ को पता नहीं..हाथ चेतन नहीं, तुम्हारी चेतना से हाथ चेतन है..तो आप सत है, चेतन भी है..और जो सत है चेतन है वो आनंद स्वरुप भी है..अपने आनंद स्वभाव को जगाओ तो संसार के सुख लोलुपता से आप बच जायेंगे..फिर आप जहां नजर डालेंगे वहा सुख लहेरायेगा..
ब्रम्हग्यानी महापुरुषों की जहा निगाहें पड़ती है वहा लोग सारी सुविधाएं छोड़ कर धरती पर बैठ कर, भूक प्यास सहे कर भी उन के दर्शन से चिन्मय आनंद पाते है..

ब्रम्हग्यानी की मत कौन बखाने
नानक ब्रम्हाग्यानी की गत मत ब्रम्हग्यानी जाने

ये आत्म विद्या है..
भौतिक विद्या ..अधि दैविक विद्या और आत्म विद्या..३ विद्या है ..
सा विद्या या विमुक्तये..

जो सारे दुखो से, सारी चिंताओं से, सारे पापों से, तापों से मुक्त कर दे उसे आत्म विद्या कहेते है..जितने अंश में आप ये आत्म विद्या आत्म सात करते है उतने अंश में आप का शरीर का प्रभाव, दुखों का प्रभाव , विकारों का प्रभाव हलका फुलका हो जाएगा..

आप चाहते है क्या की हम दुखों के प्रभाव में दबे रहे? नहीं!
आप चाहते है क्या की हम विकारों के प्रभाव में दबे रहे? नहीं!
तो श्रीकृष्ण कहेते है की आओ! मेरे पास अध्यात्म बुध्दी ले लो!…अध्यात्म बुध्दी का नाम क्या है?

प्रसादे सर्व दुखानाम
हानि रस्योप जायते
प्रसन्न चेतसो यासु
बुध्दी पर्यवितिष्टते

उस आत्म प्रसाद से , ब्रम्हज्ञान के प्रसाद से सारे दुखों का अंत होता है..और आप की बुध्दी में परमात्म रस जगमगाता है..बुध्दी बलवान होती है तो मन को नियंत्रित रखती है..और मन इन्द्रियों को नियंत्रित रखता है..आप जानते हो गलत है फिर भी इन्द्रियों का प्रभाव मन को खींचता है..मन का प्रभाव बुध्दी को खींचता है और आप ना चाहते हुए भी गलतियाँ करते रहेते है..तो बाद में उस का फल भी भोगना पड़ता है..

अगर आप आत्म-विश्रांति का अभ्यास करे तो बुध्दी बलवान होगी..मन को नियंत्रित करेगी.. तो मन भी बलवान होगा..तो इन्द्रिया भी नियंत्रण में रहेंगी..आप की गाडी ठीक जगह पर चलेगी..आप तेजस्वी बनेंगे..बुरी जगह से अपने को रोकने में सफल हो जायेंगे..अच्छे लोगों का साथ सहयोग करने में आप बलवान हो जायेंगे..

तो रोज सुबह उठते समय जो नींद में से हमें जगाता है वो कौन है? कैसी कृपा है!
और रात को थके थकाए आप को अपनी नींद भरी गोद में ले जाता है वो कौन है?

पैसो से तुम एयर कंडीशन कमरा बना सकते हो; नींद तो उस की देन है!
पैसो से तुम पकवान व्यंजन बना सकते हो; भूक तो उस की देन है!
ऐसे ही दुनिया की चीजे ला कर तुम सुख के साधन जुटा सकते हो
लेकिन सुख और प्रसन्नता तो किसी संत और प्यारे प्रभु की देन है!
नहीं तो प्रसन्नता कहाँ मिलती है?

अगर अंतरात्मा में सुख होता तो क्लबों में क्यों जाते? काय को एक दुसरे की थूक चाटते? काय को शराब पिते ? काय को गाय का मांस खाते और आत्मह्त्या करते?
क्लबों में सुख होता तो सारे क्लबी सुखी हो जाते!

अगर सत्ता में सुख होता तो सारे सत्ताधीश सुखी होते! एलिज़ाबेथ बोलती सारी सत्ता ले लो , एक घंटा जीवित रखो तो मैं प्रार्थना कर लूँ..पश्चाताप कर लूँ ..मरने के बाद कहा जाउंगी आई डोंट नो …
अरे! मरने के बाद क्या हम तो जीते जी हम जिस के है उस के साथ मिलेंगे!..

निज ज्ञान का आदर – दुर्लभ सत्संग

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  • मनुष्य का विवेक
  • सब परमात्मा का स्वरुप
  • शरीर में ही स्वस्थ मन तथा आत्मा का निवास
  • शरीर को मैं मानना ही मूर्खता
  • परमात्मा सबका सहारा
  • परमात्मा – आनंद का सागर
  • संसार से वैराग्य
  • पति-पत्नी का मधुर व्यवहार
  • प्राप्त वस्तुओं का सदुपयोग
  • ईश्वर की सुन्दर व्यवस्था
  • ईश्वर सत्य है

साधक की साधना कब पूर्ण होती है ?

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  • तीर्थ यात्रा से भव की शुद्धि
  • उपासना से मन शांत
  • ऋषि विश्वामित्र की एकाग्रता
  • मन-बुद्धि से आत्मा की सत्ता का प्रतिपादन
  • अंतर करण के 3  दोष
  • नामदेवजी की कथा
  • आत्मज्ञान की प्राप्ति
  • कालीमाता ने ली बलि
  • ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर , कार्य करें न शेष
  • जीवन परिवर्तनशील
  • राग-द्वेष से मुक्ति

अमृत तत्व की प्राप्ति – पुराना दुर्लभ सत्संग – आशारामजी बापू

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महत्वपूर्ण बातें ;

  1. ब्रह्मा जी का ज्ञान
  2. मानस पुत्र की कथा – सनकादि ऋषि का जीवन
  3. चैतन्य परमात्मा की सत्ता – गुरु परम्परा में विश्वास
  4. पुलस्त कुल का इतिहास
  5. देव गुरु बृहस्पति की कथा
  6. देवराज इन्द्र के जीवन का रहस्य
  7. ब्रह्म ज्ञान : परम सुख – परम आनंद
  8. उन्नति का रहस्य – यौवन सुरक्षा
  9. महात्मा गांधी का जीवन

निश्चिन्त होते जाओ – मौन साधना – संत श्री आशारामजी बापू

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तात्विक सत्संग : –

निश्चिन्त, निर्भिक और आत्मियता से जियो। ये तिन सूत्र जानो …।

जो तुम्हे दुर्बल बनाये उसे त्यागो ।

मुक्तानंद स्वामी और भक्त की कथा |

विश्रांति का प्रयोग |

भगवान किसी देश, काल, वस्तु, अवस्था मे है ऐसी भ्रमणा छोड दो ।

सूक्ष्म अहंकार क्या है?

श्वासों-श्वास का तारिका।

शत्रु-विरोधियों को भगवान प्रेरित करते हैं?

कुत्ते के पिल्लो को कौन प्रेरित करते हैं?